श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2112, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/213-220 तीसरा अध्याय 95
[बायाँ स्तम्भ]
श्रीअद्वैताचार्यके साथ मिलन :-
आचार्ये मिलिया कैला दण्डवत् प्रणाम।
अद्वैत आलिङ्गन करि' करिला सम्मान ॥ 213 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यसे
मिलकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्यने
उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया॥ 213 ॥
आचार्यके द्वारा श्रीठाकुरका आनुकूल्य-विधान
और गीता-भागवत-कीर्तन :-
गङ्गातीरे गोफा करि' निर्जने ताँरे दिला।
भागवत-गीतार भक्ति-अर्थ शुनाइला ॥ 214 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने गङ्गाके तटपर निर्जन
स्थानपर एक गुफा बनाकर श्रीहरिदास ठाकुरको रहनेके
लिये दे दी और उन्होंने श्रीहरिदास ठाकुरको भागवत
तथा गीताके भक्तिपरक अर्थोंका श्रवण कराया॥ 214 ॥
दोनोंका नित्य कृष्णकथा-संलाप :-
आचार्येर घरे नित्य भिक्षा-निर्वाहण।
दुइ जना मेलि' कृष्ण-कथा-आस्वादन ॥ 215 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके घरपर नित्य श्रीहरिदास
ठाकुर भोजन ग्रहण करते और दोनों मिलकर
श्रीकृष्ण-कथाका आस्वादन करते॥ 215 ॥
श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :-
हरिदास कहे, — “गोसाञि, करि निवेदने।
मोरे प्रत्यह अन्न देह' कोन् प्रयोजने ? ? 216 ॥
महा-महा विप्र एथा कुलीन-समाज।
आमारे आदर कर, ना वासह लाज ! ! 217 ॥
अलौकिक आचार तोमार, कहिते पाइ भय।
सेइ कृपा करिबा, —याते तोमार रक्षा हय ॥" 218 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, — “हे गोसाईं, मैं
आपसे एक निवेदन कर रहा हूँ। आप प्रतिदिन मुझे
किस उद्देश्यसे भोजन कराते हैं? यहाँ शान्तिपुरमें
बड़े-बड़े ब्राह्मण वास करते हैं और कुलीन समाज है।
[दायाँ स्तम्भ]
यद्यपि मैं तो नीचकुलका हूँ, तथापि आप लज्जाका
भय नहीं करके मुझे इतना आदर देते हैं। आपका
आचरण अलौकिक अर्थात् संसारकी मर्यादासे परे है।
यद्यपि आपको यह सब कहते हुए मुझे भय लगता
है, तथापि आप मुझपर ऐसी कृपा करना जिससे
आपकी समाजमें निन्दासे रक्षा हो ॥” 216-218 ॥
अनुभाष्य— 'रक्षा'- व्यवहारिक लोकसमाज रक्षा अथवा
सामाजिक लज्जा-निन्दादिसे रक्षा ॥ 218 ॥
जगद्गुरु लोकशिक्षक श्रीअद्वैताचार्यके निरपेक्ष
सात्वत-शास्त्र-सम्मत वचन :-
आचार्य कहेन, — “तुमि ना करिह भय।
सेइ आचरिब, येइ शास्त्रमत हय ॥ 219 ॥
तुमि खाइले हय कोटि ब्राह्मण-भोजन।”
एत बलि' श्राद्धपात्र कराइला भोजन ॥ 220 ॥
अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा, — “हे हरिदास ठाकुर !
आप भय मत कीजिये। मैं शास्त्रोंके मतके अनुसार
ही आचरण करूँगा। आपको भोजन करानेसे करोड़ों
ब्राह्मणोंको भोजन कराना हो जाता है।” यह कहकर
श्रीअद्वैताचार्यने श्रीहरिदास ठाकुरको श्राद्ध-पात्रका भोजन
कराया॥ 219-220 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'श्राद्धपात्र', -श्राद्धके दिन
गृहस्थ-वैष्णवोंको भगवान्को निवेदन करके सब प्रकारकी
खाद्य वस्तुओंको वैष्णवों और ब्राह्मणोंको भोजन
करानेका विधान है। श्रीअद्वैतप्रभुने संसारमें उस प्रकारके
श्राद्धदिवसके उपस्थित होनेपर श्रीहरिदासको श्राद्धपात्र
(अप्राकृत ब्राह्मण गुरु मानकर) खिलाया ॥ 220 ॥
तीसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य—भक्तिसन्दर्भकी 177 संख्यामें उद्धृत
गरुड़पुराण वचन, —
“ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते।
सत्रयाजि सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः ॥
सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णु-भक्तो विशिष्यते।
वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते ॥”