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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2110, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2110

[ 3/196–204 तीसरा अध्याय 93
आदि आचार्योंके प्रति किस प्रकारसे विद्वेष किया है।
इसलिये जिस प्रकार प्रपञ्चमें भगवान्‌के आविर्भावके
साथ-साथ रावण, जरासन्ध, शिशुपाल, दन्तवक्र, कंस,
पूतना, अघासुर, बकासुर आदि लीलापोषणकारी असुर
जन्म ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार युग-युगमें आचार्यगणोंके
आविर्भूत होनेपर उनकी लीलापुष्टि करनेके लिये असुर
स्वभाववाले व्यक्तियोंकी भी वृद्धि होती है। चिरकालसे
यह जगत्‌की एक प्रथा है। श्रीविष्णुस्वामी, श्रीरामानुज,
श्रीमध्व, श्रीनिम्बार्क आदि आचार्योंकी जीवनीकी आलोचना
करनेपर भी इस बातकी साक्षी पद-पदमैं देखी जाती
है। जब आचार्यके विरुद्धमें समस्त अनाचारी समाज
विद्वेष करके अन्धतामिस्रमें प्रवेश करनेके लिये कृतसङ्कल्प
होता है, तब भी आचार्य सत्यकी सुदृढ़ नींवपर दृढ़तासे
खड़े रहकर उच्च स्वरसे सनातनी वाणीकी घोषणा
करनेमें एक पद भी पीछे नहीं हटते हैं। इसके द्वारा
ही आचार्यका आचार्यत्व प्रमाणित होता है।—“गौड़ीय
चतुर्थ खण्ड” ॥ 196 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शपथको स्वीकार करना :—
हरिदास कहेन,—“यदि नामाभासे 'मुक्ति' नय।
तबे आमार नाक काटिमु,—एइ सुनिश्चय ॥”197 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“यदि नामाभाससे
मुक्ति नहीं होती हो, तो निश्चय ही मैं अपनी नाक
काट दूँगा ॥”197 ॥
सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा ब्रह्मबन्धुको धिक्कार-देना :—
शुनि' सभासद् उठे करि' हाहाकार।
मजुमदार सेइ विप्रे करिल धिक्कार ॥ 198 ॥
अनुवाद—इस प्रकार गोपाल-चक्रवर्त्तीकी चुनौतीकी
बात सुनकर सभामें उपस्थित सभी व्यक्ति उठकर खड़े
हो गये और हाहाकार करने लगे। श्रीहिरण्य तथा
श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस ब्राह्मण अर्थात् गोपाल-चक्रवर्त्तीको
धिक्कार दिया ॥ 198 ॥
उसे नास्तिक हेतुवादी जानकर बलराम आचार्यके द्वारा
तिरस्कार और अभिशाप देना :—
बलाइ पुरोहित तारे करिला भर्त्सन ।
“घट-पटिया मूर्ख तुमि, भक्ति काँहा जान ?199 ॥
हरिदास ठाकुरे तुञ्जि कैलि अपमान !
सर्वनाश हबे तोर, ना हबे कल्याण ॥”200 ॥
अनुवाद—श्रीबलराम आचार्यने भी गोपाल चक्रवर्त्तीकी
भर्त्सना करते हुए कहा,—“तुम घट और पटको लेकर
तर्क करनेवाले मूर्ख हो, भक्तिके विषयमें तुम्हें क्या
ज्ञान है? तुमने श्रीहरिदास ठाकुरका अपमान किया है,
तुम्हारा सर्वनाश होगा, कभी कल्याण नहीं होगा ॥”199–200 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'घटपटिया',—घट और पटको
लेकर वृथा तर्क करनेवाले नैयायिक ॥ 199 ॥
नाममें अर्थवाद करनेवालेके सङ्गका परित्याग :—
शुनि' हरिदास तबे उठिया चलिला।
मजुमदार सेइ विप्रे त्याग करिला ॥ 201 ॥
अनुवाद—यह सब सुनकर श्रीहरिदास ठाकुर उठकर
चलने लगे। श्रीहिरण्य तथा श्रीगोवर्धन मजुमदारने उस
ब्राह्मणका त्याग कर दिया अर्थात् उसे आरिन्दाके पदसे
निष्कासित कर दिया ॥ 201 ॥
सभ्य व्यक्तियोंके द्वारा श्रीठाकुरके
चरणोंमें क्षमा-प्रार्थना :—
सभा-सहिते हरिदासेर पड़िला चरणे।
हरिदास हासि' कहे मधुर-वचने ॥ 202 ॥
अदोषदर्शी श्रीठाकुरके द्वारा क्षमा :—
“तोमा सबार दोष नाहि, एइ अज्ञ ब्राह्मण।
तार दोष नाहि, तार तर्कनिष्ठ मन ॥ 203 ॥
अचिन्त्य-स्वभाव अधोक्षज नामप्रभु—जड़ीय
युक्ति और तर्कसे अतीत :—
तर्केर गोचर नहे नामेर महत्त्व।
कोथा हैते जानिबे से एइ सब तत्त्व ? ?204 ॥