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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1880, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1880

[ 24/151-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ध्यानयोगमिश्रा भक्तिमें सिद्धिकी प्राप्ति :—
श्रीमद्भागवत (3/28/34)में—
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो
भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात्।
औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहूर्दह्यमान—
स्तच्चापि चित्तबड़िशं शनकैर्वियुङ्क्ते॥ 151 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके
प्रति भाव प्राप्त करके भक्तिके द्वारा हृदयके द्रवीभूत
और आनन्दसे भर जानेके कारण पुलकादि उत्पन्न होते
हैं, उत्कण्ठाके कारण आनन्द-अश्रुओंके द्वारा बार-बार
वह आनन्दमें निमज्जित हुआ करता है; तब मछलीको
पकड़नेवाले काँटेकी भाँति ध्यानयुक्त चित्तको (ध्येय
वस्तुकी धारणासे) थोड़ा-थोड़ा करके बाहर कर देता
है,—यही 'निगर्भ' योगीका उदाहरण है॥ 151॥
अनुभाष्य—शरणागत देवहूतिको भगवान् श्रीकपिलदेव
निगर्भ योगीके लिये श्रीभगवान्‌की अप्राकृत श्रीमूर्तिके
प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गके ध्यानकी कर्त्तव्यताका उपदेश
प्रदान करके ध्यानके फल मनके निग्रहकी बात बतला
रहे हैं,—
एवं (ध्यानपथेन) भगवति हरौ प्रतिलब्धभावः (प्रतिलब्धः
भावः प्रेमा येन सः) भक्त्या (श्रद्धया) द्रवद्धृदयः (द्रवत्
आर्द्रीभवत् हृदयं यस्य सः) प्रमोदात् (हर्षप्रकर्षात्) उत्पुलकः
(उद्गतानि पुलकानि यस्य सः रोमाञ्चितदेहः) औत्कण्ठ्यबाष्पकलया
(औत्कण्ठ्येन प्रवृत्तया अश्रुकलया) मुहुः (पुनः पुनः) अद्ह्यमानः
(आनन्दसंप्लवे निमज्जमानः) च तत् अपि चित्तबड़िशं (दुर्ग्रहस्य
भगवतः ग्रहणे बड़िशं मत्स्यवेधनम् इव उपायभूतं चित्तम्
अपि) शनकैः (क्रमशः ध्येय-वस्तुनः) वियुङ्क्ते (तद्धारणे
शिथिलप्रयत्नः भवति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 151 ॥
(क) आरुरुक्षु, (ख) आरूढ़ और (ग) प्राप्तसिद्धिके
भेदसे तीन प्रकारके योगी :—
'योगारुरुक्षु', 'योगारूढ़', 'प्राप्तसिद्धि' आर।
एइ तिन भेदे हय छय प्रकार॥ 152 ॥
अनुवाद—योगारुरुक्षु, योगारूढ़ और प्राप्तसिद्धि—ये
तीन सगर्भ और निगर्भके भेदसे कुल मिलाकर छः
प्रकारके होते हैं॥ 152॥
श्रीमद्भगवद्गीता (6/3-4)में—
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढ़स्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ 153॥
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥ 154॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 153-154॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिसकी योगमें आरोहण करनेकी
इच्छा है, वह 'आरुरुक्षु' है; उस आरुरुक्षु मुनिका यम,
नियम, आसन और प्राणायामरूप कर्म ही 'कारण'
(साधन) है। योगारूढ़ व्यक्तिका ध्यान-धारणा-प्रत्याहाररूप
श्रम ही 'कारण' है। इन्द्रियोंके उद्देश्यसे कर्ममें जब
आसक्ति नहीं रहती, तब सभी सङ्कल्प परित्याग करके
योगी 'समाधि'-युक्त अथवा 'योगारूढ़' होते हैं॥ 153-154॥
अनुभाष्य—
योगं (ज्ञानयोगम्) आरुरुक्षोः (प्राप्तुमिच्छोः) मुनेः [तदारोहे]
कर्म कारणं (साधनम्) उच्यते; योगोरूढ़स्य (ज्ञानयोगमारूढ़स्य
तु) तस्य (ज्ञाननिष्ठस्य) एव शमः (ज्ञानपरिपाके
समाधिश्चित्तविक्षेपकर्मोपरमः) कारणम् उच्यते। यदा हि इन्द्रियार्थेषु
(इन्द्रियभोग्येषु शब्दादिषु तत् साधनेषु च) कर्मसु न अनुषज्जते
(आसक्तिं न करोति), तदा सर्वसङ्कल्पसंन्यासी (सर्वान् भोगविषयान्
कर्मविषयान् च आसक्तिमूलभूतान् सङ्कल्पान् संन्यसितुं शीलं
यस्य सः) योगारूढ़ (मुक्तः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 153-154॥
छः प्रकारके योगियोंका साधुसङ्गमें योगमार्गका त्याग
और श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति :—
एइ छय योगी साधुसङ्गादि-हेतु पाञा।
कृष्ण भजे कृष्णगुणे आकृष्ट हञा॥ 155 ॥
च-शब्दे 'अपि'र अर्थ इँहाओ कहय।
'मुनि', 'निर्ग्रन्थ'-शब्देर पूर्ववत् अर्थ हय॥ 156 ॥
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