श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1400, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/209-224 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—दण्ड अर्थात् लाठीके द्वारा
गुण्डिचा मन्दिरके द्वारपर खड़े रथको पीटने लगीं ॥ 211 ॥
अनुभाष्य— 'प्रभुर'—श्रीजगन्नाथके ॥ 209 ॥
श्रीजगन्नाथको लौटाने हेतु सेवकोंकी प्रतिज्ञा :-
सब भृत्यगण कहे,—योड़ करि' हात।
'कालि आनि दिब तोमार आगे जगन्नाथ ॥ '212 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सभी सेवकोंने हाथ जोड़कर
कहा—'हम कल ही श्रीजगन्नाथको आपके सामने ले
आयेंगे ॥ '212 ॥
उसे सुनकर लक्ष्मीजीका क्रोध शान्त :-
तबे शान्त हञा लक्ष्मी याय निज घर।
आमार लक्ष्मीर सम्पद्—वाक्य-अगोचर ॥ 213 ॥
लक्ष्मीके ऐश्वर्यका वर्णनकर श्रीवासके
द्वारा स्वरूपका परिहास :-
दुग्ध आउटि' दधि मथे तोमार गोपीगणे।
आमार ठाकुराणी बैसे रत्नसिंहासने ॥ "214 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथके सेवकोंके मुखसे ऐसा सुनकर
शान्त होकर श्रीलक्ष्मी अपने महलमें चली गयीं।
[श्रीवास पण्डित कह रहे हैं-] मेरी लक्ष्मीदेवीकी
सम्पत्तिका वाणीसे वर्णन नहीं किया जा सकता। तुम्हारी
गोपियाँ तो दूध उबालने और [उसकी दही बनाकर]
दही मन्थनके कार्यमें ही लगी रहती हैं, परन्तु मेरी
ठाकुराणीतो रत्नसिंहासनपर विराजमान होती हैं॥ 213-214॥
अनुभाष्य— 'आउटि'—औटाकर या उबालकर ॥ 214 ॥
श्रीवासके वचन सुनकर महाप्रभुके
रागमार्गीय भक्तोंका हँसना :-
नारद-प्रकृति श्रीवास करे परिहास।
शुनि' हासे महाप्रभुर यत निज-दास ॥ 215 ॥
अनुवाद—नारदजीके भावमें श्रीवास पण्डित इस
प्रकार परिहास कर रहे थे। उनकी बातोंको सुनकर
महाप्रभुके सभी अन्तरङ्ग भक्त हँस रहे थे॥ 215 ॥
अनुभाष्य—'निज-दास'—श्रीराधागोविन्दकी सेवामें
एकनिष्ठ रागात्मिक भक्तिमें रत श्रीगदाधरादि महाप्रभुके
शक्तिवर्ग ॥ 215 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीवास और श्रीस्वरूपके
भजन-वैशिष्ट्यका वर्णन :-
प्रभु कहे,—"श्रीवास, तोमाते नारद-स्वभाव।
ऐश्वर्यभावे तोमाते, ईश्वर-प्रभाव ॥ 216 ॥
इँहो दामोदर-स्वरूप—शुद्ध-व्रजवासी।
ऐश्वर्य ना जाने इँहो शुद्धप्रेमे भासि' ॥ "217 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"श्रीवासजी, तुममें तो
नारदका स्वभाव है, इसलिये ऐश्वर्य भावमें तुम्हारे ऊपर
ईश्वरका प्रभाव हो रहा है। यह स्वरूप दामोदर तो
शुद्ध ब्रजवासी है, यह ऐश्वर्यको नहीं जानता, यह तो
शुद्धप्रेममें ही डूबा रहता है॥ "216-217 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा ब्रजके माधुर्यकी गरिमाका वर्णन :-
स्वरूप कहे,—"श्रीवास, शुन सावधाने।
वृन्दावन-सम्पद् तोमार नाहि पड़े मने? ॥ 218 ॥
महावैकुण्ठका ऐश्वर्य वृन्दावन-ऐश्वर्यका एक कणमात्र :-
वृन्दावने साहजिक ये सम्पत्सिन्धु।
द्वारका-वैकुण्ठ-सम्पत्-तार एक बिन्दु ॥ 219 ॥
श्रीकृष्णके वृन्दावन-धामका वर्णन :-
परम पुरुषोत्तम स्वयं भगवान्।
कृष्ण याँहा धनी, ताँहा वृन्दावन-धाम ॥ 220 ॥
चिन्तामणिमय भूमि रत्नेर भवन।
चिन्तामणिगण-दासी-चरण-भूषण ॥ 221 ॥
कल्पवृक्ष-लतार—याँहा साहजिक-वन।
पुष्प-फल बिना केह ना मागे अन्य धन ॥ 222 ॥
अनन्त कामधेनु ताँहा फिरे वने वने।
दुग्धमात्र देन, केह ना मागे अन्य धने ॥ 223 ॥
सहज लोकेर कथा—याँहा दिव्य-गीत।
सहज गमन करे,—यैछे नृत्य-प्रतीत ॥ 224 ॥
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