श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1763, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/125 ]
कामगायत्री-साक्षात् श्रीकृष्ण विग्रह, एक एक
अक्षर-एक-एक अङ्ग-प्रत्यङ्ग :-
[यथा राग:]
कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय कृष्णेर स्वरूप,
सार्द्ध चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैला काममय ॥ 125 ॥
अनुवाद—कामगायत्री मन्त्र श्रीकृष्णका स्वरूप है।
इस मन्त्रराजमें साढ़े चौबीस अक्षर हैं और इस मन्त्रका
प्रत्येक अक्षर पूर्ण चन्द्र है। ये चन्द्रसमूह श्रीकृष्णको
उदित कराकर त्रिजगत्को प्रेममय बना देते हैं ॥ 125 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कामगायत्री मन्त्र श्रीकृष्णस्वरूप
है। कामबीजको अर्द्ध (आधा) अक्षर माननेसे उसमें
साढ़े चौबीस अक्षर होते हैं ॥ 125 ॥
अनुभाष्य—'कामगायत्री'—मध्यलीला 8/137 संख्या
देखें। कामगायत्रीके साढ़े चौबीस अक्षर ही श्रीकृष्णके
अङ्गोंमें साढ़े चौबीस चन्द्र जैसे हैं और वे श्रीकृष्णस्वरूप
हैं, क्योंकि वे-सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन नामक
तीन तत्त्वोंसे युक्त हैं ॥ 125 ॥
अमृतानुकणा—"पद्मपुराणके सृष्टिखण्डमें ऐसा लिखा
है कि वेदमाता गायत्रीने भी गोपी जन्म लेकर
श्रीकृष्णका सङ्ग प्राप्त किया था। उसी समयसे उन्होंने
कामगायत्रीका रूप धारण कर लिया है। ×× कामगायत्री
निश्चय ही अनादि हैं। वे अनादि गायत्री पहले वेदमाता
गायत्रीके रूपमें प्रकट थीं। बादमें साधनके प्रभावसे और
अन्यान्य उपनिषदोंका सौभाग्य देखकर गोपालोपनिषद्के
साथ व्रजमें जन्म लिया। कामगायत्रीके रूपमें नित्य
होकर भी वे वेदमाता गायत्रीके रूपमें नित्य पृथक्
विराजमान हैं।" (जैवधर्म, 32वाँ अः)
श्रीश्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने 'मन्त्रार्थ-दीपिका'-
ग्रन्थमें साढ़े-चौबीस-अक्षरात्मक कामगायत्री-मन्त्रकी
व्याख्यासे सम्बन्धित एक विशेष घटनाका वर्णन किया
है, वह इस प्रकार है,—
“हे वैष्णवों ! मेरे इस 'कामगायत्री'की व्याख्याके
लिखनेका वृत्तान्त आप लोग श्रवण करो।
श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने
प्राकृत वर्ण अनुसार कामगायत्रीकी वर्ण-संख्या साढ़े
चौबीस कहकर जो लिखा है, उस मतानुसार मैंने भी
वही लिखा है। वह जैसे,—
“कामगायत्री-मन्त्ररूप, हय कृष्णेर स्वरूप,
सार्द्ध-चब्बिश अक्षर तार हय।
से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्ण करि' उदय,
त्रिजगत् कैला काममय ॥”
इस प्रमाणका अवलम्बन करके पूर्वमतके अनुसार
अनुक्रम संस्थापित हुआ है। किन्तु श्रीकृष्णदास कविराज
गोस्वामीने कामगायत्रीकी अक्षर संख्या 'पचीस' छोड़कर
किस प्रमाण अथवा किस अभिप्रायसे साढ़े चौबीस कही
है, वह मैं समझ नहीं पाया। अनेक शास्त्रोंको पढ़कर
अथवा श्रवण करके मैंने यह जाना कि शास्त्रोंके
विचारसे अर्द्ध-अक्षरकी सम्भावना नहीं है, इसलिये मैं
महा-सन्देहके सागरमें निमग्न हो गया था। यदि कोई
कहे कि मात्राहीन 'त'-कार (त्)—अर्द्ध-अक्षर है, तो
ऐसा होनेपर मात्राहीन अक्षर यहाँपर और भी हैं,
इसलिये ऐसा भी नहीं हो सकता। व्याकरण, पुराण,
आगम, नाट्य-अलङ्कारादि शास्त्रोंमें स्वरवर्ण-व्यञ्जनवर्णके
भेदसे पचास वर्णोंका ही उल्लेख है, किन्तु कहीं भी
अर्द्धाक्षरका कोई प्रमाण नहीं है। श्रीजीव गोस्वामीके
द्वारा रचित श्रीहरिनाममृत-व्याकरणमें “नारायणादुद्भूतोऽयं
वर्णक्रमः”-संज्ञापादमें स्वर-व्यञ्जनके प्रसङ्गमें पचास
अक्षरोंका ही उल्लेख है, इसी प्रकार अन्य व्याकरणोंमें
भी वही विचार है। और वृहन्नारदीय पुराणमें
श्रीराधिका-सहस्रनाम-स्तोत्रमें वृन्दावनेश्वरी श्रीराधिकाको
पचास-वर्णरूपिणी कहा गया है। इस प्रकार अन्य
शास्त्रोंमें भी और मातृकान्यास आदिमें भी मातृकादि-
प्रकरणमें कहीं भी मैंने अर्द्धाक्षरके साथ पचास वर्णक्रम
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