श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1770, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/146-149 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
गोपीभावमें आविष्ट महाप्रभुकी श्रीकृष्णमाधुर्यमें ग्रस्त अपने
चित्तकी वश्यता और सौभाग्यको बतलाना :-
आमि त' बाउल, आन कहिते आन कहि।
कृष्णेर माधुर्यस्रोते आमि याइ बहि' ॥ 146 ॥
अनुवाद—मैं तो पागल (उन्मत्त) हूँ, एक प्रसङ्ग
कहते-कहते अन्य प्रसङ्ग कहने लग गया हूँ। ऐसा
इसलिये हुआ क्योंकि मैं तो श्रीकृष्णके माधुर्य-स्रोतमें
बहता जा रहा हूँ॥" 146 ॥
महाप्रभुका क्षणकालके लिये मौनभाव :-
तबे महाप्रभु क्षणेक मौन करि' रहे।
मने एक करि' पुनः सनातने कहे॥ 147 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु एक क्षण तक मौन रहे।
मनको स्थिर करके पुनः वे श्रीसनातन गोस्वामीसे कहने
लगे॥ 147 ॥
श्रीकृष्णमाधुर्य-श्रवण करनेवालेका श्रीकृष्णप्रेमरूपी
सुखमें निमज्जित होना :-
कृष्णेर माधुरी आर महाप्रभुर मुखे।
इहा येइ सुने, सेइ भासे प्रेमसुखे॥ 148 ॥
अनुवाद—इस अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णकी माधुरी,
और उसपर वह महाप्रभुके श्रीमुखसे निःसृत हुई है,
इसलिये इसे जो भी श्रवण करता है, वह प्रेमानन्दमें
निमज्जित हो जाता है॥ 148॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 149 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सम्बन्धतत्त्वविचारे
श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णनं नाम एकविंशः परिच्छेदः।
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है॥ 149 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें सम्बन्धतत्त्वविचारमें
श्रीकृष्णैश्वर्यमाधुर्यवर्णन-नामक इक्कीसवें अध्यायका
अनुवाद समाप्त।
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