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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1397, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1397

चौदहवाँ अध्याय 14/190-197 ]
अङ्ग'-गर्दन, कमर और चरण (अथवा घुटना)। 'हय
उद्गार'-फूटकर बाहर आता है ॥ 190-191 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभावकथनमें (56 श्लोक) :-
विन्यासभङ्गिरङ्गानां भ्रूविलासमनोहरा।
सुकुमारा भवेद्यत्र ललितं तदुदाहृतम् ॥ 192 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जहाँ (अर्थात् जिन चेष्टाओंसे)
अङ्गोंकी विन्यासभङ्गि और भौंहोंका विलास मनोहर
और सुकुमार होता है, वहीं 'ललित-अलङ्कार' कहा
जाता है ॥ 192 ॥
अनुभाष्य-
यत्र अङ्गानां सुकुमारा (अतिकोमलो) विन्यासभङ्गिः
(रचना-चातुरी) भ्रूविलास-मनोहरा भवेत्, तत् 'ललितम्' इति
उदाहृतम्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥
ललितभूषित राधा देखे यदि कृष्ण।
दुँहे दुँहा मिलिबारे हयेन सतृष्ण ॥ 193 ॥
अनुवाद-जब श्रीकृष्ण इन ललित-अलङ्कारोंसे
भूषित श्रीराधाको देखते हैं, तब दोनों एक-दूसरेसे
मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो जाते हैं ॥ 193 ॥
गोविन्दलीलामृतमें (9/14 श्लोक)-
ह्रिया तिर्यग्-ग्रीवा-चरण-कटि-भङ्गी-सुमधुरा
चलच्चिल्ली-वल्ली-दलित-रतिनाथोर्जित-धनुः।
प्रिय-प्रेमोल्लासोल्लसित-ललितालालित-तनुः
प्रियप्रीत्यै सासीदुदितललितालंकृतियुता ॥ 194 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 194 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णकी प्रीति वर्धित करनेके
लिये जब श्रीराधिका ललित-अलङ्कारसे भूषित हुई थी,
तब लज्जासे उनकी गर्दनके वक्रभाव, चरण और
कमरकी सुमधुर भङ्गिमा, भ्रूलताकी चञ्चलतासे कामदेवके
तेजस्वी धनुषकी भी पराजय और प्रियतमके प्रति
प्रेमोल्लासमें उल्लसित ललित-भावसे पुष्ट श्रीअङ्ग
लक्षित होने लगे ॥ 194 ॥
अनुभाष्य-
सा (राधा) ह्रिया (लज्जया) तिर्यग् ग्रीवा-चरण-कटि-
भङ्गीसुमधुरा (तिर्यग्भावेन सुष्ठु-विन्यस्त-कन्धर-जानु-कटीभ्यङ्ग-
त्रयेण भङ्गया सुमधुरा कृष्णमनोहरा) चलच्चिल्लीवल्ली-
दलित-रतिनाथोर्जित-धनुः (चलन्ती कम्पनवती चिल्लीभ्रूः
चिल्ली-पक्षिणीव भ्रूः क्लिन्नाक्षी वा, सा एव वल्ली लता,
तया दलितः विजितः रतिनाथस्य कामदेवस्य उर्जितं धनुः यया
सा) प्रियप्रेमोल्लासोल्लसित-ललितालालित-तनुः (प्रियस्य कान्तस्य
कृष्णस्य प्रेम्णा यः उल्लासः तेनोल्लसितं यत् ललितं
क्रीड़ानृत्यं तेन आ-लालित-तनुः आ-लालिता संसेविता तनुः
यस्याः सा) प्रियप्रीत्यै (कान्तस्य प्रेमवर्द्धनाय)
उदितललितालंकृतियुता (उदितं प्रकाशितं ललितभावविशेषं,
तदेव अलङ्कारेण युता ललितालङ्कार-समन्विता) आसीत्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 194 ॥
लोभे आसिं कृष्ण करे कञ्चुकाकर्षण।
अन्तरे उल्लास, राधा करे निवारण ॥ 195 ॥
बाहिरे वामता-क्रोध, भितरे सुख मने।
'कुट्टमित'-नाम एइ भाव विभूषणे ॥ 196 ॥
अनुवाद-जब श्रीकृष्ण आगे आकर लोभसे श्रीराधाकी
कञ्चुकी (चोली) को खींचते हैं, तब यद्यपि उससे
श्रीराधाके हृदयमें उल्लास होता है, तथापि वे बाहरसे
श्रीकृष्णको ऐसा करनेसे मना करती हैं। श्रीराधा बाहरसे
वाम्यभाव और क्रोध प्रकट करती हैं और भीतरसे
अपने मनमें सुख अनुभव करती हैं। इसी भावरूपी
विभूषणका नाम 'कुट्टमित' है ॥ 195-196 ॥
अनुभाष्य- 'कञ्चुक'-चोली, कवच, अङ्गरखा,
वस्त्र ॥ 195 ॥
उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव-प्रकरणमें (49 श्लोक)-
स्तनाधरादिग्रहणे हृत्प्रीतावपि सम्भ्रमात्।
बहिः क्रोधो व्यथितवत् प्रोक्तं कुट्टमितं बुधैः ॥ 197 ॥
। 553