सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1874, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1874

[ 24/120-125 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सत्सङ्गके गुण और महिमा :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/2/27)में उद्धृत हरिभक्तिसुधोदय-वचन—
अहो महात्मन् बहुदोषदुष्टोऽप्येकेन
भात्येष भवो गुणेन।
सत्सङ्गमाख्येन सुखावहेन
कृताद्य नो येन कृशा मुमुक्षा॥120॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे महात्मन्! इस भवसंसारमें बहुत दोष रहनेपर भी साधुसङ्गरूपी एक महान् गुण है। उसी एक नित्यकल्याणप्रद गुणके द्वारा अब हमारी मुक्तिकी इच्छा दुर्बल हो गयी है॥120॥
अनुभाष्य—
हे महात्मन्, अहो एष भवः (मानवजन्म) बहुदोषदुष्टः (अशेषदोषाकरभूतः) अपि सुखावहेन (अर्थदेन, नित्यकल्याण-प्रदेन) सत्सङ्गमाख्येन (साधुसङ्गनाम्ना) एकेन गुणेन भाति (दीप्यति), येन (गुणेन) अद्यः नः (अस्माकं) मुमुक्षा (मोक्षवाञ्छा) कृशा कृता (क्षयीभूता भवति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥120॥
जिज्ञासु मुक्तिकामी शौनकादिका शुद्धभक्तके सङ्गसे मुक्तिकी कामनाका त्याग :—
नारदेर सङ्गे शौनकादि मुनिगण।
मुमुक्षा छाड़िया कैला कृष्णेर भजन॥121॥
कभी तो श्रीकृष्णदर्शनसे, कभी श्रीकृष्णकृपासे मुक्तिकी कामनाका त्याग और शुद्धभक्तिकी प्राप्ति :—
कृष्णेर दर्शने, कारो कृष्णेर कृपाय।
मुमुक्षा छाड़िया गुणे भजे ताँर पाँय॥122॥
अनुवाद—श्रीनारदके सङ्गसे शौनकादि मुनियोंने मुक्तिकी वाञ्छाको त्याग करके श्रीकृष्णका भजन किया। किसीने श्रीकृष्णके दर्शन करके और किसीने श्रीकृष्णकी कृपासे मोक्षकी वाञ्छाको छोड़कर उनके गुणोंके प्रति आकर्षित होकर उनके श्रीचरणकमलोंका भजन किया॥121-122॥
शुद्ध श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त करनेपर पहले आचरित ज्ञानके प्रयासमें खेद :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/34)—
अस्मिन् सुखघनमूर्त्तौ परमात्मनि
वृष्णिपत्तने स्फुरति।
आत्मारामतया मे वृथा गतो
बत चिरं कालः॥123॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस वृष्णिपत्तन द्वारकामें चित्सुख-घनमूर्ति श्रीकृष्णके स्फुरित होनेपर मेरे सुखका उदित हुआ है। हाय, आत्मारामताका आश्रय (निर्वेशेष-ब्रह्मका अनुशीलन) करते हुए मेरे अनेक दिन वृथा (बेकार) चले गये हैं॥123॥
अनुभाष्य—
बत (खेदे) वृष्णिपत्तने (द्वारकानगर्यां) सुखघनमूर्त्तौ (चित्सुखघनविग्रहे) परमात्मनि अस्मिन् (श्रीकृष्णे) स्फुरति [सति] आत्मारामतया (निर्विशेषब्रह्मानुशीलनेन) चिरं मे (मम) कालः वृथा गतः (हतः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥123॥
(ख) दो प्रकारके जीवन्मुक्त :—
‘जीवन्मुक्त’ अनेक सेइ, दुइ भेद जानि।
‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’, ‘ज्ञाने जीवन्मुक्त’ मानि॥124॥
भक्तिके फलसे जीवन्मुक्त अवरोहपन्थी भक्तको श्रीकृष्णसेवानन्दकी प्राप्ति, ज्ञानके फलसे आरोहपन्थी मुक्ताभिमानीकी अधोगति :—
‘भक्त्ये जीवन्मुक्त’ गुणाकृष्ट हञा कृष्ण भजे।
‘शुष्कज्ञाने जीवन्मुक्त’ अपराधे अधो मजे॥125॥
अनुवाद—‘जीवन्मुक्त’ (इसी जीवनमें मुक्त) अनेक हैं, उनमें दो श्रेणियाँ हैं। एक प्रकारके जीवन्मुक्त तो भक्तिका आश्रय करके जीवन्मुक्त होते हैं और दूसरी प्रकारके वे हैं जो केवल ज्ञानका आश्रय करके स्वयंको जीवन्मुक्त मानते हैं, किन्तु वास्तवमें मुक्त होते
428 ।