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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

इस प्रकार अन्तमें उन्हें अति उच्च 'रङ्गक्षेत्र' प्राप्त
हुआ था॥ 115॥
अनुभाष्य-
श्रुतज्ञाः (वेदकुशलाः) नवयोगीन्द्राः (जायन्तेयाः) कमलभुवः
(पद्मयोनेः) अक्लेशां (क्लेशवर्जितां) गोष्ठीं (सभां) प्रविश्य,
श्रुतिशिरसाम् (उपनिषदां) श्रुतिं (श्रवणं) कुर्वन्तः अपि यदुपुरसङ्गमाय
(द्वारकां गन्तुमित्यर्थः) पुलकभृतः (रोमाञ्चितदेहाः सन्तः) उत्तुङ्गम्
(अत्युच्चं) रङ्गं (रङ्गक्षेत्रम्) अवापुः (प्राप्तवन्तः) ।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 115॥
(2) मोक्षाकाङ्क्षीके तीन प्रकारके भेद :-
मोक्षाकाङ्क्षी ज्ञानी हय तिनप्रकार।
मुमुक्षु, जीवन्मुक्त, प्राप्तस्वरूप आर॥ 116॥
अनुवाद-मोक्षकी (ब्रह्ममें लीन होनेकी) आकाङ्क्षा
करनेवाले ज्ञानी तीन प्रकारके होते हैं-(1) मुमुक्षु
(मुक्तिकामी), (2) जीवन्मुक्त (प्राकृत देह रहते हुए भी
मुक्त) और (3) प्राप्त-स्वरूप (जिन्हें अपने नित्य
स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी है) ॥ 116 ॥
(क) मुक्तिकामी विषयी व्यक्तियोंका
भक्तिके आश्रयमें श्रीकृष्णभजन :-
'मुमुक्षु' अनेक जगते संसारी जन।
'मुक्ति' लागि' भक्त्ये करे कृष्णेर भजन॥ 117 ॥
अनुवाद-जगत्में अनेक संसारी व्यक्ति 'मुक्तिकामी'
हैं। 'मुक्ति'के लिये वे भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन
करते हैं॥ 117॥
श्रीमद्भागवत (1/2/26)में-
मुमुक्षवो घोररूपान हित्वा भूतपतीनथ।
नारायण-कलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥ 118 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 118॥
अमृतप्रवाह भाष्य-मुक्तिकामी व्यक्ति घोररूपी
भूतपतियोंका परित्यागकर, किन्तु उनके प्रति असूया-रहित
(ईर्ष्या-द्वेष-रहित) होकर श्रीनारायणकी सभी कलाओंका
भजन करते हैं॥ 118॥


अनुभाष्य-कल्याण चाहनेवाले बुद्धिमान व्यक्ति
अधोक्षज विष्णुकी अथवा उनके अवतारोंकी और
सकाम अशान्त स्वभाववाले उपासक व्यक्ति विष्णुके
अतिरिक्त अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, यही
श्रीसूत गोस्वामी शौनकादि ऋषियोंको बतला रहे हैं,-
[ननु अन्यानपि केचिद्भजन्तो दृश्यन्ते? सत्यं, मुमुक्षवस्तु
अन्यान् न भजन्ति, किन्तु सकामा एवेत्याह]-अथ (अतएव)
घोररूपान् (भीषणाकृतीन्) भूतपतीन् (पितृभूतप्रजेशादीन्) हित्वा
(त्यक्त्वा) मुमुक्षवः (निःश्रेयसार्थिनः ज्ञानिनः) अनसूयवः
(अहिंस्रव्रताः देवान्तरानिन्दकाः) शान्ताः (निष्कामाः सन्तः)
नारायणकलाः (नारायणस्य अंशावतारान्) हि भजन्ति।
श्लोक-भावानुवाद-[निश्चय ही कई लोग विष्णुके
अतिरिक्त अन्योंका क्यों भजन करते दिखायी देते हैं?
यह सत्य है, यद्यपि मुक्तिकामी अन्योंका भजन नहीं
करते हैं, तथापि सकाम व्यक्ति ही ऐसा करते हैं,
इसलिये कह रहे हैं-] आगे अमृतप्रवाह भाष्य
देखें॥ 118॥
साधुसङ्गसे मुक्तिकी कामना-त्याग :-
सेइ सबेर साधुसङ्गे गुण स्फुराय।
कृष्णभजन कराय, 'मुमुक्षा' छाड़ाय॥ 119॥
अनुवाद-वे सब मुक्तिकामी लोग यदि साधुसङ्ग
(शुद्धभक्तोंका सङ्ग) करते हैं, तब वे श्रीकृष्णके गुणोंसे
आकृष्ट होकर 'मुक्तिकी कामना' छोड़कर श्रीकृष्णका
भजन करते हैं॥ 119॥
अमृतप्रवाह भाष्य-चतुःसन और शुकदेवकी
ब्रह्ममयता और नवयोगेन्द्रोंका साधक होना दिखलाकर,
'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त' और 'प्राप्त-स्वरूप'-इस प्रकारके
तीन प्रकारके मोक्षाङ्काक्षी ज्ञानियोंकी बातका विचार
करते हुए सर्वप्रथम मुक्तिकामियोंकी बात कह रहे हैं।
उन मुक्तिकामियोंको साधुसङ्गमें जब भगवान्के गुणोंकी
स्फूर्ति होती है, तब वे मुक्तिकी कामनाको छोड़कर
श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 119॥


। 427

[ 24/120-125 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सत्सङ्गके गुण और महिमा :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/27)में उद्धृत हरिभक्तिसुधोदय-वचन—
अहो महात्मन् बहुदोषदुष्टोऽप्येकेन
भात्येष भवो गुणेन।
सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेन
कृताद्य नो येन कृशा मुमुक्षा॥120॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे महात्मन्! इस भवसंसारमें बहुत दोष रहनेपर भी साधुसङ्गरूपी एक महान् गुण है। उसी एक नित्यकल्याणप्रद गुणके द्वारा अब हमारी मुक्तिकी इच्छा दुर्बल हो गयी है॥120॥
अनुभाष्य—
हे महात्मन्, अहो एष भवः (मानवजन्म) बहुदोषदुष्टः (अशेषदोषाकरभूतः) अपि सुखावहेन (अर्थदेन, नित्यकल्याण-प्रदेन) सत्सङ्गमाख्येन (साधुसङ्गनाम्ना) एकेन गुणेन भाति (दीप्यति), येन (गुणेन) अद्यः नः (अस्माकं) मुमुक्षा (मोक्षवाञ्छा) कृशा कृता (क्षयीभूता भवति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
जिज्ञासु मुक्तिकामी शौनकादिका शुद्धभक्तके सङ्गसे मुक्तिकी कामनाका त्याग :—
नारदेर सङ्गे शौनकादि मुनिगण।
मुमुक्षा छाड़िया कैला कृष्णेर भजन॥121॥
कभी तो श्रीकृष्णदर्शनसे, कभी श्रीकृष्णकृपासे मुक्तिकी कामनाका त्याग और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :—
कृष्णेर दर्शने, कारो कृष्णेर कृपाय।
मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे ताँर पाँय॥122॥
अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शौनकादि मुनियोंने मुक्तिकी वाञ्छाको त्याग करके श्रीकृष्णका भजन किया। किसीने श्रीकृष्णके दर्शन करके और किसीने श्रीकृष्णकी कृपासे मोक्षकी वाञ्छाको छोड़कर उनके गुणोंके प्रति आकर्षित होकर उनके श्रीचरणकमलोंका भजन किया॥121-122॥
शुद्ध श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करनेपर पहले आचरित ज्ञानके प्रयासमें खेद :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/34)—
अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ परमात्मनि
वृष्णिपत्तने स्फुरति।
आत्मारामतया मे वृथा गतो
बत चिरं कालः॥123॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस वृष्णिपत्तन द्वारकामें चित्सुख-घनमूर्ति श्रीकृष्णके स्फुरित होनेपर मेरे सुखका उदित हुआ है। हाय, आत्मारामताका आश्रय (निर्वेशेष-ब्रह्मका अनुशीलन) करते हुए मेरे अनेक दिन वृथा (बेकार) चले गये हैं॥123॥
अनुभाष्य—
बत (खेदे) वृष्णिपत्तने (द्वारकानगर्यां) सुखघनमूर्त्तौ (चित्सुखघनविग्रहे) परमात्मनि अस्मिन् (श्रीकृष्णे) स्फुरति [सति] आत्मारामतया (निर्विशेषब्रह्मानुशीलनेन) चिरं मे (मम) कालः वृथा गतः (हतः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥
(ख) दो प्रकारके जीवन्मुक्त :—
‘जीवन्मुक्त’ अनेक सेइ, दुइ भेद जानि।
‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’, ‘ज्ञाने जीवन्मुक्त’ मानि॥124॥
भक्तिके फलसे जीवन्मुक्त अवरोहपन्थी भक्तको श्रीकृष्णसेवानन्दकी प्राप्ति, ज्ञानके फलसे आरोहपन्थी मुक्ताभिमानीकी अधोगति :—
‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’ गुणाकृष्ट हञा कृष्ण भजे।
‘शुष्कज्ञाने जीवन्मुक्त’ अपराधे अधो मजे॥125॥
अनुवाद—‘जीवन्मुक्त’ (इसी जीवनमें मुक्त) अनेक हैं, उनमें दो श्रेणियाँ हैं। एक प्रकारके जीवन्मुक्त तो भक्तिका आश्रय करके जीवन्मुक्त होते हैं और दूसरी प्रकारके वे हैं जो केवल ज्ञानका आश्रय करके स्वयंको जीवन्मुक्त मानते हैं, किन्तु वास्तवमें मुक्त होते
428 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/124-130 ]
नहीं हैं। जो भक्तिकी सहायतासे जीवन्मुक्त होते हैं, वे
श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन
करते हैं। और केवल शुष्कज्ञानसे स्वयंको जीवन्मुक्त
माननेवाले अपराधके कारण अधोःपतित होते हैं॥124-125॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अपराधे अधो मजे'—शुष्कज्ञान-
जनित जीवन्मुक्त (अभिमानी)-लोग अपराधवशतः
अधःपतित होकर मजे अर्थात् नष्ट हो जाते हैं॥125॥
श्रीमद्भागवत (10/2/32)में—
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-
स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रे
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥126॥
अनुवाद—हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया
हूँ', ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें
भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत
कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण
करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित
होते हैं॥126॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 22/30 संख्या देखें॥126॥
श्रीमद्भगवद्गीता (18/54)में—
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥127॥
अनुवाद—गीतामें कहा गया है,—अभेद ब्रह्मवादरूपी
ज्ञानचर्चाके द्वारा स्वयं प्रसन्नात्माका शोक और कामनारहित
होनेपर तथा सभी जीवोंमें समभावयुक्त ब्रह्मता प्राप्त
करनेके बाद उसे मेरी पराभक्ति प्राप्त होती है। तात्पर्य
यह है कि पहले कर्ममिश्रा-भक्तिका उल्लेख हुआ था,
उसकी अपेक्षा ज्ञानमिश्रा भक्ति श्रेष्ठ है॥127॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/65 संख्या देखें॥127॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/44)में उद्धृत बिल्वमङ्गल वाक्य :—
अद्वैतवीथिपथिकैरुपस्याः
स्वानन्दसिंहासनलब्ध दीक्षाः।
शठेन केनापि वयं हठेन
दासीकृता गोपवधूविटेन॥128॥
अनुवाद—अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा उपास्य और
आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर भी मैं किसी
गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक दासीके रूपमें
परिणत हो गया हूँ॥128॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 10/178 संख्या देखें॥128॥
(ग) स्वरूप-प्राप्त भक्तोंका चिदानन्ददेहसे श्रीकृष्णभजन :—
भक्तिबले 'प्राप्तस्वरूप' दिव्यदेह पाय।
कृष्णगुणाकृष्ट हञा भजे कृष्ण-पांय॥129॥
अनुवाद—'प्राप्तस्वरूप' (स्वरूपकी उपलब्धि
करनेवाला) जीव भक्तिके बलसे दिव्यदेहको प्राप्त
करता है और श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर
श्रीकृष्णके चरणोंका भजन करता है॥129॥
दस प्रकारके लक्षणोंमेंसे निरोध और मुक्तिके लक्षण :—
श्रीमद्भागवत (2/10/6)में—
निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः।
मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः॥130॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥130॥
अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीहरिकी योगनिद्राके बाद]
शक्तिगणोंके अर्थात् उपाधियोंके साथ आत्माके शयनको
जीवका 'निरोध' कहा जाता है। अन्य प्रकारके रूपका
(मायिक स्थूल-सूक्ष्म रूपका) परित्यागकर स्व-स्वरूपमें
विशेषरूपसे अवस्थानका नाम 'मुक्ति' है॥130॥
अनुभाष्य—श्रीशुकदेव परीक्षितसे सर्ग, विसर्ग, स्थान,
पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशकथा, निरोध, मुक्ति और
आश्रय,—महापुराणके इन दस लक्षणोंको दशम-पदार्थ
| 429

[ 24/130-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आश्रयस्वरूप भगवान्‌के विशुद्धतत्त्वज्ञानके उद्देश्यसे वर्णन
करते हुए इस श्लोकमें उसके अन्तर्गत निरोध और
मुक्तिके स्वरूप अथवा लक्षण बतला रहे हैं, -
[श्रीहरेः योगनिद्राम्] अनु (पश्चात्) अस्य आत्मनः (जीवस्य)
शक्तिभिः (स्वोपाधिभिः) शयनं (लयः) निरोधः (इति स्मृतः);
तथा अन्यथा रूपं (अविद्यया अध्यस्तं कर्तृत्वादि) हित्वा
(त्यक्त्वा) स्वरूपेण (भगवद्दास्ये शुद्धजीवस्वरूपेण) व्यवस्थितिः
(विशेषेण अवस्थानं स्वरूपसाक्षात्कार इत्यर्थ एव) 'मुक्तिः'।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 130 ॥
मायारूपी भोगवाञ्छामें श्रीकृष्ण-विमुखता, श्रीकृष्णसेवासे
अथवा श्रीकृष्ण-उन्मुखतासे मायासे मुक्ति :-
कृष्ण-बहिर्मुख-दोष माया हैते हय।
कृष्णोन्मुखी भक्ति हैते माया-मुक्ति हय ॥ 131 ॥
अनुवाद-मायासे ही श्रीकृष्ण-बहिर्मुखतारूपी दोष
उत्पन्न होता है और श्रीकृष्ण-उन्मुखी भक्तिसे ही मायासे
मुक्ति होती है ॥ 131 ॥
श्रीमद्भागवत (11/2/37)में-
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशा-
दपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः।
तन्माययातो बुध आभजेत्तं
भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ 132 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है,
उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और
उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत
स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको
'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य-भक्तिके
साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे ॥ 132 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 20/119 संख्या देखें ॥ 132 ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 133 ॥
अनुवाद-इस त्रिगुणमयी मेरी मायासे अत्यन्त
कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं,
वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं॥ 133 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 133 ॥
भक्तिबलसे ही मुक्ति और मुक्त होनेपर श्रीकृष्णभक्ति :-
भक्ति बिना मुक्ति नाहि, भक्त्ये मुक्ति हय।
तबे मुक्ति पाइले अवश्य कृष्ण भजय ॥ 134 ॥
अनुवाद-भक्तिके बिना मुक्ति नहीं हो सकती,
भक्तिसे ही मुक्ति प्राप्त होती है। जो भक्तिके बलपर
मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे सदा ही श्रीकृष्णका भजन
करते हैं॥ 134 ॥
श्रीमद्भागवत (10/14/4)में-
श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवल-बोधलब्धये।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 135 ॥
अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका
पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान
प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसीको ही स्थिर
रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार
करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार
चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र
ही प्राप्त होता है॥ 135 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 135 ॥
श्रीमद्भागवत (10/2/32)में-
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य-
स्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रे
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 136 ॥
अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया
430 ।

चौबीसवाँ अध्याय [24/136-141]
हूँ, ऐसा कहकर अभिमान करते हैं, वे आपमें
भक्तिरहित होनेके कारण अशुद्ध बुद्धिवाले हैं। वे बहुत
कष्ट करके मायासे अतीत परमपद ब्रह्म तक आरोहण
करके भी भगवद्भक्तिके अनादरके कारण अधःपतित
होते हैं॥ 136 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/30 संख्या देखें ॥ 136 ॥
श्रीमद्भागवत (11/5/3) में-
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्।
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ 137 ॥
अनुवाद-इन चारों वर्णाश्रमियोंमेंसे जो अपने प्रभु
भगवान् विष्णुका साक्षात् भजन नहीं करके, अपने-अपने
वर्णाश्रमके अहङ्कारके कारण उनके भजनमें अवज्ञा
करते हैं, वे अपने स्थानसे भ्रष्ट होकर अधःपतित हो
जाते हैं॥ 137 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/28 संख्या देखें ॥ 137 ॥
श्रीमद्भागवत (10/87/21) श्लोकमें श्रीधर-उद्धृत सर्वज्ञ
भाष्यकार व्याख्या और नृसिंहतापनी (2/5/16)में-
मुक्ता अपि लीलया विग्रहं
कृत्वा भगवन्तं भजन्ते ॥ 138 ॥
अनुवाद-मुक्तगण भी लीलासे आकर्षित होकर
विग्रह स्थापित करके भगवान्का भजन करते हैं॥ 138 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 24/107 संख्या देखें ॥ 138 ॥
पूर्वोक्त छः प्रकारके आत्मारामोंका श्रीकृष्णभजन :-
एइ छह आत्माराम कृष्णेरे भजय।
पृथक् पृथक् च-कारे इहा 'अपि'र अर्थ कय ॥ 139 ॥
अनुवाद-आत्माराम शब्दके छः प्रकारके अर्थोंमें
च-कारका ('तथा'का) अर्थ यहाँ 'अपि' ('भी') ही
ग्रहण किया गया है। इसलिये 'ये छः प्रकारके
आत्माराम श्रीकृष्णका भजन करते हैं'- इसका अर्थ
होगा कि साधक-आत्माराम भी श्रीकृष्णके गुणोंसे
आकृष्ट होकर श्रीकृष्णभजन करते हैं, ब्रह्ममय-आत्माराम
भी भजन करते हैं, इसी प्रकार अन्य चारोंके लिये भी
ऐसा ही जानना होगा ॥ 139 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'छय आत्माराम'-साधक, ब्रह्ममय
और प्राप्त-ब्रह्मलय एवं मुमुक्षु, जीवन्मुक्त और
प्राप्त-स्वरूप, -ये छय प्रकारके 'आत्माराम' हैं॥ 139 ॥
आत्माराम, मुनि और निर्ग्रन्थ
व्यक्तियोंका श्रीकृष्णभजन :-
“आत्मारामार्च अपि” करे कृष्णे अहैतुकी भक्ति।
“मुनयः सन्तः” इति कृष्णमनने आसक्ति ॥ 140 ॥
अनुवाद-छः प्रकारके आत्माराम भी श्रीकृष्णकी
अहैतुकी भक्ति करते हैं। 'मुनयः सन्तः'का तात्पर्य यह
है कि वे मुनि होकर श्रीकृष्ण-मननमें आसक्त होते
हैं॥ 140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-“ 'मुनयः सन्तः' इति श्रीकृष्णमनने
आसक्ति' - आत्मारामगण 'मुनि' बनकर श्रीकृष्णमननमें
आसक्त होते हैं ॥ 140 ॥
“निर्ग्रन्थाः”–अविद्याहीन, केह-विधिहीन।
याँहा येइ युक्त, सेइ अर्थेर अधीन ॥ 141 ॥
अनुवाद- 'निर्ग्रन्थ'-शब्दके दो अर्थ हैं-अविद्याहीन
और विधिहीन। इन दोनोंमेंसे जहाँ जो अर्थ उपयुक्त है,
वही प्रयोग किया जाना चाहिये ॥ 141 ॥
अमृतानुकणा- 'एइ छह आत्माराम' - अर्थात्
'ब्रह्मसाधक', 'ब्रह्ममय' और 'प्राप्तब्रह्मलय'-ये तीन
ब्रह्मोपासक (103 संख्या) और 'मुमुक्षु', 'जीवन्मुक्त'
('भक्तिसे ही जीवन्मुक्त', 'ज्ञानसे जीवन्मुक्त' नहीं-125
संख्या) और 'प्राप्तस्वरूप' (116 संख्या) - ये तीन
प्रकारके मोक्षकी आकाङ्क्षा करनेवाले - इस प्रकार कुल
छः प्रकारके आत्माराम हैं। उनके साथ पृथक् पृथक्-रूपमें
'च'-कारके योगसे 'अपि'का अर्थ व्यक्त हुआ है। जैसे,
ब्रह्मसाधक-आत्माराम भी 'मुनि' (मननशील) होकर
अर्थात् श्रीकृष्णमननमें आसक्त होकर अहैतुकी भक्ति
तथा भुक्ति-मुक्ति-सिद्धिकी इच्छाओंसे शून्य होकर भक्ति
। 431

[ 24/139-147 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करते हैं। इस प्रकारसे पृथक् पृथक् रूपसे कहे गये
छः प्रकारके आत्मारामगणोंके क्षेत्रमें अर्थको समझना
होगा। 'निर्ग्रन्थ अपि' (निर्ग्रन्थ होकर भी)—उनके
विशेषणके रूपमें कहा गया है। निर्ग्रन्थ-शब्दके अर्थ
अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन हैं। यहाँपर विधिहीन
कहनेसे रागमार्ग अन्तर्गत विधिहीनता नहीं है, क्योंकि
पहले कहा गया है,—“निर्ग्रन्थ-शब्दे कहे,–(क) अविद्या-
ग्रन्थिहीन। (ख) विधिनिषेध-वेदशास्त्र-ज्ञानादिविहीन॥”
(16 संख्या)। ये दो अर्थ यहाँपर 'आत्माराम'—शब्दके
अर्थके अनुसार युक्त होंगे॥ 139-141॥
अन्य एक प्रकारका अर्थ :—
च-शब्दे करि यदि 'इतरेतर' अर्थ।
आर एक अर्थ कहे परम समर्थ॥ 142 ॥
“आत्मारामाश्च आत्मारामाश्च” करि बार छय।
पञ्च आत्माराम, छये च-कारे लुप्त हय ॥ 143 ॥
एक 'आत्माराम'-शब्दे अवशेष रहे।
एक 'आत्माराम'-शब्दे छयजन कहे ॥ 144 ॥
अनुवाद—'च' शब्दका 'इतरेतर' समासके अनुसार
अर्थ करनेसे आत्माराम श्लोकका अन्य एक परम
उपयुक्त अर्थ निकलता है। यद्यपि छः प्रकारके
आत्मारामोंके लिये 'आत्माराम'-शब्द छः बार दोहराना
होगा, तथापि (संस्कृत व्याकरणके इस नियमके अनुसार)
च-शब्दका 'इतरेतर' समासमें योग करनेपर पाँच
आत्माराम लोप हो (समा) जाते हैं और अन्तमें एक
'आत्माराम'-शब्द ही रहता है। वही 'आत्माराम'-शब्द
ही छहों आत्मारामोंको बतलाता है। (पय़ार 147 के
बाद अमृतानुकणा टीका देखें) ॥ 143-144 ॥
दृष्टान्त—(विश्वप्रकाशमें और पाणिनिमें 1/2/64 और
सिद्धान्त-कौमुदीमें अजन्त पुल्लिङ्ग-शब्दके प्रकरणमें) :—
“स्वरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ।” उक्तार्थानामप्रयोगः।
रामश्च रामश्च रामश्च रामा इतिवत् ॥ 145 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूपसे एक जैसे और एक
विभक्तिमें जिनका अर्थ कहा जाता है, वहाँ एक
स्वरूपको रखकर अन्य सब स्वरूपोंका प्रयोग नहीं
होता है, जैसे,—‘रामश्च, रामश्च, रामश्च’,—इनके स्थानपर
एक ‘रामाः’ शब्दका प्रयोग होता है ॥ 145 ॥
तबे ये च-कार, सेइ 'समुच्चय' कय।
“आत्मारामाश्च मुनयश्च” कृष्णेरे भजय ॥ 146 ॥
अनुवाद—'च'-कारका 'समुच्चय'के (सभीको एकत्रित
करके) अर्थमें प्रयोग करनेपर इस पदका अर्थ
होगा— “आत्मारामाश्च मुनयश्च” अर्थात् सभी आत्मारामगण
और सभी मुनिगण श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 146 ॥
सात प्रकारके अर्थ :—
“निर्ग्रन्था अपि”र एइ अपि'—सम्भावने।
एइ सात अर्थ प्रथमे करिलुँ व्याख्याने ॥ 147 ॥
अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 147 ॥
अमृतानुकणा—'इतरेतर अर्थ'-योगसे 'च'-शब्दसे एक
अन्य व्याख्या दी गई है। जहाँपर प्रत्येक पदकी
प्रधानता रहनेपर सभी पदोंका अन्वय होता है, उस
प्रकारके द्वन्द्व-समासको ही 'इतरेतर-योग' कहा जाता
है। जिस स्थानपर ये सब पद एक ही विभक्ति और
एक ही वचनवाले होते हैं—इतरेतर-योगसे तब उनका
एक पद मात्र ही बाकी रहता है। जैसे, 'रामश्च रामश्च
रामश्च'—ये तीन 'राम'-पदोंमेंसे दो पद लोप हो जानेपर
अन्तमें समासबद्ध पद ‘रामाः’ होता है। उसी प्रकार
‘आत्मारामाश्च’, ‘आत्मारामाश्च’ इस रूपमें छः
‘आत्मारामाश्च’-पद 'इतरेतर'-समाससे युक्त होनेपर उनमेंसे
पाँच ‘आत्मारामाश्च’-पद लुप्त हो जाते हैं और छठे
‘आत्मारामाश्च’-पदमें ‘च’-कार लुप्त होकर केवल
‘आत्मारामाः’-पद बाकी रहता है, उसके द्वारा उक्त छः
प्रकारके आत्माराम ही सूचित होते हैं। यहाँपर
432 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/142-150 ]
'आत्मारामश्च'-पदमॆं जो 'च'-कार है, उसका तृतीय पुरुष क्षीरोदशायीका ध्यान :-
समुच्चय-अर्थमें व्यवहार होनेपर 'आत्मारामश्च मुनयश्च' श्रीमद्भागवत (2/2/8)में—
अर्थात् पहले कहे गये छः प्रकारके आत्मारामगण और केचित् स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे
मुनिगण श्रीकृष्णभजन करते हैं—इस प्रकारसे अर्थ हुआ प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम्।
है। 'निर्ग्रन्थ अपि'से 'अपि' सम्भावना-अर्थमें होकर चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्खगदाधरं
आत्मारामगण, मुनिगण और सम्भावना-अर्थमें निर्ग्रन्थगण धारणया स्मरन्ति ॥ 150 ॥
अर्थात् अविद्याग्रन्थिहीन, शास्त्रविधिहीन, मूर्ख, नीच,
म्लेच्छ, धन सञ्चय करनेवाले, निर्धन आदि (16, 17 अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 150 ॥
संख्या) श्रीकृष्णभजन करते हैं—इस रूपमें 'इतरेतर'-योगसे अमृतप्रवाह भाष्य—कोई-कोई योगी अपनी देहके
प्रकाशित यह अर्थ और पहले कहे गये छः अर्थ भीतर स्थित हृदयमें अवस्थित प्रादेशमात्र (तर्जनी
(139-141 संख्या), कुल मिलाकर यहाँ तक सात अङ्गुली और अङ्गुठेके विस्तार जितने परिमाणके)
अर्थोंकी व्याख्या हुई है॥ 142-147 ॥ चतुर्भुज शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी पुरुषका धारणाके द्वारा
स्मरण किया करते हैं,—यही 'सगर्भ' योगीका लक्षण
परमात्मनिष्ठ दो प्रकारके आत्माराम :- है॥ 150 ॥
अन्तर्यामि-उपासके 'आत्माराम' कय। अनुभाष्य—श्रीशुकदेव गोस्वामी परीक्षितको स्थूल
सेइ आत्माराम योगीर दुइ भेद हय ॥ 148 ॥ जगत्के विषय-भोगोंको निन्दनीय जानकर उनसे निवृत्त
(1) सगर्भ-योगी और (2) निगर्भ-योगी, वैराज-धारणा-निष्ठ योगियोंकी बात बतलाकर उनसे
दोनों ही तीन प्रकारके :- श्रेष्ठ व्यष्टि-अन्तर्यामी चिद्घनरूप-ध्यानकारी योगियोंकी
सगर्भ, निगर्भ,—एइ हय दुइ भेद। बात बतला रहे हैं,—
एक एक तिन भेदे छय विभेद ॥ 149 ॥
केचित् (विरलाः) स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे (स्वदेहस्य निजशरीरस्य
अनुवाद—अन्तर्यामी परमात्माके उपासकोंको भी अन्तः मध्ये यत् हृदयं तत्र यः अवकाशः तस्मिन्) वसन्तम्
'आत्माराम' कहते हैं। उन आत्माराम योगियोंके भी दो (अन्तर्यामितया कृतवासं) प्रादेशमात्रं (अङ्गुष्ठतर्जन्यौर्विस्तारः
भेद हैं—सगर्भ और निगर्भ। पुनः इन दोनोंके तीन-तीन सः एव मात्रा प्रमाणं यस्य तस्मिन् प्रादेशप्रमाणहृदये ध्येयत्वात्,
भेद हैं, इस प्रकार कुल मिलाकर उनके छः विभेद तावन्मात्रप्रदेशेऽप्यचिन्त्यशक्त्या पञ्चदशवर्षीयपुरुषाकारप्रमाणं) चतुर्भुजं
हैं॥ 148-149 ॥ कञ्जरथाङ्ग-शङ्खगदाधरं (पद्मचक्रशङ्खगदाधारिणं) पुरुषं (क्षीरोदशायिनं
अनुभाष्य—'सगर्भ योगी'—जो योगी उपास्य तृतीयं) धारणया स्मरन्ति।
अन्तर्यामीको साकार मानकर उनके रूपका ध्यानादि श्लोक-भावानुवाद—कोई विरले [योगी] अपने
करते हैं। 'निगर्भ-योगी'—जो योगी निराकार या शून्यका शरीरके भीतर हृदयमें वास करनेवाले प्रादेशमात्र
ध्यानादि करते हैं। सगर्भ और निगर्भ योगियोंके छः परिमाणके (अङ्गुठेसे तर्जनीके विस्तार जितने होनेपर
विभाग हैं—1) सगर्भ-योगारुरुक्षु (योगारुरुक्षु अर्थात् भी अचिन्त्य शक्तिके द्वारा पन्द्रह-वर्षीय पुरुषाकारमें)
जिन्होंने योगमें आरूढ़ होना प्रारम्भ किया है), 2) पद्म-चक्र-शङ्ख-गदाधारी चतुर्भुजरूप अन्तर्यामी पुरुषका
निगर्भ-योगारुरुक्षु, 3) सगर्भ-योगारूढ़, 4) निगर्भ-योगारूढ़, (तृतीय पुरुष क्षीरोदशायीका) धारणासे स्मरण करते
5) सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, 6) निगर्भ-प्राप्तसिद्धि ॥ 149 ॥ हैं॥ 150 ॥
। 433

[ 24/151-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ध्यानयोगमिश्रा भक्तिमें सिद्धिकी प्राप्ति :—
श्रीमद्भागवत (3/28/34)में—
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो
भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात्।
औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहूर्दह्यमान—
स्तच्चापि चित्तबड़िशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥ 151 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके
प्रति भाव प्राप्त करके भक्तिके द्वारा हृदयके द्रवीभूत
और आनन्दसे भर जानेके कारण पुलकादि उत्पन्न होते
हैं, उत्कण्ठाके कारण आनन्द-अश्रुओंके द्वारा बार-बार
वह आनन्दमें निमज्जित हुआ करता है; तब मछलीको
पकड़नेवाले काँटेकी भाँति ध्यानयुक्त चित्तको (ध्येय
वस्तुकी धारणासे) थोड़ा-थोड़ा करके बाहर कर देता
है,—यही 'निगर्भ' योगीका उदाहरण है॥ 151॥
अनुभाष्य—शरणागत देवहूतिको भगवान् श्रीकपिलदेव
निगर्भ योगीके लिये श्रीभगवान्‌की अप्राकृत श्रीमूर्तिके
प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गके ध्यानकी कर्त्तव्यताका उपदेश
प्रदान करके ध्यानके फल मनके निग्रहकी बात बतला
रहे हैं,—
एवं (ध्यानपथेन) भगवति हरौ प्रतिलब्धभावः (प्रतिलब्धः
भावः प्रेमा येन सः) भक्त्या (श्रद्धया) द्रवद्धृदयः (द्रवत्
आर्द्रीभवत् हृदयं यस्य सः) प्रमोदात् (हर्षप्रकर्षात्) उत्पुलकः
(उद्गतानि पुलकानि यस्य सः रोमाञ्चितदेहः) औत्कण्ठ्यबाष्पकलया
(औत्कण्ठ्येन प्रवृत्तया अश्रुकलया) मुहुः (पुनः पुनः) अद्ह्यमानः
(आनन्दसंप्लवे निमज्जमानः) च तत् अपि चित्तबड़िशं (दुर्ग्रहस्य
भगवतः ग्रहणे बड़िशं मत्स्यवेधनम् इव उपायभूतं चित्तम्
अपि) शनकैः (क्रमशः ध्येय-वस्तुनः) वियुङ्क्ते (तद्धारणे
शिथिलप्रयत्नः भवति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥
(क) आरुरुक्षु, (ख) आरूढ़ और (ग) प्राप्तसिद्धिके
भेदसे तीन प्रकारके योगी :—
'योगारुरुक्षु', 'योगारूढ़', 'प्राप्तसिद्धि' आर।
एइ तिन भेदे हय छय प्रकार॥ 152 ॥
अनुवाद—योगारुरुक्षु, योगारूढ़ और प्राप्तसिद्धि—ये
तीन सगर्भ और निगर्भके भेदसे कुल मिलाकर छः
प्रकारके होते हैं॥ 152॥
श्रीमद्भगवद्गीता (6/3-4)में—
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढ़स्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ 153॥
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥ 154॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 153-154॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिसकी योगमें आरोहण करनेकी
इच्छा है, वह 'आरुरुक्षु' है; उस आरुरुक्षु मुनिका यम,
नियम, आसन और प्राणायामरूप कर्म ही 'कारण'
(साधन) है। योगारूढ़ व्यक्तिका ध्यान-धारणा-प्रत्याहाररूप
श्रम ही 'कारण' है। इन्द्रियोंके उद्देश्यसे कर्ममें जब
आसक्ति नहीं रहती, तब सभी सङ्कल्प परित्याग करके
योगी 'समाधि'-युक्त अथवा 'योगारूढ़' होते हैं॥ 153-154॥
अनुभाष्य—
योगं (ज्ञानयोगम्) आरुरुक्षोः (प्राप्तुमिच्छोः) मुनेः [तदारोहे]
कर्म कारणं (साधनम्) उच्यते; योगोरूढ़स्य (ज्ञानयोगमारूढ़स्य
तु) तस्य (ज्ञाननिष्ठस्य) एव शमः (ज्ञानपरिपाके
समाधिश्चित्तविक्षेपकर्मोपरमः) कारणम् उच्यते। यदा हि इन्द्रियार्थेषु
(इन्द्रियभोग्येषु शब्दादिषु तत् साधनेषु च) कर्मसु न अनुषज्जते
(आसक्तिं न करोति), तदा सर्वसङ्कल्पसंन्यासी (सर्वान् भोगविषयान्
कर्मविषयान् च आसक्तिमूलभूतान् सङ्कल्पान् संन्यसितुं शीलं
यस्य सः) योगारूढ़ (मुक्तः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 153-154॥
छः प्रकारके योगियोंका साधुसङ्गमें योगमार्गका त्याग
और श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :—
एइ छय योगी साधुसङ्गादि-हेतु पाञा।
कृष्ण भजे कृष्णगुणे आकृष्ट हञा॥ 155 ॥
च-शब्दे 'अपि'र अर्थ इँहाओ कहय।
'मुनि', 'निर्ग्रन्थ'-शब्देर पूर्ववत् अर्थ हय॥ 156 ॥
434 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/157-160 ]
यहाँ तक तेरह प्रकारके अर्थ :-
'उरुक्रमे' 'अहैतुकी' काँहा कोन अर्थ।
एइ तेर अर्थ कहिलुँ परम समर्थ ॥ 157 ॥
अनुवाद—ये छः प्रकारके योगी साधुसङ्गके प्रभावसे
श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर श्रीकृष्णका
भजन करते हैं। यहाँ 'च'-शब्दसे 'अपि' अर्थ ही होता
है और 'मुनि' और 'निर्ग्रन्थ' शब्दोंका अर्थ पहले जैसे
होगा। 'अहैतुकी'-शब्द सदा 'उरुक्रम'के साथ ही प्रयोग
होगा। इस प्रकार मैंने तुम्हें इस 'आत्मारामश्च'
श्लोकके तेरह प्रकारके पृथक् पृथक् अर्थ बतलाये
हैं॥ 155-157 ॥
एइ सब शान्त यबे भजे भगवान्।
'शान्त' भक्त करि' तबे कहि ताँर नाम ॥ 158 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'एइ सब शान्त यबे भजे'—ये
सब योगी जब शान्तरसमें आरूढ़ होकर भजन करते
हैं, [तब उन्हें 'शान्त' भक्त कहा जाता है।] ॥ 158 ॥
अनुभाष्य—ये तेरह,—(1) साधक, (2) ब्रह्ममय,
(3) प्राप्तब्रह्मलय, (4) मुमुक्षु, (5) जीवन्मुक्त,
(6) प्राप्तस्वरूप,—ये छः आत्माराम, और (7) निर्ग्रन्थमुनि,
(8) सगर्भ-योगारुरुक्षु, (9) निगर्भ-योगारुरुक्षु,
(10) सगर्भ-योगारूढ़, (11) निगर्भ-योगारूढ़,
(12) सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, (13) निगर्भ-प्राप्तसिद्धि ॥ 158 ॥
अमृताणुकणा—पहले आत्मा-शब्दसे 'ब्रह्म'-अर्थ लेनेपर
ज्ञानमार्गके उपासकरूप आत्मारामगणोंके सम्बन्धमें सात
प्रकारके अर्थोंकी व्याख्या हुई है। अब आत्मा-शब्दसे
'अन्तर्यामी'-अर्थ लक्षित होनेपर योगमार्गमें जो
अन्तर्यामी-उपासक हैं, उन योगियोंको यहाँपर 'आत्माराम'
कहा जा रहा है। वे छः प्रकारके हैं-सगर्भ-योगारुरुक्षु
सगर्भ-योगारूढ़, सगर्भ-प्राप्तसिद्धि, निगर्भ-योगारुरुक्षु,
निगर्भ-योगारूढ़ और निगर्भ-प्राप्तिसिद्धि। यहाँपर भी
पहलेके जैसे अर्थात् पहले जो तीन प्रकारके ब्रह्मोपासक
और तीन प्रकारके मुक्तिकामी, कुल छः प्रकारके
आत्मारामोंकी बात कही गयी है और उस स्थानपर
जैसे 'च'-शब्दसे 'अपि'-अर्थ, 'मुनि'-शब्दसे मननशील
और 'निर्ग्रन्थ'-शब्दसे अविद्या-ग्रन्थिहीन और विधिहीन
अर्थ हुआ है (139-141 संख्या), यहाँपर भी उसी
प्रकारसे 'उरुक्रमे' और 'अहैतुकी'-दो शब्दमें जोड़कर
ऊपर लिखे छः प्रकारके आत्माराम-योगिगर्णोंके किस
क्षेत्रमें कौनसा अर्थ प्रकाशित होगा। जैसे, सगर्भ-
योगारुरुक्षु-रूप आत्माराम भी 'निर्ग्रन्थ' होनेपर भी मुनि
अर्थात् मननशील होकर उरुक्रम श्रीकृष्णकी भक्ति
करते हैं—इस रूपमें छः प्रकारके योगियोंके सम्बन्धमें
भी पृथक् पृथक् रूपसे अर्थ समझने होंगे। इसलिये
पहले सात प्रकारके और अब छः प्रकारके—कुल
तेरह अर्थ व्यक्त हुए हैं। वे सब “शमो मन्निष्ठताबुद्धेः”
(भागवत 11/19/36) इस सूत्रमें श्रीकृष्णमें
ममतायुक्त-बुद्धिसम्पन्न ना होकर केवल श्रीकृष्णनिष्ठा
मात्र प्राप्त करके 'शान्त'-रसाश्रित 'शान्तभक्त' नामसे
कहलाते हैं॥ 155-158 ॥
'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दकी
(3) 'मन' अर्थके द्वारा व्याख्या :-
'आत्मा' शब्दे 'मन' कह—मने येइ रमे।
साधुसङ्गे सेइ भजे श्रीकृष्णचरणे ॥ 159 ॥
अनुवाद—'आत्मा' शब्दके अर्थ 'मन'को ग्रहण
करनेपर आत्मारामका अर्थ होगा—जो मनमें रमण
करता है। ऐसा व्यक्ति भी साधुसङ्गमें श्रीकृष्णके
चरणोंका भजन करता है॥ 159 ॥
मनका निग्रह करनेवालेको परमपदकी प्राप्ति :-
श्रीमद्भागवत (10/87/18)—
उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः
परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्।
तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं
पुनरहि यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 160 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 160 ॥
। 435

[ 24/160-163 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो
कर्मयोगमें उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना
करते हैं, वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे
कूर्पदृक् अर्थात् स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण
(उस सम्प्रदायके ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार
होता है उस हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना
करते हैं। हे अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण
शिरोगत (मूलाधार उदरसे आरम्भ करके हृदयके
मध्यमेंसे होकर मस्तक और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए)
सहस्रदल-पद्मस्वरूप आपकी उपलब्धिके स्थान
सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते
हैं, वे पुनः मृत्युके मुख अर्थात् संसारमें पतित नहीं
होते॥160॥
अनुभाष्य—जनलोकमें ब्रह्मसत्र-यज्ञमें श्रवणके इच्छुक
ऋषियोंको चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दनने जिन
श्रुतियोंके द्वारा इस भगवत्-स्तवका कीर्तन किया था,
उसीका ही बादमें आदिनरऋषि श्रीनारायण नारदसे वर्णन
कर रहे हैं,—
ऋषिवर्त्मसु (ऋषीणां वर्त्मसु सम्प्रदायमार्गेषु) ये कूर्पदृशः
(कूर्पं शर्करारजः विद्यते दृक्षु अक्षिषु येषां ते तथा रजःपिहितदृष्टयः
शार्कराक्षाः स्थूलदृष्टयः) उदरम् (उदरावलम्बनं मणिपुरकस्थं
ब्रह्म) उपासते (ध्यायन्ति); आरुणयः (आरुण्याख्याः ऋषयः)
परिसरपद्धतिं (परितः सरन्ति प्रसर्पन्तीति परिसराः नाड्यः
तासां पद्धतिं मार्गं प्रसरणस्थानं) हृदयं दहरम् (आकाशावलम्बनं
सूक्ष्ममेव ब्रह्म उपासते); हे अनन्त, ततः (हृदयात्) तव परमं
(श्रेष्ठं ज्योतिर्मयं) धाम (उपलब्धिस्थानं सुषुम्नाख्यं) शिरः
(मूर्द्धानं प्रति) उद्गात् (उदसर्पन्, मूलाधारात् आरभ्य हृदयमध्यात्
ब्रह्मरन्ध्रं प्रत्युद्गतमित्यर्थः),—यत् [तव धाम] समेत्य (प्राप्य)
इह कृतान्तमुखे (कृतान्तस्य कालस्य मृत्योः मुखे संसारे) न
पतन्ति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥160॥
निगृहीत-चित्त मुनियोंके द्वारा श्रीकृष्णके गुणोंसे
आकृष्ट होकर शुद्धभक्ति :—
एहो कृष्णगुणाकृष्ट महामुनि हञा।
अहैतुकी भक्ति करे निर्ग्रन्थ हञा॥161॥
अनुवाद—मनमें रमण करनेवाला ऐसा योगी भी
श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर महामुनि (श्रीकृष्ण
मननमें आसक्त) हो जाता है और वह भी निर्ग्रन्थ
होकर श्रीकृष्णकी अहैतुकी भक्ति करता है॥161॥
‘आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके
(4) 'यत्न' अर्थके द्वारा व्याख्या :—
‘आत्मा'-शब्दे 'यत्न' कहे—यत्न करिया।
“मुनयोऽपि” कृष्ण भजे निर्ग्रन्थ हञा॥162॥
अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका अर्थ 'यत्न' भी है
अर्थात् श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर मुनि भी निर्ग्रन्थ
होकर श्रीकृष्णभजनके लिये दृढ़ प्रयास करते हैं॥162॥
नित्यसत्य वास्तव वस्तुके अनुसन्धानके
लिये प्रयत्न करना कर्त्तव्य :—
श्रीमद्भागवत (1/5/18)में—
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो
न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः।
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं
कालेन सर्वत्र गभीर-रंहसा॥163॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥163॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो सत्यलोक अथवा ब्रह्मलोकादि
ऊपरके लोकोंमें एवं सुतल और अतलादि निम्न
लोकोंमें भ्रमण करनेपर भी प्राप्त नहीं होती, ऐसी दुर्लभ
वस्तुके लिये सभी पण्डितलोग प्रयत्न करेंगे, क्योंकि
चौदह भुवनोंके ऊपरी और निम्न लोकोंमें जो सुख हैं,
वे सभी गम्भीर वेगसे युक्त कालके द्वारा दुःखकी भाँति
अनायास ही प्राप्त होते हैं॥163॥
अनुभाष्य—जब श्रीव्यासदेव बहुत तपस्याका अनुष्ठान
करके और समस्त शास्त्रोंका प्रणयन करनेपर भी
आत्म-प्रसन्नताको प्राप्त करनेसे वञ्चित होकर सरस्वती
नदीके तटपर मन-ही-मनमें अनेक प्रकारके कुतर्क
और खेद कर रहे थे, तभी उनके अन्तर्यामी गुरुदेव
श्रीनारद गोस्वामी उनके निकट आकर उपस्थित हुए।
436 |

चौबीसवाँ अध्याय 24/163-167 ]
श्रीव्यासदेवने जब उनसे आत्म-प्रसन्नता न होनेका
कारण पूछा, तब श्रीनारदने हरिभक्ति और हरिकथाके
माहात्म्यको बतलाकर नित्य-तत्त्व श्रीकृष्णभक्तिके लिये
प्रयत्न करनेके लिये कहा,–
उपर्यधः (उपरि आब्रह्मलोकात् अधः स्थावरपर्यन्तं) भ्रमतां
(विवक्षायां षष्ठी, भ्रमद्भिः जीवैः) यत् (सुखं) न लभ्यते
(नैव प्राप्यते), कोविदः (विवेकशीलः) तस्यैव (तादृशस्य
सुखस्य एव) हेतोः प्रयतेत (यत्नं कुर्यात्); गभीर-रंहसा
(अनतिक्रम्यवेगेन) कालेन दुःखवत् (अप्रार्थितानि दुःखानि
यथैवायान्ति देहिनां, तथैव) तं सुखं (विषयसुखं) अन्यतः
(अन्यस्मात् प्राक्तनकर्मतः) सर्वत्र (सर्वयोनिषु) [प्रयत्नं बिनापि]
लभ्यते (प्राप्यते)।
श्लोक-भावानुवाद—ब्रह्मलोकसे स्थावर योनियों तक
भ्रमण करते हुए जीवोंको जो सुख प्राप्त नहीं होता,
विवेकी लोग वैसे सुखकी प्राप्तिके प्रयत्न करते हैं।
जिसका अतिक्रम नहीं किया जा सकता, वह काल न
चाहनेपर भी जैसे जीवोंको दुःख प्रदान करता है, वैसे
ही विषयसुख पूर्व कर्मोंके फलस्वरूप सभी योनियोंमें
बिना प्रयासके प्राप्त होते हैं ॥ 163 ॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103)में उद्धृत नारदीयवाक्य :—
सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः।
अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 164 ॥
अनुवाद—सद्धर्मको उदित करानेके लिये जिनकी
दृढ़ा मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित सर्वार्थ-सिद्धि
होती है॥ 164 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 20/106 संख्या देखें ॥ 164 ॥
आग्रहपूर्वक यत्न अथवा उत्साह और
निश्चयसे ही भक्तिकी सिद्धि :—
च-शब्द अपि-अर्थे, 'अपि'—अवधारणे।
यत्नाग्रह बिना भक्ति ना जन्माय प्रेमे ॥ 165 ॥
अनुवाद—अमृतानुकणा देखें ॥ 165 ॥
अमृतानुकणा—यहाँपर 'च'-शब्दसे अपि-अर्थ होकर
'मुनयश्च'–मुनयोऽपि अर्थात् मुनिगण भी 'आत्मारामः'–
(आत्मा-शब्दसे यत्न-अर्थके कारण) यत्नपरायण होकर
'निर्ग्रन्थ अपि'—(अपि-शब्दके निश्चय अर्थमें)
अविद्याग्रन्थिहीन होकर उरुक्रम श्रीकृष्णकी अहैतुकी
भक्ति करते हैं, क्योंकि भक्तिमें यत्न और आग्रहके
बिना कभी भी सुदुर्लभ 'प्रेम' प्राप्त नहीं हो सकता ॥ 165 ॥
आसङ्ग ही आग्रहपूर्वक प्रयत्न :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/35)–
साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या सुचिरादपि।
हरिणा चाश्वदेयेति द्विधा सा स्यात् सुदुर्लभा ॥ 166 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 166 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—भक्ति दो प्रकारसे सुदुर्लभा
है,–(1) आसङ्ग-शून्य (श्रीकृष्णप्रीतिवाञ्छा-रहित) होनेपर
सैकड़ों साधनोंके द्वारा भी शीघ्र प्राप्त नहीं होती और
(2) श्रीकृष्ण भी सहसा भक्ति नहीं देते ॥ 166 ॥
अनुभाष्य—
अनासङ्गैः (सङ्गरहितैः) साधनौधैः (साधनपुञ्जैः) सुचिरात्
(बहुकालेन) अपि [भक्तिः] अलभ्या (लब्धुमशक्या) हरिणा
(भगवता) आशु (शीघ्रम्) अदेया (“मुक्तिं ददाति कर्हिचित्
स्म न भक्तियोगम्” इति (भाः 5/6/18) वचनात् च—इति) सा
सुदुर्लभा भक्तिः द्विधा स्यात् (प्रकारद्वयेनापि तस्याः
दुर्लभत्वमित्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद—सङ्गरहित होकर बहुकाल तक
अनेक साधन करनेपर भी भक्ति प्राप्त नहीं होती और
भगवान् भी शीघ्र भक्ति नहीं देते ('भगवान् मुक्ति तो
दे देते हैं, किन्तु भक्तियोग सहज ही नहीं देते'-(भाः
5/6/18) वचनके अनुसार) वह सुदुर्लभा भक्ति दो
प्रकारकी है (दो प्रकारकी होनेपर भी वह दुर्लभ
है—यह अर्थ है।)।। 166 ।।
निरन्तर योग ही आग्रहपूर्वक यत्न :—
श्रीमद्भगवद्गीता (10/10)में–
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 167 ॥
। 437

[ 24/167-171 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक
मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित
विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके
द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥167॥
अनुभाष्य-आदिलीला 1/49 संख्या देखें ॥167॥
"आत्मारामः" - पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके
(5) 'धृति'- अर्थके द्वारा व्याख्या :-
'आत्मा'-शब्दे 'धृति' कहे-धैर्ये येइ रमे।
धैर्यवन्त तबे हञा करय भजने॥ 168॥
अनुवाद - 'आत्मा' - शब्दका अर्थ 'धृति' स्वीकार
करनेपर आत्मारामका अर्थ होगा- जो धैर्यशील होकर
रमण करते हैं। वे धैर्यशील होकर श्रीकृष्णका भजन
करते हैं॥ 168 ॥
मुनि और निर्ग्रन्थ-इन दोनों शब्दोंके अर्थ;
विष्णु-वैष्णवकी कृपासे दोनोंको भक्तिकी प्राप्ति :-
'मुनि'-शब्दे-पक्षी, भृङ्ग; 'निर्ग्रन्थे' - मूर्खजन।
कृष्णकृपाय साधुकृपाय दाँहार भजन ॥ 169 ॥
अनुवाद - 'मुनि' - शब्दका अर्थ पक्षी और भ्रमर है।
'निर्ग्रन्थ'-शब्दका अर्थ मूर्ख-लोग है। ये दोनों अर्थात्
पक्षी-भ्रमरादि और मूर्खजन भी श्रीकृष्णकी कृपा तथा
साधुकी कृपासे श्रीकृष्णका भजन करते हैं॥ 169 ॥
ब्रजके पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :-
श्रीमद्भागवत (10/21/14)में-
प्रायो बताम्ब मुनयो विहगा वनेऽस्मिन्
कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम्।
आरुह्य ये द्रुमभुजान् रुचिरप्रवालान्
शृण्वन्ति मीलितदृशो विगतान्यवाचः ॥ 170॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे माते! इस वनमें जो सब
पक्षी सुन्दर-सुन्दर पल्लवोंसे सुशोभित वृक्षोंकी शाखाओं
आदिपर बैठकर नेत्र बन्द करके और कलरव करना
बन्द करके श्रीकृष्णके मुखसे निकले कल-वेणुगीतको
श्रवण करते हैं, वे भी प्रायः मुनिकी भाँति ही
हैं॥ 170 ॥
अनुभाष्य-व्रजमें शरत्कालके आनेपर श्रीकृष्णने
वन-वनमें वंशीध्वनि करके परिभ्रमण करना आरम्भ
किया, उनकी उस वंशीध्वनिको सुनकर गोपियाँ श्रीकृष्णके
सङ्गके लिये कामातुर होकर गान कर रही हैं, -
हे अम्ब, अस्मिन् वने ये विहगाः (पक्षिणः) ते
प्रायः (प्रायेण) मुनयः एव, यतः ते (पक्षिणः) कृष्णेक्षितं
(कृष्णदर्शनं पुष्पफलाद्यन्तरं बिना यथा भवति, तथा) रुचिरप्रवालान्
(रुचिराः शोभनाः प्रवालाः येषां तान् विचित्रोपशाखायुक्तान्)
द्रुमभुजान् (वृक्षाणां शाखाः) आरुह्य [केनापि सुखेन] मीलितदृशः
(निमीलित-नयनाः) विगतान्यवाचः (त्यक्तान्यशब्दाः सन्तः)
तदुदितं (तेनैव कृष्णेन प्रकटितं) कलवेणुगीतं (मधुरमुरलीनिनादं)
शृण्वन्ति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 170 ॥
ब्रजके भ्रमर भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :-
श्रीमद्भागवत (10/15/7)में-
एतेऽलिनस्तव यशोऽखिल-लोकतीर्थं
गायन्त आदिपुरुषानुपथं भजन्ते।
प्रायो अमी मुनिगणा भवदीयमुख्या
गूढं वनेऽपि न जहत्यनघात्मदेवम्॥ 171 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 171 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- हे अनघ (पापशून्य)! हे
आदिपुरुष ! ये सब भँवरे समस्त लोकोंको पवित्र
करनेवाले आपके यशसमूहका गान करते-करते (आपके
जानेके मार्गपर आपके पीछे जाकर) भजन कर रहे
हैं; ये भँवरेका वेष धारण करनेवाले मुनिगण
आत्मदेवतारूप आपको आपके गूढ़रूपमें होनेपर भी
परित्याग नहीं कर रहे हैं॥ 171 ॥
अनुभाष्य-पौगण्ड-अवस्थामें पदार्पण करके भगवान्
श्रीकृष्ण एक बार श्रीबलरामके साथ पुष्पोंसे भरे वनमें
प्रवेश करके चारों ओरकी शोभा देखकर विहार
438

चौबीसवाँ अध्याय [ 24/171–173 ]

करनेके इच्छा करके बड़े भाई बलरामकी प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं,—
हे आदिपुरुष (सर्वेषां सत्त्वानां कारणभूत-सन्धिनी-शक्तिमद्विग्रह), एते अलिनः (भृङ्गाः) तव अखिललोकतीर्थ (सकललोकपावनं) यशः गायन्तः अनुपथं (पथि पथि) भजन्ते; हे अनघ (शुद्धसत्त्वाधीश विग्रह), अमी भवदीय मुख्याः (त्वदीयानां मुख्याः प्रधानाः) मुनिगणाः वने गूढम् (अज्ञातम्) अपि आत्मदैवं (सेश्वरं तां) प्रायः न जहति (न त्यजन्ति त्वयि मनुष्यवेषेण निगूढे सति मुनयोऽप्यलिवेषेण निगूढास्त्वां भजन्तीत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
यहाँ पाठान्तरमें,— (भाः 10/15/7) यह श्लोक लक्षित होता है—
“नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा
हरिण्यः कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन।
सूक्तैश्च कोकिलगणाः गृहमागताय
धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥”

इसका अर्थ है,— “हे स्तुत्यर्ह (पूजनीय), मयूरगण अपने घरमें आये आपको देखकर परमानन्दमें नृत्य कर रहे हैं, हिरणियाँ गोपियोंके समान दृष्टि निक्षेप करके और कोयलें मधुर शब्द करके प्रीति उत्पन्न कर रही हैं; वृन्दावनवासी ही धन्य हैं, क्योंकि इसी प्रकार ही अर्थात् अपनी-अपनी वस्तुको प्रदान करना ही साधुओंका स्वभाव है॥” 171 ॥

ब्रजके हंस-सारसादि पक्षी भी श्रीकृष्णनिष्ठ मुनि :—
श्रीमद्भागवत (10/35/11) में—
सरसि सारसहंसविहङ्गा-
श्चारुगीतहतचेतस एत्य।
हरिमुपासत ते यतचित्ता
हन्त मीलितदृशो धृतमौनाः॥ 172॥

अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 172 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— जलाशयमें सारस, हंसादि पक्षीगण (श्रीकृष्णकी वंशीसे निकले) मधुर गीतसे आकृष्ट होकर आ जाते हैं और संयत चित्तसे नेत्र बन्द करके मौन धारण करते हुए हरिकी उपासना करते हैं॥ 172 ॥

अनुभाष्य— दिनके समय श्रीकृष्णके वनमें जानेपर विरह-सन्तप्त गोपियाँ परस्पर इस प्रकार गीतका गान करती थीं,—
[यर्हि अधरे कृष्णः सन्धितवेणुर्भवति तर्हीति पूर्वेणान्वयः] सरसि (सरोवरे) ये सारसहंसविहङ्गाः चारुगीतहतचेतसः (चारुणा वेणुगीतेन हतानि आकृष्टानि चेतांसि येषां ते) एत्य (आगत्य) हन्त (विषादे) यतचित्ताः (संयतमनाः) धृतमौनाः (निःशब्दाः) मीलितदृशः (मुदितनेत्राः सन्तः) हरिम् उपासत (अभजन्त, तत्समीपे उपविविशुर्वा)।
श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 172 ॥

शुद्धभक्तकी कृपासे अशुद्ध जातिकी भी शुद्धि :—
श्रीमद्भागवत (2/4/18)—
किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा
आभीरकङ्का यवनाः खशादयः।
येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः
शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 173 ॥

अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश, आभीर, (शुष्म) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता हूँ॥ 173 ॥

अनुभाष्य— श्रीशुकके मुखसे हरिकथा सुनकर परीक्षितके द्वारा श्रीकृष्णमें ऐकान्तिक मतिसे युक्त होकर मायाधीश भगवान्‌की सृष्टि आदि लीलाके विषयमें जिज्ञासा करनेपर उसके उत्तरमें श्रीशुक सर्वप्रथम भगवान्‌को प्रणाम करके मङ्गलाचरण कर रहे हैं,—
किरातहूनान्ध्रपुलिन्दपुक्कशाः आभीर-कङ्काः यवनाः खशादयः (पापयोनयः) अन्ये ये पापाः (स्व-स्व-प्राक्तन-कर्मतः पापजातयः) यदुपाश्रयाश्रयाः (यस्य भगवतः उपाश्रयाः आश्रिताः भागवत-वैष्णवाः तदाश्रयाः भक्ताश्रिताः सन्तः) शुध्यन्ति (पवित्री भवन्ति) तस्मै प्रभविष्णवे (प्रभावशालिने भगवत विष्णवे) नमः।


439

[ 24/173-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 173 ॥
'धृति'-शब्दका अन्य अर्थ :-
किंवा 'धृति'-शब्दे निजपूर्णतादि-ज्ञान कय।
दुःखाभावे उत्तमप्राप्त्ये महापूर्ण हय ॥ 174 ॥
अनुवाद-अथवा 'धृति'-शब्दका अर्थ अपनी पूर्णता आदिका ज्ञान भी कहा गया है। उत्तम वस्तु अर्थात् भगवद्-प्रेम प्राप्त होनेपर पूर्णताका ज्ञान होता है और सांसारिक वस्तुओंमें आसक्ति दूर हो जाती है, इसलिये दुःखका अभाव होता है, तब व्यक्ति महापूर्ण हो जाता है॥ 174 ॥
धृतिकी संज्ञा :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/4/144)-
धृतिः स्यात् पूर्णता-ज्ञानं दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः।
अप्राप्तातीत-नष्टार्थानभिशोचनादिकृत् ॥ 175 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-उत्तम लाभके द्वारा दुःखका न होना और पूर्णता-ज्ञानमें ही 'धृति' होती है। जो प्राप्त नहीं हुआ और अतीतमें संग्रह किये धनके नष्ट होनेपर जो शोक होता है, उसे 'धृति' ही दूर करती है॥ 175 ॥
अनुभाष्य-
दुःखाभावोत्तमाप्तिभिः (दुःखस्य अभावः तेन उत्तमस्य उद्गतं तमः यस्मात् सः प्रेमा, तस्य परमपुरुषार्थस्य प्रेम्णः आप्तिभिः च यत्) पूर्णता-ज्ञानम् (आत्मप्रसादानुभवः, तत् एव) धृतिः ; (सा)-अप्राप्तातीतनष्टार्थानभिशोचनादिकृत् (अप्राप्तस्य अतीतस्य नष्टस्य च अर्थस्य विषयस्य हेतोः अनभिशोचनं करोति या सा, अभिशोचनाभावः या सम्पाद्यते इत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 175 ॥
श्लोकका अर्थ :-
कृष्णभक्त-दुःखहीन, वाञ्छान्तर-हीन।
कृष्णप्रेम-सेवा-पूर्णानन्द-प्रवीण ॥ 176 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णभक्तकी श्रीकृष्णसेवाके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा ही नहीं होती, इसलिये उसे अन्य कोई इच्छा पूर्ण नहीं होनेका दुःख अनुभव नहीं होता। श्रीकृष्णकी प्रेमपूर्वक की गयी सेवाके द्वारा उसका हृदय सदा पूर्णतमरूपमें आनन्दित रहता है॥ 176 ॥
श्रीकृष्णसेवामें ही भक्त सन्तुष्ट, असन्तोषजनक अन्य कामनाओंका अभाव :-
श्रीमद्भागवत (9/4/67)में-
मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम्।
नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम् ॥ 177 ॥
अनुवाद-मेरी सेवासे ही परिपूर्ण-हृदयवाले शुद्धभक्त मेरी सेवाके द्वारा सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ स्वयं आनेपर भी जब उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, तब मायिक (स्वर्गादि) भोग और सायुज्य मुक्ति, जो कालके द्वारा अति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, उनकी इच्छा वे क्यों करेंगे? सायुज्यमुक्तिके द्वारा जीवकी सत्ता कालका ग्रास बन जाती है, इसलिये भुक्ति और सायुज्य-मुक्ति, ये स्थायी नहीं हैं॥ 177 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/208 संख्या देखें ॥ 177 ॥
सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अनुशीलनमें निष्ठ भक्त ही धीर और स्थिर :-
श्रीगोस्वामिपादोक्त-श्लोक-
हृषीकेशे हृषीकाणि यस्य स्थैर्यगतानि हि।
स एव धैर्यमाप्नोति संसारे जीवचञ्चले ॥ 178 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 178 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-इस जीवचञ्चल (क्षण-भङ्गुर) संसारमें जिस व्यक्तिकी समस्त इन्द्रियाँ हृषीकेश-श्रीकृष्णमें स्थिर हुई हैं, उस व्यक्तिने ही धैर्य प्राप्त किया है॥ 178 ॥
अनुभाष्य-
यस्य हृषीकाणि (इन्द्रियाणि) हृषीकेशे (सर्वानियन्तरि भगवति) स्थैर्यगतानि (उपशमं लब्धानि) स एव जीवचञ्चले (क्षणभङ्गुर) संसारे धैर्यम् आप्नोति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 178 ॥
440 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/179-184 ]
'आत्माराम':—धैर्यवान, 'मुनय:'—पक्षिगण, (शास्त्र-ज्ञानरहित) 'मूर्ख'। ये दो प्रकारके आत्माराम
'निर्ग्रन्था:'—मूर्खगण :— श्रीकृष्णकी कृपासे और साधुसङ्गमें श्रीकृष्णमें रतिरूपा-
'च'—अवधारणे, इहा 'अपि'—समुच्चये। बुद्धिको प्राप्त करते हैं। वे शुद्धबुद्धिसे युक्त होकर
धृतिमन्त हञा भजे पक्षि-मूर्खचये ॥ 179 ॥ अन्य सबका त्याग करके श्रीकृष्णभक्ति करते
हैं॥ 180-182 ॥
अनुवाद—अमृतानुकणा देखें॥ 179 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—“सब छाड़ि' शुद्धभक्ति करे
अमृतानुकणा—आत्मा-शब्दसे 'धृति'-अर्थ, 'च'-कारसे कृष्ण-पाय। कृष्णकृपाय साधुसङ्गे विचार-बुद्धि पाय॥”
अवधारण-अर्थ (निश्चय-अर्थ) और 'अपि'-शब्दसे [अर्थात् सब कुछ त्याग करके वे श्रीकृष्णके
समुच्चय-अर्थ ग्रहण करके 'मुनय:' और 'निर्ग्रन्थ अपि' चरणकमलोंकी शुद्धभक्ति करते हैं और श्रीकृष्ण-कृपासे
अर्थात् मुनिरूप पक्षीगण एवं मूर्खगण 'आत्मारामश्च'— तथा साधुसङ्गमें विचार-बुद्धि प्राप्त करते हैं।]॥ 182 ॥
निश्चय रूपमें धृतिमान (अर्थात् धैर्यशील अथवा श्रीमद्भगवद्गीता (10/8)में—
भगवत्सम्बन्धज्ञान-हेतु दुःखशून्य और उत्तमवस्तु अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्त्तते।
भगवत्प्रेम-प्राप्ति हेतु पूर्णानन्द) होकर उरुक्रम-श्रीकृष्णकी इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ 183 ॥
अहैतुकी भक्ति करते हैं, इस प्रकारसे अर्थ होता अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 183 ॥
है॥ 179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं सभीका प्रभव (उत्पत्ति)-स्थान
'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवर्त्तित हुआ है; ऐसा
(6) 'बुद्धि'-अर्थकी व्याख्या :— जानकर सब पण्डितगण भक्तियुक्त होकर मेरा भजन
'आत्मा'-शब्दे 'बुद्धि' कहे बुद्धिविशेष। करते हैं॥ 183 ॥
सामान्यबुद्धियुक्त यत जीव अशेष ॥ 180 ॥ अनुभाष्य—
पण्डित और मूर्खके भेदसे बुद्ध्याराम दो प्रकारके :— अहं (कृष्णः) सर्वस्य (विधिरुद्राणां प्रपञ्चस्य च) प्रभवः
बुद्ध्ये रमे आत्माराम—दुइ त' प्रकार। (हेतुः जन्मकारणम्); मत्तः (सर्वकारणकारणभूतात्) सर्वं
'पण्डित' मुनिगण, निर्ग्रन्थ 'मूर्ख' आर ॥ 181 ॥ (वस्तु) प्रवर्त्तते (मदधीनप्रवृत्तिकम्)—इति मत्वा बुधाः
साधु और श्रीकृष्णकी कृपासे सद्बुद्धिकी (कृष्णरसविदः) भावसमन्विताः (प्रेमयुक्ताः सन्तः) मां भजन्ते।
प्राप्ति और श्रीकृष्णभजन :— श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 183 ॥
कृष्णकृपाय साधुसङ्गे रति-बुद्धि पाय। भक्तकी कृपासे श्रौत-पथका अनुसरण करते हुए नीच
सब छाड़ि' कृष्णभक्ति शुद्धबुद्ध्ये पाय ॥ 182 ॥ त्रियर्क जातिकी भी मायासे मुक्ति :—
श्रीमद्भागवत (2/7/46)में—
अनुवाद—'आत्मा'-शब्दका अर्थ 'बुद्धि' ग्रहण करनेसे ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां
विशेष बुद्धिको लक्ष्य किया जाता है। किन्तु कम हो स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः।
या अधिक हो, सभी जीवोंमें बुद्धि होती है, इसलिये यद्यद्भुतक्रमपरायण-शील-शिक्षा-
सामान्य बुद्धिसे युक्त असंख्य जीवोंको भी स्वीकार स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ 184 ॥
किया गया है। जो अपनी बुद्धिका सदुपयोग करते हैं, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 184 ॥
वे आत्माराम कहलाते हैं। ऐसे आत्माराम दो प्रकारके
होते हैं, एक—'पण्डित' मुनिगण और दूसरे निर्ग्रन्थ
। 441

[ 24/184-189
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अमृतप्रवाह भाष्य-स्त्री, शूद्र, हूण, शबरादि
पापयोनिवाले जीव और पक्षी आदि तिर्यक-जातियाँ भी
जब अद्भुतक्रम (भगवान् श्रीउरुक्रम) परायणगणोंसे
(अर्थात् शुद्धभक्तोंके आचरणके अनुसरणसे) शिक्षा
प्राप्त (अर्थात् भगवद्भक्त) होकर (दुस्तर दैवी) मायासे
उद्धार प्राप्त कर लेते हैं, तब श्रौतपन्थी व्यक्तियोंका तो
कहना ही क्या ? ॥ 184 ॥

श्रीमद्भगवद्गीता (10/10)में-
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 186 ॥

अनुवाद-नित्य भक्तियोगके द्वारा जो लोग प्रीतिपूर्वक
मेरा भजन करते हैं, मैं उनको शुद्धज्ञानजनित
विमल-प्रेमयोग दान करता हूँ। वे लोग उस ज्ञानके
द्वारा मेरे परमानन्द धामको प्राप्त करते हैं॥186॥

अनुभाष्य-आदिलीला 1/49 संख्या देखें ॥186॥

अनुभाष्य-ब्रह्मा अपने शिष्य नारदसे भगवान्
विष्णुके लीलावतार-समूहकी क्रिया, प्रयोजन और
विभूतिसमूहका वर्णन करके उनकी दुस्तर मायासे मुक्त
शरणागत उच्चकुलमें उत्पन्न भक्तोंके नामोंका वर्णन
करके निम्नकुलमें उत्पन्न जनगणोंकी भी श्रौतपन्थामें
मुक्ति-प्राप्तिकी योग्यताकी बात बतला रहे हैं,-

सर्वश्रेष्ठ पाँच प्रकारके साधन :-
सत्सङ्ग, कृष्णसेवा, भागवत, नाम।
व्रजे वास,-एइ पञ्चसाधन प्रधान ॥ 187 ॥

पाँच प्रकारके साधनोंमेंसे किसी एकके सामान्य
अनुशीलनसे ही श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति :-
एइ पञ्च-मध्ये एक 'स्वल्प' यदि हय।
सुबुद्धि जनेर हय कृष्णप्रेमोदय ॥ 188 ॥

यदि स्त्रीशूद्रहूणशबरा पापजीवाः (पापयोनयः) तथा तिर्यक्जनाः
अपि अद्भुतक्रमपरायणशील-शिक्षाः (अद्भुताः विस्मयोत्पादिकाः
क्रमाः पादन्यासाः यस्य हरेः तस्य परायणाः हरिजनाः तेषां
शीले स्वभावे शिक्षा येषां ते-ये शुद्धभक्त-शिष्याः सन्तः
कृष्णभक्तसङ्गैः गठितचरित्राः भवन्ति, तर्हि एवम्भूताः) ते अपि
देवमायां वै विदन्ति (जानन्ति) अतितरन्ति (अतिक्रामन्ति) च;
[अतः] ये (भक्ताः) श्रुतधारणाः (श्रुतं भगवतः नामरूप-
गुण-लीलादि-तत्त्वं धारयन्ति श्रौतमार्गेण ये, ते) किमु (पुनः
तेषां किं वक्तव्यम्?-निश्चितमेव ते मायां विदन्ति अतितरन्तीत्यर्थः)।

अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 187 ॥
इन पाँच साधनोंमेंसे यदि कोई किसी एक अङ्गका
भी 'स्वल्प' मात्रामें पालन करता है, तब ऐसे बुद्धिमान
व्यक्तिमें श्रीकृष्णप्रेमका उदय होता है॥188॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'भागवत, नाम' - श्रीमद्भागवत और
श्रीकृष्णनाम ॥ 187 ॥

अनुभाष्य-श्रीकृष्णभक्तसङ्ग, श्रीकृष्णसेवा, श्रीकृष्णकथा-
विग्रह श्रीमद्भागवत, श्रीकृष्णनाम, श्रीकृष्णधाम श्रीव्रजमें
वास-ये पाँच प्रधान साधन हैं॥187 ॥

श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 184 ॥

सद्बुद्धि और नित्य-अनित्यका विचार करके
श्रीकृष्ण-भजनसे ही श्रीकृष्ण-प्राप्ति :-
विचार करिया यबे भजे कृष्ण-पांय।
सेइ बुद्धि देन ताँरे, याते कृष्ण पाय ॥ 185 ॥

भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/238)-
दुरुहाद्भुतवीर्येऽस्मिन् श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके।
यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भावजन्मने ॥ 189 ॥

अनुवाद-भक्ति ही एकमात्र कल्याणका साधन है,
इस प्रकार विचार करके जब कोई श्रीकृष्णके
चरणकमलोंका भजन करता है, तब श्रीकृष्ण उसे स्वयं
ऐसी बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह श्रीकृष्णको प्राप्त
कर सके ॥ 185 ॥

अनुवाद-सहसा दुर्बोध और अद्भुत शक्तिसम्पन्न
अन्तिम पाँच अङ्गोंमें श्रद्धाकी बात तो दूर रहे, अति

442

चौबीसवाँ अध्याय 24/189-195 ]
अल्प सम्बन्ध उत्पन्न होनेपर भी वह निरअपराधी
व्यक्तिकी भावोत्पत्तिका कारण बन जाता है ॥ 189 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/129 संख्या देखें ॥ 189 ॥
अनर्थमय और सकाम होनेपर भी सुबुद्धिके कारण
निरन्तर श्रीकृष्णभजनके फलसे कामनाओंको त्यागकर
निष्काम-सेवा और सिद्धिकी प्राप्ति; वैसा होनेपर भी
सकाम-भक्ति निष्काम-सेवाका 'कारण' नहीं :-
उदार महती याँर सर्वोत्तमा बुद्धि।
नाना कामे भजे, तबु पाय भक्तिसिद्धि ॥ 190 ॥
अनुवाद-उदारचित्त और बुद्धिमान व्यक्ति अनेक
प्रकारकी कामनाओंकी पूर्त्तिकी अभिलाषासे भजन
आरम्भ करनेपर भी अन्तमें भक्तिकी सिद्धिकी प्राप्ति
करते हैं ॥ 190 ॥
श्रीमद्भागवत (2/3/10)में-
अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ 191 ॥
अनुवाद-पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे
रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी
कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला
ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र
शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे ॥ 191 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 191 ॥
निरन्तर सेवाके प्रभावसे काम अथवा अनर्थकी निवृत्ति
और शुद्ध सेवाकी प्राप्ति :-
भक्ति-प्रभाव, -सेइ काम छाड़ाञा।
कृष्णपदे भक्ति कराय गुणे आकर्षिया ॥ 192 ॥
अनुवाद-भक्तिके प्रभावसे उस व्यक्तिकी समस्त
प्रकारकी भोग-वासनाएँ धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं और
श्रीकृष्णके गुणोंसे आकर्षित होकर वह श्रीकृष्णके
चरणकमलोंकी निरन्तर सेवामें नियुक्त हो जाता है ॥ 192 ॥
श्रीमद्भागवत (5/19/26)में-
सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां
नैवार्थदो यत् पुनरर्थिता यतः।
स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छता
मिच्छापिधानं निजपादपल्लवम् ॥ 193 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण प्रार्थना किये जानेपर मनुष्योंकी
प्रार्थनाको पूर्ण करते हैं, यह बात सत्य है। किन्तु जिस
अर्थसे (भोगकी वस्तुसे) बार-बार भोगके लिये प्रार्थना
उदित होती है, श्रीकृष्ण उस अर्थको नहीं देते।
अन्यकामी होकर जो एकमात्र उनके पादपल्लवको
प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं करनेपर भी उनका भजन
करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वयं ही अन्य-कामनाओंको
शान्त कर देनेवाले अपने चरणकमलोंको दिया करते
हैं ॥ 193 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/40 संख्या देखें ॥ 193 ॥
“आत्मारामः”-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दके
(7) 'स्वभाव'-अर्थकी व्याख्या :-
'आत्मा'-शब्दे 'स्वभाव' कहे, ताते येइ रमे।
आत्माराम जीव यत स्थावर-जङ्गमे ॥ 194 ॥
अनावृत शुद्धजीवस्वरूप और आवृत जीवस्वरूपका धर्म;
शुद्ध 'अहं' और अशुद्ध 'अहं'-
जीवेर स्वभाव-कृष्णे 'दास' अभिमान।
देहे आत्म-ज्ञाने आच्छादित सेइ 'ज्ञान' ॥ 195 ॥
अनुवाद-'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ 'स्वभाव' भी
होता है, जो अपने स्वभावमें आनन्द अनुभव करते
हैं, वे आत्माराम कहलाते हैं। इसलिये जितने भी
स्थावर अथवा जङ्गम प्राणी हैं, वे सभी आत्माराम
कहलाते हैं। वास्तवमें उन जीवोंका स्वभाव श्रीकृष्णके
'दास' होनेका अभिमान करना है, किन्तु देहमें आत्मबुद्धि
होनेके कारण उनका यह वास्तविक 'ज्ञान' आच्छादित
रहता है॥ 194-195 ॥
। 443

[ 24/196-201 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
च-शब्दे 'एव', 'अपि'-शब्द समुच्चये।
'आत्माराम' एव हञा श्रीकृष्ण भजये॥ 196॥
शुद्धस्वभाव 'आत्माराम' जीवका और
'निर्ग्रन्थ' जीवका दृष्टान्त :-
एइ जीव-सनकादि सब मुनिजन।
'निर्ग्रन्थ'-मूर्ख, नीच, स्थावर-जङ्गम॥ 197॥
अनुवाद-अमृतानुकणा देखें॥ 196-197॥
अमृतानुकणा-आत्मा-शब्दसे 'स्वभाव' अर्थ,
'च'-शब्दसे 'एव' (निश्चय ही) अर्थ और 'अपि'-शब्दसे
समुच्चय-अर्थ होनेपर, समस्त अर्थ यहाँपर इस प्रकार
होते हैं,-
सनकादि मुनिगण एवं 'निर्ग्रन्थ' अर्थात् मूर्ख, नीच,
स्थावर-जङ्गमादि 'आत्माराम एव' होकर अर्थात्
श्रीकृष्णदासके स्वभावसे युक्त होकर उरुक्रम-श्रीकृष्णकी
अहैतुकी भक्ति करते हैं॥ 196-197॥
मुक्तजीव व्यास आदिकी श्रीकृष्णसेवा-प्रसिद्ध,
निर्ग्रन्थ अथवा निर्बोधके भजनका वर्णन :-
व्यास-शुक-सनकादिर प्रसिद्ध भजन।
'निर्ग्रन्थ' स्थावरादिर शुन विवरण॥ 198॥
अनुवाद-व्यास, शुक और सनकादिका भजन तो
प्रसिद्ध है ही, अब तुम मुझसे 'निर्ग्रन्थ' स्थावरादिके
विषयमें श्रवण करो॥ 198॥
श्रीकृष्णकी कृपासे सभीका श्रीकृष्णभजन :-
कृष्णकृपादि-हेतु हैते स्वभाव उदय।
कृष्णगुणाकृष्ट हञा ताँहारे भजय॥ 199॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण-कृपासे सभी स्थावरादिका भी
श्रीकृष्णदास होनेका स्वभाव उदित होता है और वे
श्रीकृष्णके गुणोंके प्रति आकृष्ट होकर उनका भजन
करते हैं॥ 199॥
श्रीकृष्णके चरणके स्पर्शसे पृथ्वी धन्या, लक्ष्मीके भी
काम्य वक्षःस्पर्शसे गोपियाँ धन्या :-
श्रीमद्भागवत (10/15/8)में-
धन्येयमद्य धरणी तृण-वीरुधस्त्वत्-
पादस्पृशो द्रुमलतः करजाभिमृष्टाः।
नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै-
र्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः॥ 200॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200॥
अमृतप्रवाह भाष्य-यह भूमि (ब्रजभूमि) आज
धन्य हो गयी है; आपके चरणस्पर्शसे सभी तृण,
गुल्मादि, आपकी अङ्गुलिके स्पर्शसे वृक्ष-लता, आपके
दयापूर्ण अवलोकनसे (दृष्टिसे) नदी-पर्वत-पक्षी-पशु
आदि सब धन्य हो गये हैं। और लक्ष्मीको भी जिसे
प्राप्त करनेकी स्पृहा है, उस आपके वक्षःस्थलको प्राप्त
करके सभी गोपियाँ धन्य हो गयी हैं॥ 200॥
अनुभाष्य-पौगण्ड-अवस्थामें पदार्पण करके श्रीकृष्ण
एकबार श्रीबलदेवके साथ कुसुमाकर-वनमें प्रवेश करके
ब्रजकी शोभाको देखकर विहार करनेके इच्छुक होकर
बड़े भाई श्रीबलदेवकी स्तुतिके छलसे स्वयं ही स्वयंकी
स्तुति कर रहे हैं,-
अद्य [तव चरणस्पर्शात्] इयं धरणी धन्या, [तथा]
त्वत्पादस्पृशः (तव पादौ स्पृशन्तीति अतः) तृणवीरुधः
(तृणगुल्मादयः) करजाभिमृष्टाः (नखैः स्पृष्टाः) द्रुमलतः (वृक्षवल्लर्यः)
सदयावलोकैः (सकारुण्यदृष्टिभिः) नद्यः अद्रयः (गिरयः) खगमृगाः
(खगाः पक्षिणः मृगाः पशवः) च (धन्याः), श्रीः अपि
यत्स्पृहा (लक्ष्मीरापि यस्मै स्पृहयति, तेन) भुजयोः अन्तरेण
(वक्षसा) गोप्यः च धन्याः।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200॥
श्रीकृष्णकी वंशीकी ध्वनिसे जङ्गमका स्थावर-धर्म,
स्थावरमें जङ्गमके धर्मका उदय :-
श्रीमद्भागवत (10/21/19)में-
गा गोपर्केरनुवनं नयतोरुदार-
वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः।
अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणां
निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम्॥ 201॥
444 ।

चौबीसवाँ अध्याय 24/201-205 ]
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/275 संख्या देखें॥ 202 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखियों! गायों और गोपोंके श्रीमद्भागवत (2/4/18)में-
साथ वन-वनमें भ्रमण करनेवाले, गायोंको बाँधनेवाली किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुक्कशा
रस्सीके पाशको धारण करने आदि जैसे चिह्नोंसे युक्त आभीरकङ्का यवनाः खशादयः।
श्रीकृष्ण-बलदेवकी उदार वेणु-ध्वनि और गीतके द्वारा येऽन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रयाः
देही (प्राणियों)के मध्य चलनेवाले स्थावरकी भाँति शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ 203 ॥
स्तम्भित हो रहे हैं तथा स्थावर वृक्षादिमें पुलक हो रहा
है, -यह सब बहुत विचित्र है॥ 201 ॥ अनुवाद-किरात, हूण, अन्ध्र, पुलिन्द, पुक्कश,
अनुभाष्य-व्रजमें शरत्कालके आनेपर, श्रीकृष्णके आभीर, (शुम्भ) कङ्क, यवन और खशादि तथा अन्य
द्वारा वन-वनमें वंशीध्वनि करते हुए गो-चारणके छलसे जो समस्त पापयोनि जातियाँ हैं, वे सब जातियाँ ही
भ्रमण आरम्भ करनेपर, गोपियाँ वंशीध्वनिके श्रवणसे जिनके आश्रित-वैष्णवोंके आश्रयमें भली-भाँति शुद्ध हो
श्रीकृष्णके सङ्गके लिये कामातुरा होकर इधर-उधर जाती हैं, मैं ऐसे प्रभावसे युक्त विष्णुको नमस्कार करता
भ्रमण करते-करते श्रीकृष्णकी गुणावलीका वर्णन कर हूँ॥ 203 ॥
रही हैं, - अनुभाष्य-मध्यलीला 24/173 संख्या देखें॥ 203 ॥
हे सख्यः, गोपार्कैः (गोप-बालकैः सह) अनुवनं (प्रतिवनं) यहाँ तक उन्नीस प्रकारका अर्थ :—
गाः नयतोः (सञ्चारयतोः) निर्योगपाशकृतलक्षणयोः (नियुज्यन्ते आगे 'तेर' अर्थ करिलुँ, आर 'छय' एइ।
गावः आभिः इति निर्योगाः दोहनकालीन-पादबन्धन-रज्जुः, ऊनविंशति अर्थ हइल मिलि' एइ दुइ॥ 204 ॥
अधुष्यगवां कर्षणाथर्ाः पाशाः च, तैः कृतं लक्षणं चिह्नं
ययोस्तयोः शिरसि निर्योगवेष्टनेन स्कन्धस्थापने च गोपपरिवृढश्रिया अनुवाद-मैंने पहले आत्माराम श्लोकके तेरह
विराजमानयोः रामकृष्णयोः) कलपदैः (मधुरशब्दैः) उदारवेणुस्वनैः अर्थ बतलाये थे और अब ये छः अन्य अर्थ हैं, इस
(महावेणुनादैः) तनुभृत्सु (शरीरधारिषु देहिषु) गतिमतां (ये प्रकार कुल मिलाकर उन्नीस अर्थ हुए॥ 204 ॥
गतिमन्तः, तेषाम्) अस्पन्दनं (स्थावरधर्मः) तरूणां पुलकः अनुभाष्य-'आगे तेर अर्थ'-पहले तेरह अर्थोंके
(जङ्गमधर्मः-इति तु) विचित्रम् (अतिविचित्रम्)। लिये मध्यलीला 24/157 श्लोकका अनुभाष्य देखें।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ अन्य छः यह हैं, -(1) 'मनो-रमणशील' (159 संख्या);
श्रीमद्भागवत (10/35/9)में— (2) 'यतने रमणशील' (162 संख्या); (3) 'धैर्यशील'
वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं (168 संख्या); (4) 'बुद्ध्याराम पण्डितमुनि' (181
व्यञ्जयन्त इव पुष्पफलाढ्याः। संख्या); (5) 'बुद्ध्याराम निर्ग्रन्थ मूर्ख' (181 संख्या);
प्रणतभारविटपा मधुधाराः (6) 'श्रीकृष्णदास-स्वभावविशिष्ट' आत्माराम (195
प्रेमहृष्टतनवो ववृषुः स्म ॥ 202 ॥ संख्या) ॥ 204 ॥
अनुवाद-[श्रीकृष्णका वेणुनाद श्रवण करके] वनकी 'आत्मारामः'-पदके अन्तर्गत आत्मा-शब्दकी
लताएँ और वृक्ष फूल और फलोंसे लद गये और 'देह'-अर्थसे व्याख्या :—
उनके भारसे उनकी डालियाँ झुक गयीं। समस्त एइ ऊनिश अर्थ करिलु, आगे शुन आर।
वनस्पति अपने भीतर श्रीकृष्णकी अभिव्यक्तिको सूचित 'आत्मा'-शब्दे 'देह' कहे, - चारि अर्थ तार॥ 205 ॥
करते हुए प्रेममें पुलकित होकर मधुधारा वर्षण करने
लगीं॥ 202 ॥
। 445

[ 24/205-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—इस प्रकार मैंने तुम्हें उन्नीस अर्थ बतलाये
हैं, अब तुम आगे सुनो। 'आत्मा'-शब्दका एक अर्थ
'देह' भी है, इस अर्थके द्वारा अन्य चार अर्थ प्रकाशित
होंगे ॥ 205 ॥
अनुभाष्य—'चारि अर्थ तार'—(1) औपाधिक ब्रह्मदेह
(206 संख्या); (2) कर्मनिष्ठ याज्ञिकोंकी कर्मदेह
(208 संख्या); (3) तपोदेह (210 संख्या); (4)
सर्वकाम-देह (212 संख्या) ॥ 205 ॥
साधुसङ्गके फलसे देहात्मबुद्धि अथवा विवर्त्तवादियोंको भी
विवर्त्त बुद्धिके त्यागसे श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :—
देहाराभी देहे भजे 'देहोपाधि ब्रह्म'।
सत्सङ्गे सेह करे कृष्णेर भजन ॥ 206 ॥
अनुवाद—जो देहको ही मैं माननेवाले 'देह-उपाधि
ब्रह्म'का अर्थात् अपनी देहको ब्रह्म मानकर भजन
करते हैं, यदि उन्हें भी सत्सङ्गकी प्राप्ति हो जाय, तो
वे भी श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 206 ॥
अनुभाष्य—देहाराभी देहको औपाधिक ब्रह्ममूर्ति
समझकर अपनी देहकी सेवा करते-करते साधुसङ्गसे
उस विवर्त्त-बुद्धिको छोड़कर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 206 ॥
श्रीमद्भागवत (10/87/18)—
उदरमुपासते य ऋषिवर्त्मसु कूर्पदृशः
परिसरपद्धतिं हृदयमारुणयो डहरम्।
तत उदगादनन्त तव धाम शिरः परमं
पुनरिह यत् समेत्य न पतन्ति कृतान्तमुखे ॥ 207 ॥
अनुवाद—(ऋषियोंके सम्प्रदाय मार्गमें) जो कर्मयोगमें
उदर अर्थात् मणिपुरमें स्थित ब्रह्मकी उपासना करते हैं,
वे 'शार्कराक्ष' ऋषि कहलाते हैं और वे कूर्पदृक् अर्थात्
स्थूलदृष्टि हैं। और आरुणि ऋषिगण (उस सम्प्रदायके
ऋषिगण) जहाँसे नाड़ियोंका विस्तार होता है उस
हृदयाकाशमें (सूक्ष्म ब्रह्मकी) उपासना करते हैं। हे
अनन्त, उससे उत्कृष्ट जो योगीगण शिरोगत (मूलाधार
उदरसे आरम्भ करके हृदयके मध्यमेंसे होकर मस्तक
और ब्रह्मरन्ध्र तक बढ़ते हुए) सहस्रदल-पद्मस्वरूप
आपकी उपलब्धिके स्थान सुषुम्ना-नामक परमश्रेष्ठ
ज्योतिर्मय धाममें पहुँच जाते हैं, वे पुनः मृत्युके मुख
अर्थात् संसारमें पतित नहीं होते ॥ 207 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 24/160 संख्या देखें ॥ 207 ॥
साधुसङ्गके फलसे कर्मका त्याग करके देहारामी
कर्मीको भी शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :—
देहाराभी—कर्मनिष्ठ याज्ञिकादि जन।
सत्सङ्गे 'कर्म' त्यजि' करये भजन ॥ 208 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 208 ॥
अनुभाष्य—'देहाराभी कर्मनिष्ठ'—यज्ञादि परायण; वे
भी सुकृतिके फलसे भक्तोंके सङ्गसे कर्मनिष्ठारूपी
यज्ञका त्याग करके श्रीकृष्णका भजन करते हैं ॥ 208 ॥
शौनकादिके द्वारा कर्मकाण्डकी निन्दा और श्रीसूतकी
हरिकथा-कीर्तनमें प्रवृत्तिकी प्रशंसा :—
श्रीमद्भागवत (1/18/12)में—
कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान्।
आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥ 209 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(हे सूत!) हम आश्वास (अर्थात्
निश्चय ही फल मिलेगा, इस आशासे) रहित इस
कर्ममार्गमें धुएँसे धूमिल हो गये हैं, [ऐसी अवस्थामें]
आप हमें श्रीगोविन्दके चरण-कमलोंके मधुमय [मादक]
आसवका पान करा रहे हैं ॥ 209 ॥
अनुभाष्य—महाभागवत श्रीसूत-गोस्वामीके द्वारा
शुश्रुषु शौनकादिको हरिकथारूपी भागवतका वर्णन
आरम्भ करनेपर ऋषिगण अपने तुच्छ कर्मकाण्डके
अनुष्ठानकी निन्दा कर रहे हैं,—
अस्मिन् अनाश्वासे (अविश्वसनीय) कर्मणि (सत्रे) धूमधूम्रात्मनां
(धूमेन धूम्रौ विवर्णौ आत्मानौ शरीर-चित्ते येषां तेषां तान्
इत्यर्थः) भवान् मधु (मधुरं) गोविन्दपादपद्मासवं
(श्रीकृष्ण-चरणाब्जयोः मकरन्दं श्रीहरिकथामृतमित्यर्थः) आपाययति
(श्रावयति)।
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