श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1876, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/130-136 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आश्रयस्वरूप भगवान्के विशुद्धतत्त्वज्ञानके उद्देश्यसे वर्णन
करते हुए इस श्लोकमें उसके अन्तर्गत निरोध और
मुक्तिके स्वरूप अथवा लक्षण बतला रहे हैं, -
[श्रीहरेः योगनिद्राम्] अनु (पश्चात्) अस्य आत्मनः (जीवस्य)
शक्तिभिः (स्वोपाधिभिः) शयनं (लयः) निरोधः (इति स्मृतः);
तथा अन्यथा रूपं (अविद्यया अध्यस्तं कर्तृत्वादि) हित्वा
(त्यक्त्वा) स्वरूपेण (भगवद्दास्ये शुद्धजीवस्वरूपेण) व्यवस्थितिः
(विशेषेण अवस्थानं स्वरूपसाक्षात्कार इत्यर्थ एव) 'मुक्तिः'।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 130 ॥
मायारूपी भोगवाञ्छामें श्रीकृष्ण-विमुखता, श्रीकृष्णसेवासे
अथवा श्रीकृष्ण-उन्मुखतासे मायासे मुक्ति :-
कृष्ण-बहिर्मुख-दोष माया हैते हय।
कृष्णोन्मुखी भक्ति हैते माया-मुक्ति हय ॥ 131 ॥
अनुवाद-मायासे ही श्रीकृष्ण-बहिर्मुखतारूपी दोष
उत्पन्न होता है और श्रीकृष्ण-उन्मुखी भक्तिसे ही मायासे
मुक्ति होती है ॥ 131 ॥
श्रीमद्भागवत (11/2/37)में-
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशा-
दपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः।
तन्माययातो बुध आभजेत्तं
भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ 132 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है,
उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और
उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत
स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको
'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य-भक्तिके
साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे ॥ 132 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 20/119 संख्या देखें ॥ 132 ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 133 ॥
अनुवाद-इस त्रिगुणमयी मेरी मायासे अत्यन्त
कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं,
वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं॥ 133 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 20/121 संख्या देखें ॥ 133 ॥
भक्तिबलसे ही मुक्ति और मुक्त होनेपर श्रीकृष्णभक्ति :-
भक्ति बिना मुक्ति नाहि, भक्त्ये मुक्ति हय।
तबे मुक्ति पाइले अवश्य कृष्ण भजय ॥ 134 ॥
अनुवाद-भक्तिके बिना मुक्ति नहीं हो सकती,
भक्तिसे ही मुक्ति प्राप्त होती है। जो भक्तिके बलपर
मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे सदा ही श्रीकृष्णका भजन
करते हैं॥ 134 ॥
श्रीमद्भागवत (10/14/4)में-
श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो
क्लिश्यन्ति ये केवल-बोधलब्धये।
तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यते
नान्यद्यथा स्थूलतुषावघातिनाम् ॥ 135 ॥
अनुवाद-हे विभो ! आपमें भक्ति ही कल्याणका
पथ है, उसे परित्याग करके जो सब व्यक्ति केवल ज्ञान
प्राप्तिके लिये अर्थात् 'मैं ब्रह्म' हूँ, इसीको ही स्थिर
रूपमें जाननेके लिये अनेक प्रकारके कष्ट स्वीकार
करते हैं, खाली भूसीको पीसनेवालोंको जिस प्रकार
चावल नहीं मिलते, उसी प्रकार, उन्हें अन्तमें क्लेशमात्र
ही प्राप्त होता है॥ 135 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/22 संख्या देखें ॥ 135 ॥
श्रीमद्भागवत (10/2/32)में-
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्य-
स्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रे
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ 136 ॥
अनुवाद-हे कमलनयन, जो 'मैं विमुक्त हो गया
430 ।