श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1756, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/107-111 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कन्दर्पके मनको मथकर श्रीकृष्ण 'मदनमोहन'के
नामसे जाने जाते हैं। रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शात्मक
पाँच बाणोंवाले मदनके 'अपने सौन्दर्यके द्वारा नारी-
विमोहनरूप अहङ्कार'को पैरोंके नीचे रौंदकर श्रीकृष्ण
स्वयं नवकन्दर्प (व्रजमें अप्राकृत नवीन मदन) बनकर
गोपियोंके साथ रासमें क्रीड़ा करते हैं॥ 107 ॥
श्रीकृष्णकी वेणु-माधुरीका वर्णन :-
निज-सम सखा-सङ्गे, गोगण-चारण रङ्गे,
वृन्दावने स्वच्छन्दे विहार।
याँर वेणुध्वनि शुनि', स्थावर-जङ्गम प्राणी,
पुलक, कम्प, अश्रु बहे धार॥ 108 ॥
अनुवाद - श्रीकृष्ण अपने समान सखाओंके साथ
गैयाओंको आनन्दपूर्वक चराते हुए वृन्दावनमें स्वच्छन्दरूपसे
विहार करते हैं। श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनिको सुनकर
स्थावर-जङ्गम (अचर-चर) सभी प्राणी पुलकित हो
जाते हैं, उनके अङ्गोंमें कम्पन होने लगता है और
उनके नेत्रोंसे अश्रुऑंकी धारा बहने लगती है॥ 108 ॥
श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :-
मुक्ताहार-वकपाँति, इन्द्रधनु-पिच्छ तथि,
पीताम्बर-बिजली-सञ्चार।
कृष्ण नव-जलधर, जगत्-शस्य-उपर,
वरिषये लीलामृत-धार ॥ 109 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 109 ॥
अनुभाष्य - श्रीकृष्णके कण्ठमें जो मुक्तामालाका हार
है, वह सफेद बगुलोंकी श्रेणीके समान है, श्रीकृष्णके
सिरपर जो मोर पंख है, वह इन्द्रधनुषके समान है और
श्रीकृष्णका पीताम्बर विद्युतके समान है। श्रीकृष्ण
नव-जलधर (नये-नये वर्षाके जलसे पूर्ण मेघ)के
समान हैं और गोपियाँ जगत्की फसलके समान हैं।
उस फसलके ऊपर मेघोंके जल बरसनेकी भाँति
श्रीकृष्ण अपनी लीलामृत-धाराका वर्षण करके उनमें
जीवनका सञ्चार करते हैं। वर्षाकालमें बगुले उड़ते हैं,
इन्द्रधनुष और विद्युत भी दिखलायी देती है॥ 109 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्यरूपरी सर्वोत्कृष्ट भगवत्ता
एकमात्र भागवतमें ही वर्णित :-
माधुर्य भगवत्ता-सार, व्रजे कैल परचार,
ताहा शुक-व्यासेर नन्दन।
स्थाने स्थाने भागवते, वर्णियाछे जानाइते,
ताहा शुनि' नाचे भक्तगण ॥"110 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-माधुर्य भगवताका सार है, - समस्त
ऐश्वर्य, समस्त वीर्य, समस्त यश, समस्त सौन्दर्य,
समस्त ज्ञान, समस्त वैराग्य, - इन छः गुणोंको 'भगवत्ता'
कहते हैं; उनमेंसे समस्त 'श्री' का नाम 'माधुर्य' है। वही
छः प्रकारकी भगवताका सार है; उसीका दूसरा नाम
'माधुर्य' है। श्रीकृष्ण-मूर्तिमें माधुर्यप्रधान भगवत्ता और
श्रीनारायण आदिमें ऐश्वर्यप्रधान भगवत्ता है॥ 110 ॥
अनुभाष्य-षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्की भगवत्ताका सार
ही माधुर्य है; यह माधुर्य व्रजमें ही प्रचारित हुआ है।
कृष्णद्वैपायन वेदव्यासके पुत्र शुकदेवने भक्तोंके हृदयको
उन्मादित कर देनेवाले उस माधुर्य-कणाका श्रीमद्भागवतके
स्थान-स्थानपर वर्णन किया है। [उसके विषयमें सुनकर
भक्तगण नृत्य करते हैं] ॥ 110 ॥
श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करते हुए महाप्रभुके द्वारा
गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन :-
कहिते कृष्णेर रसे, श्लोक पड़े प्रेमावेशे,
प्रेमे सनातन-हात धरि'।
गोपी-भाग्य, कृष्ण-गुण, ये करिल वर्णन,
भावावेशे मथुरा-नागरी ॥ 111 ॥
अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 111 ॥
अनुभाष्य - मथुरावासिनी स्त्रियोंने गोपियोंके असामान्य
सौभाग्य और श्रीकृष्णके अलौकिक गुणोंका भावपूर्ण
310 ।