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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

चिन्मयधाम है और वे आनन्दमय सभी रात्रियाँ भी
चिन्मय रात्रियाँ हैं; जो रासलीला हुई थी, वह भी सम्पूर्ण
रूपसे चिन्मय है; उसमें जड़ीय किसी भी क्रियाका
स्पर्शमात्र भी नहीं हुआ। श्रीकृष्ण कभी भी जड़मयी
रतिकी ओर देखते नहीं हैं। चिद्-जगत्में ही उनकी
समस्त लीलाएँ अवरुद्ध हैं; उनकी कामक्रीड़ा-सब
कुछ चिन्मय कार्य-मात्र है॥158॥
अनुभाष्य-शुद्ध हृदयवाले राजा परीक्षितको
महाभागवत परमहंस-कुलचूड़ामणि श्रीशुकदेवके द्वारा
गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ाका वर्णन-
एवं [कथितभावेन] सत्यकामः (नित्यसत्यसङ्कल्पः श्रीकृष्णः)
अनुरताबलागणः (अनुरतः आकृष्टः अबलागणः यस्मिन्
तादृशः अनुरागि-स्त्रीकदम्बस्थः इत्यर्थः) आत्मनि (एव)
अवरुद्धसौरतः (अवरुद्धाः सौरताः सुरतव्यापाराः येन एवम्भूतः
सः आत्मारामः अप्राकृत-कामदेवः इत्यर्थः) शरत्-
काव्यकथारसाश्रयाः (शरदि भवाः काव्येषु कथ्यमाना ये
रसास्तेषामाश्रयभूताः, यद्वा, शरत्कालोचितकाव्यकथारसाः तेषाम्
आश्रयभूताः ताः, यद्वा, 'रसाश्रयाः शरत्काव्यकथाः'
इत्यन्वये-शृङ्गार-रसाश्रयाः शरदि प्रसिद्धाः काव्येषु याः कथास्ताः)
शशाङ्कांशुविराजिताः (शशाङ्कस्य अंशुभिः किरणैः विराजिताः
शोभमानाः) सर्वाः एव निशाः सिषेवे (रासक्रीड़या यापयामास)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥158॥
गोपियोंमें नायिकोचित परम-चमत्कार-
लक्षणमय गुण-वैचित्र्य :-
'वामा' एक गोपीगण, 'दक्षिणा' एक गण।
नाना-भावे कराय कृष्णे रस आस्वादन॥159॥
अनुवाद-एक प्रकारकी गोपियाँ 'वामा' स्वभावकी
हैं और दूसरी प्रकारकी 'दक्षिणा' स्वभावकी हैं। ये
अनेक भावोंके द्वारा श्रीकृष्णको रसास्वादन कराती
हैं॥159॥
सभी गोपियोंमें श्रेष्ठा श्रीकृष्णप्रेष्ठा
श्रीराधाके गुण और स्वभाव :-
गोपीगण-मध्ये श्रेष्ठा राधा-ठाकुराणी।
निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेम-रत्नखनि॥160॥


वयसे 'मध्यमा' तैं हो स्वभावते 'समा'।
गाढ़ प्रेमभावे तैं हो निरन्तर 'वामा'॥161॥
वाम्य-स्वभावे मान उठे निरन्तर।
तार मध्ये उठे कृष्णेर आनन्द-सागर॥"162॥
अनुवाद-गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठा श्रीराधा-ठाकुराणी हैं,
वे निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेमरूपी रत्नोंकी खान हैं। वे
आयुमें 'मध्यमा' (पौगण्ड और यौवनके मध्य), स्वभावमें
'समा' (समभाव) हैं। 'समा' होनेपर भी गाढ़ प्रेमभावके
कारण निरन्तर 'वामा' अर्थात् वाम्यभाव धारण करनेवाली
हैं। वाम्य स्वभावके कारण निरन्तर मानवती होती रहती
हैं, जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णको आनन्द सागरमें निमज्जित
करती हैं॥160-162॥
अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियाँ दो प्रकारकी हैं,-'वामा'
और 'दक्षिणा'। गोपियोंके मध्य निर्मल उज्ज्वल-रस-
प्रेमरत्नकी खान-स्वरूपा राधा-ठाकुराणी ही सर्वश्रेष्ठा
हैं। वे आयुमें-'मध्यमा', स्वभावमें-'समा' एवं निरन्तर
'वामा' हैं। उनके वाम्य स्वभावसे ही मान उदित होता
है॥159-162॥
अनुभाष्य- 'वामा'-उज्ज्वलनीलमणिके सखी प्रकरणमें,
32 संख्या-
“मानग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना।
अभेद्या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्यते॥”
“जो नायिका मानग्रहण करनेमें सदैव चेष्टाशील
होती है, मानके शिथिल पड़नेसे अत्यन्त कोप करती
है, नायक जिसको सहज ही वशीभूत करनेमें समर्थ
नहीं होता तथा नायकके प्रति प्रायः कठोर होती है,
वही 'वामा' कहलाती है।”
'दक्षिणा'-उज्ज्वलनीलमणिके सखी प्रकरणमें 38
संख्या-
“असह्या माननिर्बन्धे नायके युक्तवादिनी।
सामभिस्तेन भेद्या च दक्षिणा परिकीर्तिता॥”
“जो नायिका मान करनेमें असमर्थ होती है,

[ 14/159-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नायकके प्रति युक्तिपूर्ण प्रिय वचनोंका प्रयोग करती है,
नायकके प्रीतिपूर्ण वचनोंसे प्रसन्न हो जाती है, उसे
'दक्षिणा' कहते हैं॥ 159 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें शृङ्गारभेदकथनमें 102 श्लोक :-
अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्।
अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥ 163 ॥
अनुवाद-सर्पकी स्वभाव-सिद्ध कुटिलगतिकी भाँति
प्रेमकी भी स्वाभाविक वक्रगति होती है। इसलिये कभी
कारण और कभी अकारण ही नायक एवं नायिकाका
मान उदित होता है ॥ 163 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 8/110 संख्या देखें ॥ 163 ॥
महाप्रभुकी हर्ष-वृद्धि, दामोदरके द्वारा श्रीराधाके कृष्णप्रेम
या महाभाव-सार-पराकाष्ठा-महिमा-व्याख्याका विस्तार :-
एत शुनि' बाड़े प्रभुर आनन्द-सागर।
'कह, कह' कहे प्रभु, बले दामोदर ॥ 164 ॥
“अधिरूढ़ महाभाव—राधिकार प्रेम।
विशुद्ध, निर्मल, यैछे दग्धवान् हेम ॥ 165 ॥
कृष्णेर दर्शन यदि पाय आचम्बिते।
नाना-भाव-विभूषणे हय विभूषिते ॥ 166 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुका आनन्द-सागर
वर्धित होने लगा और वे श्रीस्वरूप दामोदरको 'और
कहो, और कहो' कहने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर कहने
लगे,—“श्रीराधिकाका प्रेम अधिरूढ़ महाभाव है। वह प्रेम
विशुद्ध, निर्मल और तपाये हुए सोनेकी भाँति उज्ज्वल
है। श्रीराधिकाको यदि अकस्मात् श्रीकृष्णका दर्शन प्राप्त
हो जाता है, तो वे अनेक भावरूपी आभूषणोंसे
विभूषित हो जाती हैं ॥ 164-166 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दग्धवान् हेम'-ज्वलित अर्थात्
तपता हुआ सोना ॥ 165 ॥
अनुभाष्य- 'अधिरूढ़ महाभाव' - उज्ज्वलनीलमणिके
स्थायिभाव प्रकरणमें 170 संख्या-
“रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम्।
यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥”
“रूढ़भावके लक्षणमें कहे गये जो सब सात्त्विक
अनुभाव अपूर्व विशिष्टताको प्राप्त होते हैं, उस
अनिर्वचनीय विशिष्टता-प्राप्त सात्त्विक भावसमूहको
'अधिरूढ़ महाभाव' कहते हैं ॥” 165 ॥
श्रीकृष्णको परिपूर्ण मात्रामें सुख प्रदान करनेवाले सब
प्रकारके भावरूपी अलङ्कारोंसे विभूषित श्रीराधिका :-
अष्ट 'सात्त्विक', हर्षादि 'व्यभिचारी' याँर।
'सहज प्रेम', विंशति 'भाव' अलङ्कार ॥ 167 ॥
'किलकिञ्चित', 'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित'।
'विव्वोक', 'मोट्टायित', आर 'मौग्ध्य', 'चकित' ॥ 168 ॥
श्रीकृष्णवाञ्छा पूर्ण करनेवाली श्रीराधाके नाना भाव-
अलङ्कार-शोभित रूप-दर्शनसे श्रीकृष्णको असीम सुख :-
एत भावभूषाय भूषित श्रीराधार अङ्ग।
देखिते उथले कृष्णसुखाब्धि-तरङ्ग ॥ 169 ॥
अनुवाद-आठ सात्त्विकभाव, हर्षादि व्यभिचारी
भाव, 'सहज प्रेम', बीस भावरूपी अलङ्कार-'किलकिञ्चित',
'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित', 'विव्वोक', 'मोट्टायित',
'मौग्ध्य' और 'चकित'—इन समस्त भावरूपी अलङ्कारोंसे
श्रीराधिकाके अङ्ग विभूषित हैं, जिन्हें देखने मात्रसे ही
श्रीकृष्णके सुख-समुद्रमें तरङ्ग उठने लगती हैं॥ 167-169 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'सात्त्विक' - सात्त्विक विकार आठ
प्रकारके हैं—(1) स्तम्भ, (2) स्वेद (पसीना), (3)
रोमाञ्च, (4) स्वरभङ्ग, (5) वेपथु (कम्प), (6) वैवर्ण्य
(वर्ण परिवर्तन), (7) अश्रु और (8) प्रलय।
'व्यभिचारी'-व्यभिचारी अथवा सञ्चारी भाव तैंतीस
प्रकारके हैं, जैसे,—
(1) निर्वेद, (2) विषाद, (3) दैन्य, (4) ग्लानि,
(5) श्रम, (6) मद, (7) गर्व, (8) शङ्का, (9) त्रास,
(10) आवेग, (11) उन्माद, (12) अपस्मार,
(13) व्याधि, (14) मोह, (15) मृति, (16) आलस्य,
548 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/167–173 ]
(17) जाड्य, (18) व्रीड़ा, (19) अवहित्था, (20) स्मृति,
(21) वितर्क, (22) चिन्ता, (23) मति, (24) धृति,
(25) हर्ष, (26) औत्सुक्य, (27) औग्र्य, (28) अमर्ष
(29) असूया, (30) चापल्य, (31) निद्रा, (32) सुप्ति
और (33) प्रबोध।
'भाव' रूप अलङ्कार—बीस प्रकारके हैं; जैसे—
[क] अङ्गज (अङ्गोंमें उत्पन्न)— (1) भाव, (2)
हाव, (3) हेला; [ख] अयत्नज (बिना प्रयासके
उत्पन्न)— (4) शोभा, (5) कान्ति, (6) दीप्ति, (7)
माधुर्य, (8) प्रगल्भता, (9) औदार्य, (10) धैर्य; [ग]
स्वभावज (स्वभावसे उत्पन्न)— (11) लीला, (12)
विलास, (13) विच्छित्ति, (14) विभ्रम, (15) किलकञ्चित,
(16) मोट्टायित, (17) कुट्टमित, (18) विब्बोक, (19)
ललित और (20) विकृत ॥ 167 ॥
अनुभाष्य—'किलकिञ्चित'—इस अध्यायकी 174 संख्या
देखें। 'कुट्टमित'—इसी अध्यायकी 197 संख्या देखें।
'विलास'—इसी अध्यायकी 187 संख्या देखें। 'ललित'—इसी
अध्यायकी 192 संख्या देखें। 'विब्बोक'—उज्ज्वलनीलमणिके
अनुभाव प्रकरणमें 75 संख्या—
“इष्टेऽपि गर्वमानाभ्यां विब्बोकः स्यादनादरः”
अर्थात् गर्व और मानके द्वारा प्रियतम अथवा
उनके द्वारा दी गयी वस्तुके अनादरको 'विब्बोक' कहते
हैं। 'मोट्टायित'—उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव प्रकरणमें—
“कान्तस्मरणवार्त्तादौ हृदि तद्भावभावतः।
प्राकट्यमभिलाषस्य मोट्टायितमुदीर्यते ॥”
अर्थात् हृदयमें प्रियतमकी स्मृति और कथाजनित
उनकी भावनासे जो अभिलाषा उत्पन्न होती है, वही
'मोट्टायित' कहलाती है। 'मौग्ध्य',—उज्ज्वलनीलमणिके
अनुभाव प्रकरणमें—
“ज्ञातस्याप्यज्ञवत्पृच्छा प्रियाग्रे मौग्ध्यमीरितम्”
अर्थात् कान्तके सामने नायिका किसी विषयको
जाननेपर भी जैसे नहीं जानती है, इस प्रकारके भावको
प्रकाश करके जो जिज्ञासा करती है, उसीको 'मौग्ध्य'
कहते हैं। 'चकित'—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें—
“प्रियाग्रे चकितं भीतेरस्थानेऽपि भयं महत्”
अर्थात् कान्तके सम्मुख होनेपर भयभीत नहीं
होनेपर भी जब नायिका अत्यन्त भयभीत होनेका
प्रदर्शन करती है, उसीको 'चकित' कहते हैं।” आदिलीला
4/243, 250, 256 संख्या देखें ॥ 168–169 ॥
श्रीराधाके 'किलकिञ्चित'-भावके दृष्टान्त-स्थल :—
किलिञ्चितादि-भावेर शुन विवरण।
ये भाव-भूषाय राधा हरे कृष्ण-मन ॥ 170 ॥
राधा देखि' कृष्ण यदि धुँइते करे मन।
दानघाटि-पथे यबे वर्जेन गमन ॥ 171 ॥
याबे आसि' माना करे पुष्प उठाइते।
सखी-आगे चाहे यदि गाये हात दिते ॥ 172 ॥
एसब स्थाने 'किलकिञ्चित'-उद्गम।
प्रथमे 'हर्ष' सञ्चारी-मूल-कारण ॥ 173 ॥
अनुवाद—अब किलकिञ्चितादि भावोंका विवरण
सुनिये जिन भावरूपी भूषणोंसे विभूषित होकर श्रीराधा
श्रीकृष्णका मन हरण करती हैं। श्रीकृष्ण जब श्रीराधाको
देखकर यदि उन्हें छूनेकी इच्छा करते हैं, अथवा जब
दानघाटीका पथ अवरुद्धकर जब श्रीराधाको जानेसे
रोकते हैं, अथवा जब श्रीराधाके पास आकर उन्हें
पुष्प-चयन करनेसे मना करते हैं, अथवा किसी
सखीके सामने श्रीराधाके श्रीअङ्गको छूनेका प्रयास
करते हैं—ऐसे समयपर किलकिञ्चित भावका प्राकट्य
होता है। पहले हर्ष-नामक सञ्चारी भाव प्रकट होता
है और यही इन किलकिञ्चत भावोंका मूल कारण
है ॥ 170–173 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जब श्रीमती राधिकाकी भाव-भूषा
देखकर श्रीकृष्णमें उन्हें स्पर्श करनेकी इच्छा उत्पन्न
होती है, तब दानघाटीके पथमें, या फिर पुष्पोंके वनमें,
। 549

[ 14/171-180 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
वैसी लीला सम्पादित करते हैं। दानघाटीके पथपर इस
प्रकारकी लीला, — जिस मार्गपर श्रीमती राधिका दूध-दही-घी
आदि लेकर जाती हैं, उस रास्ते अथवा दूसरी पार
खड़े होकर श्रीकृष्ण कहते हैं, - 'तुम जब तक शुल्क
(कर) नहीं दोगी, तब तक इस मार्गसे तुम्हारा जाना
मना है'; इस छलसे एक दानकेलिरूप लीलाका उद्गम
करते हैं। और जब श्रीराधिका पुष्प चयन करने जाती
हैं, तब श्रीकृष्ण पुष्पवनके अधिकारी बनकर 'मेरे पुष्प
चोरी कर रही हों' कहकर एक लीलाका उद्गम करते
हैं। इन सभी स्थानोंपर ऐसे समयमें श्रीराधाजीका
'किलकिञ्चित' भाव प्रकट होता है ॥ 171-173 ॥
किलकिञ्चित-भावकी संज्ञा :-
उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव प्रकरणमें (44 श्लोक)—
गर्वाभिलाषरुदितस्मितासूयाभयक्रु
सङ्करीकरणं हर्षादुच्यते किलकिञ्चितम् ॥ 174 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-गर्व, अभिलाष, रोदन, हास्य,
असूया, भय और क्रोध-इन सात भावोंके हर्षके साथ
संमिश्रणको 'किलकिञ्चित्' भाव कहते हैं ॥ 174 ॥
अनुभाष्य-
हर्षात् (हर्षः एव हेतुः तस्मात्) गर्वाभिलाषरुदितस्मितासूयाभय-
क्रुधां (गर्वादीनां सप्तानां भावानां) सङ्करीकरणं (मिश्रणं
युगपत्-प्राकट्यं) 'किलकिञ्चितम्' उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥
गर्वादि सात भावोंका हर्षके साथ युगपत्
मिलनके फलसे उक्त 'महाभाव'का उदय :-
आर सात भाव आसि' सहजे मिलय।
अष्टभाव-सम्मिलने 'महाभाव' हय ॥ 175 ॥
गर्व, अभिलाष, भय, शुष्करुदित।
क्रोध, असूया हय, आर मन्दस्मित ॥ 176 ॥
नाना-स्वादु अष्टभाव एकत्र मिलन।
याहार आस्वादे तृप्त हय कृष्ण-मन ॥ 177 ॥
मीठे पानेके साथ उपमा :-
दधि, खण्ड, घृत, मधु, मरीच, कर्पूर।
एलाची-मिलने यैछे रसाला मधुर ॥ 178 ॥
अनुवाद-हर्षके साथ गर्व, अभिलाष, भय, शुष्क-
रोदन, क्रोध, असूया और मन्द-मुस्कान-ये सात भाव
सहजमें आकर मिल जाते हैं और इन आठ भावोंके
मिलनेसे 'महाभाव' होता है। इन आठ भावोंका एक
साथ मिश्रण ऐसा स्वादिष्ट होता है कि उसे आस्वादन
करके श्रीकृष्णका मन तृप्त हो जाता है; जिस प्रकार
दही, चीनी, घी, मधु, काली मिर्च, कर्पूर और छोटी
इलायचीके मिलनेपर रस मधुर हो जाता है ॥ 175-178 ॥
अनुभाष्य-मूल कारण हर्षके साथ गर्व आदि सात
भाव जब मिलते हैं, तब इन आठ भावोंके सम्मिलनसे
'किलकिञ्चित'-महाभाव होता है ॥ 175 ॥
श्रीराधाके किलकिञ्चित भाव-दर्शनसे
श्रीकृष्णका प्रगाढ़तम सुख :-
एइ भाव-युक्त देखि' राधास्य-नयन।
सङ्गम हइते सुख पाय कोटि-गुण ॥" 179 ॥
अनुवाद-किलकिञ्चित भावसे युक्त श्रीराधाके
मुखकमल और नेत्रोंको देखकर श्रीकृष्णको जो सुख
होता है, वह श्रीराधाके सङ्गम सुखसे भी करोड़ों गुणा
अधिक है ॥ 179 ॥
श्रीराधाके किलकिञ्चित-भावका दृष्टान्त-स्थल :-
दानकेलिकौमुदीमें (1) श्लोक और उज्ज्वलनीलमणिमें
अनुभावकथनमें (46) श्लोक-
अन्तःस्मेरतयोज्ज्वला जलकणव्याकीर्णपक्ष्मङ्कुरा
किञ्चित्पाटलिताञ्चला रसिकतोत्सिक्ता पुरः कुञ्चती।
रुद्धायाः पथि माधवेन मधुरव्याभुग्नतारोत्तरा
राधायाः किलकिञ्चितस्तबकिनी दृष्टिः श्रियं वः क्रियात् ॥ 180 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 180 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाके गर्वादि सात भावोंसे
550 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/180-184 ]
मिलित, हर्षजनित 'किलकिञ्चित' भावोत्थित दृष्टि तुम्हारा
मङ्गलविधान करे। दानघाटीके पथपर श्रीकृष्णने आकर
जब राधाजीको रोका, तब राधाजीके अन्तःकरणमें
हँसीका उदय हुआ; तब उनके नयन उज्ज्वल हो गये;
नेत्रोंकी पलकें नव-उदित अश्रुओंसें भर गयीं; नेत्रोंके
दोनों कोने कुछ लाल रङ्गके हो गये; रसके उच्छ्वास-हेतु
नेत्रोंमें उत्साह उदित हुआ; नयनाश्रु कुछ बन्द होने लगे
और दोनों नयनोंकी पुतली अति सुन्दर रूपसे ऊपर
हो गयीं ॥ 180 ॥
अनुभाष्य-
पथि (दानघट्टमार्गे) माधवेन (शुल्क-ग्रहणच्छलेन) रुद्धायाः
राधायाः अन्तःस्मेरतया (अन्तः अव्यक्तया स्मेरतया
ईषद्व्रास्ययुक्ततया) उज्ज्वला (दीप्तिविशिष्टा इति 'स्मितं'),
जलकणव्याकीर्णपक्ष्माङ्कुरा (जलकणैः व्याकीर्णाः विक्षिप्ताः
पक्ष्माङ्कुराः नेत्रलोमाग्रभागाः यस्याः सा इति 'रोदनं'),
किञ्चित्पाटलिताञ्चला (श्वेतरक्ताभनयनप्रान्तदेशा, श्वेतिमा स्वाभाविक
एव, रक्तिमा क्रोधात् इति 'क्रोधः'), रसिकतोत्सिक्ता (रसिकतया
उत्कर्षेण सिक्ता इति 'गर्वः' 'अभिलाषः' वा), पुरः (अग्रतः)
एव कुञ्चती (इति 'भयं'), मधुर-व्याभुग्नतारोत्तरा (मधुरा
व्याभुग्ना वक्रा या नयनतारा तया उत्तरा श्रेष्ठा इति
'अभिलाषः' 'गर्वः' 'असूया' वा), किलकिञ्चितस्तबकिनी
(किलकिञ्चितरूपो यः स्तबकः गाम्भीर्यमयत्वादस्फुटः भावविशेषः
नानाभावपुष्पगुच्छः तद्वती) दृष्टिः वः (युष्माकं) श्रियं क्रियात्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 180 ॥
गोविन्दलीलामृतमें (9/18 श्लोक) :-
वाष्पव्याकुलितारुणाञ्चलचलन्नेत्रं रसोल्लासितं
हेलोल्लासचलाधरं कुटिलभ्रूयुग्मुद्यत्स्मितम्।
राधायाः किलकिञ्चिताञ्चितमसौ वीक्ष्याननं सङ्गमा-
दानन्दं तमवाप कोटिगुणितं योऽभून्न गीर्गोचरः ॥ 181 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-राधिकाके अश्रुओके द्वारा
आकुलित नेत्र किञ्चित् अरुण और चञ्चल हो गये;
रसोल्लास और कन्दर्पभावके कारण अधर कम्पित होने
लगे; दोनों भौंहे कुटिल (टेढ़ी) हो गयीं; मुखकमलपर
मृदु मन्द मुस्कानकी रेखा दिखायी देने लगी और
किलकिञ्चित-भावसे उत्पन्न प्रसन्नताको व्यक्त होते देखकर
श्रीकृष्णने राधिकाके मुख दर्शनसे उनके साथ सङ्गमकी
अपेक्षा करोड़ों गुणा जिस सुखको प्राप्त किया, उसका
वाणीके द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 181 ॥
अनुभाष्य-
असौ (श्रीकृष्णः) राधायाः वाष्पव्याकुलितारुणाञ्चलचलन्नेत्रं
(वाष्पैः अश्रुजलैः व्याकुलिते अरुणम् अञ्चलं ययोः एवम्भूते
चञ्चले नेत्रे यस्मिन् तत्) रसोल्लासितं, हेलोल्लासचलाधरं
(भावविशेषातिशयेन कम्पमानोष्ठं) कुटिलभ्रूयुग्मम् उद्यत्स्मितम्
(प्रकटन्मन्दहास्यं) किलकिञ्चिताञ्चितं (तद्भावयुक्तम्) आननं
(मुखं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) सङ्गमात् कोटिगुणितं तम् आनन्दं
अवाप (प्राप्तवान्) - यः आनन्दः गीर्गोचरः (वाक्यविषयः) न
(नैव भवति, कदापीत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥
श्रीराधाके भाव-श्रवणसे श्रीस्वरूपका
महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :-
एत शुनि' प्रभु हैला आनन्दित मन।
सुखाविष्ट हञा स्वरूपे कैला आलिङ्गन ॥ 182 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुके मनमें बहुत आनन्द
हुआ और उस आनन्दमें आविष्ट होकर उन्होंने
श्रीस्वरूप दामोदरका आलिङ्गन किया ॥ 182 ॥
महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें श्रीस्वरूपके द्वारा
श्रीराधाके 'विलास' भावका वर्णन :-
“'विलासादि'-भाव-भूषार कह त' लक्षण।
येइ भावे राधा हरे गोविन्देर मन ॥" 183 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "विलासादि'-भाव- भूषणोंका
लक्षण वर्णन करो, जिनके द्वारा विभूषित श्रीराधा
श्रीगोविन्दका मन हरण करती हैं ॥" 183 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा वर्णन आरम्भ; भक्तोंका सुख :-
तबे त' स्वरूप-गोसाञि कहिते लागिला।
शुनि' प्रभुर भक्तगण महासुख पाइला ॥ 184 ॥
। 551

[ 14/184-191 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
“राधा बसि' आछे किंवा वृन्दावने याय।
ताँहा आचम्बिते कृष्ण-दरशन पाय॥185॥
देखितेइ नाना-भाव हय विलक्षण।
से वैलक्षण्येर नाम 'विलास'-भूषण॥186॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने कहना आरम्भ किया, जिसे सुनकर महाप्रभुके भक्तोंको परमसुख प्राप्त हुआ। श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “श्रीराधा कभी कहीं बैठी हुई हैं अथवा वृन्दावनमें जा रही हैं—ऐसे समयमें यदि उन्हें अचानक श्रीकृष्णका दर्शन प्राप्त हो जाये, तो दर्शन करते ही उनमें अनेक प्रकारके विलक्षण भाव उदित हो जाते हैं, उन विलक्षण भावोंका नाम ही 'विलास'-भूषण है॥184-186॥
उज्जवलनीलमणिमें अनुभावकथनमें (31 श्लोक) :-
गतिस्थानासनादीनां मुखनेत्रादिकर्मणाम्।
तात्कालिकं तु वैशिष्ट्यं विलासः प्रियसङ्गजम्॥187॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥187॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रियके सङ्गसे उत्पन्न, प्रिय सङ्गम-स्थानपर जाना और बैठना आदि एवं मुखनेत्रादि अङ्गोंका उस समय जो वैशिष्ट्य उदित होता है, उसे 'विलास' कहते हैं॥187॥
अनुभाष्य—
गतिस्थानासनादीनां (कान्तायाः गमनावस्थानोपवेशनादिकानां) मुखनेत्रादिकर्मणां च (आङ्गिकक्रियाणां) प्रियसङ्गजं (कान्तसम्मिलनजातं) तात्कालिकं (कान्तमिलन-कालिकं) वैशिष्ट्यं (वैचित्र्यं) तु 'विलासः' [इत्यभिधीयते]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥187॥
लज्जा, हर्ष, अभिलाष, सम्भ्रम, वाम्य, भय।
एत भाव मिलि' राधाय चञ्चल करय॥188॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके अचानक दर्शन होनेसे श्रीराधाको लज्जा, हर्ष, अभिलाष, सम्भ्रम, वाम्य तथा भय—ये सब भाव मिलकर चञ्चल कर देते हैं॥188॥
गोविन्दलीलामृतमें (9/11 श्लोक) :-
पुरः कृष्णलोकात् स्थगितकुटिलास्या गतिरभूत्
तिरश्चीनं कृष्णाम्बरदरवृतं श्रीमुखमपि।
चलत्तारं स्फारं नयनयुगमाभुग्नमिति सा
विलासाख्य-स्वालङ्करणवलितासीत् प्रियमोदे॥189॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥189॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णको सामने देखकर राधिकाके गमनने स्थिर होकर कुटिल भाव धारण कर लिया; उनका मुखकमल नीले वस्त्रसे कुछ ढका होनेपर भी नेत्रोंकी दोनों पुतलियाँ विस्तृत, चञ्चल और वक्र हो गयीं एवं विलास नामक अलङ्कारसे मण्डित होकर वे श्रीकृष्णके आनन्दका वर्धन करने लगीं॥189॥
अनुभाष्य—
अस्याः (श्रीराधायाः) गति पुरः (अग्रतः) कृष्णालोकात् (कृष्णदर्शनेन) स्थगितकुटिला (स्थगिता स्तब्धा कुटिला मन्दा च) अभूत्; श्रीमुखमपि तिरश्चीनं (वक्रीभूतं) कृष्णाम्बर-दरवृतं (श्यामवासेन ईषत् आवृतञ्च) अभूत्; चलत्तारं (चलन्ती तारा यत्र तत्) स्फारं (विस्तृतं) नयनयुगं (नेत्रद्वयम्) आभुग्नं (वक्रम) अभूत्; -इति सा राधा प्रियमुदे (कृष्णानन्दवर्द्धनाय) विलासाख्य-स्वालङ्करण-वलिता (विलासाभिधेयेन स्वेन निजेन अलङ्करणेन भूषणेन वलिता समन्विता) आसीत्।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥189॥
कृष्ण-आगे राधा यदि रहे दाण्डञा।
तिन-अङ्ग-भङ्गे रहे भ्रू नाचाञा॥190॥
मुखे-नेत्रे हय नाना-भावेर उद्गार।
एइ कान्ता-भावेर नाम 'ललित'-अलङ्कार॥191॥
अनुवाद—यदि श्रीराधा श्रीकृष्णके सामने खड़ी रहें, तो वे त्रिभङ्ग रूपमें हो जाती हैं, उनकी भ्रुकुटि (भौंहें) नृत्य करने लगती है और उनके मुख तथा नेत्रोंमें अनेक प्रकारके भाव प्रकट होने लगते हैं। कान्ताके इस भावका नाम 'ललित'-अलङ्कार है॥190-191॥
अनुभाष्य—'तिन-अङ्ग-भङ्गे'-त्रिभङ्ग रूपमें; 'तिन
552 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/190-197 ]
अङ्ग'-गर्दन, कमर और चरण (अथवा घुटना)। 'हय
उद्गार'-फूटकर बाहर आता है ॥ 190-191 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभावकथनमें (56 श्लोक) :-
विन्यासभङ्गिरङ्गानां भ्रूविलासमनोहरा।
सुकुमारा भवेद्यत्र ललितं तदुदाहृतम् ॥ 192 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जहाँ (अर्थात् जिन चेष्टाओंसे)
अङ्गोंकी विन्यासभङ्गि और भौंहोंका विलास मनोहर
और सुकुमार होता है, वहीं 'ललित-अलङ्कार' कहा
जाता है ॥ 192 ॥
अनुभाष्य-
यत्र अङ्गानां सुकुमारा (अतिकोमलो) विन्यासभङ्गिः
(रचना-चातुरी) भ्रूविलास-मनोहरा भवेत्, तत् 'ललितम्' इति
उदाहृतम्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥
ललितभूषित राधा देखे यदि कृष्ण।
दुँहे दुँहा मिलिबारे हयेन सतृष्ण ॥ 193 ॥
अनुवाद-जब श्रीकृष्ण इन ललित-अलङ्कारोंसे
भूषित श्रीराधाको देखते हैं, तब दोनों एक-दूसरेसे
मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो जाते हैं ॥ 193 ॥
गोविन्दलीलामृतमें (9/14 श्लोक)-
ह्रिया तिर्यग्-ग्रीवा-चरण-कटि-भङ्गी-सुमधुरा
चलच्चिल्ली-वल्ली-दलित-रतिनाथोर्जित-धनुः।
प्रिय-प्रेमोल्लासोल्लसित-ललितालालित-तनुः
प्रियप्रीत्यै सासीदुदितललितालंकृतियुता ॥ 194 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 194 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णकी प्रीति वर्धित करनेके
लिये जब श्रीराधिका ललित-अलङ्कारसे भूषित हुई थी,
तब लज्जासे उनकी गर्दनके वक्रभाव, चरण और
कमरकी सुमधुर भङ्गिमा, भ्रूलताकी चञ्चलतासे कामदेवके
तेजस्वी धनुषकी भी पराजय और प्रियतमके प्रति
प्रेमोल्लासमें उल्लसित ललित-भावसे पुष्ट श्रीअङ्ग
लक्षित होने लगे ॥ 194 ॥
अनुभाष्य-
सा (राधा) ह्रिया (लज्जया) तिर्यग् ग्रीवा-चरण-कटि-
भङ्गीसुमधुरा (तिर्यग्भावेन सुष्ठु-विन्यस्त-कन्धर-जानु-कटीभ्यङ्ग-
त्रयेण भङ्गया सुमधुरा कृष्णमनोहरा) चलच्चिल्लीवल्ली-
दलित-रतिनाथोर्जित-धनुः (चलन्ती कम्पनवती चिल्लीभ्रूः
चिल्ली-पक्षिणीव भ्रूः क्लिन्नाक्षी वा, सा एव वल्ली लता,
तया दलितः विजितः रतिनाथस्य कामदेवस्य उर्जितं धनुः यया
सा) प्रियप्रेमोल्लासोल्लसित-ललितालालित-तनुः (प्रियस्य कान्तस्य
कृष्णस्य प्रेम्णा यः उल्लासः तेनोल्लसितं यत् ललितं
क्रीड़ानृत्यं तेन आ-लालित-तनुः आ-लालिता संसेविता तनुः
यस्याः सा) प्रियप्रीत्यै (कान्तस्य प्रेमवर्द्धनाय)
उदितललितालंकृतियुता (उदितं प्रकाशितं ललितभावविशेषं,
तदेव अलङ्कारेण युता ललितालङ्कार-समन्विता) आसीत्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 194 ॥
लोभे आसिं कृष्ण करे कञ्चुकाकर्षण।
अन्तरे उल्लास, राधा करे निवारण ॥ 195 ॥
बाहिरे वामता-क्रोध, भितरे सुख मने।
'कुट्टमित'-नाम एइ भाव विभूषणे ॥ 196 ॥
अनुवाद-जब श्रीकृष्ण आगे आकर लोभसे श्रीराधाकी
कञ्चुकी (चोली) को खींचते हैं, तब यद्यपि उससे
श्रीराधाके हृदयमें उल्लास होता है, तथापि वे बाहरसे
श्रीकृष्णको ऐसा करनेसे मना करती हैं। श्रीराधा बाहरसे
वाम्यभाव और क्रोध प्रकट करती हैं और भीतरसे
अपने मनमें सुख अनुभव करती हैं। इसी भावरूपी
विभूषणका नाम 'कुट्टमित' है ॥ 195-196 ॥
अनुभाष्य- 'कञ्चुक'-चोली, कवच, अङ्गरखा,
वस्त्र ॥ 195 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव-प्रकरणमें (49 श्लोक)-
स्तनाधरादिग्रहणे हृत्प्रीतावपि सम्भ्रमात्।
बहिः क्रोधो व्यथितवत् प्रोक्तं कुट्टमितं बुधैः ॥ 197 ॥
। 553

[ 14/197-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चोली या मुखको ढकनेवाले
आञ्चलको स्पर्श करनेके समय हृदय प्रफुल्लित होनेपर
भी सम्भ्रमके कारण बाहरसे क्रोध और व्यथितकी भाँति
लक्षणोंको 'कुट्टमित' कहते हैं॥ 197 ॥
अनुभाष्य—
स्तनाधरादि-ग्रहणे (वक्षोगण्डस्थलोष्ठ-स्पर्शने) हृत्प्रीतौ (मनसि
लब्धे आनन्दे सति) अपि सम्भ्रमात् (लोक-गौरवात्) बहिः
(सखिदृष्टिपथे) व्यथितवत् (आर्त्तजनोचितः) क्रोधः (अर्थात्
अन्तः-सन्तोषाः बहिः-क्रोधः) [भवेत्]—इति बुधैः
(अलङ्कारशास्त्रविद्भिः) 'कुट्टमितं' प्रोक्तं (कथितम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197 ॥
कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण हय, करे पाणि-रोध।
अन्तरे आनन्द राधा, बाहिरे वाम्य-क्रोध॥ 198 ॥
व्यथा पाञा करे, येन शुष्क रोदन।
ईषत् हासिया कृष्णे करेन भर्त्सन॥ 199 ॥
अनुवाद—उनको स्पर्श करनेके लिये बढ़े श्रीकृष्णके
हाथोंको श्रीराधा रोकती तो हैं, परन्तु मन-ही-मनमें
सोचती हैं—'श्रीकृष्ण अपनी इच्छा पूर्ण कर लें'। इस
प्रकार श्रीराधा हृदयमें तो आनन्द अनुभव करती हैं,
परन्तु बाहरसे वामता (विरोध) और क्रोध प्रकट करती
हैं। श्रीराधा ऐसा प्रदर्शन करती हैं जैसे वे दुःखी हैं
और बिना आँसूके रोनेका अभिनय करती हैं। और
साथ ही मन्द मुस्कुराते हुए श्रीकृष्णको डाँट भी लगाती
है॥ 198-199 ॥
(गोस्वामीपाद द्वारा उक्त श्लोक) :—
पाणिरोधमविरोधितवाञ्छं
भर्त्सनाश्च मधुरस्मितगर्भाः।
माधवस्य कुरुते करभोरुर्हारि
शुष्करुदितञ्च मुखेऽपि॥ 200 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके हाथके द्वारा उन्हें
स्पर्श करनेकी चेष्टाको रोकनेकी इच्छा नहीं होनेपर भी
शिशु-हाथीकी सूंडके समान जंघावाली श्रीमती राधिका
श्रीकृष्णके हाथोंकी चेष्टाका विरोध करते हुए मधुर-मुस्कानके
साथ उनको डाँटने और मनोहर शुष्करोदन (रोनेका
दिखावा) करने लगीं॥ 200 ॥
अनुभाष्य—
करभोरुः (करिशावकशुण्डवत् ऊर्जितोरुदेशा राधिका) माधवस्य
अविरोधितवाञ्छं (न विरोधिता वाञ्छा यस्मिन् तत्) पाणिरोधं
(करस्पर्शनिवारणं), मधुरस्मित-गर्भाः (मधुरं मृदु स्मितं मन्दहास्यं
गर्भे येषां तथाभूताः) भर्त्सनाः, अपि च मुखे हारि-शुष्करुदितं
(कृष्णमनोहारि कपटरोदनं) कुरुते।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200 ॥
एइमत आर सब भाव-विभूषण।
याहाते भूषित राधा हरे कृष्ण मन॥ 201 ॥
अनुवाद—इस प्रकार और अनेक भावरूपी भूषण
हैं जिनसे विभूषित होकर श्रीराधा श्रीकृष्णका मन हरण
करती हैं॥ 201 ॥
अनुभाष्य—'हरे'—हरण अर्थात् आकर्षण करती
हैं॥ 201 ॥
सहस्र मुखोंसे भी शेषरूपी विष्णु
श्रीकृष्ण-लीला वर्णन करनेमें असमर्थ :—
अनन्त कृष्णेर लीला ना याय वर्णन।
आपने वर्णेन यदि 'सहस्रवदन'॥ 202 ॥
अनुवाद—यदि श्रीकृष्ण स्वयं अपने अंश 'सहस्र-वदन'
अर्थात् हजार मुखवाले शेषके द्वारा भी वर्णन करें, तो
भी उनकी अनन्त लीलाओंका वर्णन करना सम्भव
नहीं है॥ 202 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 21/10, 12 संख्या तथा भाः
2/7/41 और 10/14/7 श्लोक देखें॥ 202 ॥
554 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/203-211 ]
श्रीराधा-सेवक श्रीस्वरूप और श्रीलक्ष्मीनारायणके
सेवक श्रीवासका संलाप; श्रीवासको
अपनी ईश्वरीके ऐश्वर्यका गर्व :-
श्रीवास हासिया कहे, — 'शुन, दामोदर ।
आमार लक्ष्मीर देख सम्पत्ति विस्तर ॥ 203 ॥
वृन्दावनेर सम्पद् देख,—पुष्प-किसलय ।
गिरिधातु-शिखिपिच्छ-गुञ्जाफल-मय ॥ 204 ॥
अनुवाद—[नारदजीके भावमें आविष्ट होकर लक्ष्मीजीके ऐश्वर्यको देखकर] श्रीवासने हँसते हुए कहा,—'सुनो! दामोदर, इधर मेरी आराध्या लक्ष्मीकी अपार सम्पत्तिको देखो। और उधर वृन्दावनकी सम्पत्ति देखो—वहाँ तो केवल फूल, कोंपलें, गैरिक धातु, मोरपंख और गुञ्जाफल मात्र ही हैं [अर्थात् दोनोंमें तुलनाका कोई स्थान ही नहीं है] ॥ 203-204 ॥
अनुभाष्य—श्रीवास स्वयंको दास्यरसके ऐश्वर्यमें अवस्थित होनेका अभिमान करके श्रीदामोदर स्वरूपको ऐश्वर्यहीन 'व्रजवासी' समझकर प्रेमकलह कर रहे हैं॥ 203 ॥
श्रीकृष्णके व्रजगमन हेतु लक्ष्मीका क्रोध अभिमान :-
वृन्दावन देखिबारे गेला जगन्नाथ ।
शुनि' लक्ष्मीदेवीरे मने हैल आसोयाथ ॥ 205 ॥
एत सम्पत्ति छाड़ि' केने गेला वृन्दावन।
ताँरे हास्य करिते लक्ष्मी करिला साजन ॥ 206 ॥
'तोमार ठाकुर, देख एत सम्पत्ति छाड़ि' ।
पत्र-फल-फूल-लोभे गेला पुष्पबाड़ी ॥ 207 ॥
एइ कर्म करे काँहा विदग्ध-शिरोमणि ?
लक्ष्मीर अग्रेते निज प्रभुरे देह' आनि' ॥ '208 ॥
अनुवाद—'श्रीजगन्नाथ वृन्दावनको देखने गये हैं—यह सुनकर लक्ष्मीदेवीके मनमें निराशा होती है कि यहाँ इतनी सब सम्पत्तिको छोड़कर वे वृन्दावन क्यों गये हैं? श्रीजगन्नाथका उपहास करनेके लिये ही लक्ष्मीजीने सज-धजकर अपने ऐश्वर्यको दिखलाया। लक्ष्मीदेवीकी दासियोंने श्रीजगन्नाथके सेवकोंसे कहा,—'तुम्हारे ठाकुर (श्रीजगन्नाथ) इतनी सम्पत्तिको छोड़कर पत्र-फल-फूलके लोभसे पुष्पोद्यानमें गये हैं! विदग्ध-शिरोमणि होकर भी वे ऐसा कार्य क्यों करते हैं? शीघ्रतासे अपने प्रभुको लक्ष्मीजीके सामने लेकर आओ॥ '205-208 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'आसोयाथ'-असूयायुक्त, स्वल्प-ईर्ष्यायुक्त। लक्ष्मीजीकी दासियाँ कह रही हैं,—'ओहे जगद्-बन्धुके सेवकों! देखो, इतनी सम्पत्ति छोड़कर फल-पत्र-पुष्पके लोभसे तुम्हारे ठाकुर पुष्पोद्यानमें गये हैं। (अभी) लक्ष्मीदेवीके समक्ष अपने उन प्रभुको लेकर आओ॥ 205-208 ॥
अनुभाष्य—'आसोयार्थ'—अशान्ति, अस्वास्थ्य, चाञ्चल्य। 'तोमार ठाकुर'—श्रीजगन्नाथके सेवकोंको लक्ष्य करके लक्ष्मीकी दासियोंकी उक्ति। 'निज प्रभुरे'—श्रीजगन्नाथको॥ 205-208 ॥
लक्ष्मीकी दासियोंके द्वारा ईश्वरके दोषके भागीदार
सेवकोंका बन्धन और उन्हें दण्ड प्रदान :—
एत बलि' लक्ष्मीर सब दासीगणे।
कटि-वस्त्रे बान्धि' आने प्रभुर निजगणे ॥ 209 ॥
लक्ष्मीर चरणे आनि' कराय प्रणति ।
धन-दण्ड लय, आर कराय मिनति ॥ 210 ॥
रथेर उपरे करे दण्डेर ताड़न ।
चोरप्राय करे जगन्नाथेर सेवकगण ॥ 211 ॥
अनुवाद—यह कहकर महालक्ष्मीकी सभी दासियोंने श्रीजगन्नाथके सेवकोंको पकड़कर उनकी कमरमें वस्त्र बाँधकर उन्हें अपनी स्वामिनी श्रीलक्ष्मीके चरणोंमें गिराकर प्रणाम करवाया, दण्डके रूपमें उनसे धन लिया और उनसे क्षमा मँगवायी। और वे दासियाँ श्रीजगन्नाथके रथके ऊपर लाठियाँ बरसाने लगीं और श्रीजगन्नाथके सेवकोंका चोरकी भाँति तिरस्कार करने लगीं॥ 209-211 ॥
। 555

[ 14/209-224 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—दण्ड अर्थात् लाठीके द्वारा
गुण्डिचा मन्दिरके द्वारपर खड़े रथको पीटने लगीं ॥ 211 ॥
अनुभाष्य— 'प्रभुर'—श्रीजगन्नाथके ॥ 209 ॥
श्रीजगन्नाथको लौटाने हेतु सेवकोंकी प्रतिज्ञा :-
सब भृत्यगण कहे,—योड़ करि' हात।
'कालि आनि दिब तोमार आगे जगन्नाथ ॥ '212 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सभी सेवकोंने हाथ जोड़कर
कहा—'हम कल ही श्रीजगन्नाथको आपके सामने ले
आयेंगे ॥ '212 ॥
उसे सुनकर लक्ष्मीजीका क्रोध शान्त :-
तबे शान्त हञा लक्ष्मी याय निज घर।
आमार लक्ष्मीर सम्पद्—वाक्य-अगोचर ॥ 213 ॥
लक्ष्मीके ऐश्वर्यका वर्णनकर श्रीवासके
द्वारा स्वरूपका परिहास :-
दुग्ध आउटि' दधि मथे तोमार गोपीगणे।
आमार ठाकुराणी बैसे रत्नसिंहासने ॥ "214 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सेवकोंके मुखसे ऐसा सुनकर
शान्त होकर श्रीलक्ष्मी अपने महलमें चली गयीं।
[श्रीवास पण्डित कह रहे हैं-] मेरी लक्ष्मीदेवीकी
सम्पत्तिका वाणीसे वर्णन नहीं किया जा सकता। तुम्हारी
गोपियाँ तो दूध उबालने और [उसकी दही बनाकर]
दही मन्थनके कार्यमें ही लगी रहती हैं, परन्तु मेरी
ठाकुराणीतो रत्नसिंहासनपर विराजमान होती हैं॥ 213-214॥
अनुभाष्य— 'आउटि'—औटाकर या उबालकर ॥ 214 ॥
श्रीवासके वचन सुनकर महाप्रभुके
रागमार्गीय भक्तोंका हँसना :-
नारद-प्रकृति श्रीवास करे परिहास।
शुनि' हासे महाप्रभुर यत निज-दास ॥ 215 ॥
अनुवाद—नारदजीके भावमें श्रीवास पण्डित इस
प्रकार परिहास कर रहे थे। उनकी बातोंको सुनकर
महाप्रभुके सभी अन्तरङ्ग भक्त हँस रहे थे॥ 215 ॥
अनुभाष्य—'निज-दास'—श्रीराधागोविन्दकी सेवामें
एकनिष्ठ रागात्मिक भक्तिमें रत श्रीगदाधरादि महाप्रभुके
शक्तिवर्ग ॥ 215 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीवास और श्रीस्वरूपके
भजन-वैशिष्ट्यका वर्णन :-
प्रभु कहे,—"श्रीवास, तोमाते नारद-स्वभाव।
ऐश्वर्यभावे तोमाते, ईश्वर-प्रभाव ॥ 216 ॥
इँहो दामोदर-स्वरूप—शुद्ध-व्रजवासी।
ऐश्वर्य ना जाने इँहो शुद्धप्रेमे भासि' ॥ "217 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"श्रीवासजी, तुममें तो
नारदका स्वभाव है, इसलिये ऐश्वर्य भावमें तुम्हारे ऊपर
ईश्वरका प्रभाव हो रहा है। यह स्वरूप दामोदर तो
शुद्ध ब्रजवासी है, यह ऐश्वर्यको नहीं जानता, यह तो
शुद्धप्रेममें ही डूबा रहता है॥ "216-217 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा ब्रजके माधुर्यकी गरिमाका वर्णन :-
स्वरूप कहे,—"श्रीवास, शुन सावधाने।
वृन्दावन-सम्पद् तोमार नाहि पड़े मने? ॥ 218 ॥
महावैकुण्ठका ऐश्वर्य वृन्दावन-ऐश्वर्यका एक कणमात्र :-
वृन्दावने साहजिक ये सम्पत्सिन्धु।
द्वारका-वैकुण्ठ-सम्पत्-तार एक बिन्दु ॥ 219 ॥
श्रीकृष्णके वृन्दावन-धामका वर्णन :-
परम पुरुषोत्तम स्वयं भगवान्।
कृष्ण याँहा धनी, ताँहा वृन्दावन-धाम ॥ 220 ॥
चिन्तामणिमय भूमि रत्नेर भवन।
चिन्तामणिगण-दासी-चरण-भूषण ॥ 221 ॥
कल्पवृक्ष-लतार—याँहा साहजिक-वन।
पुष्प-फल बिना केह ना मागे अन्य धन ॥ 222 ॥
अनन्त कामधेनु ताँहा फिरे वने वने।
दुग्धमात्र देन, केह ना मागे अन्य धने ॥ 223 ॥
सहज लोकेर कथा—याँहा दिव्य-गीत।
सहज गमन करे,—यैछे नृत्य-प्रतीत ॥ 224 ॥
556 ।

प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति इस प्रकार है:

चौदहवाँ अध्याय 14/218-227 ]
सर्वत्र जल-याँहा अमृत-समान।
चिदानन्द ज्योतिः स्वाद्य-याँहा मूर्त्तिमान् ॥ 225 ॥
लक्ष्मी जिनि' गुण याँहा लक्ष्मीर समाज।
कृष्ण-वंशी करे याँहा प्रियसखी-काज ॥ 226 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,- "श्रीवासजी,
सावधानीपूर्वक सुनो। क्या वृन्दावनकी सम्पत्तिके विषयमें
भूल गये हो? वृन्दावनकी सहज सम्पत्ति महासागरकी
भाँति है और द्वारका-वैकुण्ठकी सम्पत्ति उसकी एक
बूँदके बराबर भी नहीं है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण परम
पुरुषोत्तम हैं और उनका समस्त ऐश्वर्य केवल
वृन्दावन-धाममें ही प्रकाशित होता है। श्रीवृन्दावनकी
भूमि चिन्तामणिसे बनी है, वहाँके भवन रत्नोंसे बने हैं।
वृन्दावनकी दासियाँ भी चिन्तामणिसे बने नूपुर अपने
चरणोंमें धारण करती हैं। वृन्दावन कल्पवृक्षों और
लताओंसे

[ 14/227-233 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्लोक-भावानुवाद—उस अप्राकृत भूमि वृन्दावनमें
परमपुरुष श्रीकृष्ण ही कान्त (अद्वितीय भोक्ता) हैं,
कान्ताएँ—व्रजकी लक्ष्मियाँ गोपियाँ हैं, कदम्बादि वृक्ष—सभी
कल्पवृक्ष (कृष्णप्रेमफल देनेवाले) हैं, समस्त भूमि ही
चिन्मय (रत्नपूर्ण, समस्त चिन्मय इच्छाओंको पूर्ण
करनेवाली) है, जल—अमृत है, बोलना—सङ्गीत है,
चलना—नृत्य है और श्रीकृष्णकी वंशी—प्रियसखी है
तथा सर्वत्र चिदानन्दज्योति अनुभव होती है। इसलिये
श्रीवृन्दावन ही परम आस्वाद्य है (वह सर्वथा जड़भावरहित
अप्राकृत और एकमात्र कृष्णके द्वारा भोग्य है—यह
अर्थ है)।
मध्यलीला 8/137 संख्यामें वृन्दावन-शब्दका अनुभाष्य
देखें ॥ 227 ॥
वृन्दावनके ऐश्वर्यका वर्णन :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/173)-उद्धृत बिल्वमङ्गल-वचन—
चिन्तामणिश्चरणभूषणमङ्गनानां
शृङ्गारपुष्पतरवस्तरवः सुराणाम्।
वृन्दावने व्रजधनं ननु कामधेनु-
वृन्द्वानि चेति सुखसिन्धुरहो विभूतिः ॥” 228 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 228 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवृन्दावनकी व्रजाङ्गनाओंके
चरणोंके भूषण ही चिन्तामणि हैं, लीला-अनुकूल समस्त
पुष्पवृक्ष ही कल्पवृक्ष (सुरतरु) और कामधेनु ही
व्रजका परम-धन है। इन सबके द्वारा श्रीवृन्दावनकी
विभूति परमानन्द-स्वरूपमें प्रकाशित हो रही है ॥ 228 ॥
अनुभाष्य—
वृन्दावने अङ्गनानां (गोपीनां) चरणभूषणं चिन्तामणिः [एव]
शृङ्गारपुष्पतरवः (शृङ्गारार्थं वेशविन्यासाय कुसुमविटपिनः) सुराणां
तरवः (कल्पद्रुमाः एव), कामधेनुवृन्द्वानि [एव] व्रजधनं
(गोकुलवासिनां धनं); अहो [वृन्दावनस्य] विभूतिः
(अतुलनीय-माहेश्वर्यमपि) सुखसिन्धुः (आनन्दामृतसमुद्रः एव)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 228 ॥
श्रीवासका परमानन्द :—
शुनि' प्रेमोवेशे नृत्य करे श्रीनिवास।
कक्षतालि बाजाय, करे अट्ट-अट्ट हास ॥ 229 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे वृन्दावनकी महिमा
श्रवणकर श्रीनिवास प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य करने
लगे और बगल बजाते हुए जोरसे अट्टहास करने
लगे॥ 229 ॥
श्रीराधाके रस-श्रवणसे महाप्रभुको भी आनन्द :—
राधार शुद्धरस प्रभु आवेशे शुनिल।
सेइ रसावेशे प्रभु नृत्य आरम्भिल ॥ 230 ॥
महाप्रभुका नृत्य और स्वरूपका गीत :—
रसावेशे प्रभुर नृत्य, स्वरूपेर गान।
'बल', 'बल' बलि' प्रभु पाते निज-काण ॥ 231 ॥
महाप्रभुकी प्रेम रूपी बाढ़में पुरी-धाम प्लावित :—
व्रजरस-गीत शुनि' प्रेम उथलिल।
पुरुषोत्तम-ग्राम प्रभु प्रेमे भासाइल ॥ 232 ॥
अनुवाद—श्रीराधाके शुद्धप्रेमरसके विषयमें सुनकर
महाप्रभुने उसी रसमें आविष्ट होकर नृत्य आरम्भ
किया। महाप्रभुके रसावेशमें नृत्यके साथ श्रीस्वरूप
दामोदर गान करने लगे,। तब महाप्रभु 'गान करते रहो',
'गान करते रहो', कहकर अपने कानोंको (हाथोंसे
खींचकर) फैला रहे थे। व्रजरसके गीतोंको सुनकर
महाप्रभुमें प्रेम उमड़ आया। इस प्रेमके द्वारा उन्होंने
श्रीपुरुषोत्तम-ग्राम (श्रीजगन्नाथ पुरी) क्षेत्रको डुबो
दिया॥ 230-232 ॥
दूसरे प्रहर तक महाप्रभुका नृत्य :—
लक्ष्मीदेवी यथाकाले गेला निज-घर।
प्रभु नृत्य करे, हैल द्वितीय प्रहर ॥ 233 ॥
अनुवाद—श्रीलक्ष्मीदेवी भी यथासमय अपने घर
नीलाचलमें चली गयीं। महाप्रभुके नृत्य करते हुए
द्वितीय प्रहरका समय हो आया ॥ 233 ॥
558 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/234-241 ]
चारों सम्प्रदायोंको ही कीर्त्तन करते हुए थकान :-
चारि-सम्प्रदाय गान करि' बहु श्रान्त हैल।
महाप्रभुर प्रेमावेश द्विगुण बाड़िल ॥ 234 ॥
अनुवाद-इतनी देरसे गान करते हुए भक्तोंकी चारों मण्डलियाँ बहुत थक गयीं, परन्तु महाप्रभुका प्रेमावेश बढ़कर दो गुणा हो गया ॥ 234 ॥
श्रीराधा-प्रेमावेशमें महाप्रभु :-
राधा-प्रेमावेशे प्रभु हैला सेइ मूर्त्ति।
नित्यानन्द दूरे देखि' करिलेन स्तुति ॥ 235 ॥
रसविरोध-भयसे दूरसे ही श्रीनिताइका महाप्रभुका स्तव :-
नित्यानन्द देखिया प्रभुर भावावेश।
निकटे ना आइसे, रहे किछु दूरदेश ॥ 236 ॥
श्रीनिताइके न आनेसे महाप्रभुका आवेश
और कीर्तन भी किसी प्रकारसे नहीं रुका :-
नित्यानन्द बिना प्रभुके धरे कोन् जन।
प्रभुर आवेश ना याय, ना रहे कीर्त्तन ॥ 237 ॥
अनुवाद-श्रीराधा-प्रेमावेशमें महाप्रभु भी वैसी राधा-मूर्ति हो गये। दूरसे महाप्रभुके राधा-रूपको देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उनकी स्तुति करने लगे। महाप्रभुको श्रीराधाके भावमें आविष्ट देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु निकट नहीं आये, कुछ दूरीपर ही रहे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त महाप्रभुको कोई पकड़ नहीं सकता था। महाप्रभुका आवेश दूर नहीं हो रहा था, इसलिये (भक्तोंके थके होनेपर भी) कीर्तन भी नहीं रुक रहा था ॥ 235-237 ॥
अनुभाष्य-'रहे'-रुके या विराम करे ॥ 237 ॥
श्रीस्वरूपके कौशलसे महाप्रभुकी बाह्यदशा :-
भङ्ग करि' स्वरूप सबार श्रम जानाइल।
भक्तगणेर श्रम देखि' प्रभुर बाह्य हैल ॥ 238 ॥
अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने इशारेसे महाप्रभुको बतलाया कि सब भक्त कीर्तन करते हुए थक गये हैं। भक्तोंके श्रमको देखकर महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये ॥ 238 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने राधाप्रेमावेशमें राधिका-मूर्ति प्रकाशित की है, ऐसा देखकर स्वयंको उस रसमें अनधिकारी जानकर श्रीनित्यानन्द प्रभु दूर ही रहे; श्रीस्वरूप गोस्वामीने इशारेसे महाप्रभुके भावावेशको भङ्ग कराया ॥ 235-238 ॥
उपवनमें जाकर सभीके द्वारा विश्राम करनेके बाद मध्याह्न-स्नान :-
सब भक्त लञा प्रभु गेला पुष्पोद्याने।
विश्राम करिया कैला मध्याह्न-स्नाने ॥ 239 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभु सभी भक्तोंको साथ लेकर पुष्पोद्यानमें चले गये। वहाँ कुछ देर विश्राम करके उन्होंने मध्याह्निक-स्नान किया ॥ 239 ॥
लक्ष्मी और जगन्नाथका बहुत प्रसाद-संग्रह :-
जगन्नाथेर प्रसाद आइल बहु उपहार।
लक्ष्मीरे प्रसाद आइल विविध प्रकार ॥ 240 ॥
भक्तोंके साथ प्रसाद सेवन; सन्ध्यामें स्नानके बाद श्रीजगन्नाथ-दर्शन :-
सबा लञा नाना-रङ्गे करिला भोजन।
सन्ध्या स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥ 241 ॥
अनुवाद-तब श्रीजगन्नाथको अर्पित भोगका उच्छिष्ट बहुतसा प्रसाद और लक्ष्मीजीको अर्पित अनेक प्रकारके भोगका प्रसाद आ गया। महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक भोजन किया। सन्ध्या स्नान करके महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये गये ॥ 240-241 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कोई-कोई कपटी (धर्मध्वजी भण्ड) व्यक्ति लक्ष्मीदेवीका प्रसाद पानेपर वितर्क करते हैं। यहाँ देखिये,-श्रीमहाप्रभुने स्वयं भक्तोंको लेकर उसी प्रसादको पाया था। तात्पर्य यह है कि लक्ष्मी आदि
। 559

[ 14/240-248 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
समस्त शक्तियाँ ही श्रीभगवान्‌की दासियाँ हैं। जब जो
भक्त उन्हें (शक्तियोंको) जो भी उत्तम वस्तु अर्पित
करता है, शक्तियाँ अपने प्रभु श्रीकृष्णको वह निवेदन
करके उन वस्तुओंका सेवन करती हैं। इसलिये
भगवान्‌के दास-दासियोंका प्रसादान्न 'भगवान्‌का प्रसादान्न'
ही है, ऐसा मानकर सर्वदा ही सेवनीय है। यहाँपर और
भी कुछ विचारणीय विषय रहता है;—मायावादी नास्तिकोंके
द्वारा निवेदित खाद्य द्रव्योंको भगवान्‌की शक्तियाँ ग्रहण
करती है या नहीं, यह घोर सन्देहका विषय है।
इसलिये भगवान्‌के दास-दासियोंके प्रति शुद्ध वैष्णवों
द्वारा अर्पित निवेदित अन्नका सेवन करना ही वैष्णवोंके
लिये उचित है॥ 240-241॥
आठ दिन तक श्रीजगन्नाथका दर्शन करते हुए
नृत्य-कीर्त्तनके बाद भक्तोंके साथ नरेन्द्र सरोवरमें
जलकेलि एवं उद्यानमें भोजन :—
जगन्नाथ देखि' करेन नर्त्तन-कीर्त्तन।
नरेन्द्र जलक्रीड़ा करे लञा भक्तगण ॥ 242 ॥
उद्याने आसिया कैल वन-भोजन।
एइमत क्रीड़ा कैल प्रभु अष्टदिन ॥ 243 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथका दर्शन करते ही महाप्रभुने
वहाँ नृत्य-कीर्तन आरम्भ किया। उसके बाद भक्तोंको
साथ लेकर महाप्रभुने नरेन्द्र सरोवरमें जल-क्रीड़ा की
और फिर उद्यानमें आकर वन-भोजन किया। इस
प्रकार महाप्रभु आठ दिनों तक ऐसी लीलाएँ करते
रहे॥ 242-243॥
श्रीजगन्नाथकी पुरीमें पुनर्यात्रा :—
आर दिने जगन्नाथेर भितर-विजय।
रथे चड़ि' जगन्नाथ चले निजालय ॥ 244 ॥
अनुवाद—अगले दिन गुण्डिचा मन्दिरमें श्रीजगन्नाथ
'भितर-विजय'के बाद रथपर चढ़कर अपने स्थान
नीलाचलकी ओर चले॥ 244॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भितर-विजय'—गुण्डिचा मन्दिरमें
रत्नवेदीसे जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा—इन तीनों
विग्रहोंको जगमोहनमें रखकर उन्हें एक ही समयमें
रथपर चढ़ाया जाता है। रत्नवेदीसे उतरकर वे
जगमोहनमें जितनी देर तक रहते हैं, उसीका नाम ही
'भितर-विजय' है॥ 244॥
अनुभाष्य—'भितर-विजय'—पुनर्यात्रामें श्रीमन्दिरके
(गुण्डिचा-मन्दिरके) अन्दर वापिस नीलाचल लौटनेके
लिये यात्रा। गुण्डिचा मन्दिरसे बाहरी विजय करके पुनः
जगन्नाथ मन्दिरकी ओर गमन॥ 244॥
पहलेकी भाँति नृत्य-गीत :—
पूर्ववत् कैल प्रभु लञा भक्तगण।
परम आनन्दे करेन नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ 245 ॥
अनुवाद—पहलेकी भाँति ही महाप्रभुने अपने भक्तोंको
साथ लेकर रथके आगे परमानन्दसे नृत्य-कीर्त्तन
किया॥ 245॥
पाहाण्डिके समय रेशमी डोरी आंशिक रूपसे छिन्न :—
जगन्नाथेर पुनः पाण्डु-विजय हइल।
एक गुटि पट्टडोरी ताँहा टूटि गेल ॥ 246 ॥
पाण्डुविजयेर तुली फाटि-फुटि याय।
जगन्नाथेर भरे तुला उड़िया पलाय ॥ 247 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथकी फिरसे पाण्डु-विजय हुई,
परन्तु अब उनके कमरमें बँधी हुई रेशमी डोरियोंमेंसे
डोरियोंका एक गुच्छा टूट गया। श्रीजगन्नाथकी पाण्डु
विजयके समय उन्हें थोड़ी-थोड़ी दूरीपर गद्दोंपर रखा
जाता है। इस बार कुछ डोरी टूट जानेसे श्रीजगन्नाथका
भार उन गद्दोंपर पड़ रहा था जिससे वे फटते जा रहे
थे और उनकी रुई उड़ती जा रही थी॥ 246-247॥
सपुत्र सत्यराजको प्रतिवर्ष श्रीजगन्नाथके
लिये रेशमी डोरी लानेका आदेश :—
कुलीनग्रामी रामानन्द, सत्यराज खाँन।
ताँरे आज्ञा दिल प्रभु करिया सम्मान ॥ 248 ॥
560 ।

चौदहवाँ अध्याय 14/248-257 ]
“एइ पट्टडोरीर तुमि हओ यजमान। अनुभाष्य-‘छिण्डा’ (उड़िया भाषा)'-टूटा हुआ
प्रतिवत्सर आनिबे 'डोरी' करिया निर्माण॥”249॥ टुकड़ा॥ 250 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कुलीनग्रामवासी श्रीरामानन्द वसु श्रीजगन्नाथके लिये रेशमी डोरी बनाकर
और श्रीसत्यराज खाँनको सम्मान देते हुए आज्ञा लानेकी सेवा प्राप्त करके दोनोंको आनन्द :-
दी,—“तुम रेशमी डोरीके यजमान बन जाओ और भाग्यवान् सेइ सत्यराज, रामानन्द।
प्रतिवर्ष नयी मजबूत रेशमी डोरियाँ बनाकर लाया सेवा-आज्ञा पाञा हैल परम-आनन्द ॥ 252 ॥
करना॥”248-249॥ तभीसे प्रतिवर्ष गुण्डिचामें उनके द्वारा
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन सब रेशमी डोरियोंके परमानन्दसे रेशमी डोरी लाना :-
द्वारा तीनों मूर्तियोंकी पाण्डुविजय होती है, वे सब प्रति वत्सर गुण्डिचाते भक्तगण-सङ्गे।
रस्सियाँ बहुत देशोंसे आती थीं और आती हैं। वर्द्धमान पट्टडोरी लञा आइसे अति बड़ रङ्गे ॥ 253 ॥
जिलेके अन्तर्गत कुलीनग्रामके निकटवर्ती अनेक ग्रामोंमें अनुवाद—श्रीसत्यराज खाँन और श्रीरामानन्द बड़े
रेशमी वस्त्र बनानेके स्थान हैं, इसलिये रेशमी डोरियाँ भाग्यवान् हैं जिन्होंने महाप्रभुसे सेवा-आज्ञा पायी। उस
लानेके लिये श्रीरामानन्द वसु और सत्यराज खाँनको आज्ञाको पाकर वे परम आनन्दित हुए। इसके बाद
महाप्रभुने यजमानके रूपमें नियुक्त किया॥ 249 ॥ प्रतिवर्ष गुण्डिचा-मन्दिर मार्जनके दिन वे बड़े उत्साहसे
भक्तोंके साथ रथके लिये मजबूत रेशमी डोरियाँ लेकर
मजबूत डोरी बनानेके लिये उदाहरण आते रहे॥ 252-253 ॥
स्वरूप टूटी हुई डोरी दिखाना :-
एत बलि' दिल ताँरे छिण्डा पट्टडोरी। श्रीजगन्नाथका रत्नबेदीपर आरोहण, महाप्रभुका
“इहा देखि' करिबे डोरी अति दृढ़ करि' ॥ 250 ॥ अपने भक्तोंके साथ घर जाना :-
श्रीजगन्नाथकी रेशमी डोरी-अनन्तरूपी तबे जगन्नाथ याइ' बसिला सिंहासने।
भगवान् विष्णुका ही अर्च्चा :- महाप्रभु घरे आइला लञा भक्तगणे ॥ 254 ॥
एइ पट्टडोरीते हय 'शेष'-अधिष्ठान।
दश-मूर्त्ति हञा येंहो सेवे भगवान्॥”251॥ अनुवाद—तब श्रीजगन्नाथ अपने सिंहासनपर जाकर
विराजमान हो गये और महाप्रभु भी अपने भक्तोंके साथ
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने उन्हें टूटी हुई अपने वासस्थानपर चले आये ॥ 254 ॥
रेशमी डोरियाँ पकड़ा दीं और कहा,-“इन्हें देखो। आप
इनसे बहुत अधिक मजबूत डोरियाँ बनाकर लाना। इन भक्तोंको हेरापञ्चमीका प्रदर्शन और ब्रजलीला :-
रेशमी डोरियोंमें 'शेष'का वास है जो दस-मूर्ति धारण एइमत भक्तगणे यात्रा देखाइल।
करके भगवान्की सेवा करते हैं॥”250-251॥ भक्तगण लञा वृन्दावन-केलि कैल ॥ 255 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'शेष'-अधिष्ठान'-अनन्तदेवका चैतन्य-गोसाञिर लीला-अनन्त, अपार।
अधिष्ठान; 'दशमूर्त्ति'-आदिलीला 5/123-124 संख्या 'सहस्र-वदन' यार नाहि पाय पार ॥ 256 ॥
देखें॥ 251 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चौदहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 257 ॥
। 561

[ 14/255-257 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे 'हेरापञ्चमी'- करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन
यात्रा-दर्शनं नाम चतुर्द्दश-परिच्छेदः। कर रहा है॥255-257॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने भक्तोंको श्रीजगन्नाथ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें 'हेरा-पञ्चमी'-यात्रा-दर्शन
रथ-यात्राका दर्शन करवाया और भक्तोंको लेकर नामक चौदहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
वृन्दावनकी लीलाएँ करके उनका आस्वादन किया। अनुभाष्य—आदिलीला 10/162-163 और 17/231
श्रीचैतन्य गोसाईंकी लीलाएँ अनन्त, अपार हैं, हजार संख्या देखें॥ 256॥
मुखवाले शेष भी उन लीलाओंका पार नहीं पा सकते। चौदहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा
मध्यलीलाका प्रथम भाग समाप्त।
562 ।

श्लोक सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण]

अ
अखिलरसामृतमूर्तिः प्रसृमर ८/१४१
अघानां लवित्री जगत्क्षेम ३/२८
अतो हेतोरहेतोश्च ८/११०, १४/१६३
अत्युद्दण्डं ताण्डवं गौरचन्द्रः ११/१
अदर्शनीयानपि नीच ११/४७
अद्वैतवीथीपथिकैरुपस्याः १०/१७८
अनयाराधितो नूनं भगवान् ८/९९
अनाथबन्धो करुणैक २/५८
अनादिरादिर्गोविन्दः ८/१३६
अन्तःस्मेरतयोज्ज्वला १४/१८०
अन्यो वेद न चान्यदुःखं २/१८
अपरिकलितपूर्वः ८/१४८
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं ६/१६५
अमून्यधन्यानि दिन २/५८
अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य ८/१४८
अयि दीनदयार्द्रनाथ ४/१९७
अर्चनं वन्दनं दास्यं ९/२५९
अविद्या कर्मसंज्ञान्या ६/१५४, ८/१५२
अहङ्कार इतीयं मे ६/१६४
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं ३/६
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो ८/६३, ९/२६५
अहेरिव गतिः ८/११०, १४/१६३
अहो बत श्वपचोऽतो ११/१९२
अहो भाग्यमहो भाग्यं ६/१४९

आ
आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां ११/११
आज्ञायैवं गुणान् ८/६२, ९/२६४
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था ६/१८६
आदरः परिचर्यायां ११/२९
आनन्दचिन्मयरसप्रति ८/१६२
आराधनानां सर्वेषां ११/३१
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे ६/२५५
आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि ९/१५०
आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य ६/१०१
आहुश्च ते नलिन १/८१, १३/१३६

इ
इतस्ततस्तामनुसृत्य ८/१०६
इति द्वापर उर्वीश ६/१०२
इति पुंसार्पिता विष्णौ ९/२६०
इति रामपदेनासौ परं ९/२९
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या ८/७५
इत्युद्धवादयोऽप्येतं ८/२१५
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं ९/१४३

ई
ईश्वरः परमः कृष्णः ८/१३६

उ
उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्व ८/६

ए
एकावृत्त्या तु कृष्णस्य ९/३३
एतां समास्थाय परात्म ३/६
एते चांशकलाः पुंसः ९/१४३
एवंव्रतः स्वप्रियनाम-कीर्त्या ९/२६२
एवं शशाङ्कांशुविराजिता १४/१५८

क
कंसारिरपि संसारवासना ८/१०५
कइअवरहिअं पेम्मं ण २/४२
कथा गानं नाट्यं गमन १४/२२७
कदाहमैकान्तिकनित्य १/२०६, ८/७३
कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपी १/५
कलावतीर्णावनेर्भरासुरान् ८/१४५
कलित-श्यामा-ललितो ८/१४१
कलौ नास्त्येव नास्त्येव ६/२४२
कस्यानुभावोऽस्य ८/१४६, ९/११४
का कृष्णस्य प्रणयजनिभूः ८/१८१
कालाग्नष्टं भक्तियोगं निजं ६/२५५
किन्तु प्रोद्यान्निखिल १३/८०
कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्म ६/१०८
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्ति ६/१८६
कृतानुतापः स कलिन्द ८/१०६
कृपारिणा विमुच्यैतान् ९/१
कृषिर्भूवाचकः शब्दो ९/३०
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! ७/९६
कृष्ण! केशव! ७/९६, ९/१३
कृष्णभक्तिरसभाविता ८/७०
कृष्णवर्णं त्विषाऽ ६/१०३, ११/१००
केशरीव स्वपोतानाम ८/६
क्रियते भगवत्यद्धा ९/२६०
क्वाहं दरिद्रः पापीयान् ७/१४३

ग
गतिस्थानासनादीनां १४/१८७

563

[ गर्वा–पाणि ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

गर्वाभिलाषरुदितस्मित 14/174
गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दन 9/150
गोलोक एव निवसत्य 8/162
गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ 1/2
गौरः पश्यन्नात्मवृन्दैः 14/1
गौरस्य कृष्णविच्छेदप्रलाप 2/1
गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णे 8/1

च
चलत्तारं स्फारं नयन 14/189
चित्राय स्वयमन्वयञ्जयदिह 8/194
चिदानन्दभानोः सदा 3/28
चिन्तामणिश्चरणभूषण 14/228

ज
जइ होइ कस्स विरहो 2/42
जगद्धिताय कृष्णाय 13/77
जन्माद्यस्य यतोऽन्वय 8/265
जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम 1/3
जयति जननिवासो देवकी 13/79
जयति जयति देवो 13/78
जयति जयति मेघश्यामलः 13/78
जानाति तत्त्वं 6/84, 11/104
जीवभूतां महाबाहो ययेदं 6/165
जैह्रयं केशे दृशि 8/181

ज्ञ
ज्ञानिनाञ्चात्मभूतानां 8/226, 9/132
ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त 8/67

त
तं वन्दे गौरजलदं 10/1
तत् किं करोमि विरलं 2/61
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो 6/261
तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं 8/70
तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान् 8/94

तत्रास्माभिश्चटुलपशूपी 1/84
तथापि ते देव 6/84, 11/104
तथाप्यन्तः खेलन्मधुर 1/76
तद्वक्षोरुहचित्रकेलि 8/189
तमेवास्वादयत्यन्त 1/211
तया तिरोहितत्वाच्च 6/156
तयोरप्युभयोर्मध्ये 8/160
तयोरैक्यं परं ब्रह्म 9/30
तव कथामृतं तप्तजीवनं 14/13
तस्मात् परतरं देवि 11/31
तस्य तीर्थपदः किंवा 8/72
तां जहार दशग्रीवः 9/211
तात्कालिकं तु वैशिष्ट्यं 14/187
तावत् कर्माणि कुर्वीत 9/266
तासामाविरभूच्छौरिः 8/81,139
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि 10/12
तेजोवारिमृदां यथा 8/265
ते दुस्तरामतितरन्ति च 6/235
तेनाटवीमटसि तद् व्यथते 8/218
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः 11/192
त्वच्छैशवं त्रिभुवन 2/61
त्वयपि लब्धं 11/151

द
दिष्ट्या यदासी 8/89, 13/160
दीयमानं न गृह्णन्ति 6/270, 9/268
दीव्यद् वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः 1/4
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा 11/32
देशं ययौ विप्रकृतेऽद्भूतेऽहं 5/1
द्विजात्मजा मे युवयोर्दि 8/145

ध
धन्यं तं नौमि चैतन्यं 7/1
धर्मान् संत्यज्य यः 8/62, 9/264

न
न देशनियमस्तत्र न 6/226
नन्दः किमकरोद्ब्रह्मन् 8/77
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां 8/92
न प्रेमगन्धोऽस्ति दरापि 2/45
न मृषा परमार्थमेव मे 1/203
नमो ब्रह्मण्यदेवाय 13/77
नष्टकुष्ठं रूपपुष्टं भक्ति 7/1
नानातन्त्रविधानेन कला 6/102
नानाभावालङ्कृताङ्गः 11/1
नानामतग्राहग्रस्तान 9/1
नानोपचार–कृतपूजनम 8/69
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त 8/80, 8/231, 9/121
नायं सुखापो 8/226, 9/132
नारायणपराः सर्वे न 9/270
नाहं विप्रो न च 13/80
निःश्रेयसाय भगवन्तान्यथा 8/40
निभृतरुन्मनो 8/223, 9/123
निमज्जतोऽनन्त भवा 11/151
निर्विचारं गुरोराज्ञा मया 10/146
निश्चिन्तो धीरललितः 8/187
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनो 11/8
नेमं विरिञ्चो न भवो 8/78
नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां 9/269
नौमि तं गौरचन्द्रं यः 6/1
न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ 3/1

प
पद्भ्यां चलन् यः प्रतिमा 5/1
परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि 1/211
परिहारेऽपि लज्जा मे किं 1/190
परीक्षा–समये वह्निं 9/212
पाणिरोधमविरोधितवाञ्छं 14/200

564 |

श्लोक सूची पाषाण-वज्राद ]
पाषाणशुष्केन्धनभारकाण्यहो 2/28 | मद्भक्तपूजाभ्यधिका 11/29 | यशोदा वा महाभागा पपौ 8/77
पीडाभिर्नवकालकूट 2/52 | मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते 11/28 | यस्मै दातुं चोरयन् क्षीर 4/1
पीताम्बरधरः स्रग्वी 8/81, 8/139 | मध्ये मणीनां हेमानां 8/94 | यस्य प्रसादादज्ञोऽपि सद्यः 1/1
पुनर्यस्मिन्नेष क्षणमपि 2/36 | मयि भक्तिर्हि 8/89, 13/160 | या ते लीलारसपरिमल 1/84
पुरः कृष्णालोकात् स्थगित 14/189 | मयैव विहितं देवि कलौ 6/182 | या माभजन दुर्जय-गेह 8/92
प्रणतभारविटपा 8/275 | मय्यर्पणञ्च मनसः 11/30 | या या श्रुतिर्जल्पति 6/142
प्रत्यगृहीदग्रजशासनं 10/145 | महद्विचलनं नृणां गृहिणां 8/40 | यावत् क्षुदस्ति जठरे 8/69
प्रवहति रसपुष्टिं छिद्रिभूती 8/205 | महाभावस्वरूपेयं 8/160 | युक्तञ्च सन्ति सर्वत्र 6/109
प्रसादं लेभिरे गोपी यत्तत् 8/78 | माश्व गोपय येन स्यात् 6/181 | येनासीज्जगतां चित्रं 13/1
प्राप्तमन्त्रं द्रुतं शिष्टै 6/226 | माधवस्य कुरुते कर 14/200 | ये मे भक्तजनाः पार्थ 11/28
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं 6/225 | मायां मदीयमुद्गृह्य वदतां 6/109 | येषां स एष भगवान् 6/235
प्रियः सोऽयं कृष्णः 1/76 | मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं 6/182 | यो दुस्त्यजान् क्षितिसुत 9/269
प्रिय-प्रेमोल्लासोल्लसित 14/194 | मायाश्रितानां नरदारकेण 8/75 | र
प्रेमच्छेदरुजोऽवगच्छति 2/18 | मारः स्वयं नु मधुर 2/74 | रतिर्वासनया स्वाद्वी भासते 8/84
प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो 2/52 | य | रथारूढस्यारादधिपदवि 13/207
प्रेमैव गोपरामाणां काम 8/215 | यः कौमारहरः स 1/58, 13/121 | रमन्ते योगिनोऽनन्ते 9/29
ब | यच्छक्तयो वदतां वादिनां 6/108 | रसेनोत्कृष्यते कृष्ण 9/117, 9/146
बहिः क्रोधो व्यथितवत् 14/197 | यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायै 6/103, 11/100 | राढे भ्रमन् शान्तिपुरी 3/1
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां 7/143 | यत् करोषि यदश्नासि 8/60 | राधामाधाय हृदये तत्याज 8/105
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न 8/65 | यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं 8/218 | राधायाः किलकिञ्चिता 14/181
| यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् 8/60 | राधाया भवतश्च चित्त 8/194
भ | यत्रोपगीयते नित्यं देव 11/32 | राम! राघव ! 7/96, 9/13
भवद्विधा भागवत 10/12 | यथा राधा प्रिया विष्णो 8/98 | राम रामेति रामेति 9/32
भवन्तमेवानुचर 1/206, 8/73 | यथाहेर्मनसः क्षोभस्तथा 11/11 | रासोत्सवोऽस्य भुजदण्ड 8/80,
भूतानि भगवत्यात्मन्येष 8/274 | यथोत्तरमसौ स्वाद 8/84 | 8/231, 9/121
भूमिरापोऽनलो वायुः खं 6/164 | यदा यस्यानुगृह्णाति 11/118 | रुद्धायाः पथि माधवेन 14/180
म | यदा यातो दैवान्मधुरिपुरसौ 2/36 | रूपभेदमवाप्नोति ध्यान 9/157
मणियंथा विभागेन 9/157 | यदि मे न दयिष्यसे तदा 1/203 | ल
मत्कथा श्रवणादौ वा 9/266 | यद्वाञ्छया श्री 8/146, 9/114 | लोकोत्तराणां चेतांसि को 7/73
मत्तुल्यो नास्ति पापात्मा 1/190 | यन्नामश्रुतिमात्रेण पुमान् 8/72 | व
मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ 1/3 | यन्नो विहाय गोविन्दः 8/99 | वंशीविलास्याननलोकनं 2/45
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा 11/30 | यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं 6/149 | वज्रादपि कठोराणि मृदूनि 7/73
मदेकवर्जं कृपयिष्यतीति 11/47 | यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा 6/155 |
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[ वन-ह्लादिनी श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
वनलतास्तरव आत्मनि 8/275 | श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी 6/254 | सा चैवास्मि तथापि 1/58, 13/121
वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य 1/2 | श्रीकृष्णरूपादिनिषेवणं 2/28 | सार्वभौमं सर्वभूमा भक्ति 6/1
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण 8/58 | श्रीगुण्डिचा-मन्दिरमात्मवृन्दैः 12/1 | सालोक्य-सार्ष्टि 6/270, 9/268
विचारयोगे सति हन्त 6/142 | श्रीगोपालः प्रादुरासीद्वशः 4/1 | सिक्तायां कृष्णलीलामृतरस 8/210
वह्निः सीतां समानीय 9/212 | श्रीमान्रासरसारम्भी वंशी 1/5 | सिद्धान्तस्त्वभेदेऽपि 9/117, 146
वाचा सूचितशर्वरीरतिकला 8/189 | श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ 1/4 | सिषेव आत्मन्यवरुद्ध 14/158
वाष्पव्याकुलितारुण 14/181 | श्रुत्वा गोपीरसोल्लासं हृष्टः 14/1 | सीतयाराधितो वह्निशछाया 9/211
विचारयोगे सति हन्त 6/142 | श्रेयो ह्येवं भवत्याश्च 10/146 | सुकुमारा भवेद्यत्र ललितं 14/192
विच्छेदावग्रहम्लान 10/1 | स | सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो 6/104, 10/170
विच्छेदेऽस्मिन् प्रभोरन्त्य 2/1 | संसारकूपपतितो 1/81, 13/136 | स्तनाधरादिग्रहणे हृत्प्रीत 14/197
विदग्धो नवतारुण्यः 8/187 | संसारतापानखिलान् 6/155 | स्त्रिय उरगेन्द्रभोग 8/223, 9/123
विन्यासभङ्गिरङ्गानां 14/192 | सख्यः श्रीराधिकाया 8/210 | स्थानस्थिताः श्रुतिगतां 8/67
विभुरपि सुखरूपः 8/205 | सङ्गीकरणं हर्षादुच्यते 14/174 | स्थिरचरवृजिनघ्नः सुस्मित 13/79
विश्लेषामनुरञ्नेन जन 8/143 | सञ्चार्य रामाभिध-भक्त 8/1 | स्वचित्तवच्छीतलममुज्ज्वल 12/1
विष्णुराराध्यते पन्था 8/58 | स जहाति मतिं लोके 11/118 | स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरी 8/143
विष्णुशक्तिः परा 6/154, 8/152 | स जीयात् कृष्णचैतन्यः 13/1 | स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि 9/270
वृन्दावने व्रजधनं ननु 14/228 | सन्दर्शनं विषयाणामथ 11/8 | स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च 6/181
वेणीमृजो नु मम 2/74 | संन्यासकृच्छ्रमः 6/104, 10/170 | ह
वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग 6/254 | समः सर्वेषु भूतेषु 8/65 | हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव 6/242
श | सर्वगोपीषु सैवैका 8/98 | हसत्यथो रोदिति रौति 9/262
शठेन केनापि वयं हठेन 10/178 | सर्वधर्मान् परित्यज्य 8/63, 9/265 | हृदयं त्वदलोककातरं 4/197
शश्वद्भक्तिविनोदया समदया 10/119 | सर्वभूतेषु भूपाल 6/156 | हृद्वाग्वपुभिर्विदधन्नमस्ते 6/261
शुक्लो रक्तस्तथा पीत 6/101 | सर्वभूतेषु यः पश्येद्ध 8/274 | हे देव, हे दयित 2/65
शुष्कं पर्युषितं वापि 6/225 | स शुश्रूवान्मातरि भार्गवेण 10/145 | हे नाथ, हे रमण 2/65
श्र | स श्रीचैतन्यदेवो मे 1/1 | हेलोद्बूलित-खेदया 10/119
श्रवणं कीर्त्तनं विष्णोः 9/259 | सहर्षं गायद्भिः परिवृत 13/207 | हिया तिर्यग्-ग्रीवा 14/194
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं 14/13 | सहस्रनामभिस्तुल्यं राम 9/32 | ह्लादतापकरी मिश्रा 6/157, 8/155
श्रियः कान्ताः कान्तः 14/227 | सहस्रनाम्नां पुण्यानां 9/33 | ह्लादिनी सन्धिनी 6/157, 8/155
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