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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1395

चौदहवाँ अध्याय 14/180-184 ]
मिलित, हर्षजनित 'किलकिञ्चित' भावोत्थित दृष्टि तुम्हारा
मङ्गलविधान करे। दानघाटीके पथपर श्रीकृष्णने आकर
जब राधाजीको रोका, तब राधाजीके अन्तःकरणमें
हँसीका उदय हुआ; तब उनके नयन उज्ज्वल हो गये;
नेत्रोंकी पलकें नव-उदित अश्रुओंसें भर गयीं; नेत्रोंके
दोनों कोने कुछ लाल रङ्गके हो गये; रसके उच्छ्वास-हेतु
नेत्रोंमें उत्साह उदित हुआ; नयनाश्रु कुछ बन्द होने लगे
और दोनों नयनोंकी पुतली अति सुन्दर रूपसे ऊपर
हो गयीं ॥ 180 ॥
अनुभाष्य-
पथि (दानघट्टमार्गे) माधवेन (शुल्क-ग्रहणच्छलेन) रुद्धायाः
राधायाः अन्तःस्मेरतया (अन्तः अव्यक्तया स्मेरतया
ईषद्व्रास्ययुक्ततया) उज्ज्वला (दीप्तिविशिष्टा इति 'स्मितं'),
जलकणव्याकीर्णपक्ष्माङ्कुरा (जलकणैः व्याकीर्णाः विक्षिप्ताः
पक्ष्माङ्कुराः नेत्रलोमाग्रभागाः यस्याः सा इति 'रोदनं'),
किञ्चित्पाटलिताञ्चला (श्वेतरक्ताभनयनप्रान्तदेशा, श्वेतिमा स्वाभाविक
एव, रक्तिमा क्रोधात् इति 'क्रोधः'), रसिकतोत्सिक्ता (रसिकतया
उत्कर्षेण सिक्ता इति 'गर्वः' 'अभिलाषः' वा), पुरः (अग्रतः)
एव कुञ्चती (इति 'भयं'), मधुर-व्याभुग्नतारोत्तरा (मधुरा
व्याभुग्ना वक्रा या नयनतारा तया उत्तरा श्रेष्ठा इति
'अभिलाषः' 'गर्वः' 'असूया' वा), किलकिञ्चितस्तबकिनी
(किलकिञ्चितरूपो यः स्तबकः गाम्भीर्यमयत्वादस्फुटः भावविशेषः
नानाभावपुष्पगुच्छः तद्वती) दृष्टिः वः (युष्माकं) श्रियं क्रियात्।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 180 ॥
गोविन्दलीलामृतमें (9/18 श्लोक) :-
वाष्पव्याकुलितारुणाञ्चलचलन्नेत्रं रसोल्लासितं
हेलोल्लासचलाधरं कुटिलभ्रूयुग्मुद्यत्स्मितम्।
राधायाः किलकिञ्चिताञ्चितमसौ वीक्ष्याननं सङ्गमा-
दानन्दं तमवाप कोटिगुणितं योऽभून्न गीर्गोचरः ॥ 181 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-राधिकाके अश्रुओके द्वारा
आकुलित नेत्र किञ्चित् अरुण और चञ्चल हो गये;
रसोल्लास और कन्दर्पभावके कारण अधर कम्पित होने
लगे; दोनों भौंहे कुटिल (टेढ़ी) हो गयीं; मुखकमलपर
मृदु मन्द मुस्कानकी रेखा दिखायी देने लगी और
किलकिञ्चित-भावसे उत्पन्न प्रसन्नताको व्यक्त होते देखकर
श्रीकृष्णने राधिकाके मुख दर्शनसे उनके साथ सङ्गमकी
अपेक्षा करोड़ों गुणा जिस सुखको प्राप्त किया, उसका
वाणीके द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ 181 ॥
अनुभाष्य-
असौ (श्रीकृष्णः) राधायाः वाष्पव्याकुलितारुणाञ्चलचलन्नेत्रं
(वाष्पैः अश्रुजलैः व्याकुलिते अरुणम् अञ्चलं ययोः एवम्भूते
चञ्चले नेत्रे यस्मिन् तत्) रसोल्लासितं, हेलोल्लासचलाधरं
(भावविशेषातिशयेन कम्पमानोष्ठं) कुटिलभ्रूयुग्मम् उद्यत्स्मितम्
(प्रकटन्मन्दहास्यं) किलकिञ्चिताञ्चितं (तद्भावयुक्तम्) आननं
(मुखं) वीक्ष्य (दृष्ट्वा) सङ्गमात् कोटिगुणितं तम् आनन्दं
अवाप (प्राप्तवान्) - यः आनन्दः गीर्गोचरः (वाक्यविषयः) न
(नैव भवति, कदापीत्यर्थः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥
श्रीराधाके भाव-श्रवणसे श्रीस्वरूपका
महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :-
एत शुनि' प्रभु हैला आनन्दित मन।
सुखाविष्ट हञा स्वरूपे कैला आलिङ्गन ॥ 182 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुके मनमें बहुत आनन्द
हुआ और उस आनन्दमें आविष्ट होकर उन्होंने
श्रीस्वरूप दामोदरका आलिङ्गन किया ॥ 182 ॥
महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें श्रीस्वरूपके द्वारा
श्रीराधाके 'विलास' भावका वर्णन :-
“'विलासादि'-भाव-भूषार कह त' लक्षण।
येइ भावे राधा हरे गोविन्देर मन ॥" 183 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "विलासादि'-भाव- भूषणोंका
लक्षण वर्णन करो, जिनके द्वारा विभूषित श्रीराधा
श्रीगोविन्दका मन हरण करती हैं ॥" 183 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा वर्णन आरम्भ; भक्तोंका सुख :-
तबे त' स्वरूप-गोसाञि कहिते लागिला।
शुनि' प्रभुर भक्तगण महासुख पाइला ॥ 184 ॥
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