श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 21/90–98 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
(घ) श्रीकृष्णके तद्रूपवैभव-धामगत चौथा (गूढ़) अर्थ :-
'त्र्यधीश्वर'-शब्देर अर्थ 'गूढ़' आर हय।
'त्रि'-शब्दे कृष्णेर तिन लोक कय॥90॥
अनुवाद—'त्र्यधीश्वर'-शब्दका अन्य और भी गूढ़ अर्थ है, 'त्रि'-शब्द श्रीकृष्णके तीन लोकोंके विषयमें बतलाता है॥90॥
श्रीकृष्णके तीन धाम :-
गोलोकाख्य गोकुल, मथुरा, द्वारावती।
एइ तिन लोके कृष्णेर सहजे नित्यस्थिति॥91॥
अनुवाद—गोलोक अर्थात् गोकुल, मथुरा और द्वारका—इन तीन लोकोंमें श्रीकृष्ण स्वाभाविक रूपसे नित्य ही वास करते हैं॥91॥
अनुभाष्य—गोलोकके तीन प्रकोष्ठ—(1) गोकुल, (2) मथुरा, (3) द्वारका। श्रीकृष्णलीलाके तीन प्रकोष्ठोंकी भाँति श्रीगौरलीलामें भी अन्तरङ्ग पूर्णैश्वर्यमय तीन प्रकोष्ठ हैं—(1) नवद्वीप-मण्डल, (2) श्रीक्षेत्रमण्डल, (दाक्षिणात्य?) और (3) व्रजमण्डल॥91॥
स्वयं श्रीकृष्ण ही तीनों धामोंके सम्राट् :-
अन्तरङ्ग-पूर्णैश्वर्यपूर्ण तिन धाम।
तिनेर अधीश्वर कृष्ण—स्वयं भगवान्॥92॥
अनुवाद—ये तीनों धाम अन्तरङ्ग-पूर्णैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण इन तीनों धामोंके अधीश्वर हैं॥92॥
अनन्त वैकुण्ठ, ब्रह्माण्ड और दिशाओंके अधिपतियोंके द्वारा वन्दित-चरण श्रीकृष्ण :-
पूर्व-उक्त ब्रह्माण्डरे यत दिक्पाल।
अनन्त वैकुण्ठावरण, चिरलोकपाल॥93॥
ताँ-सबार मुकुट कृष्णपादपीठ-आगे।
दण्डवत्काले तार मणि पीठे लागे॥94॥
मणि-पीठे ठेकाठेकि, उठे झन्झनि।
पीठेर स्तुति करे मुकुट हेन जानि॥95॥
अनुवाद—पहले कहे गये ब्रह्माण्डोंके जितने भी दिक्पाल और अनन्त वैकुण्ठोंके आवरणोंमें रहनेवाले जितने चिरलोकपाल हैं, श्रीकृष्ण-पादपीठके आगे दण्डवत् करते समय उन सबके मुकुटोंकी मणियाँ श्रीकृष्णके सिंहासन और पादपीठको स्पर्श करती हैं। मणियोंके पादपीठसे टकरानेपर झनझनकी ध्वनि होती है और वह ध्वनि ऐसी लगती है मानो मुकुट पादपीठकी स्तुति कर रहे हों॥93–95॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 21/58 संख्या देखें॥93॥
स्वाराज्य-लक्ष्मीका अर्थ :-
निज-चिच्छक्त्ये कृष्ण नित्य विराजमान।
चिच्छक्ति-सम्पत्तिर 'षडैश्वर्य' नाम॥96॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥96॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्ण स्वाराज्यलक्ष्मीरूप अपनी चिद्-शक्तिसे युक्त होकर नित्य विराजमान हैं। भगवान्की चिद्-शक्ति-सम्पत्तिको ही 'षडैश्वर्य' कहते हैं। 'चिच्छक्ति'—चिद्-शक्तिमद्-विग्रह श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति और सेविका है॥96॥
वे—श्रीकृष्णकी सेविका :-
सेइ स्वाराज्यलक्ष्मी करे नित्य पूर्ण काम।
अतएव वेदे कहे 'स्वयं भगवान्'॥97॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाराज्यलक्ष्मी ही नित्य श्रीकृष्णकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करती है, इसलिये वेद श्रीकृष्णको 'स्वयं भगवान्' कहते हैं॥97॥
श्रीकृष्णका ऐश्वर्य—अगाध अमृतका समुद्र :-
कृष्णेर ऐश्वर्य—अपार अमृतेर सिन्धु।
अवगाहिते नारि, तार छुँइल एक बिन्दु॥”98॥
306 |
इक्कीसवाँ अध्याय 21/98-100 ]
अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अपार अमृतका सिन्धु
है। मैं उसमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं कर सकता
हूँ, इसलिये मैंने केवल उसकी एक बूँदको ही स्पर्श
किया है॥”98॥
ऐश्वर्य-माधुरीका वर्णन करते हुए महाप्रभुकी
श्रीकृष्णविग्रह-माधुरीकी स्फूर्ति :-
ऐश्वर्य कहिते प्रभुर कृष्णस्फूर्ति हैल।
माधुर्ये मजिल मन, एक श्लोक पड़िल॥99॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका वर्णन करते-करते
महाप्रभुको श्रीकृष्णके माधुर्यकी स्फूर्ति हो आयी। उनका
मन श्रीकृष्णके माधुर्यमें रम गया और उन्होंने एक
श्लोक पढ़ा॥99॥
अपनी नरलीलाके उपयुक्त अलौकिक लीला-माधुर्यसे
श्रीकृष्ण स्वयं ही मुग्ध :-
श्रीमद्भागवत (3/2/12)में—
“यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोगमाया-
बलं दर्शयता गृहीतम्।
विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः
परं पदं भूषणभूषणाङ्गम् ॥100॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥
अमृतप्रवाह भाष्य—वही श्रीकृष्णमूर्ति अपनी
चिद्-शक्तिका बल प्रदर्शित करानेकी इच्छासे मर्त्यलीलाके
उपयोगी, स्वयंमें भी विस्मय उत्पन्न कर देनेवाली एवं
समस्त सौभाग्य-ऋद्धिके परमपद (पराकाष्ठा) और
समस्त भूषणोंको भूषित करनेमें समर्थ है॥100॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी अप्रकट अवस्थामें श्रील
उद्धव उनके विरहमें शोकसे कातर होकर श्रीविदुरसे
श्रीकृष्णके अतुल रूप-माधुर्यका वर्णन कर रहे हैं—
यत् (बिम्बं) मर्त्यलीलौपयिकं (मर्त्यलीलासु औपयिकं
योग्यं नराकारं) स्वयोगमायाबलं (निजचिच्छक्तेः वीर्यं) दर्शयता
(प्रकाशयता) [भगवता स्वयं] गृहीतं (स्वीकृतं) स्वस्य च
(आत्मनः अपि) विस्मापनं (विस्मयजनकं) सौभगर्द्धेः
(सौभाग्यातिशयस्य) परं पदं (पराकाष्ठा, प्रतिष्ठा) भूषणभूषणाङ्गं
(भूषणानां भूषणानि अङ्गानि यस्मिन् तत् स्वबिम्बं) [प्रदर्श्य
अन्तरधात् इति पूर्वेणान्वयः]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'प्रदर्श्य
अन्तरधात्' पूर्व श्लोक (3/2/11) के साथ उसका
अन्वय करें॥ 100 ॥
अमृतानुकणा—श्रीश्रीमद्रूप-गोस्वामी प्रभुपाद-कृत
'लघुभागवतामृत'में अपनी कारिकामें आलोच्य
'यन्मर्त्यलीलौपयिकं' इस श्रीमद्भागवतीय श्लोककी व्याख्या
प्रदत्त हुई है। इसके पूर्वश्लोकमें कहे गये 'स्वबिम्बं'से
यहाँपर 'यत्'-पदके द्वारा 'बिम्ब'-पदको कहा जा रहा
है, अर्थात् जो बिम्ब (श्रीविग्रह) मर्त्यलीलासमूहके
अतिशय उपयोगी है। अनेक प्रकार आश्चर्य, माधुर्य,
वीर्य और ऐश्वर्यादिकी सम्पूर्ण प्रकाश होकर श्रीकृष्णकी
मर्त्यलीला उनकी अन्यान्य देवलीलाओंकी अपेक्षा भी
अतीव मनोहारिणी है। यहाँपर 'बिम्ब'-पदके द्वारा
सद्गुणावलीसम्पन्न परव्योमनाथादि सभी स्व-स्वरूपगणोंके
मूलतत्त्व जो श्रीकृष्ण हैं, वे ही लक्षित हुए हैं। इसलिये,
सम्पूर्ण रूप और गुणोंके आश्रय हेतु वह बिम्ब जो
विचित्र नरलीलाके अतिशय योग्य है, वही कथित हुआ
है। *'स्वयोगमायाबलं'—*स्वयोगमाया अर्थात् चिद्-शक्ति,
उनका 'बल' अर्थात् सामर्थ्य। चिद्-शक्तिके सामर्थ्यको
ही 'दर्शयता गृहीतम्' अर्थात् साक्षात् करवानेके लिये
(उन्होंने जो बिम्ब) प्रकट किया है। 'अहो! मेरी
चिद्-शक्तिके अद्भुत प्रभावका दर्शन करो, जिसकी
गन्धमात्र भी दिव्यातिदिव्य लोकसमूहमें सम्भवपर नहीं
है'—इस प्रकारसे चिद्-शक्ति-प्रभाव दर्शन करवाते हुए
श्रीकृष्णका इस प्रकार जगमोहन-रूप जो योगमायाके
द्वारा आविष्कृत हुआ है, यही उस 'स्वयोगमाया' आदि
पदका अभिप्राय है। *'विस्मापनं स्वस्य च'—*वही बिम्ब
'स्वस्य' अर्थात् स्वयंको और परव्योमनाथादि आत्मदर्शोको
'विस्मापन' अर्थात् नवनवायमानरूपमें परम चमत्कृत
। 307
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
[ 21/100-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करनेवाला है। वह बिम्ब 'सौभगर्द्धेः परं पदं'—'सौभगर्द्धि'
अर्थात् महाश्चर्यमय सौन्दर्यकी पराकाष्ठाका 'परंपद'
अर्थात् नित्य उत्कर्ष-सम्पत्तिका परमाश्रय है।
'भूषणभूषणाङ्गम्'—कौस्तुभ, मकर-कुण्डलादि जो भूषण
हैं, उनके भी भूषणस्वरूप अर्थात् उनकी भी शोभाको
वर्द्धन करनेवाले जिनके अङ्गसमूह हैं, उन श्रीविग्रहका
असमोर्ध्वत्व ही यहाँपर वर्णित हुआ है। यहाँपर
'श्रीकृष्णका जो बिम्ब (श्रीविग्रह) स्वयंमें भी अत्यन्त
विस्मयका उत्पादन करनेवाला है'—इस प्रकार वाक्यमें
जो देह-देहीका भेद प्रतीत होता है, वह औपचारिक
(आरोपित) मात्र है, क्योंकि भगवान् और भगवद्-विग्रह
दोनों ही अभिन्न और सच्चिदानन्दघन हैं। कूर्मपुराणमें
भी उसी प्रकार कहा गया है—"देह-देहि-भिदा चात्र
नेश्वरे विद्यते क्वचित्"—परमेश्वरमें कभी भी देह-देहीका
भेद नहीं होता॥100॥
द्विभुज चिरकिशोर मुरलीधर-विग्रह :-
[यथा राग:]
कृष्णेर यतेक खेला, सर्वोत्तम-नरलीला,
नरवपु ताहार स्वरूप।
गोपवेश, वेणुकर, नवकिशोर, नटवर,
नरलीलार हय अनुरूप॥101॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी जितनी भी लीलाएँ हैं, उनमें
सबसे सर्वोत्तम नरवत् लीला ही है। श्रीकृष्णका
अनादिसिद्ध निज-स्वरूप ही नराकृति है। उनका
गोपवेश, हाथमें वेणु धारण करना, नवकिशोर अवस्था,
नटवर रूप नरलीलाके अनुरूप ही होता है॥101॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी गोकुल-लीला, वासुदेव-
सङ्कर्षणादि परव्योम-लीला, कारणार्णवशायी आदि
पुरुषावतार-लीला, मत्स्य-कूर्म आदि नैमित्तिक
अवतार-लीला, ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार-लीला, पृथु-
व्यासादि आवेशावतार-लीला, सविशेष परमात्मादि-लीला,
निर्विशेष ब्रह्म आदि अनन्त क्रीड़ामय भगवान्की
लीलाओंमेंसे तारतम्य (श्रेष्ठ और निम्न)के विचारसे
श्रीकृष्णकी नरलीला ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीकृष्णका
स्वरूप—नरवपु, गोपवेश, वेणुधारी, नवकिशोर और
नटवर है। श्रीकृष्णका स्वरूप—नरलीलाके समान है,
किन्तु वह तुच्छ, मरणशील, अनित्य, अमङ्गलकारी,
सीमित, छितराया हुआ (खण्डोंमें) अथवा विभाजित
आदि प्राकृत विशेषणोंके मलसे युक्त नहीं है॥101॥
श्रीकृष्णकी श्रीविग्रहमाधुरीका वर्णन;
श्रीकृष्णरूप—सभीको आकर्षित करनेवाला :-
कृष्णेर मधुर रूप, शुन, सनातन।
ये रूपेर एक कण, डुबाय ये त्रिभुवन,
सर्वप्राणी करे आकर्षण॥102॥ध्रु॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥102॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके मधुररूपका एक कण गोकुल,
मथुरा और द्वारका,—इन तीन भुवनोंको, अथवा अन्तःपुर
गोलोक-वृन्दावन, मध्यम-आवास परव्योम और
बाह्य-आवास देवीधाम,—इन तीन भुवनोंको डुबो देनेमें
समर्थ है एवं उन तीनों भुवनोंके प्राणियोंको अपनी
रूपमाधुरीसे आकर्षित करता है॥102॥
नित्यलीला प्रकट करनेमें योगमायाके प्रभावका प्रदर्शन :-
योगमाया चिच्छक्ति, विशुद्धसत्त्व-परिणति,
तार शक्ति लोके देखाइते।
एइरूप रतन, भक्तगणेर गूढ़धन,
प्रकट कैला नित्यलीला हैते॥103॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥103॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमूर्ति उनकी चिद्-शक्ति-
नामक योगमायाके सन्धिनीगत विशुद्धसत्त्व-तत्त्वका
परिणामस्वरूप है॥103॥
अनुभाष्य—परव्योमादिमें विशुद्धसत्त्वकी परिणतिरूपा
308 |
इक्कीसवाँ अध्याय 21/103-107 ]
चिच्छक्ति योगमायाकी अवस्थिति नहीं है। उस योगमायाके कि श्रीकृष्णके अङ्ग मानो अलङ्कारोंके भी अलङ्कार हैं।
अपूर्व असामान्य शक्तिके कार्यको दिखलानेके लिये वैसी अङ्गोंकी शोभा होनेपर भी ललित-त्रिभङ्ग मुद्रासे
ही श्रीकृष्णने भक्तोंके लिये अत्यन्त गोपनीय और तो शोभा अधिक परिमाणमें वर्द्धित हो जाती है। उसपर
आदरणीय रत्नस्वरूप नित्यलीला गोलोकसे प्रपञ्चमें भी नेत्रोंके ऊपरी भागमें धनुष जैसी भ्रू (भौंहें) नृत्य
प्रकट की ॥ 103 ॥ कर रही हैं। श्रीकृष्ण तिरछे भावसे अपाङ्ग-दृष्टिरूप
बाण भ्रू-रूपी धनुषपर चढ़ाकर श्रीराधा एवं उनकी
अपने रूपके भोगकी स्वयंकी ही तीव्र आsub/आकांक्षा :-
अनुगत गोपियोंके मनको बिद्ध (घायल) करनेके
रूप देखि' आपनार, कृष्णेर हैल चमत्कार, उद्देश्यसे दृढ़ रूपमें सन्धान कर रहे हैं ॥ 105 ॥
आस्वादिते मने उठे काम।
श्रीकृष्णके रूपसे परव्योमके श्रीनारायण
'स्वसौभाग्य' याँर नाम, सौन्दर्यादि-गुणग्राम, और लक्ष्मियाँ भी आकृष्ट :-
एइरूप नित्य तार धाम ॥ 104 ॥ ब्रह्माण्डोपरि परव्योम, ताँहा ये स्वरूपगण,
ताँ-सबार बले हरे मन।
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 104 ॥ पतिव्रता-शिरोमणि, याँरे कहे वेदवाणी,
अमृतप्रवाह भाष्य-सौन्दर्य आदि गुणसमूह जिस आकर्षये सेइ लक्ष्मीगण ॥ 106 ॥
चिद्-तत्त्वका परम सौभाग्य है, वह इस श्रीकृष्णरूपमें
नित्य अवस्थित है ॥ 104 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 106 ॥
अनुभाष्य-श्रीकृष्णरूपकी असामान्य चमत्कारिता अनुभाष्य-श्रीकृष्णका रूप इतना मनोरम है कि
ऐसी है कि वह स्वयं श्रीकृष्णमें ही विस्मय उत्पन्न वह प्राकृत जगत्के सभी प्राणियों और देवताओंकी बात
करती है एवं उसे आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्णकी तो दूर, ब्रह्माण्डके ऊपर परव्योममें रहनेवाले श्रीनारायण
भी उत्कण्ठा वर्द्धित होती है। समस्त सौन्दर्य, ज्ञान, आदि श्रीकृष्णस्वरूपोंके मनको भी बलपूर्वक हरण
ऐश्वर्य, वीर्य, यश और वैराग्यात्मक छः प्रकारके करता है। वेदोंमें जिन लक्ष्मियोंको एकमात्र
ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण निज अतिशय-सौभाग्य श्रीकृष्णमें ही 'पतिव्रता-शिरोमणि' कहा गया है, वे भी श्रीकृष्णके
नित्य अवस्थित है ॥ 104 ॥ सौन्दर्यसे आकर्षित होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी
अभिलाषा करती हैं ॥ 106 ॥
गोलोकके आश्रयवर्ग विषयके रूपसे
मुग्ध और आकृष्ट :- “राधाजीके साथ सुशोभित होनेपर ही मदनमोहन" :-
भूषणेर भूषण अङ्ग, ताँहे ललित त्रिभङ्ग, चढ़ि' गोपी-मनोरथे, मन्मथेर मन मथे,
ताहार उपर भ्रूधनु-नर्त्तन। नाम धरे 'मदनमोहन'।
तेरछे नेत्रान्ते बाण, तार दृढ़ सन्धान, जिनि' पञ्चशर-दर्प, स्वयं नवकन्दर्प,
बिन्धे राधा-गोपीगण-मन ॥ 105 ॥ रास करे लञा गोपीगण ॥ 107 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 105 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 107 ॥
अनुभाष्य-अलङ्कार अङ्गोंके भूषण होते हैं, किन्तु अनुभाष्य-गोपियोंके अनुकूल चित्तवृत्तिरूप मनोरथ
श्रीकृष्णके अङ्गोंकी शोभा इतनी अपूर्व और अद्भुत है पर चढ़कर उनके द्वारा अपनी सेवा स्वीकार करके
। 309
[ 21/107-111 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कन्दर्पके मनको मथकर श्रीकृष्ण 'मदनमोहन'के
नामसे जाने जाते हैं। रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शात्मक
पाँच बाणोंवाले मदनके 'अपने सौन्दर्यके द्वारा नारी-
विमोहनरूप अहङ्कार'को पैरोंके नीचे रौंदकर श्रीकृष्ण
स्वयं नवकन्दर्प (व्रजमें अप्राकृत नवीन मदन) बनकर
गोपियोंके साथ रासमें क्रीड़ा करते हैं॥ 107 ॥
श्रीकृष्णकी वेणु-माधुरीका वर्णन :-
निज-सम सखा-सङ्गे, गोगण-चारण रङ्गे,
वृन्दावने स्वच्छन्दे विहार।
याँर वेणुध्वनि शुनि', स्थावर-जङ्गम प्राणी,
पुलक, कम्प, अश्रु बहे धार॥ 108 ॥
अनुवाद - श्रीकृष्ण अपने समान सखाओंके साथ
गैयाओंको आनन्दपूर्वक चराते हुए वृन्दावनमें स्वच्छन्दरूपसे
विहार करते हैं। श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनिको सुनकर
स्थावर-जङ्गम (अचर-चर) सभी प्राणी पुलकित हो
जाते हैं, उनके अङ्गोंमें कम्पन होने लगता है और
उनके नेत्रोंसे अश्रुऑंकी धारा बहने लगती है॥ 108 ॥
श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :-
मुक्ताहार-वकपाँति, इन्द्रधनु-पिच्छ तथि,
पीताम्बर-बिजली-सञ्चार।
कृष्ण नव-जलधर, जगत्-शस्य-उपर,
वरिषये लीलामृत-धार ॥ 109 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 109 ॥
अनुभाष्य - श्रीकृष्णके कण्ठमें जो मुक्तामालाका हार
है, वह सफेद बगुलोंकी श्रेणीके समान है, श्रीकृष्णके
सिरपर जो मोर पंख है, वह इन्द्रधनुषके समान है और
श्रीकृष्णका पीताम्बर विद्युतके समान है। श्रीकृष्ण
नव-जलधर (नये-नये वर्षाके जलसे पूर्ण मेघ)के
समान हैं और गोपियाँ जगत्की फसलके समान हैं।
उस फसलके ऊपर मेघोंके जल बरसनेकी भाँति
श्रीकृष्ण अपनी लीलामृत-धाराका वर्षण करके उनमें
जीवनका सञ्चार करते हैं। वर्षाकालमें बगुले उड़ते हैं,
इन्द्रधनुष और विद्युत भी दिखलायी देती है॥ 109 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्यरूपरी सर्वोत्कृष्ट भगवत्ता
एकमात्र भागवतमें ही वर्णित :-
माधुर्य भगवत्ता-सार, व्रजे कैल परचार,
ताहा शुक-व्यासेर नन्दन।
स्थाने स्थाने भागवते, वर्णियाछे जानाइते,
ताहा शुनि' नाचे भक्तगण ॥"110 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-माधुर्य भगवताका सार है, - समस्त
ऐश्वर्य, समस्त वीर्य, समस्त यश, समस्त सौन्दर्य,
समस्त ज्ञान, समस्त वैराग्य, - इन छः गुणोंको 'भगवत्ता'
कहते हैं; उनमेंसे समस्त 'श्री' का नाम 'माधुर्य' है। वही
छः प्रकारकी भगवताका सार है; उसीका दूसरा नाम
'माधुर्य' है। श्रीकृष्ण-मूर्तिमें माधुर्यप्रधान भगवत्ता और
श्रीनारायण आदिमें ऐश्वर्यप्रधान भगवत्ता है॥ 110 ॥
अनुभाष्य-षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्की भगवत्ताका सार
ही माधुर्य है; यह माधुर्य व्रजमें ही प्रचारित हुआ है।
कृष्णद्वैपायन वेदव्यासके पुत्र शुकदेवने भक्तोंके हृदयको
उन्मादित कर देनेवाले उस माधुर्य-कणाका श्रीमद्भागवतके
स्थान-स्थानपर वर्णन किया है। [उसके विषयमें सुनकर
भक्तगण नृत्य करते हैं] ॥ 110 ॥
श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करते हुए महाप्रभुके द्वारा
गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन :-
कहिते कृष्णेर रसे, श्लोक पड़े प्रेमावेशे,
प्रेमे सनातन-हात धरि'।
गोपी-भाग्य, कृष्ण-गुण, ये करिल वर्णन,
भावावेशे मथुरा-नागरी ॥ 111 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 111 ॥
अनुभाष्य - मथुरावासिनी स्त्रियोंने गोपियोंके असामान्य
सौभाग्य और श्रीकृष्णके अलौकिक गुणोंका भावपूर्ण
310 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/111-112 ]
वर्णन जिस प्रकार किया है, श्रीगौरहरिने 'कृष्णरस'का
वर्णन करते हुए प्रेमसे भरकर श्रीसनातनका हाथ
पकड़कर प्रेमावेशमें उस श्लोकका उच्चारण किया॥ 111॥
श्रीमद्भागवत (10/44/14)में :-
“गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं
लावण्यसारमसमोर्द्धमनन्यसिद्धम्।
दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-
मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥ 112 ॥
अनुवाद-मथुरावासिनियाँ बोलीं,- “आहा! गोपियोंने
ऐसी कौनसी तपस्या की ! वे समस्त श्री, ऐश्वर्य और
यशके एकान्त आश्रय, दुर्लभ, स्वतःसिद्ध, असमोर्ध्व,
लावण्यके साररूप इन श्रीकृष्णके मुखामृतका नेत्रोंके
द्वारा निरन्तर पान करती रहती हैं॥” 112 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/156 संख्या देखें ॥ 112 ॥
अमृतानुकणिका-इस श्लोकमें-यश, वीर्य और
ऐश्वर्य-भगवान्के छः गुणोंमें-से ये तीन गुण ही वर्णित
हुए हैं, परन्तु इन तीन गुणोंके द्वारा छहों गुणोंको ही
समझना चाहिये। इसलिये माथुर रमणियाँ श्रीकृष्णको
ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-इन सबके
एकान्त धाम कह रही हैं। वे कैसे धाम है?
ऐश्वर्य-लौकिक, नरवत् भावको अतिक्रमण करके
जो भाव है उसको ऐश्वर्य कहते हैं अर्थात् साधारण
व्यक्ति जिसे नहीं कर सकते, उसे ऐश्वर्य कहते हैं।
गोवर्धनको धारण करना यह किसी भी मनुष्यके लिये
सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णका गोवर्धन धारण
करना अलौकिक है। श्रीकृष्णने यशोदा माताको अपने
मुखमें दो बार विराट रूप दिखाया, यशोदाजीने कृष्णके
मुखमें असंख्य ब्रह्माण्ड देखे और स्वयंको उस मुखमें
देखा। दुर्वासाजी और अर्जुनने भी ऐसा ही देखा।
वृन्दावनकी प्रत्येक लीलामें श्रीकृष्णने बालक होकर भी
बिना अस्त्र-शस्त्रके, बिना रूप बढ़ाये बड़े-बड़े असुरोंका
संहार कर दिया। ये सब ऐश्वर्यकी लीलाएँ हैं।
कुवलयापीड़ हाथीका वध करना भी अलौकिक है।
कंस भी महाबलवान था। जरासन्ध कंसकी परीक्षा
लेनेके लिये मथुरापर आक्रमण करने आया और उसने
अपने सैनिकोंके साथ गोकुलमें डेरा जमाया। कंस
मथुरासे ही हाथियोंके पैरोंको पकड़कर जरासन्धकी
सेनाके ऊपर फेंकने लगा और उनके नीचे दबकर
जरासन्धके अनेक सैनिक मर गये। इतने बलवान
कंसको श्रीकृष्णने खेल-ही-खेलमें मार दिया। द्वारकामें
श्रीकृष्णकी एक विशेष ऐश्वर्य लीलाका वर्णन एक
पौराणिक उपख्यानमें देखा जाता है (इसी अध्यायकी
पयार संख्या 59-89 देखें)। वैकुण्ठमें जितना ऐश्वर्य है
उससे भी अधिक ऐश्वर्य श्रीकृष्णमें है। वैकुण्ठाधिपतिमें
ऐश्वर्य है, किन्तु वे जन्म नहीं ले सकते-इस जगत्में
किसीके पिता, पुत्र, पति नहीं हो सकते। श्रीकृष्णमें यह
सब कुछ है।
'वीर्य' - श्रीकृष्णकी वीरताको समझनेके लिये कुछ
प्रसङ्गोंका यहाँ वर्णन कर रहे हैं। भीष्म पितामह
अद्वितीय वीर थे, उनके पास इच्छा-मृत्युका वरदान
था। भगवान्के अवतार परशुराम भी उनको युद्धमें
पराजित नहीं कर सके। श्रीकृष्णने प्रतिज्ञा की थी कि
वे कुरुक्षेत्र युद्धमें अस्त्र-शस्त्र नहीं धारण करेंगे, किन्तु
भीष्म पितामहने प्रतिज्ञा की थी कि मैं कुरुक्षेत्रके युद्धमें
श्रीकृष्णसे अस्त्र धारण करवाऊँगा। एक दिन श्रीकृष्ण
अर्जुनके रथका सञ्चालन कर रहे थे। अर्जुनने ऐसी
प्रतिज्ञा की थी कि वे भीष्म पितामहको किसी वीरको
नहीं मारने देंगे। प्रातःकालसे अर्जुन भीष्ममें युद्ध करते
रहे। सायंकाल तक युद्ध चलता रहा और अर्जुनने
भीष्म पितामहको सारा दिन इतना व्यस्त रखा कि वे
किसी वीरको मार नहीं पाये। अर्जुन पसीनेसे तर-बतर
हो गये और युद्ध-विरामसे थोड़ी देर पहले एक क्षणके
लिये अपने हाथोंसे पसीनेको थोड़ासा पोंछा, इतनेमें ही
भीष्म पितामहने दस हजार महारथियोंको मार दिया।
श्रीकृष्णने देखा कि भीष्म पितामह तो अर्जुनका भी वध
कर देंगे। उन्हें क्रोध आ गया और रथके चक्केको
311
[ 21/112 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
चक्रकी भाँति उठाकर भीष्म पितामहकी ओर तीव्र गतिसे दौड़े। ब्रह्मादि देवता जो आकाशसे युद्धक्षेत्रको देख रहे थे, वे बोले कि आज अवश्य ही भीष्मकी मृत्यु होगी। यदि श्रीकृष्ण चक्र चला देते तो भीष्म पितामहकी मृत्यु अवश्यम्भावी थी। दुर्योधन, कर्णादि सभी लोग स्तम्भित हो गये। यदि चाहते तो श्रीकृष्ण एक ही दिनमें सबका संहार कर देते। तभी अर्जुनने दौड़कर उनके चरणोंको पकड़ लिया और बोले,—“हे प्रभो! आप अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग मत कीजिये, मैं ही उनके लिये पर्याप्त हूँ।” और अर्जुनकी बहुत विनती सुनकर श्रीकृष्ण शान्त हुए।
रुक्मणी विवाहके समय वे कात्यायानी देवीकी पूजाके लिये गयीं और उनकी सुरक्षाके लिये अनेकों सैनिकोंने उन्हें घेर रखा था। शिशुपालको वर बनाया था और जरासन्ध, दुर्योधन, कर्ण, दुःशासनादि सब लोग आये थे कि श्रीकृष्ण किसी प्रकारसे रुक्मणीका हरण न कर लें। परन्तु श्रीकृष्ण अचानक उन वीरों बीच प्रकट हो गये और रुक्मिणीजीके हाथको पकड़कर उन्हें रथपर बिठा लिया। उन्होंने रथकी बागडोर रुक्मिणीजीके हाथोंमें दे दी और अपना धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये और देखते-ही-देखते सबको परास्त करके रुक्मिणीजीका हरण कर लिया जैसे गरुड़ सर्पोंके बीचमेंसे अपने भागको उठा लेता है।
राजा नग्नजितकी प्रतिज्ञा थी कि मैं अपनी पुत्री नाग्नजितीका विवाह उससे करूँगा जो एक साथमें मेरे इन सातों साँडोंको नथ दे। दस-बीस बड़े-बड़े वीर मिलकर भी जिनमें-से एक साँडको भी नहीं बाँध सकते थे, ऐसे सात बड़े-बड़े साँडोंको एक साथ वशीभूत करके इन सबकी नाकमें नकेल डालकर श्रीकृष्ण इनको पकड़कर ऐसे खींचने लगे जैसे कोई बालक काठके बैलोंको घसीटता है।
नरकासुर, इन्द्र, पौण्ड्र अद्भुत वीरता दिखलायी देती है। महाभारत युद्धके समाप्त होनेके बाद अर्जुन और भीममें विवाद हो गया
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
कि उनमें-से किसके द्वारा युद्ध जीता गया। दोनोंमें झगड़ा होने लगा और भीमने अपनी गदा तथा अर्जुनने अपना गाण्डीव उठा लिया। श्रीकृष्णने उन्हें लड़नेसे रोक दिया और उन्हें बर्बरीकके पास ले जाकर कहा,—“बर्बरीक! तुम सम्पूर्ण युद्धके साक्षी हो, बताओ इन दोनोंमें-से किसके द्वारा महाभारतका युद्ध जीता गया।” बर्बरीक बोला,—“यह व्यर्थका विवाद है। मैंने देखा कि आपने ही दोनों सेनाओंका संहार किया। आपके अतिरिक्त अन्य कोई वीर ही नहीं था।”
‘यश’—अन्य भगवद्रूपोंका यश भी सर्वत्र देखा जाता है, किन्तु श्रीकृष्णके समान किसी औरका यश नहीं है।
‘ज्ञान’—भगवद्गीतामें जो ज्ञान बताया है अथवा श्रीमद्भागवतम्के दशम और एकादश स्कन्धमें उद्धव-सन्देश या उद्धव-संवादमें जो उद्धवजीको जो ज्ञान दिया है, ऐसा ज्ञान कहीं भी नहीं है, यहाँ तक कि उपनिषदों, वेदोंमें भी नहीं है।
‘वैराग्य’—शरद ऋतुमें पूर्णिमाकी रात्रि है और वृन्दावनकी प्राकृतिक सौन्दर्यके द्वारा यमुनाजीकी छटा निराली हो रही है। श्रीकृष्ण परम सुन्दरी, सर्वगुण-सम्पन्ना महाभाववती करोड़ों गोपियोंको रासमें अचानक छोड़कर अन्तर्धान हो गये। संसारमें ऐसा करना किसी भी पुरुषके लिये सम्भव नहीं है। मूसल लीलामें श्रीकृष्णके समस्त परिजन मारे गये और वे अविचलित, ग्लानिरहित होकर शान्त बैठकर सब देखते रहे।
त्याग, वैराग्य, रूप, गुण, लीलाएँ, उदारता आदि समस्त विषयोंमें श्रीकृष्ण निरूपम हैं, उनके समान कोई नहीं है। विशेषकर चार गुण—रूप-माधुरी, गुण-माधुरी, वेणु-माधुरी और प्रेम-माधुरी अन्य किसी भी भगवद्रूपमें भी नहीं है।
‘रूप’—वह सभीको आकर्षित करके उन्मत्त बना देता है, विशेषकर स्त्रियोंको परम मनोहर लगता है। श्रीकृष्णके रूपको देखकर मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जिस योनिमें जो भी, जहाँ भी है, स्त्रीजाति अधिक
312 |
इक्कीसवाँ अध्याय 21/112 ]
आकृष्ट होती है। श्रीरामका, श्रीनारायणका रूप भी
बहुत सुन्दर है, किन्तु श्रीकृष्णके जैसा किसीका रूप
नहीं है। श्रीरूपगोस्वामी विरचित श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम्
श्लोक-३-
श्यामे! रमारमण-सुन्दरता-वरिष्ठ-
सौन्दर्य-मोहित-समस्त-जगज्जनस्य।
श्यामस्य वामभुज-बद्धतनुं कदाहं
त्वामिन्दिरा-विरल-रूपभरां भजामि ?॥
अर्थात् “हे श्रीमती श्यामे! आपका श्रीविग्रह,
नारायण भगवान्की सुन्दरतासे भी श्रेष्ठ, अपने सौन्दर्यके
द्वारा समस्त जगत्जनोंको मोहित करनेवाले श्यामसुन्दरकी
बायीं भुजासे निबद्ध है, अर्थात् आप श्रीकृष्णके
वामाङ्गमें विराजमान हैं एवं आपके रूपकी समता प्राप्ति
लक्ष्मीदेवीके लिये भी दुर्लभ है मैं तुम्हारी इस प्रकारकी
छविका कब भजन किया करूँगा ?”
माथुर रमणियाँ कह रही हैं- 'दृग्भिः पिबन्त्यनुसवं'
गोपियोंने अपने नेत्रोंके द्वारा मदिरा (अमृत)का पान
किया। वह अमृत क्या था? वह था श्रीकृष्णका
रूप-प्रेमादि। 'दुराप-मेकान्तधाम'- जो अन्योंके लिये
अत्यन्त दुर्लभ है, अपने प्रेमके द्वारा गोपियोंने अपने
नेत्रोंसे श्रीकृष्णकी असमोर्ध्व रूपमाधुरीका पान किया।
'लावण्यसारमसमोर्ध्वम्'- लावण्य अर्थात् कान्ति। एक
काला व्यक्ति भी लावण्यके कारण सुन्दर दिखता है
और गोरा व्यक्ति भी यदि शरीरपर लावण्य न रहे तो
उतना सुन्दर नहीं दिखता है। श्रीकृष्ण श्याम वर्ण
होनेपर भी निराले लावण्यसे युक्त हैं। मोती श्वेत होता
है और उसमेंसे ज्योति निकलती है, यही ज्योति ही
लावण्य-सार है। उसी प्रकार श्रीकृष्णके शरीरसे भी
ऐसी दीप्ति या लावण्य निकलता है जिसे देखते ही
सभी लोग मुग्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णका लावण्य-सार
असमोर्ध्व है। अर्थात् श्रीकृष्णके समान भी किसीके भी
रूपका आकर्षण नहीं है, उससे अधिक होनेका तो
किसीमें सामर्थ्य ही नहीं है। वह अतुलनीय है। यद्यपि
श्रीकृष्णके मुखारविन्दकी कमलसे तुलना की गयी है,
तो क्या कमलका सौन्दर्य श्रीकृष्णके मुखके सौन्दर्यके
समान हो सकता है, यह कदापि सम्भव नहीं है।
त्रिजगत्में ऐसा कोई नहीं है जिससे उनके मुखारविन्दकी
तुलना की जाय, इसलिये उपमा-अलङ्कार ही दिया गया
है। 'अनन्यसिद्धम्'- किसी थोड़े कुरूप व्यक्तिको भी
उबटन लगाकर स्नानके बाद शृङ्गारकर अनेक प्रकारके
अलङ्कारोंसे अलंकृत किया जाय, तो वह भी सुन्दर
दिखने लगता है। उबटन-अलङ्कारोंकी सहायतासे वह
व्यक्ति कुछ सुन्दर प्रतीत होता है। किन्तु श्रीकृष्णका
सौन्दर्य कैसा है ? सायंकालमें गोचारणसे लौटते हुए
उनके शरीरपर लाखों गायोंके खुरोंसे उड़ी धूल पड़ी है,
परन्तु धूल-धूसरित श्रीकृष्णका सौन्दर्य और भी वर्द्धित
हो रहा है। पाठशालासे लौटकर आ रहे महाप्रभुजीके
गालोंपर स्याही लगी है और वे परम सुन्दर अथवा
सुन्दरसे भी सुन्दर बन गये। यदि श्रीकृष्ण निवस्त्र चल
रहे हों, तो भी बड़े सुन्दर लगते हैं। यशोदा माता
श्रीकृष्णका शृङ्गार करना चाहती हैं, उनकी आँखोंमें
काजल लगाना चाहती हैं, उनकी कमरमें सोनेकी
करधनी लगाना चाहती हैं। श्रीकृष्ण मचलकर भागे और
यशोदाजी पीछे-पीछे दौड़ीं। वे उनको कोई भी अलङ्कार
धारण नहीं करा सकीं। श्रीकृष्ण भागते जा रहे हैं और
उनको देखकर ऋषि-महर्षि लोग और गोपियाँ एक दम
मुग्ध हो गये। ऐसा किसीका रूप नहीं है। बिना
अलङ्कारके वे ऐसे सुन्दर लगते हैं। उनके द्वारा
अलङ्कार धारण करनेपर अलङ्कारोंकी शोभा होती है।
श्रीमद्भागवत (3/2/12) में उद्धव-वचन 'परं पदं
भूषणभूषणाङ्गम्' अर्थात् “वह श्रीमूर्त्ति समस्त लौकिक
दृश्योंमें भी परम अलौकिक तथा समस्त भूषणोंकी भी
भूषणस्वरूप थी।”
अहो! गोपियोंने ऐसा कौन सा तप किया?
'गोप्यस्तपः किमचरन्'- मथुरा रमणियाँ विचार रही
हैं,-“ओह! क्या किसी भी प्रकारके तपसे ऐसी
रूप-माधुरीका पान किया जा सकता है?”
किन्तु किसी भी तपस्याके द्वारा श्रीकृष्णकी ऐसी
। 313
[ 21/1112-116 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
रूप-माधुरीका पूर्ण रूपसे आस्वादन नहीं किया जा अमृतप्रवाह भाष्य—नित्य तरुणतारूप महासमुद्रकी
सकता। सौभरि ऋषिने भी बड़ी कठोर तपस्या की थी, तरङ्गकी भाँति लावण्यका सार श्रीकृष्णके शरीरमें
किन्तु उन्हें श्रीकृष्णके परम मधुर रूपके दर्शन नहीं लक्षित होता है। उसमें भावोंका उदय आवर्त्त अर्थात्
हुए। हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण आदिने भँवर है और वंशीध्वनि बवण्डर है; ऐसी अवस्थामें
भी बड़ी कठोर तपस्या की थी, किन्तु उस तपस्यासे स्त्रियोंका चित्त तिनकोंकी भाँति उसमें फंसकर उसके
उन्हें श्रीकृष्णके दर्शन नहीं प्राप्त हुए। यहाँ तक कि चक्रसे निकल नहीं पाता ॥113॥
लक्ष्मीजीने भी कठोर तपस्या की, परन्तु उन्हें भी अनुभाष्य—‘चक्रवात’—गोलाकार चक्र जैसी घूमती
श्रीकृष्णके असमोर्ध्व लावण्यसार रूप मुखामृत पान हुई वायु (बवण्डर) ॥113॥
करनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये तपके द्वारा श्रीकृष्णरूपके अमृतपानसे गोपियाँ कृतकृतार्थ :-
तो यह असम्भव है? यदि तप नहीं किया तो क्या सखि हे, कोन् तप कैल गोपीगण।
किया? क्या गङ्गाजल या तीर्थोंके स्नानसे श्रीकृष्णकी कृष्णरूप-सुमाधुरी, पिबि’ पिबि’ नेत्र भरि’,
ऐसी दुर्लभ और अनुपम रूप-राशिका पान किया जा श्लाघ्य करे जन्म-तनु-मन ॥114॥ध्रु॥
सकता है? यह कभी भी सम्भव नहीं है? अनुवाद—हे सखि, गोपियोंने कौन सी तपस्या की
इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा है कि गोपियोंके है जिसके फलस्वरूप वे श्रीकृष्णके रूपकी सुमाधुरीको
आनुगत्यमें भजन किये बिना किसी भी तपस्या, नेत्रोंके द्वारा छक-छककर पान करके अपने जन्म,
भजनके द्वारा यह सम्भव नहीं है। श्रुतियाँ जब इस तन और मनको सफल बनाती हैं॥114॥
बातसे अवगत हुईं, तब उन्होंने गोपियोंके आनुगत्यमें श्रीकृष्णरूप-माधुर्य-असमोर्ध्व,
भजन करके अपने मनोभीष्टको प्राप्त किया। श्रीनारायणमें भी उसका अभाव :-
माथुर रमणियाँ कह रही हैं कि यह गोपियोंका परम ये माधुरीर ऊर्द्ध आन, नाहि यार समान,
सौभाग्य है कि वे श्रीकृष्णके ऐसे असमोर्ध्व परम परव्योमे स्वरूपेर गणे।
मनोहर रूपका दर्शन करती हैं। और हम कैसी अभागी यिँहो सर्व-अवतारी, परव्योम-अधिकारी,
है कि हम यहाँ श्रीकृष्णका जो रूप देख रही हैं वह ए माधुर्य नाहि नारायणे ॥115॥
किशोरस्वरूप रहनेपर भी क्रोधमें आविष्ट है और यह अनुवाद—जिस माधुरीसे श्रेष्ठ और जिस माधुरीके
असुर उनको मारनेके लिये तत्पर है। इसलिये हम समान परव्योमके अन्यान्य भगवद्-स्वरूपोंका तो कहना
परम दुर्भागिनी हैं।—"श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ही क्या, जो उन सबके अवतारी तथा परव्योमके
महाराज" ॥112॥ अधिपति श्रीनारायण हैं—यह माधुरी उनमें भी नहीं
श्रीकृष्णके तारुण्यामृत-सिन्धुकी लावण्यामृत-तरङ्गोंमें है॥115॥
गोपियोंका नित्य अवगाहन करना :- प्रमाण,—नारायणी लक्ष्मीमें भी श्रीकृष्णके
तारुण्यामृत—पारापार, तरङ्ग—लावण्यसार, माधुर्यके प्रति लोभ :-
ताते से आवर्त्त भावोद्गम। ताते साक्षी सेइ रमा, नारायणेर प्रियतमा,
वंशीध्वनि—चक्रवात, नारीर मन—तृणपात, पतिव्रतागणेर उपास्या।
ताहा डुबाय, ना हय उद्गम ॥113॥ तिँहो ये माधुर्यलोभे, छाड़ि’ सब कामभोगे,
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥113॥ व्रत करि’ करिला तपस्या ॥116॥
314 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/116-121 ]
अनुवाद-पतिव्रता स्त्रियोंकी उपास्य और
श्रीनारायणकी अत्यन्त प्रियतमा लक्ष्मी ही इस विषयमें
साक्षी हैं। उन लक्ष्मीने श्रीकृष्णके इसी माधुर्यके लोभसे
सब प्रकारके काम-भोगोंको छोड़कर व्रत धारण करके
तपस्या की थी॥ 116॥
अन्यान्य प्रकाश-विग्रहोंमें स्वेच्छाके अनुरूप प्रयोजनके
अनुसार अपने स्वतःसिद्ध माधुर्यके अंशका प्रकाश :-
सेइ त' माधुर्य-सार, अन्य-सिद्धि नाहि तार,
तिँहो-माधुर्यादि-गुणखनि।
आर सब प्रकाशे, ताँर दत्त गुण भासे,
याँहा यत प्रकाशे कार्य जानि ॥ 117 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वह श्रीकृष्णमाधुर्य अनन्यसिद्ध
अर्थात् स्वयं सिद्ध है, वह और किसी गुणके द्वारा
सिद्ध नहीं होता। वह श्रीकृष्णमूर्ति अपने अन्य-अन्य
प्रकाशमें अर्थात् श्रीनारायणादि मूर्तियोंमें अपने प्रकाशके
द्वारा जो-जो कार्य होगा, उसके अनुरूप ऐश्वर्य-वीर्य
आदि गुण प्रकट कराती है ॥ 117 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्य और गोपीप्रेम,
दोनों ही नित्य-नवनवायमान :-
गोपीभाव-दरपण, नव नव क्षणे क्षण,
तार आगे कृष्णेर माधुर्य।
दोंहे करे हुड़ाहूड़ि, बाड़े मुख नाहि मुड़ि,
नव नव दोंहार प्राचुर्य ॥ 118 ॥
अनुवाद-गोपियोंका भाव उस दर्पणके समान है,
जिसके आगे श्रीकृष्णका माधुर्य क्षण-क्षणमें नव-नवायमान
रूप धारण करता है। गोपियोंके भाव और श्रीकृष्णके
माधुर्य-दोनोंमें होड़ सी लग जाती है, दोनों ही बढ़ते
जाते हैं, कोई भी हार नहीं मानता, बल्कि दोनों ही
नव-नवायमान होकर बढ़ते ही जाते हैं ॥ 118 ॥
रागानुगा भक्तिके बिना श्रीकृष्णमाधुर्य सुदुर्लभ :-
कर्म, तप, योग, ज्ञान, विधि-भक्ति, जप, ध्यान,
इँहा हैते माधुर्य दुर्लभ।
केवल ये रागमार्गे, भजे कृष्णे अनुरागे,
तारे कृष्ण-माधुर्य सुलभ ॥ 119 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 119 ॥
अनुभाष्य-कर्म, तप, योग, ज्ञान, वैधीभक्ति, जप,
ध्यानादि साधनोंके द्वारा माधुर्यकी प्राप्ति नहीं होती;
श्रीकृष्ण-माधुर्य केवलमात्र रागमार्गसे श्रीकृष्ण-नाम
भजनमें अनुरागयुक्त व्यक्तिके लिये ही सुलभ है॥ 119 ॥
स्वयं-भगवान् व्रजेन्द्रनन्दनसे ही अन्यान्य भगवत्ता :-
सेइरूप व्रजाश्रय, ऐश्वर्य-माधुर्यमय,
दिव्यगुणगण-रत्नालय।
आनेर वैभव-सत्ता, कृष्णदत्त भगवत्ता,
कृष्ण-सर्व-अंशी, सर्वाश्रय ॥ 120 ॥
अनुवाद-श्रीकृष्णका सर्वाकर्षक रूप केवल व्रजमें
ही विद्यमान है। वह रूप ऐश्वर्य-माधुर्यमय और दिव्य
गुणरूपी रत्नोंका भण्डार है। अन्यान्य भगवदावतारोंकी
वैभव-सत्ता और भगवत्ता श्रीकृष्णके द्वारा ही प्रदत्त है।
श्रीकृष्ण सबके अंशी और सबके आश्रय हैं॥ 120 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणादिकी जो वैभवसत्ता
है, उसे श्रीकृष्णके द्वारा प्रदत्त भगवत्ता ही जानना
होगा ॥ 120 ॥
श्रीकृष्ण-समस्त चिन्मय सद्गुणोंके समाश्रय :-
श्री, लज्जा, दया, कीर्त्ति, धैर्य, वैशारदी मति,
एइ सब कृष्णे प्रतिष्ठित।
सुशील, मृदु, वदान्य, कृष्ण बिना नाहि अन्य,
कृष्ण करे जगतेर हित ॥ 121 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 121 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणमें श्री, लज्जा, दया,
कीर्ति, धैर्य, वैशारदी (निपुण) मतिरूपी जो सब
। 315
[ 21/121-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
उज्ज्वल गुण समूह दिखलायी देते हैं, वे सब श्रीकृष्णके
द्वारा उनमें प्रतिष्ठित हुए हैं। किन्तु सुशीलता, मृदुता
और वदान्यता—श्रीकृष्णके अतिरिक्त और किसी भी
प्रकाशमें दिखलायी नहीं पड़ती। [श्रीकृष्ण ही जगत्का
हित करते हैं।]॥ 121 ॥
श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यका पान करनेके लिये
पलकरहित चक्षुओंकी आकाङ्क्षा :—
कृष्ण देखि' यत जन, कैल निमिषे निन्दन,
व्रजे विधि निन्दे गोपीगण॥”
सेइ सब श्लोक पड़ि', महाप्रभु अर्थ करि',
सुखे माधुर्य करे आस्वादन॥ 122 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके रूप माधुर्यको देखकर अनेक
लोगोंने अपनी पलकोंके झपकनेकी निन्दा की है।
ब्रजमें गोपियोंने तो पलकोंको बनानेवाले विधाता
(ब्रह्मा)की भी निन्दा की है।” महाप्रभु श्रीमद्भागवतके
ऐसे और भी श्लोकोंको पढ़कर और उनके अर्थोंको
प्रकाशित करके आनन्दपूर्वक श्रीकृष्णके माधुर्यका
आस्वादन करने लगे॥ 122 ॥
अनुभाष्य—'निमिषे निन्दन'—नेत्रको ढकनेवाले अङ्गको
'पलक' कहते हैं, नेत्रके ऊपर लगी होनेके कारण वह
देखनेमें बाधा देती है, इसलिये वह निन्दनीय है॥ 122 ॥
श्रीकृष्णके मुखकमलका मधुपान करनेसे जड़सुलभ तृप्ति
नहीं; प्रतिक्षण गोपियोंके आनन्दरूपी समुद्रकी वृद्धि :—
श्रीमद्भागवत (9/24/65)में—
“यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण-
भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम्।
नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो
नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेेश्च॥ 123 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 123 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके मुखचन्द्र, मकरकुण्डलसे
सुशोभित कर्ण (कान), शोभायमान कपोल (गाल),
[दायाँ स्तम्भ]
सौन्दर्य, विलासपूर्ण मुस्कराहट—इन समस्त नित्य
उत्सवोंको नेत्रोंके द्वारा पान करके नर-नारी परम
आनन्दित होते हैं और दर्शनमें बाधा देनेवाली नेत्रोंकी
पलकोंके प्रति क्रोधित होते हैं॥ 123 ॥
अनुभाष्य—श्रील शुकदेव महाराज परीक्षितको
यदुवंशका वर्णन करते-करते श्रीकृष्णके अवतारोंके
उद्देश्य और उनके सर्वलोक-मनोहर अतुल सुन्दर
रूप-माधुर्यका वर्णन कर रहे हैं—
यस्य (कृष्णस्य) मकरकुण्डलचारुकर्णभ्राजत्कपोलसुभगं
(मकरकुण्डलाभ्यां चारू शोभितौ कर्णौ ताभ्यां भ्राजन्तौ
समुज्ज्वलौ यौ कपोलौ गण्डदेशौ, ताभ्यां सुभगं कमनीयं)
सविलासहासं (सविलासः सलीलः हासः यस्मिन् तत्) नित्योत्सवं
(नित्यम् उत्सवः आनन्दः यस्मिन् तत्) आननं (मुखपद्मं)
नार्यः नराः दृशिभिः (नेत्रैः) पिबन्त्यः [अपि] न तु ततृपुः
(तृप्ताः) [निमेषोन्मेषमात्रव्यवधानमप्यसहमानास्तत्कर्तुः] निमेः
(विधातुः) कुपिताः (क्रुधाः च बभूवुः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पलक
झपकनेके समय दर्शनमें जो बाधा होती है, वह उनके
लिये असहनीय होती है॥ 123 ॥
श्रीमद्भागवत (10/31/15)में :—
अटति यद्भवानह्नि काननं
त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते
जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ 124 ॥
अनुवाद—गोपियाँ बोलीं,—“हे कृष्ण! दिनके समयमें
जब तुम वनमें चले जाते हो, तब तुम्हारे घुँघराले
केशोंसे सुशोभित श्रीमुखको न देखकर हमारा एक-एक
त्रुटिकाल भी युगके समान प्रतीत होता है। तुम्हारे
मुखारविन्दका दर्शन करानेवाले हमारे नेत्रोंपर जिस
विधाताने पलकोंकी सृष्टि की है, उसे हम मूर्ख मानती
हैं॥” 124 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/153 संख्या देखें॥ 124 ॥
316 |
इक्कीसवाँ अध्याय 21/125 ]
कामगायत्री-साक्षात् श्रीकृष्ण विग्रह, एक एक
अक्षर-एक-एक अङ्ग-प्रत्यङ्ग :-
[यथा राग:]
कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय कृष्णेर स्वरूप,
सार्द्ध चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैला काममय ॥ 125 ॥
अनुवाद—कामगायत्री मन्त्र श्रीकृष्णका स्वरूप है।
इस मन्त्रराजमें साढ़े चौबीस अक्षर हैं और इस मन्त्रका
प्रत्येक अक्षर पूर्ण चन्द्र है। ये चन्द्रसमूह श्रीकृष्णको
उदित कराकर त्रिजगत्को प्रेममय बना देते हैं ॥ 125 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कामगायत्री मन्त्र श्रीकृष्णस्वरूप
है। कामबीजको अर्द्ध (आधा) अक्षर माननेसे उसमें
साढ़े चौबीस अक्षर होते हैं ॥ 125 ॥
अनुभाष्य—'कामगायत्री'—मध्यलीला 8/137 संख्या
देखें। कामगायत्रीके साढ़े चौबीस अक्षर ही श्रीकृष्णके
अङ्गोंमें साढ़े चौबीस चन्द्र जैसे हैं और वे श्रीकृष्णस्वरूप
हैं, क्योंकि वे-सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन नामक
तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं ॥ 125 ॥
अमृतानुकणा—"पद्मपुराणके सृष्टिखण्डमें ऐसा लिखा
है कि वेदमाता गायत्रीने भी गोपी जन्म लेकर
श्रीकृष्णका सङ्ग प्राप्त किया था। उसी समयसे उन्होंने
कामगायत्रीका रूप धारण कर लिया है। ×× कामगायत्री
निश्चय ही अनादि हैं। वे अनादि गायत्री पहले वेदमाता
गायत्रीके रूपमें प्रकट थीं। बादमें साधनके प्रभावसे और
अन्यान्य उपनिषदोंका सौभाग्य देखकर गोपालोपनिषद्के
साथ व्रजमें जन्म लिया। कामगायत्रीके रूपमें नित्य
होकर भी वे वेदमाता गायत्रीके रूपमें नित्य पृथक्
विराजमान हैं।" (जैवधर्म, 32वाँ अः)
श्रीश्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने 'मन्त्रार्थ-दीपिका'-
ग्रन्थमें साढ़े-चौबीस-अक्षरात्मक कामगायत्री-मन्त्रकी
व्याख्यासे सम्बन्धित एक विशेष घटनाका वर्णन किया
है, वह इस प्रकार है,—
“हे वैष्णवों ! मेरे इस 'कामगायत्री'की व्याख्याके
लिखनेका वृत्तान्त आप लोग श्रवण करो।
श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने
प्राकृत वर्ण अनुसार कामगायत्रीकी वर्ण-संख्या साढ़े
चौबीस कहकर जो लिखा है, उस मतानुसार मैंने भी
वही लिखा है। वह जैसे,—
“कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय कृष्णेर स्वरूप,
सार्द्ध-चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैला काममय ॥”
इस प्रमाणका अवलम्बन करके पूर्वमतके अनुसार
अनुक्रम संस्थापित हुआ है। किन्तु श्रीकृष्णदास कविराज
गोस्वामीने कामगायत्रीकी अक्षर संख्या 'पचीस' छोड़कर
किस प्रमाण अथवा किस अभिप्रायसे साढ़े चौबीस कही
है, वह मैं समझ नहीं पाया। अनेक शास्त्रोंको पढ़कर
अथवा श्रवण करके मैंने यह जाना कि शास्त्रोंके
विचारसे अर्द्ध-अक्षरकी सम्भावना नहीं है, इसलिये मैं
महा-सन्देहके सागरमें निमग्न हो गया था। यदि कोई
कहे कि मात्राहीन 'त'-कार (त्)—अर्द्ध-अक्षर है, तो
ऐसा होनेपर मात्राहीन अक्षर यहाँपर और भी हैं,
इसलिये ऐसा भी नहीं हो सकता। व्याकरण, पुराण,
आगम, नाट्य-अलङ्कारादि शास्त्रोंमें स्वरवर्ण-व्यञ्जनवर्णके
भेदसे पचास वर्णोंका ही उल्लेख है, किन्तु कहीं भी
अर्द्धाक्षरका कोई प्रमाण नहीं है। श्रीजीव गोस्वामीके
द्वारा रचित श्रीहरिनाममृत-व्याकरणमें “नारायणादुद्भूतोऽयं
वर्णक्रमः”-संज्ञापादमें स्वर-व्यञ्जनके प्रसङ्गमें पचास
अक्षरोंका ही उल्लेख है, इसी प्रकार अन्य व्याकरणोंमें
भी वही विचार है। और वृहन्नारदीय पुराणमें
श्रीराधिका-सहस्रनाम-स्तोत्रमें वृन्दावनेश्वरी श्रीराधिकाको
पचास-वर्णरूपिणी कहा गया है। इस प्रकार अन्य
शास्त्रोंमें भी और मातृकान्यास आदिमें भी मातृकादि-
प्रकरणमें कहीं भी मैंने अर्द्धाक्षरके साथ पचास वर्णक्रम
। 317
[ 21/125-126 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नहीं देखा। ऐसा होनेपर क्या इन सब शास्त्रोंको श्रील
कविराज गोस्वामी नहीं जानते थे? यह भी सम्भव नहीं
है, क्योंकि वे भ्रम-प्रमादादि दोषोंसे सर्वथा रहित हैं,
यह सब जानते हैं।
पुनः यदि उक्त मन्त्रमें मात्राहीन 'त'-कार (अर्थात्
सबसे अन्तमें 'प्रचोदयात्'के 'त्') को अर्द्धाक्षर माना
जाय, तो क्या श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने क्रमभङ्ग
करके (अर्द्धचन्द्र) लिखा है? क्योंकि उक्त वर्णक्रमानुसार
श्रीकृष्णके मुख-कपोल-चरणान्त इस क्रमसे सबसे
अन्तमें जो श्रीचरण हैं, उसको परित्याग करके उन्होंने
उन्होंने ललाटमें अर्द्धचन्द्र स्थापित किया है। वह
जैसे—श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यलीलामें इक्कीसवें अध्यायमें
श्रीसनातन-शिक्षाके प्रसङ्गमें सम्बन्धतत्त्व विचारमें—
“सखि हे, कृष्णमुख-द्विजराज-राज।
कृष्णवपु-सिंहासने, वसि’ राज्यशासने,
करे सङ्गे चन्द्रेर समाज॥
दुइ गण्ड सुचिक्कण, जिनि’ मणि-सुदर्पण,
सेइ दुइ पूर्णचन्द्र जानि।
×× सब लोक करे आप्यायित॥”
इस रूपमें दो प्रकार अनुवादके द्वारा बहुत विचार
करनेपर भी मुझे कोई समाधान नहीं मिला। तब सब
उपाय छोड़कर, अन्न-जलादि त्यागकर, मैं मनमें दुःखी
होकर देहत्यागके अभिप्रायसे राधाकुण्डके तटपर आ
गया। जब मन्त्राक्षर नहीं जानता हूँ, तब मन्त्रदेवता
कैसे गोचर होंगे, इसलिये देह-त्याग करना ही कर्त्तव्य
है (मैंने यह निश्चय किया)।
उसके बाद रात्रिका द्वितीय प्रहर होनेपर तन्द्रा
आनेपर मैंने देखा कि श्रीवृषभानुनन्दिनी आकर कह
रही हैं,—'हे विश्वनाथ! हे हरिवल्लभ! तुम उठो।
श्रीकृष्णदास कविराजने जो कुछ लिखा है, वही सत्य
है। वह मेरी नर्मसखी है। मेरे अनुग्रहसे मेरे अन्तःकरणकी
सभी भावनाओंको जानते हैं। इसलिये उनके वचनोंमें
तनिक भी सन्देह मत करना। काम-गायत्री मेरी और
मेरे प्राणवल्लभकी उपासनाका मन्त्र है। हमलोग मन्त्राक्षरके
द्वारा भक्तोंके निकट प्रकाशित होते हैं। मेरे अनुग्रहके
बिना हम दोनोंको कोई भी जाननेमें समर्थ नहीं है।
‘वर्णागम-भास्वत्’ नामक ग्रन्थमें अर्द्धाक्षरका निरूपण
किया गया है, उसे देखकर ही श्रीकृष्णदास कविराजने
लिखा है, वह सुनो। उसके बाद तुम इस ग्रन्थको
देखकर सबके उपकारके लिये प्रमाण संग्रह करो।” यह
सुनकर मैं शीघ्रतासे उठ गया। जाग्रत होकर सन्देह दूर
होनेपर “हा राधे!” कहकर बार-बार विलाप करने
लगा। फिर उनके आदेशको हृदयमें धारण करके
उनकी आज्ञा पालनमें तत्पर हो गया। श्रीमती राधिकाने
अर्द्धाक्षर निर्णय करनेके विषयमें जो इङ्गित दिया
था— “व्यन्त-यकारोऽर्द्धाक्षरं ललाटेऽर्द्धचन्द्रबिम्बः तदितरं
पूर्णाक्षरं पूर्णचन्द्रः।” उसके अनुसार उक्त मन्त्रमें ‘वि’के
पूर्व जो ‘य’ है, वही अर्द्धाक्षर है (अर्थात् ‘कामदेवाय’-
पदके ‘य’-कारके बाद ‘विद्महे’-पदका ‘वि’-अक्षर है,
इसलिये उक्त ‘य’-कार अर्द्धाक्षर है)। वही ललाटमें
अर्द्धचन्द्र-स्वरूप है। उसके अतिरिक्त अन्य सभी
अक्षर पूर्णाक्षर या पूर्णचन्द्र हैं।
×בवर्णागम-भास्वत्’–का प्रमाण इस प्रकार
है— “विकारान्त-यकारेण अर्द्धाक्षरं प्रकीर्त्तितम्॥”125॥
श्रीकृष्णके साढ़े चौबीस अङ्ग-चन्द्रके
ऊपर श्रीमुखचन्द्रका राजत्व :—
सखि हे, कृष्ण मुख—द्विजराज-राज।
कृष्णवपु-सिंहासने, बसि’ राज्य-शासने,
करे सङ्गे चन्द्रेर समाज॥ 126॥ ध्रु॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 126॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'द्विजराज-राज'—चन्द्रोंका राजा।
[हे सखि,] वह श्रीकृष्णमुखचन्द्र राजा होकर, श्रीकृष्णशरीररूप
सिंहासनपर बैठकर, (अङ्ग-प्रत्यङ्गादि) चन्द्रोंका समाज
लेकर माधुर्य-राज्यपर शासन कर रहा है। कहाँ कौन
सा चन्द्र है, वह बादमें बतलाया जा रहा है॥ 126॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णमुखमण्डल-चन्द्र ही चन्द्रराज है;
318 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/126-131 ]
(1) मुखचन्द्र, (2) बायाँ कपोलचन्द्र, (3) दायाँ
कपोलचन्द्र, (4) चन्दनबिन्दुचन्द्र, (5-14) हाथोंके
नखचन्द्र, (15-24) पाँवोंके नखचन्द्र, (24 ½) ललाटका
अर्द्धचन्द्र;—इन साढ़े चौबीस चन्द्रोंके समाजको लेकर
श्रीकृष्णमुख-चन्द्रराजा श्रीकृष्ण देहरूप सिंहासनपर
बैठकर राजत्व कर रहा है ॥ 126 ॥
दुइ गण्ड सुचिक्वण, जिनि' मणि-सुदर्पण,
सेइ दुइ पूर्णचन्द्र जानि।
ललाटे अष्टमी-इन्दु, ताहाते चन्दन-बिन्दु,
सेह एक पूर्णचन्द्र मानि ॥ 127 ॥
करनख-चान्देर ठाट, वंशी-उपर करे नाट,
तार गीत मुरलीर तान।
पदनख-चन्द्रगण, तले करे नर्त्तन,
नूपुरेरे ध्वनि यार गान ॥ 128 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके दो अत्यन्त उज्ज्वल कपोल
दो पूर्ण चन्द्र हैं, ये चमकती मणियोंकी शोभाको भी
तिरस्कृत कर देनेवाले हैं। उनके ललाटपर अष्टमीका
चन्द्र अर्द्धचन्द्र और उसमें चन्दनका बिन्दु एक
पूर्णचन्द्र है। श्रीकृष्णके हाथोंके नख एक-एक पूर्ण चन्द्र
हैं और उनके हाथोंमें धारण की हुई वंशीके ऊपर वे
नृत्य करते हैं, उनका गीत ही मुरलीकी तान है। उनके
चरणोंके नख भी पूर्ण चन्द्र हैं और वे पृथ्वीपर नृत्य
करते हैं, तब नूपूरकी ध्वनि ही उनका गान है॥ 127-128 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अष्टमी-इन्दु'—अर्द्धचन्द्र ॥ 127 ॥
अनुभाष्य—'ठाट'—स्थिति; 'नाट'—नाट्य ॥ 128 ॥
विलासमैं मत्त क्षत्रियकी भाँति श्रीकृष्णमुखकमल—
गोपियोंके चित्तको बींध देनेवाला :—
नाचे मकर-कुण्डल, नेत्र—लीला-कमल,
विलासी राजा सतत नाचाय।
भ्रू-धनु, नेत्र-बाण, धनुर्गुण-दुई काण,
नारीमन-लक्ष्य बिन्धे ताय ॥ 129 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 129 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णमुखचन्द्र विलासी राजा है; वह
मुखचन्द्र मकर-कुण्डलों और नेत्रकमलोंको सदा नृत्य
कराता है। भौंहे-धनुषके समान हैं, नेत्र उसके बाण
हैं; दोनों कान-धनुषकी रस्सीसे बँधे हुए हैं; कानों तक
विस्तृत नेत्ररूपी बाणोंके द्वारा श्रीकृष्ण गोपनारियोंके
मनरूपी लक्ष्य-वस्तुको बींधते हैं ॥ 129 ॥
महादान्यरूपमें सबको अङ्ग-चन्द्रसमूहसे
अमृत-वितरण :—
एइ चान्देर बड़ नाट, पसारि' चान्देर हाट,
बिनिमूले बिलाय निजामृत।
काँहो स्मित-ज्योत्स्नामृते, काँहारे अधरामृते,
सब लोक करे आप्यायित ॥ 130 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 130 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्ण मुखचन्द्रका नाट्य (नृत्य)
सभीका ही अतिक्रम करता है और अन्य साढ़े तेईस
चन्द्ररूपी बिक्री किये जानेवाले द्रव्योंके द्वारा हाटका
विस्तार करके अपने अमृतको बिना मूल्यके वितरण
करता है। किसी ग्राहकको मधुर हास्यरूप ज्योत्स्नामृतके
द्वारा, किसी ग्राहकको अधरामृतके द्वारा और अन्यान्य
सभीको किसी अन्य प्रकारसे प्रसन्न करता है ॥ 130 ॥
कामक्रीड़ामत्त मुखचन्द्र-राजाके मन्त्री और
प्रमोदविलास-भवन आदिका वर्णन :—
विपुलायतारुण, मदन-मद-घूर्णन,
मन्त्री यार ए दुइ नयन।
लावण्य-केलि-सदन, जन-नेत्र-रसायन,
सुखमय गोविन्द-वदन ॥ 131 ॥
अनुवाद—लालिमायुक्त दो नयन जिनके कोर कानों
तक प्राय विस्तृत हैं, उस श्रीकृष्णमुखरूप राजाके मन्त्री
हैं और वे मदनके मदको नष्ट करते हैं। गोविन्दका
मुखकमल जो आनन्दसे परिपूर्ण है, वह लावण्यकी
। 319
[ 21/131-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
लीलाका वासस्थान है और वह सभीके नेत्रोंके लिये
रसायन स्वरूप है॥131॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अति विस्तृत लालिमायुक्त दो
नयन-उन श्रीकृष्णमुखरूप राजाके मन्त्री हैं, वे मदनके
मदको नष्ट करते हैं॥131॥
श्रीकृष्णमुखचन्द्रके दर्शनसे गोपियोंकी नवनवायमान,
नित्य वर्द्धित होनेवाली, परम-चमत्कारमयी चिन्मयी अतृप्ति,
उसके लिये विधिकी निन्दा :-
याँर पुण्यपुञ्ज-फले, से मुख दर्शन मिले,
दुइ आँखि कि करिबे पाने?
द्विगुण बाड़े तृष्णा-लोभ, पिते नारे-मनःक्षोभ,
दुःखे करे विधिर निन्दने॥132॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥132॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दुइ आँखि कि करिबे
पाने' -दर्शकके दो नेत्र किस प्रकार उस अमृतसमुद्रका
पान कर सकते हैं?॥132॥
अनुभाष्य-भक्तिजनित अनुष्ठानसे ही भक्ति-उन्मुखी
'सुकृति' उत्पन्न होती है। देखनेवाले व्यक्तिके दो नेत्रोंके
द्वारा ऐसे श्रीकृष्णमुखका कितना पान करना सम्भव
है? उसकी तृष्णा और लोभ दो गुणा वर्द्धित होनेपर
भी अभिलषित परिमाणके अनुसार पान नहीं कर
पानेपर अपनी अयोग्यता और अभावके कारण उसका
मन विशेषरूपसे क्षुब्ध होता है; द्रष्टा तब दुःखी चित्तसे
अपने सृष्टिकर्त्ताको दोष देता है॥132॥
विधि-श्रीकृष्णमाधुरी-रससे अनभिज्ञ :-
ना दिनेक लक्ष कोटि, सबे दिला आँखि दुटि,
ताते दिला निमिष-आच्छादन।
विधि-जड़ तपोधन, रसशून्य तार मन,
नाहि जाने योग्य सृजन॥133॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥133॥
अनुभाष्य-अतृप्त द्रष्टा तब खेदपूर्वक कहता
है,-मेरे लाख-करोड़ नेत्र नहीं है, केवलमात्र दो ही हैं
और वे भी पलकोंसे ढके हुए हैं। बीच-बीचमें जब
अति अल्प समयके लिये भी पलकें गिरती है, उस
समयमें भी पुनः श्रीकृष्ण-दर्शनमें बाधा होती है।
इसलिये शरीरका निर्माण-कर्त्ता ब्रह्मा अत्यन्त अज्ञानी
है और श्रीकृष्णदर्शनकी सेवाको छोड़कर तुच्छ तपस्यामें
रत होनेके कारण बिल्कुल भी 'रसज्ञ' नहीं है, सृष्टि
आदि शुष्क कार्योंको ही करनेवाला है-कहाँ किस
प्रकारका विधान करना उचित है, इस विषयमें वह
सम्पूर्ण रूपसे अनभिज्ञ है॥133॥
विधिको परामर्श और उपदेश-प्रदान :-
ये देखिबे कृष्णानन, तार करे द्वि-नयन,
विधि हञा हेन अविचार।
मोर यदि बोल धरे, कोटी आँखि तार करे,
तबे जानि योग्य सृष्टि तार॥134॥
अनुवाद-विधाताने विचारहीन होकर श्रीकृष्णमुखके
दर्शनके लिये भी सभीको केवल दो ही नेत्र दिये हैं।
आगे अनुभाष्य देखें॥134॥
अनुभाष्य-मेरे परामर्शको स्वीकार करके विधाता
यदि श्रीकृष्णमुखके दर्शन करनेवालेको करोड़ों नेत्र
प्रदान करे, तभी मैं उसको सृष्टि रचनाके विषयमें योग्य
समझूँगा॥134॥
श्रीकृष्णकी अङ्ग-माधुरी, मुख-माधुरी और हास्य-माधुरीमें
गोपीभावयुक्त महाप्रभुका लोभ :-
कृष्णाङ्ग-माधुर्य-सिन्धु, सुमधुर मुख-इन्दु,
अति-मधु स्मित-सुकिरण।
ए तिने लागिल मन, लोभे करे आस्वादन,
श्लोक पड़े, स्वहस्त-चालन॥135॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥135॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'ए तिने लागिल मन'-श्रीकृष्णके
अङ्गोंका माधुर्य मानो समुद्र है, उनका सुमधुर मुख
320 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/135-137 ]
मानो समुद्रमेंसे उठा चन्द्र है और उनकी अति मधुर
मुस्कान मानो उस चन्द्रकी किरण है-इन तीनोंमें मन
लग गया ॥ 135 ॥
अनुभाष्य-साधारणतः प्रथम दृष्टिमें ही श्रीकृष्णके
अङ्गरूपी माधुर्य-समुद्रका दर्शन, विशेष द्वितीय-दृष्टिमें
अङ्ग-सिन्धुमें स्थित सुमधुर मुखचन्द्र और विशेषतः
तृतीय दर्शनमें मधुरसे भी अति मधुर मृदुहास्यरूपी
मुखचन्द्रकी किरण-इन तीनोंका माधुर्य महाप्रभुके
श्लोकके पाठ करनेके समय क्रमशः उदित होने लगा
एवं महाप्रभुके द्वारा अपने हाथोंको हिलाने रूपी विकार
दिखलायी दिया ॥ 135 ॥
गोपियोंके लिये श्रीकृष्णके अङ्ग, श्रीकृष्णका मुख और
श्रीकृष्णकी हास्य-माधुरीका तारतम्य :-
श्रीकृष्णकर्णामृत (92) में बिल्वमङ्गलवाक्य-
मधुरं मधुरं वपुरस्य विभो-
मधुरं मधुरं वदनं मधुरम्।
मधुगन्धि-मृदुस्मितमेतदहो
मधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ॥ 136 ॥
अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 136 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-इन श्रीकृष्णका शरीर मधुर है,
इनका मुख भी मधुर है और इनका मधु-सुगन्धयुक्त
मृदुहास्य और भी मधुर है; अहो ! इनका सब कुछ
ही मधुर है ॥ 136 ॥
अनुभाष्य-
अस्य विभोः (कृष्णस्य) वपुः (मूर्तिः अङ्गं वा) मधुरं
मधुरं (तादृश-स्वस्वरूपेतर-सर्वविग्रहाणां रूपतारतम्येन अतिमधुरम्);
[कृष्णस्य] वदनं (च) मधुरं मधुरं मधुरं (कृष्णाङ्ग-तारतम्येन
अतितरं मधुरम्); अहो, एतत् मधुगन्धि (मधुसुरभियुक्तं)
मृदु-स्मितं (मन्दहास्यं च) मधुरं मधुरं मधुरं मधुरं
(कृष्णदेह-कृष्णमुख-तारतम्येन अतितमं मधुरम्)।
श्लोक-भावानुवाद-इन श्रीकृष्णका शरीर और
उसके अङ्ग मधुरसे मधुर हैं अर्थात् अपनेसे अतिरिक्त
सभी विग्रहोंसे रूपके तारतम्यसे अति मधुर हैं। इनका
मुख मधुरसे मधुरसे भी मधुर है अर्थात् श्रीकृष्णके
समस्त अङ्गोंके तारतम्यसे अतितर मधुर है। और
अहो ! इनका मधु-सुगन्धयुक्त मृदुहास्य मधुरसे मधुरसे
मधुरसे भी मधुर है अर्थात् श्रीकृष्णके देह और
श्रीकृष्णके मुखके तारतम्यसे भी अतितम मधुर है।
अहो ! इनका सब कुछ ही मधुर है ॥ 136 ॥
गोपीभावमें निमग्न महाप्रभुकी श्रीकृष्णके माधुर्यके
आस्वादनमें नित्य बढ़नेवाली अतृप्ति :-
सनातन, कृष्णमाधुर्य-अमृतेर सिन्धु।
मोर मन-सन्निपाति, सब पिते करे मति,
दुर्देव, वैद्य ना देय एक बिन्दु ॥ 137 ॥ ध्रु॥
अनुवाद-हे सनातन ! श्रीकृष्णका माधुर्य अमृतका
सिन्धु है। मेरा मन सन्निपात रोगसे ग्रस्त होनेके कारण
उस सिन्धुका पूर्णरूपसे पान करनेकी इच्छा करता है।
किन्तु मेरा ऐसा दुर्भाग्य है कि वैद्य मुझे उसकी एक
बूँद भी पान नहीं करने देता ॥ 137 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-धातु (कफ, वात और पित्त) में
त्रिदोषके उत्पन्न होनेपर उसे 'सन्निपात' कहते हैं। मेरा
मन जबसे श्रीकृष्णके अङ्गके माधुर्य, श्रीकृष्णके मुखके
माधुर्य और श्रीकृष्णकी मुस्कानके माधुर्य-इन तीनोंका
आघात खाकर पीड़ित हो गया है, तबसे मेरा मन
सन्निपात-रोगसे ही पीड़ित हुआ है, इसमें सन्देह नहीं
है। वह उस-उस सौन्दर्य रससमुद्रके प्रति पिपासु होकर
दौड़ रहा है। साधारण सन्निपात-रोगका वैद्य जिस प्रकार
रोगीको एक बूँद भी जलका पान नहीं करने देता,
उसी प्रकार मेरे इस रोगके वैद्य श्रीकृष्णके अतिरिक्त
और कोई नहीं होनेपर भी वे अपने सौन्दर्यामृत-
समुद्रकी एक बूँदको भी मुझे पान नहीं करने
देते-यही दुःख (दुर्भाग्य) है ॥ 137 ॥
अनुभाष्य-विप्रलम्भ-रसमें गोपीभावमें विभावित
महाप्रभुकी श्रीकृष्ण-माधुर्य-आस्वादनकी प्यास इतनी
तीव्र है कि वे अपार श्रीकृष्ण माधुर्यका आस्वादन
करके भी अप्राकृत परम-चमत्कारमय उत्तरोत्तर वर्द्धनशील
। 321
[ 21/137-141 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अतृप्तिके कारण प्रबल आवेग और उत्कण्ठावशतः
सामान्य परिमाणमें भी श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन
नहीं कर पा रहे हैं, ऐसा कहकर खेद और आक्षेप
कर रहे हैं॥137॥
श्रीकृष्णके अङ्ग-मधुर, श्रीकृष्णका मुख-मधुरतर,
श्रीकृष्णका हास्य-मधुरतम :-
कृष्णाङ्ग-लावण्यपूर, मधुर हैते सुमधुर,
ताते सेइ मुख सुधाकर।
मधुर हैते सुमधुर, ताहा हइते सुमधुर,
ताँर येइ स्मित ज्योत्स्ना-भर॥138॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका कलेवर तो लावण्यका धाम
है और वह मधुरसे भी सुमधुर है। उनका मुखचन्द्र
तो उससे भी अधिक मधुरसे भी सुमधुर है। और
उनके मुखचन्द्रपर उससे भी अति सुमधुर उनकी
मन्द-मुस्कान है जो चाँदनीके समान है॥138॥
अनुभाष्य—'ताँर'—श्रीकृष्णमुखचन्द्रका; 'स्मित
ज्योत्स्ना-भर'—श्रीकृष्णके मुखपर मन्द-मुस्कान जैसे
गोपियोंको आह्लाद प्रदान करनेवाली चन्द्रिकाका पूर्ण
आलोक (प्रकाश) है॥138॥
समस्त त्रिभुवन ही-उस हास्यचन्द्रिकाके
आलोकमें स्नान किया हुआ :-
मधुर हैते सुमधुर, ताहा हैते सुमधुर,
ताहा हैते अति सुमधुर।
आपनार एककणे, व्यापे सब त्रिभुवने,
दशदिक् व्यापे यार पूर॥139॥
अनुवाद—वह मन्द-मुस्कान मधुरसे भी सुमधुर,
उससे भी सुमधुर, उससे भी अति सुमधुर है। अपने
केवलमात्र एक ही कणसे सम्पूर्ण त्रिभुवनोंमें व्याप्त
होकर दसों-दिशाओंको अपने आलोकसे प्रकाशित कर
देती है॥139॥
अनुभाष्य—यद्यपि श्रीमुखके एक ओर वह मुस्कान
दिखलायी देती है, तथापि गोलोक, परव्योम और
[दायाँ स्तम्भ]
देवीधाम उससे व्याप्त होकर दसों दिशाओंमें प्रकाश भर
जाता है॥139॥
श्रीकृष्णके क्रीड़ाविग्रहकी वेणु-माधुरीसे त्रिभुवन उन्मत्त :-
स्मित-किरण-सुकर्पूर, पैशे अधर-मधुरे,
सेइ मधु माताय त्रिभुवने।
वंशीछिद्र आकाशे, तार गुण शब्दे पैशे,
ध्वनिरूपे पाञा परिणामे॥140॥
अनुवाद—वह मन्द-हास्य-किरण उत्तम कर्पूरकी
भाँति है जो अधरोंकी मधुरतामें प्रवेश कर जाती है।
फिर वह मधुरता वंशीके छिद्रोंसे ध्वनिके रूपमें परिणत
होकर आकाशके व्याप्त हो जाती है॥140॥
अनुभाष्य—'स्मितकिरण-सुकर्पूर'—मन्द हास्य-किरण
रूपी कर्पूरसे। 'पैशे'—प्रवेश करती है॥140॥
श्रीकृष्णकी वंशी-ब्रह्माण्ड, परव्योम और गोलोकके
समस्त शुद्धसत्त्वकी, विशेषतः शृङ्गार-रसके
आश्रित जनोंकी उन्मादिनी :-
से ध्वनि चौदिके धाय, अण्ड भेदि' वैकुण्ठे याय,
बले पैशे जगतेर काणे।
सबा मातोयाल करि', बलात्कारे आने धरि',
विशेषतः युवतीर गणे॥141॥
अनुवाद—वह वंशीध्वनि चारों दिशाओंमें प्रसारित
होने लगती है। यद्यपि श्रीकृष्ण इस ब्रह्माण्डमें वंशीवादन
कर रहे होते हैं, तथापि उनकी वंशीध्वनि ब्रह्माण्डको
भेद करके वैकुण्ठमें प्रवेश करके बलपूर्वक सभी
लोगोंके कानोंमें प्रवेश कर जाती है और उन्हें मत्त कर
देती है। विशेषतः वह ध्वनि गोलोक-वृन्दावनमें प्रवेश
करके व्रजाङ्गनाओंके मनको आकर्षित करके उन्हें
जबरदस्ती वहाँ ले जाती है जहाँ श्रीकृष्ण वंशीवादन
कर रहे हैं॥141॥
अनुभाष्य—'अण्ड भेदि''—ब्रह्माण्डरूपी प्राकृत-राज्यको
भेद करके अप्राकृत वैकुण्ठमें जाती है और बलपूर्वक
गोपीजन-जगत्के अर्थात् गोपियोंके कानोंमें प्रवेश करती
है॥141॥
322
इक्कीसवाँ अध्याय 21/142-145 ]
वेणु-माधुरीका प्रभाव :-
ध्वनि-बड़ उद्धत, पतिव्रतार भाङ्गे व्रत,
पति-कोल हैते टानि' आने।
वैकुण्ठेर लक्ष्मीगणे, येइ करे आकर्षणे,
तार आगे केबा गोपीगणे ॥ 142 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनि बहुत अभिमानी है, वह पतिव्रता-स्त्रियों तकके व्रतको भङ्ग करा देती है। वह ध्वनि उन्हें पतियोंकी गोदसे भी खींचकर ले आती है। उसमें इतना सामर्थ्य है कि वह वैकुण्ठकी लक्ष्मियों तकको भी आकर्षित कर लेती है, तब गोपियोंके विषयमें क्या कहें? ॥ 142 ॥
नीवि खसाय पति-आगे, गृहधर्म कराय त्यागे,
बले धरि' आने कृष्णस्थाने।
लोकधर्म, लज्जा, भय, सब ज्ञान लुप्त हय,
ऐछे नाचाय सब नारीगणे ॥ 143 ॥
अनुवाद—वंशीकी ध्वनि पतियोंके सामने ही गोपियोंके नाड़ेको ढीला कर देती है, गोपियोंके गृह-धर्मका त्याग कराकर उन्हें बलपूर्वक पकड़कर उस स्थानपर ले आती है, जहाँपर श्रीकृष्ण विराजमान होते हैं। उन गोपियोंका लोकधर्म, लज्जा, भयादिका सब ज्ञान लुप्त हो जाता है। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि समस्त नारियोंको अपने इशारोंपर नचाती है॥ 143 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'नीवि'—लहँगेको कमरसे बाँधने वाली डोरी॥ 143 ॥
श्रीकृष्णके अतिरिक्त सभी शब्दोंको स्तम्भित करनेवाली :-
काणेर भितर वासा करे, आपने ताँहा सदा स्फुरे,
अन्य शब्द ना देय प्रवेशिते।
आन कथा ना सुने काण, आन बुझिते बोलय आन,
एइ कृष्णेर वंशीर चरिते॥ 144 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 144 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'काणेर भितर वासा करे'—'हम गोपियाँ हैं, हमारे कानके भीतर वंशीध्वनि वास करती है अर्थात् सदा कानमें लगी ही रहती है॥' 144 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी वंशीध्वनि गोपियोंके कानोंमें आवास बनाकर स्वयं ही ध्वनिकी स्फूर्तिसे गोपियोंको उन्मत्त प्राय बनाकर रखती है, तब गोपियोंके कानमें अन्य कोई शब्द प्रवेश नहीं कर पाता और उनका मन कहीं और होनेके कारण वे ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पातीं। श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका ऐसा प्रभाव है कि वह गोपियोंके मनको सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंसे दूर कर देती है॥ 144 ॥
इक्कीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका बाह्य दशामें आना, अमानी और मानद-धर्म :-
पुनः कहे बाह्यज्ञाने, आन कहिते कहिलुँ आने,
कृष्ण-कृपा तोमार उपरे।
मोर चित्त-भ्रम करि', निजेश्वर्य-माधुरी,
मोर मुखे शुनाय तोमारे ॥ 145 ॥
अनुवाद—कुछ बाह्यज्ञान होनेपर महाप्रभु पुनः कहने लगे—मैं क्या कहते-कहते क्या कह गया? हे सनातन! तुमपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये उन्होंने ही मेरे चित्तको भ्रमित कराके, अपने ऐश्वर्य और माधुर्यकी कथाको मेरे मुखके माध्यमसे तुम्हें सुनाया है॥ 145 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रेमके आवेशमें श्रीकृष्णतत्त्व बोलते-बोलते बाह्यज्ञान शून्य होकर महाप्रभुने जिस रससन्दर्भको प्रकाशित किया, यह स्थान उसका वर्णन-स्थल नहीं है। इसलिये वे कह रहे हैं,—"मैं एक विषयमें बोलते हुए अन्य विषयको बोलने लगा, श्रीकृष्णने कृपा करके मेरे चित्तमें भ्रम उत्पन्न कराके अपनी ऐश्वर्य-माधुरी तुम्हें श्रवण करायी है॥ 145 ॥
इक्कीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
। 323
[ 21/146-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुकी श्रीकृष्णमाधुर्यमें ग्रस्त अपने
चित्तकी वश्यता और सौभाग्यको बतलाना :-
आमि त' बाउल, आन कहिते आन कहि।
कृष्णेर माधुर्यस्रोते आमि याइ बहि' ॥ 146 ॥
अनुवाद—मैं तो पागल (उन्मत्त) हूँ, एक प्रसङ्ग
कहते-कहते अन्य प्रसङ्ग कहने लग गया हूँ। ऐसा
इसलिये हुआ क्योंकि मैं तो श्रीकृष्णके माधुर्य-स्रोतमें
बहता जा रहा हूँ॥" 146 ॥
महाप्रभुका क्षणकालके लिये मौनभाव :-
तबे महाप्रभु क्षणेक मौन करि' रहे।
मने एक करि' पुनः सनातने कहे॥ 147 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु एक क्षण तक मौन रहे।
मनको स्थिर करके पुनः वे श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने
लगे॥ 147 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्य-श्रवण करनेवालेका श्रीकृष्णप्रेमरूपी
सुखमें निमज्जित होना :-
कृष्णेर माधुरी आर महाप्रभुर मुखे।
इहा येइ सुने, सेइ भासे प्रेमसुखे॥ 148 ॥
अनुवाद—इस अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णकी माधुरी,
और उसपर वह महाप्रभुके श्रीमुखसे निःसृत हुई है,
इसलिये इसे जो भी श्रवण करता है, वह प्रेमानन्दमें
निमज्जित हो जाता है॥ 148॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 149 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सम्बन्धतत्त्वविचारे
श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णनं नाम एकविंशः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 149 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें सम्बन्धतत्त्वविचारमें
श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णन-नामक इक्कीसवें अध्यायका
अनुवाद समाप्त।
324 ।
। 325