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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 6/247-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके ऐसे दीनतापूर्वक
वचनोंको सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें
आलिङ्गनकर कहने लगे, - "अब जाकर श्रीजगन्नाथदेवका
दर्शन करो ॥ "247 ॥
घर आकर प्रसाद और महाप्रभुके महिमासूचक
श्लोकको भेजना :-
जगदानन्द-दामोदर,- दुइ सङ्गे लञा।
घरे आइल भट्टाचार्य जगन्नाथ देखिया ॥ 248 ॥
उत्तम उत्तम प्रसाद बहुत आनिला।
निजविप्र-हाते दुइ जना सङ्गे दिला ॥ 249 ॥
निज-कृत दुइ श्लोक लिखिया तालपाते।
'प्रभुके दिह' बलि' दिल जगदानन्द-हाते ॥ 250 ॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करनेके बाद
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदरको
साथ लेकर अपने घर लौट आये। मन्दिरसे वे अपने
साथ बहुतसा उत्तम-उत्तम प्रसाद भी लाये। उस
प्रसादको अपने एक ब्राह्मण और श्रीजगदानन्द तथा
श्रीदामोदरके हाथोंमें दिया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने
द्वारा रचित दो श्लोकोंको तालपत्रपर लिखकर श्रीजगदानन्द
पण्डितके हाथमें देकर कहा, - 'इसे महाप्रभुको दे
देना ॥ '248-250 ॥
महाप्रभुके द्वारा पत्रकी प्राप्तिसे पहले श्रीमुकुन्दके द्वारा
दोनों श्लोकोंकी नकलके द्वारा रक्षा :-
प्रभु-स्थाने आइला दुँहे प्रसाद-पत्री लञा।
मुकुन्द दत्त पत्र निल तार हाते पाञा ॥ 251 ॥
श्रीजगदानन्दका महाप्रभुको श्रीभट्टाचार्यके
श्लोकवाला पत्र देना :-
दुइ श्लोक बाहिर-भिते लिखिया राखिल।
तबे जगदानन्द पत्री प्रभुके लञा दिल ॥ 252 ॥
प्रभु श्लोक पड़ि' पत्र छिण्डिया फेलिल।
भित्ते देखि' भक्त सब श्लोक कण्ठे कैल ॥ 253 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द और श्रीदामोदर, प्रसाद और
पत्रीको लेकर महाप्रभुके पास आये। भीतर जानेसे
पहले श्रीमुकुन्द दत्तने श्रीजगदानन्दके हाथसे वह पत्री
ले ली और उन दो श्लोकोंको बाहर दीवारपर लिख
दिया। तब श्रीजगदानन्दने भीतर जाकर महाप्रभुको वह
पत्री दी। महाप्रभुने उन श्लोकोंको पढ़ते ही पत्रीको
फाड़कर फेंक दिया। परन्तु भक्तोंने दीवारपर लिखे उन
दोनों श्लोकोंको देखकर कण्ठस्थ कर लिया था। वे दो
श्लोक इस प्रकार हैं ॥ 251-253 ॥
ज्ञान-वैराग्य-भक्ति-वितरणकारी श्रीगौरको प्रणाम :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (6/74)-
वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग-
शिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः।
श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी
कृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये ॥ 254 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 254 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वैराग्य, विद्या और निजभक्तियोगकी
शिक्षा देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्यरूपधारी एक सनातन
पुरुष-जो सर्वदा कृपाके समुद्र हैं, उनके प्रति मैं
शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥
अनुभाष्य-
वैराग्यविद्यानिज-भक्तियोगशिक्षार्थं (कृष्णेतरवस्तुविरक्ति-
परेशानुभूति-निजनाम-रूप-गुण-लीला-सेवनयोग्योपदेशार्थम्) एकः
पुराणः (सनातनः) कृपाम्बुधिः (जड़ासक्तजनेष्वपि परमोत्तम-मुक्त-
जनोचित-व्रजप्रेमदानरूप-दयार्णवः) पुरुषः श्रीकृष्णचैतन्यशरीरधारी
(श्रीकृष्णचैतन्य एव शरीरं धर्तुं शीलमस्य सः) अहं तं प्रपद्ये
(आश्रयामि)।
श्लोक-भावानुवाद-जड़ विषयोंमें आसक्त लोगोंको
भी मुक्तजनोंके लिये उचित परम-उत्तम व्रजप्रेमदानरूप
दयाके समुद्र; श्रीकृष्णसे इतर वस्तुओंसे विरक्ति, पर-ईशकी
अनुभूति और निज नाम-रूप-गुण-लीला-सेवाके योग्य
उपदेश देनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य-शरीरधारी एक सनातन
पुरुषके मैं शरणागत होता हूँ ॥ 254 ॥
204 |

छठा अध्याय 6/255-261 ]
गुप्तभक्ति-व्यक्तकारी श्रीगौरमें निष्ठा :-
कालान्नष्टं भक्तियोगं निजं यः
प्रादुष्कर्त्तुं कृष्णचैतन्यनामा।
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे
गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥ 255॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥
अमृतप्रवाह भाष्य—कालके प्रभावसे निजभक्तियोगको
प्राय विनष्ट देखकर जो 'श्रीकृष्णचैतन्य'—नामक पुरुष
उसका पुनः प्रचार करनेके लिये आविर्भूत हुए हैं,
उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा चित्तरूपी भ्रमर गाढ़रूपसे
लीन हो जाय॥ 255॥
अनुभाष्य—
कालात् (अन्याभिलाषकर्मज्ञानजड़ासक्तिप्राबल्यात् काल-
धर्मवशेन) नष्टं (लुप्तं) निजं (कृष्णनामरूपगुणलीलामयं) भक्तियोगं
प्रादुष्कर्तुं (पुनः प्रकटयितुं) यः कृष्णचैतन्यनामा [सन्] आविर्भूतः
(प्रकाशितः), तस्य पादारविन्दे (चरण-कमले) चित्तभृङ्गः
(चञ्चलमनाभ्रमरः) गाढं गाढं लीयतां (निमज्जतु)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 255॥
दोनों श्लोकोंके द्वारा श्रीसार्वभौमकी महिमाका विस्तार :-
एइ दुइ श्लोक—भक्तकण्ठे मणिहार।
सार्वभौमेर कीर्त्ति घोषे ढक्कावाद्याकार॥ 256॥
अनुवाद—ये दो श्लोक नगाड़ेके भाँति उच्च स्वरसे
श्रीसार्वभौमकी कीर्ति सब समयके लिये घोषित करते
रहेंगे, क्योंकि ये सब भक्तोंके कण्ठके मणिमय हार
स्वरूप बन गये हैं॥ 256॥
श्रीगौरगत प्राण सार्वभौम :-
सार्वभौम हैला प्रभुर भक्त एकजन।
महाप्रभुर सेवा-बिना नाहि अन्य मन॥ 257॥
'श्रीकृष्णचैतन्य शचीसुत गुणधाम।'
एइ ध्यान, एइ जप, लय एइ नाम॥ 258॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभुके अनन्य
भक्त बन गये। अब वे महाप्रभुकी सेवाके अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं जानते थे। 'समस्त गुणोंके सागर
शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्य'के नामका सब समय जप-कीर्तन
करते और उन्हींका ध्यान करते॥ 257-258॥
महाप्रभुके निकट श्रीसार्वभौमके द्वारा ब्रह्मस्तुतिके एक
श्लोकका पाठान्तरपूर्वक पाठ करना :-
एकदिन सार्वभौम प्रभु-आगे आइला।
नमस्कार करि' श्लोक पड़िते लागिला॥ 259॥
भागवतेर 'ब्रह्मस्तवे'र श्लोक पड़िला।
श्लोक-शेषे दुइ अक्षर-पाठ फिराइला॥ 260॥
अनुवाद—एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुके
पास आकर उनको प्रणाम करनेके बाद भागवतसे
ब्रह्म-स्तुतिका एक श्लोक पढ़ा। पढ़ते हुए उन्होंने
श्लोकके अन्तिम चरणके दो अक्षरोंका पाठ बदल
दिया॥ 259-260॥
श्रीमद्भागवत (10/14/8) परिवर्तित :-
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो
भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत
यो भक्तिपदे स दायभाक्॥ 261॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 261॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिकी
उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते
मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते
हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्'
अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं। इस श्लोकका
पाठ करते समय श्रीसार्वभौमने “भक्तिपदे स दायभाक्”—
ऐसा उच्चारण किया था॥ 261॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा गर्व चूर्ण होनेपर ब्रह्मा
एकान्त शरणागत होकर श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं—
तत् (तस्मात्) ते अनुकम्पां (कृपां) सुसमीक्ष्यमाणः (सम्यक्
। 205

[ 6/261-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मन्यमानः) आत्मकृतं (निजानुष्ठितं) विपाकं (कर्मफलं) भुञ्जानः
एव हृद्वाग्वपुभिः (कायमनोवाक्यैः) ते (तुभ्यं) नमः विदधत्
(जड़ीयाहङ्कारं त्यक्त्वा आत्मसमर्पणं कुर्वन्) यः जीवेत्, सः
मुक्तिपदे दायभाक् (योग्यपात्रः) भवति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥261॥
महाप्रभु द्वारा भागवतके पाठका समर्थन और संरक्षण :-
प्रभु कहे,-" 'मुक्तिपदे'–इहा पाठ हय।
'भक्तिपदे' केने पड़, कि तोमार आशय ॥" 262 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,-"श्लोकमें तो
'मुक्तिपदे'–यह पाठ है। आप 'भक्तिपदे' पाठ क्यों कह
रहे हैं? आपका ऐसा कहनेका क्या अभिप्राय है?"॥262॥
भट्टाचार्यकी मुक्तिके स्थानपर
भक्ति-पाठ-रक्षा करनेकी इच्छा :-
भट्टाचार्य कहे,-" 'भक्ति'-सम नहे मुक्तिफल।
भगवद्भक्तिविमुखेर हय दण्ड केवल ॥ 263 ॥
पाषण्ड, मायावादी और विष्णुविद्वेषी
दैत्यगणको सायुज्य मुक्ति :-
कृष्णेर विग्रह येइ सत्य नाहि माने।
येइ निन्दा-युद्धादिक करे ताँर सने ॥ 264 ॥
सेइ दुइर दण्ड हय-'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति'।
तार मुक्ति फल नहे, येइ करे भक्ति ॥ 265 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-" 'भक्ति'के
समान मुक्तिका फल नहीं है। मुक्ति तो भगवद्भक्ति-विमुख
लोगोंके लिये केवल दण्डमात्र है। श्रीकृष्णके विग्रहको
जो लोग सत्य नहीं मानते और जो लोग उनकी निन्दा
एवं उनसे युद्धादि करते हैं,-इन दोनों प्रकारके
लोगोंको 'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति' रूप दण्ड मिलता है। परन्तु
जो भक्ति करते हैं, उसका फल ऐसी मुक्ति नहीं
है॥263-265॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीभट्टाचार्यने कहा,- (प्रेम)-भक्ति
ही भक्तिका सर्वोत्तम फल है, मुक्ति भक्तिका फल नहीं
है। भगवद्भक्तिसे विमुख व्यक्तिके लिये सायुज्यमुक्ति
केवल एक प्रकारका दण्ड है॥ 263 ॥
अनुभाष्य-श्रीरूप गोस्वामी द्वारा रचित लघुभागवतामृतमें
ब्रह्मलोकके वर्णनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित कारिका-
"भक्तेरव्यभिचारायाः प्रेमसैवेव यत्फलम्।
केवलं ब्रह्मभावस्तु विद्वेषेणापि लभ्यते ॥"
अर्थात् "प्रेमसेवा ही अव्यभिचारिणी भक्तिका फल
है। (पक्षान्तरमें) यह निश्चित है कि ब्रह्मभाव (भगवान्के)
विद्वेषके द्वारा भी प्राप्त होता है।"
श्रीबलदेवविद्याभूषणके द्वारा रचित टीका-
"ननु चित्परमाणोर्जीवस्य चिद्राशौ तस्मिन् ब्रह्मणि लयेनैव
भाव्यं, न पुनस्ततो निःसृत्य तदाश्रयस्य कृष्णस्य सेवनं
सम्भवेदिति चेत्? तत्राह-भक्तेरिति। तस्मिन् ब्रह्मणि विलीनतया
स्थितिस्तु भगवता कृष्णेन् निहतानां विद्वेषिणामपि भवेत्,
'सिद्धलोकस्तु तमसाः पारे यत्र वसन्ति हि। सिद्धा ब्रह्मसुखे
मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः ॥' (ब्रह्माण्डपुराणे) इति स्मरणात्।
तस्मात् तल्लीनत्वमात्रं भक्तेः फलं न भवतीति। तमसाः-
अष्टमावरणात् प्रकृतिमण्डलात्, पारे ब्रह्मलोकः- 'चयस्त्विषाम्'
इति न्यायेन निराकारचित्पुअरूपं स्थानमित्यर्थः।
सिद्धाः-अनवज्ञातभगवदङ्घ्रयस्तादृग्ब्रह्मचिन्तकाः तच्चिन्तनात्
विध्वस्त-लिङ्गाः, यत्र वसन्ति-लीयन्ते; तच्चरणावज्ञाताणान्तु
ज्ञानलव-दग्धनामधःपातो भवति, 'येऽन्येऽरविन्दाक्ष !
विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रं
पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥" (भाः 10/2/32) इति
श्रीभागवतात्।"
अर्थात् "यदि चित्परमाणु जीवका चित्पुञ्ज ब्रह्ममें
ही लय हो गया, ऐसा होनेपर तो ब्रह्मसे निकलकर
जीवके लिये पुनः उसके आश्रय श्रीकृष्णकी सेवा
सम्भव नहीं होगी ? इस आशङ्काके उत्तरमें उल्लिखित
श्लोक कहा गया है। ब्रह्ममें लीन होकर अवस्थान
करना तो अति तुच्छ है, - वह स्थिति तो श्रीकृष्णके
हाथों मारे गये विद्वेषी दैत्योंको भी प्राप्त होती है;
क्योंकि ब्रह्माण्डपुराणमें ही इसका प्रमाण मिलता है
(आदिलीला 5/39 संख्या देखें)। इस श्लोकमें,
"चयस्त्विषाम्' –इस न्यायके अनुसार 'ब्रह्म या सिद्धलोक'
शब्दसे निराकार चित्पुञ्जरूप विशेष स्थानको समझना
होगा। 'सिद्धाः'-शब्दका तात्पर्य, जो सब जीव भगवान्के
चरणकमलोंकी अवज्ञा नहीं करते हैं, अपितु इस
206 ।

छठा अध्याय 6/263-269 ]
प्रकारकी ब्रह्मचिन्ताके द्वारा जिनके लिङ्गदेहका आवरण
दूर हो गया है-वे 'वसन्ति' अर्थात् लय प्राप्त करते
हैं। किन्तु जो भगवान्‌के श्रीचरणोंकी अवज्ञा करनेवाले
हैं, उनका (भाः 10/2/32)-“येऽन्योरविन्दाक्ष” श्लोकके
अनुसार जो सामान्य ज्ञान पहले सहारा था, वह भी
भगवान्‌की अवज्ञा करनेके फलस्वरूप सम्पूर्ण रूपसे
नष्ट हो जाता है, इसलिये उनका अधःपतन होता है
अर्थात् उनको नरककी प्राप्ति होती है ॥ "263-265 ॥
पाँच प्रकारकी मुक्ति :-
यद्यपि मुक्ति हय एइ पञ्च-प्रकार ।
सालोक्य-सामीप्य-सारूप्य-सार्ष्टि-सायुज्य आर ॥ 266 ॥
सायुज्यके अतिरिक्त चार प्रकारकी
मुक्तियाँ भक्तिकी आनुषङ्गिक :-
'सालोक्यादि' चारि यदि हय सेवा-द्वार।
तबु कदाचित् भक्त करे अङ्गीकार ॥ 267 ॥
नरक-सदृश सायुज्य 'भक्तिविनाशक'
होनेके कारण सर्वथा परित्याज्य :-
'सायुज्य' शुनिते भक्तेर हय घृणा-भय।
'नरक' वाञ्छये, तबु सायुज्य ना लय ॥ 268 ॥
अनुवाद-यद्यपि मुक्ति 'सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य,
सार्ष्टि और सायुज्य'-पाँच प्रकारकी होती है, तथापि
सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ यदि भगवद्-सेवाका
द्वार हों, तो कदाचित् भक्त उन्हें स्वीकार करते हैं।
'सायुज्य' मुक्तिका नाम सुनते ही भक्तोंको उससे घृणा
और भय होता है। भक्त सायुज्य मुक्तिको अङ्गीकार
करनेके स्थानपर नरक जाना श्रेयस्कर समझते
हैं॥ 266-268 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि
और सायुज्य, - इन पाँच प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे पहली
सालोक्यादि चार इतनी निन्दनीय नहीं हैं, क्योंकि वे
भगवत्सेवाके द्वार-स्वरूप हैं। तथापि श्रीकृष्णभक्त उपरोक्त
चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी स्वीकार नहीं करते,
क्योंकि वे जन्म-जन्मान्तर श्रीकृष्णभक्तिकी ही अभिलाषा
करते हैं। 'सायुज्य'-शब्द सुनने मात्रसे भक्तमें उसको
तुच्छ समझकर घृणा और 'भक्तिविरोधिकारी अपराध'
जानकर भय होता है ॥ 267-268 ॥
दो प्रकारके सायुज्य :-
ब्रह्मे, ईश्वरे सायुज्य दुइ त' प्रकार।
ब्रह्म-सायुज्य हैते ईश्वर-सायुज्य धिक्कार ॥ 269 ॥
अनुवाद-सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है-
'ब्रह्म-सायुज्य' और 'ईश्वर-सायुज्य'। ब्रह्म-सायुज्यसे
ईश्वर-सायुज्य और भी अधिक धिक्कारके योग्य है॥269॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सायुज्य दो प्रकारका होता
है—ब्रह्मसायुज्य और ईश्वरसायुज्य। मायावादी वेदान्तियोंके
मतानुसार जीवका चरमफल—ब्रह्मसायुज्य है; पातञ्जलके
मतानुसार, कैवल्य-अवस्थामें ईश्वर-सायुज्य है। इन
दोनों प्रकारके सायुज्योंमेंसे ईश्वरसायुज्य ही अधिक
घृणित है। ब्रह्मसायुज्यमें निर्विशेषज्ञानके द्वारा निर्विशेष
गति प्राप्त होती है; किन्तु सविशेष-ईश्वरका ही ध्यान
करके जो कैवल्यरूपी ईश्वरसायुज्य प्राप्त होता है, वही
वासनादोषके कारण और अधिक पतनरूपी फल है।
“क्लेशकर्मविपाकाशयैर परामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ।”
अर्थात् “क्लेशों और कर्मफलकी वासनाओंसे अस्पृष्ट
विशेष पुरुष ही ईश्वर है।", “स पूर्वेषामपि गुरुः
कालेनावच्छेदात् ।” अर्थात् “वह सनत् कुमारादिसे भी
पूर्व विद्यमान है और कालसे कभी भी ढका या
प्रभावित नहीं होता।” इसके द्वारा सविशेष-ईश्वरका
नित्यत्व देखा जाता है। पुनः इस पातञ्जलमें कैवल्यपादमें
“पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा
वा चितिशक्तिरिति” अर्थात् “प्रकृतिके तीनों गुणोंके
प्रभाव दूर होनेपर शुद्ध आत्मा अपने चिद्-स्वरूपमें
कैवल्य-मुक्तिको प्राप्त होती है।” इस सूत्रके द्वारा
साधककी सिद्धावस्थामें अन्य पुरुष-ईश्वरके अवस्थानका
अभाव है। सविशेषतत्त्वके आश्रयके छलसे योगमार्ग
अत्यन्त तुच्छ है। तात्पर्य यह है कि (योगपन्थामें)
सविशेष तत्त्वकी उपासनासे सविशेष-फल ना होकर
अत्यन्त सुदूरवर्ती धिक्कारयोग्य फल प्राप्त होता है ॥ 269 ॥
। 207

[ 6/270-278 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
सेव्यकी निष्काम-सेवाके अतिरिक्त सेवककी
किसी भी मुक्तिकी कामना नहीं :-
श्रीमद्भागवत (3/29/13)-
सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ २70 ॥
अनुवाद-[मेरे द्वारा] सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्टि
(ऐश्वर्यसम्पत्ति), सामीप्य (निकटवास), सारूप्य
(चतुर्भुजाकार) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति)
प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते, क्योंकि
मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी
अभिलाषा नहीं है॥ 270 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 270 ॥
महाप्रभुके द्वारा मुक्तिपदकी व्याख्या :-
प्रभु कहे,–“मुक्तिपदे'र आर अर्थ हय।
मुक्तिपद-शब्दे 'साक्षात् ईश्वर' कहय ॥ 271 ॥
मुक्ति पदे याँर, सेइ 'मुक्तिपद' हय।
किम्वा नवम पदार्थ 'मुक्तिर' समाश्रय ॥ 272 ॥
दुइ-अर्थे 'कृष्ण' कहि, केने पाठ फिरि।”
सार्वभौम कहे,-"ओ-पाठ कहिते ना पारि ॥ 273 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मुक्तिपदके और भी
अर्थ हैं। मुक्तिपद-शब्दसे 'साक्षात् ईश्वर'को कहा जाता
है। मुक्ति जिनके चरणोंमें रहती है, वे 'मुक्तिपद' हैं।
अथवा [भागवतके दस लक्षणोंमेंसे] नौवें पदार्थ मुक्तिके
जो सम्पूर्ण आश्रय हैं, वे मुक्तिपद हैं। इसलिये जब ये
दोनों अर्थ 'मुक्तिपद'के द्वारा श्रीकृष्णको ही कहते हैं,
तब क्यों पाठमें परिवर्तन करते हो?" श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यने कहा,-"मैं वह पाठ [मुक्तिका उच्चारण] नहीं
कर सकता ॥ 271-273 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके चरणोंमें मुक्ति है,
वे-'मुक्तिपद' अर्थात् 'दसवें' पदार्थ श्रीकृष्ण हैं; अथवा
नौवाँ पदार्थ जो मुक्ति है, वह जिनको आश्रय करके
रहती है, वे-श्रीकृष्ण हैं॥ 272 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 2/91-92 संख्या देखें ॥ 272 ॥
तथापि श्रीसार्वभौमके द्वारा मुक्ति-शब्दके 'सायुज्य' अर्थका
अनादर और 'भक्ति'-शब्दका आदर :-
यद्यपि तोमार अर्थ एइ शब्दे कय।
तथापि 'आश्लिष्य-दोषे' कहन ना याय ॥ 274 ॥
यद्यपि 'मुक्ति'-शब्देर हय पञ्च वृत्ति।
'रूढ़िवृत्यॆ' कहे तबु 'सायुज्ये' प्रतीति ॥ 275 ॥
मुक्ति-शब्द कहिते मने हय घृणा-त्रास।
भक्ति-शब्द कहिते मने हय त' उल्लास ॥ २76 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - यद्यपि आपके
अर्थोंमें 'मुक्तिपद' श्रीभगवान् ही हैं, तथापि 'आश्लिष्य-दोष'
(संशय) के कारण 'मुक्तिपद' शब्द कहा नहीं जाता।
यद्यपि 'मुक्ति' शब्दकी पाँच प्रकारकी वृत्तियाँ हैं, तथापि
रूढ़िवृत्तिके द्वारा मुक्ति शब्दसे 'सायुज्य'की ही प्रतीति
होती है। मुक्ति-शब्द कहते ही मनमें घृणा होती है
और भय लगता है। परन्तु भक्ति-शब्द कहते ही मनमें
उल्लास हो जाता है॥ 274-276 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'आश्लिष्य-दोष'-जिसका दो
प्रकारसे अर्थ हो सकता है; जिसमें मुख्य अर्थकी कुछ
हानि होती है, वह दोष। 'रूढ़िवृत्ति'-मुख्यवृत्ति ॥ 274-275 ॥
छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
श्रीसार्वभौमकी निष्काम भक्तिको
देखकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :-
शुनिय़ा हासेन प्रभु आनन्दित मने।
भट्टाचार्य कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गने ॥ 277 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वचनोंको सुनकर
महाप्रभु बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उनका प्रगाढ़
आलिङ्गन किया ॥ 277 ॥
ग्रन्थकारके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यकी
कृपाकी महिमाका कीर्तन :-
येइ भट्टाचार्य पड़े पड़ाय मायावादे।
ताँर ऐछे वाक्य स्फुरे चैतन्य-प्रसादे ॥ 278 ॥
208 ।

छठा अध्याय 6/278-286 ]
लोहाके यावत् स्पर्शि' हेम नाहि करे।
तावत् स्पर्शमणि केह चिनिते ना पारे ॥ 279 ॥
अनुवाद-[ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी
कह रहे हैं] जो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मायावादको पढ़ते
और पढ़ाते थे, आज महाप्रभुकी कृपासे उनके मुखसे
ऐसे वाक्य निकल रहे हैं। जब तक अपने स्पर्शसे वह
लोहेको सोना नहीं बनाती, तब तक स्पर्शमणिको कोई
पहचान नहीं पाता ॥ 278-279 ॥
महाप्रभुका 'परमेश्वर श्रीकृष्ण' होनेमें सभीका विश्वास :-
भट्टाचार्येर वैष्णवता देखि' सर्वजन।
प्रभुके जानिल,-'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन' ॥ 280 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी वैष्णवताको देखकर
सभी जान गये कि महाप्रभु 'साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन'
श्रीकृष्ण हैं ॥ 280 ॥
काशीमिश्रादिकी महाप्रभुके चरणोंमें शरणागति :-
काशीमिश्र-आदि यत नीलाचलवासी।
शरण लइल सबे प्रभु-पदे आसि' ॥ 281 ॥
अनुवाद-तदुपरान्त काशीमिश्रादि जितने नीलाचलवासी
थे, सभीने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण
की ॥ 281 ॥
इसके बाद महाप्रभुका दक्षिण भारतमें भ्रमण :-
सेइ सब कथा आगे करिब वर्णन।
एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-विवरण ॥ 282 ॥
अनुवाद-इन सब कथाओंका मैं बादमें वर्णन
करूँगा, अभी मैं महाप्रभुकी दक्षिण-भारतकी यात्राका
वर्णन करूँगा ॥ 282 ॥
सार्वभौम करे यैछे प्रभुर सेवन।
यैछे परिपाटी करे भिक्षा-निर्वाहण ॥ 283 ॥
विस्तारिया आगे ताहा करिब वर्णन।
एइ महाप्रभुर लीला-सार्वभौम-मिलन ॥ 284 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने जिस प्रकार भिक्षादि
करवाकर अनेक प्रकारसे महाप्रभुकी सेवा की, इन सब
लीलाओंका मैं विस्तारपूर्वक बादमें वर्णन करूँगा। यह
महाप्रभुकी श्रीसार्वभौम-मिलन लीला है ॥ 283-284 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला पन्द्रहवाँ अध्याय देखें ॥ 284 ॥
छठे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रीसार्वभौम और चैतन्य महाप्रभुके संवादको
श्रवण करनेसे निष्काम भक्तिकी प्राप्ति,
यह कर्मकाण्डीय फलश्रुति मात्र नहीं :-
इहा येइ श्रद्धा करि' करये श्रवण।
ज्ञान-कर्मपाश हैते हय विमोचन ॥ 284 ॥
श्रद्धाय चैतन्यलीला सुने येइजन।
अचिरे मिलये ताँरे चैतन्य-चरण ॥ 285 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 286 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे सार्वभौमोद्धारो
नाम षष्ठ-परिच्छेदः।
अनुवाद-इस लीलाको जो श्रद्धापूर्वक सुनते हैं, वे
ज्ञान और कर्मके बन्धनसे छूट जाते हैं। जो
श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्यलीलाको सुनते हैं, उन्हें शीघ्र ही
महाप्रभुके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। श्रीरूप-रघुनाथ
गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास
इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 284-286 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यखण्डमें सार्वभौम-उद्धार
नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 209

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सातवाँ अध्याय
कथासार—माघमासके शुक्ल पक्षमें महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण करके फाल्गुन मासमें नीलाचलमें वास किया।
फाल्गुनमासमें दोलयात्राका दर्शन करके चैत्रमासमें
श्रीसार्वभौमका उद्धार किया। वैशाखमासमें दक्षिणकी
ओर यात्रा की। अकेले ही दक्षिणमें भ्रमण करेंगे,—ऐसा
प्रस्ताव रखनेपर, श्रीनित्यानन्द प्रभुने उनके साथ 'कृष्णदास'
नामक एक ब्राह्मणको भेजा। जानेके समय श्रीसार्वभौमने
महाप्रभुको साथ ले जानेके लिये चार कौपीन-बहिर्वास
दिये और श्रीरामानन्द रायके साथ गोदावरीके तटपर
साक्षात्कार करनेके लिये अनुरोध किया। आलालनाथ
तक श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि कुछ भक्त महाप्रभुके साथ
गये थे। उन सबको वहीं छोड़कर केवल कृष्णदासको
साथ ले जाना स्वीकार करके महाप्रभु 'कृष्ण' 'कृष्ण'
बोलते-बोलते चलने लगे। जिस गाँवमें वे रात्रिमें वास
करते थे, वहाँ शरणागत व्यक्तियोंमें शक्ति सञ्चार
करके उसे सम्पूर्ण देशको ही 'वैष्णव' बनानेकी आज्ञा
देते। वे सब (महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त लोग) पुनः दूसरे
लोगोंकी भक्तिकी शिक्षा देकर अन्यान्य गाँवोंमें भक्तोंकी
संख्यामें वृद्धि करने लगे। इस प्रकार सबको वैष्णव
बनाते हुए महाप्रभु कूर्मस्थानमें पहुँचे, वहाँ 'कूर्म'-नामक
ब्राह्मणपर कृपा की और 'वासुदेव' नामक ब्राह्मणका
गलितकुष्ठ (ऐसा कोढ़, जिसमें कीड़े पड़ गये हों, उस)
रोगसे उद्धार किया। वासुदेवका उद्धार करके 'वासुदेवामृतप्रद'
नामक महाप्रभुका एक नाम हुआ।
—(अमृतप्रवाहभाष्य)
'वासुदेवामृतप्रद'-प्रभुको प्रणाम :-
धन्यं तं नौमि चैतन्यं वासुदेवं दयार्द्रधीः।
नष्टकुष्ठं रूपपुष्टं भक्तितुष्टं चकार यः॥1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने दयार्द्रबुद्धि (दयासे द्रवित
बुद्धि) होकर 'वासुदेव'-नामक भक्तको कोढ़-रोगसे मुक्त
करके सुन्दर रूपमें पुष्ट किया और उसे भक्ति देकर
सन्तुष्ट किया था, उन्हीं धन्य श्रीचैतन्यदेवको मैं प्रणाम
करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
यः दयार्द्रधीः (दयया आर्द्रा धीर्यस्य सः) [कुष्ठ रोगाक्रान्तं]
वासुदेवं नष्टकुष्ठं (विगतकुष्ठरोगं) रूपपुष्टं (सौन्दर्यमयं) भक्तितुष्टं
चकार, तं धन्यं चैतन्यं नौमि।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ 2 ॥
माघ मासमें संन्यास, फाल्गुन मासमें पुरीधाममें वास,
चैत्र मासमें श्रीसार्वभौमका उद्धार, वैशाख मासमें
दक्षिण भारत जानेकी इच्छा :-
एइमते सार्वभौमेर निस्तार करिल।
दक्षिण-गमने प्रभुर इच्छा उपजिल ॥ 3 ॥
माघ-शुक्लपक्षे प्रभु करिल संन्यास।
फाल्गुने आसिया कैल नीलाचले वास ॥ 4 ॥
फाल्गुनेर शेषे दोलयात्रा से देखिल।
प्रेमावेशे बहुविध नृत्यगीत कैल ॥ 5 ॥
चैत्रे रहि' कैल सार्वभौम-विमोचन।
वैशाखेर प्रथमे दक्षिण याइते हैल मन ॥ 6 ॥
। 211

[ 7/3-17 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद - इस प्रकार श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार
करनेके बाद महाप्रभुकी दक्षिण भारत जानेकी इच्छा
जाग्रत हुई। माघमासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास
ग्रहण किया और फाल्गुन मासमें नीलाचलमें आकर
वास किया था। फाल्गुन मासके अन्तमें महाप्रभुने
डोलयात्राका दर्शन किया और प्रेमावेशमें अनेक प्रकारसे
नृत्य-गीत किया। चैत्रमासमें नीलाचलमें रहते हुए
महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यका उद्धार किया तथा
वैशाख मासके प्रारम्भमें उन्होंने दक्षिण भारत जानेका
निश्चय किया ॥ 3-6॥
भक्तोंके निकट कृतज्ञता-ज्ञापन और विदायी-माँगना :-
निजगण आनि' कहे विनय करिया।
आलिङ्गन करि' सबाय श्रीहस्ते धरिया॥ 7॥
“तोमा-सबा जानि आमि प्राणाधिक करि' ।
प्राण छाड़ा याय, तोमा-सबा छाड़िते ना पारि ॥ 8 ॥
तुमि-सब बन्धु मोर बन्धुकृत्य कैले।
इँहा आनि' मोरे जगन्नाथ देखाइले ॥ 9 ॥
एबे सबा-स्थाने मुञि मागों एक दाने।
सबे मेलि' आज्ञा देह, याइब दक्षिणे ॥ 10 ॥
बड़े भाई विश्वरूपको ढूँढ़नेके छलसे दक्षिण भारतके
लोगोंके उद्धारके लिये अकेले जानेकी इच्छा :-
विश्वरूप-उद्देशे अवश्य आमि याब।
एकाकी याइब, केहो सङ्गे ना लइब॥ 11 ॥
सेतुबन्ध हैते आमि ना आसि यावत्।
नीलाचले तुमि-सब रहिबे तावत् ॥" 12 ॥
अनुवाद - महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंको बुलाकर
उनका आलिङ्गन किया और उनके हाथोंको पकड़कर
विनीत भावसे कहने लगे, - "आप सब मुझे मेरे प्राणोंसे
भी अधिक प्रिय हैं। मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ,
परन्तु आप सबको नहीं। आप सब मेरे बन्धु हैं और
मुझे यहाँ लाकर श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराके वास्तवमें
बन्धुका कार्य ही किया है। अब मैं आप सबसे एक
दान माँगता हूँ, आप सभी मुझे दक्षिण भारत जानेकी
अनुमति प्रदान करो। मुझे अपने भाई श्रीविश्वरूपको
खोजनेके लिये अवश्य ही जाना है, परन्तु मैं अकेला
ही जाऊँगा और किसीको साथमें नहीं लूँगा। जब तक
मैं रामेश्वरम्से लौटकर नहीं आ जाता, तब तक आप
सब नीलाचलमें ही रहना ॥ "7-12 ॥
विश्वरूप-सिद्धि-प्राप्ति जानेन सकल।
दक्षिण-देश उद्धारिते करेन एइ छल ॥ 13 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभु तो सर्वज्ञ हैं। विश्वरूपको
इससे पूर्व ही सिद्धिप्राप्ति हो चुकी है अर्थात् वे
अप्रकट हो चुके हैं, उसे महाप्रभु पूर्णरूपसे जानते थे,
परन्तु दक्षिण-भारतके लोगोंका उद्धार करनेके लिये
उन्होंने यह छल किया कि मैं विश्वरूपको खोजूँगा ॥ 13 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 9/299-300 संख्या देखें ॥ 13 ॥
भक्तोंका दुःख :-
शुनिया सबार मने हैल महादुःख।
निःशब्द हइला, सबार शुकाइल मुख ॥ 14 ॥
अनुवाद - महाप्रभुकी बातको सुनकर सभीके मनमें
इतना दुःख हुआ कि वे कुछ बोल ही नहीं पाये और
सबका मुख सूख गया ॥ 14 ॥
साथमें जानेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुकी प्रार्थना :-
नित्यानन्दप्रभु कहे, - “ऐछे कैछे हय?
एकाकी याइबे तुमि, के इहा सहय? ॥ 15 ॥
दुइ-एक सङ्गे चलुक, ना पड़ हठ-रङ्गे।
यारे कह, सेइ दुइ चलुक् तोमार सङ्गे ॥ 16 ॥
दक्षिणेर तीर्थपथ आमि सब जानि।
आमि सङ्गे याइ, प्रभु, आज्ञा देह तुमि ॥ " 17 ॥
अनुवाद - श्रीनित्यानन्द प्रभुने कुछ धैर्य धारण
212 ।

सातवाँ अध्याय 7/15-27 ]
करके कहा,—“ऐसा कैसे हो सकता है? आप अकेले
जायेंगे, इसे कौन सहन कर सकता है? हम दो-एक
व्यक्तियोंको अपने सङ्ग लेकर चलो, अन्यथा आप
किसी ठगके चङ्गुल पड़ जाओगे। आप जिन्हें कहेंगे,
वे दो व्यक्ति ही आपके साथ जायेंगे। मैं दक्षिणके सभी
तीर्थोंके मार्ग जानता हूँ। प्रभो! आप मुझे आज्ञा
दीजिये, मैं आपके साथ जाऊँगा॥”15-17॥
अनुभाष्य—'हठ-रङ्गे'—ठग या जुआ-चोरके
चङ्गुलमें॥16॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीनित्यानन्द-जगदानन्द-दामोदर आदि
भक्तोंकी कृत्रिम निन्दाके छलसे गुणगान :—
प्रभु कहे,—“आमि नर्त्तक, तुमि—सूत्रधार।
तुमि यैछे नाचाओ, तैछे नर्त्तन आमार ॥ 18 ॥
संन्यास करिया आमि चलिलाङ वृन्दावन।
तुमि आमा लञा आइले अद्वैत-भवन ॥ 19 ॥
नीलाचल आसिते, पथे भाङ्गिला मोर दण्ड।
तोमा-सबार गाढ़-स्नेहे आमार कार्य-भङ्ग ॥ 20 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको लक्ष्य करके
कहा,—“मैं नर्तक हूँ और आप सूत्रधार हो। आप जैसे
मुझे नचाते हो, मैं वैसे ही नाचता हूँ। संन्यास लेकर
जब मैं वृन्दावनकी ओर चला, तब आप मुझे
शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घर ले आये। नीलाचल
आते समय मार्गमें आपने मेरा संन्यास दण्ड तोड़ दिया।
आप सबके गाढ़-स्नेहसे मेरे कार्य बिगड़ रहे हैं॥18-20॥
जगदानन्द चाहे आमा विषय भुञाइते।
येइ कहे, सेइ भये चाहिये करिते ॥ 21 ॥
कभु यदि इँहार वाक्य करिये अन्यथा।
क्रोधे तिनदिन मोरे नाहि कहे कथा ॥ 22 ॥
अनुवाद—(महाप्रभुने श्रीजगदानन्दके विषयमें
कहा)—जगदानन्द तो मुझे विषय-भोग करवाना चाहता
है। वह जो भी कहता है, उसके भयसे मुझे वह करना
पड़ता है। यदि कभी मैं इसकी बात नहीं मानकर कुछ
और करता हूँ, तो यह क्रोधित होकर तीन दिन तक
मुझसे बात नहीं करता॥21-22॥
मुकुन्द हुयेन दुःखी देखि' संन्यास-धर्म।
तिनबारे शीते स्नान, भूमिते शयन ॥ 23 ॥
अन्तरे दुःखी मुकुन्द, नाहि कहे मुखे।
इहार दुःख देखि' मोर द्विगुण हुये दुःखे ॥ 24 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥23-24॥
अनुभाष्य—(महाप्रभुने श्रीमुकुन्दको लक्ष्य करके
कहा)—संन्यासधर्मका पालन करनेके लिये मैं शीतकालमें
भी तीन बार स्नान और बिना शय्याके भूमिपर शयन
करता हूँ, ऐसा देखकर मुकुन्द दुःखी होता है। मेरे
लिये मुकुन्दके मनमें दुःख होता है, ऐसा जानकर
उसके लिये मैं दुगना दुःखी होता हूँ॥23-24॥
दामोदर-ब्रह्मचारीकी निरपेक्षतापर महाप्रभुका कटाक्ष :—
आमि त'—संन्यासी, दामोदर—ब्रह्मचारी।
सदा रहे आमार उपर शिक्षा-दण्ड धरि' ॥ 25 ॥
इँहार आगे आमि ना जानि व्यवहार।
इँहारे ना भाय स्वतन्त्र चरित्र आमार ॥ 26 ॥
लोकापेक्षा नाहि इँहार कृष्णकृपा हैते।
आमि कभु लोकापेक्षा ना पारि छाड़िते ॥ 27 ॥
अनुवाद—(अब महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितको
लक्ष्य करके कहा)—यद्यपि मैं संन्यासी हूँ और दामोदर
ब्रह्मचारी है, तथापि वह शिक्षा-दण्ड लेकर सदा ही मेरे
ऊपर शासन करता है, अर्थात् सदा मुझे उपदेश देता
रहता है। इसके विचारसे मैं लोक-व्यवहार नहीं
जानता, इसलिये इसे मेरा स्वतन्त्र व्यवहार अच्छा नहीं
लगता। इसपर श्रीकृष्णकी कृपा है, इसलिये यह अपेक्षा
नहीं रखता कि लोग क्या कहेंगे, परन्तु मैं संन्यासी हूँ,
इसलिये कभी भी लोकापेक्षा नहीं छोड़ सकता॥25-27॥
। 213

[ 7/25-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य-दामोदर (ब्रह्मचारी) मुझे सदैव
इस प्रकार शिक्षादण्ड देता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता
है कि इसके सामने मैं एक व्यवहार-ज्ञानशून्य व्यक्ति
हूँ। दामोदर पण्डित आदिके प्रति कृष्णकृपा अधिक
होनेके कारण, ये लोगोंकी अपेक्षा न करके मुझे
अनेक प्रकारके विषय-भोग कराना चाहते हैं। किन्तु
मैं दीन संन्यासी हूँ, लोकापेक्षाको नहीं छोड़ सकता,
इसलिये अपने संन्यास-धर्मके अनुसार व्यवहार करता
हूँ॥ 25-27॥
अनुभाष्य- 'संन्यासी' - ब्रह्मचारीके गुरु होते हैं, इसलिये
'ब्रह्मचारी' होकर संन्यासीको उपदेश देना अनुचित है।
'ना भाय'-अच्छा नहीं लगता ॥ 25-26 ॥
महाप्रभुके द्वारा सभीको अपने वापिस
लौटने तक पुरीमें रहनेका अनुरोध :-
अतएव तुमि-सब रह नीलाचले।
दिन-कत तीर्थ आमि भ्रमिब एकले॥"28॥
अनुवाद-इसलिये तुम सब नीलाचलमें रहो और
मैं कुछ दिन अकेले ही तीर्थ भ्रमण करूँगा॥"28॥
अपने भक्तोंके दोष-प्रदर्शनके छलसे गुण-वर्णन :-
इँहा-सबार वश प्रभु हुये ये-ये-गुणे।
दोषरूप-छले करे गुण आस्वादने ॥ 29 ॥
अनुवाद-महाप्रभु जिन-जिन गुणोंके कारण इन
सब भक्तोंके वशीभूत थे, दोषरूप-छलसे उन सभी
गुणोंका महाप्रभुने आस्वादन किया॥ 29 ॥
अनुभाष्य-पूर्वकथित भक्तोंके जिन-जिन गुणोंके
कारण महाप्रभु वशीभूत हुए थे, उन्हींको ही 'छलपूर्वक
दोष' कहकर उल्लेख करके उन्होंने भक्तोंकी महिमा
बतलायी ॥ 29 ॥
महाप्रभुका अनुपम भक्तवात्सल्य :-
चैतन्येर भक्तवात्सल्य-अकथ्य-कथन।
आपने वैराग्य-दुःख करेन सहन ॥ 30 ॥
भक्तोंके लिये महाप्रभुको कष्ट स्वीकार,
भक्तोंका उसमें दुःख :-
सेइ दुःख देखि' येइ भक्त दुःख पाय।
सेइ दुःख ताँर शक्त्ये सहन ना याय॥ 31 ॥
गुण-दोषोद्गार-छले सबा निषेधिया।
एकाकी भ्रमिबेन तीर्थ वैराग्य करिया ॥ 32 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके भक्तवात्सल्यको शब्दोंके द्वारा
व्यक्त नहीं किया जा सकता। अपने संन्यासके वैराग्य
दुःखको वे स्वयं सहन कर लेते थे। परन्तु महाप्रभुके
उस दुःखको देखकर भक्त दुःखी होते और महाप्रभुमें
अपने भक्तोंके इन दुःखोंको सहन करनेकी शक्ति नहीं
थी। उनके भक्तोंको कोई दुःख न हो, इसलिये महाप्रभुने
भक्तोंके गुणोंको भी दोष कहकर छलसे उनको अपने
साथ जानेके लिये मना किया, जिससे वे वैराग्ययुक्त
होकर अकेले तीर्थ-भ्रमण कर सकें ॥ 30-32 ॥
स्वतन्त्र ईश्वर महाप्रभु अपने सङ्कल्पपर अटल :-
तबे चारिजन बहु मिनति करिल।
स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु कभु ना मानिल ॥ 33 ॥
अनुवाद-तब उन चारोंने मिलकर बहुत प्रार्थना
की, परन्तु महाप्रभु तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उन्होंने
किसीकी भी बात नहीं मानी ॥ 33 ॥
श्रीनित्ताइकी अन्तिम प्रार्थना :-
तबे नित्यानन्द कहे, - "ये आज्ञा तोमार।
दुःख-सुख ये हउक्, कर्त्तव्य आमार ॥ 34 ॥
किन्तु एक निवेदन करों आर बार।
विचार करिया ताहा कर अङ्गीकार ॥ 35 ॥
कौपीन-बहिर्वास और जलपात्रको उठानेके लिये अपने
साथ किसीको ले जानेकी प्रार्थना :-
कौपीन, बहिर्वास आर जलपात्र।
आर किछु नाहि याबे, सबे एइ मात्र ॥ 36 ॥
214 ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

सातवाँ अध्याय 7/34–42 ]
महाप्रभुके द्वारा संख्या नाम-जप :-
तोमार दुइ हस्त बद्ध नाम-गणने।
जलपात्र-बहिर्वास वहिबे केमने ॥ 37 ॥
प्रेमावेशे पथे तुमि हबे अचेतन।
ए-सब सामग्री तोमार के करे रक्षण ॥ 38 ॥
अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,—“आपकी
जैसी आज्ञा। उसका पालन करना हमारा कर्तव्य है,
चाहे हमें दुःख हो या सुख हो। परन्तु एक बार मैं
फिरसे कुछ निवेदन करता हूँ, कृपया उसपर विचार
करके उसे स्वीकार कीजिये। यदि और कुछ भी आप
साथ नहीं ले जायेंगे, तो भी कौपीन, बहिर्वास और
जलपात्र तो आप अवश्य ही साथ ले जायेंगे। आपके
दोनों हाथ तो नाम करने और संख्या गिननेमें बँधे
रहेंगे, फिर आप जलपात्र और बहिर्वास कैसे उठायेंगे?
प्रेमाविष्ट होकर जब आप मार्गमें अचेतन हो जायेंगे,
तब आपकी इन सब वस्तुओंकी रक्षा कौन
करेगा ? ॥ 34-38 ॥
अनुभाष्य—नाम-संख्या गिननेके लिये महाप्रभुके
दोनों हाथ बँधे रहते, इसलिये यदि कोई दूसरा व्यक्ति
कमण्डलु और बहिर्वासादिको (कौपीन-धोती आदिको)
नहीं उठायेगा, तो आवश्यकताके समय महाप्रभुको ये
व्यवहार करनेवाली वस्तुएँ नहीं मिलेंगी। प्रेमावेशमें
अचेतन होनेपर उस समय इन वस्तुओंकी रक्षाके लिये
किसी व्यक्तिकी आवश्यकता है। श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा
किये गये नाम-संख्याकी गणनाके सम्बन्धमें
श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें कहा गया है—“वध्नन् प्रेमभरप्रकम्पितकरो
ग्रन्थीन् कटीडोरकैः संख्यातुं निजलोकमङ्गल-हरेकृष्णेति
नाम्नां जपन्” अर्थात् “समस्त जगत्का मङ्गल करनेवाले
अपने पवित्र नाम—हरे कृष्ण महामन्त्रका जप करते हुए
नाम संख्या गणना करनेके लिये जब वे गाँठयुक्त
कटिडोरीका स्पर्श करते हैं, तो उनके हाथ प्रेमावेशमें
काँपते हैं।” आदि वाक्य, और स्तवमालामें—“हरे
कृष्णेत्युच्चैः स्फुरितरसनो नामगणनाकृत-ग्रन्थिश्रेणी-
सुभगकटिसूत्रोज्ज्वलकरः” अर्थात् “उच्च स्वरसे हरे
कृष्ण नाम उच्चारण करते हुए उनकी रसना नृत्य
करती है और उच्चारित नामकी गणनाके लिये गाँठयुक्त
कटि-सूत्रमें उनका सुन्दर बायाँ हाथ सुशोभित हो रहा
है॥” आदि चैतन्याष्टक श्लोक आलोच्य हैं॥ 37-38 ॥
कृष्णदास-ब्राह्मणको साथ लेनेके लिये अनुरोध :-
‘कृष्णदास’-नामे एइ सरल ब्राह्मण।
इँहो सङ्गे करि’ लह, धर निवेदन ॥ 39 ॥
जलपात्र-वस्त्र वहि’ तोमा-सङ्गे याबे।
ये तोमार इच्छा कर, किछु ना बलिबे ॥” 40 ॥
अनुवाद—'कृष्णदास'-नामका यह एक सरल ब्राह्मण
है। इसे अपने साथ ले जाइये, यही मेरी प्रार्थना है।
यह आपके जलपात्र और वस्त्र उठाकर आपके साथ
चलेगा। आपकी जैसी इच्छा हो वैसा ही करना, यह
आपको कुछ भी नहीं कहेगा॥” 39-40 ॥
अनुभाष्य—यह कालाकृष्णदास ब्राह्मण और आदिलीला
11/37 संख्यामें वर्णित नित्यसिद्ध व्रजसखा द्वादश
गोपालोंमें अन्यतम, श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके प्राण
स्वरूप हैं,—वे कालाकृष्णदास, ये दोनों पृथक् व्यक्ति हैं।
पहलेवाले ब्राह्मण बादमें गौड़देश (बङ्गालमें) गये थे,
इस विषयमें मध्यलीला 10/62-74 संख्या देखें॥ 39 ॥
महाप्रभुके द्वारा स्वीकार :-
तबे ताँर वाक्य प्रभु करि’ अङ्गीकारे।
ताहा-सबा लञा गेला सार्वभौम-घरे ॥ 41 ॥
श्रीसार्वभौमके घरमें गमन :-
नमस्करि’ सार्वभौम आसन निवेदिल।
सबाकारे मिलि’ तबे आसने बसिल ॥ 42 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बातको
मान लिया और उन सबको साथ लेकर वे श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यके घर गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने प्रणाम
करके महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन प्रदान किया
। 215

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ (Text) प्रस्तुत है:

[ 7/41–53 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
और फिर बाकी सबको आसन देकर वे स्वयं भी बैठ
गये॥ 41-42॥
भट्टाचार्यसे विदायीकी याचना :—
नाना कृष्णवार्त्ता प्रभु कहिल ताँहारे।
“तोमार ठाञि आइलाङ आज्ञा मागिबारे॥ 43॥
विश्वरूपको ढूँढ़नेका छल :—
संन्यास करि' विश्वरूप गियाछे दक्षिणे।
अवश्य करिब आमि ताँर अन्वेषणे॥ 44॥
आज्ञा देह, अवश्य आमि दक्षिणे चलिब।
तोमार आज्ञाते शुभे लेउटि' आसिब॥”45॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौमके साथ बहुतसी
श्रीकृष्ण विषयक चर्चा की और तब उनसे कहा,—“मैं
आपके पास एक आज्ञा माँगने आया हूँ। मेरे ज्येष्ठ
भ्राता विश्वरूप संन्यास लेकर दक्षिण भारतमें गये थे,
मुझे उन्हें ढूँढ़ने अवश्य ही जाना है। आप मुझे आज्ञा
दीजिये कि मैं उन्हें ढूँढ़ने दक्षिण भारतमें जाऊँ।
आपकी आज्ञासे सफल होकर वापिस लौट
आऊँगा॥”43-45॥
अनुभाष्य—‘लेउटि'—पश्चिम भारतीय (हिन्दी भाषाका)
शब्द ‘लौटना’ या वापिस आना॥ 45॥
भट्टाचार्यकी विरह-दुःखपूर्ण उक्ति :—
शुनि' सार्वभौम हैला अत्यन्त कातर।
चरणे धरिया कहे विषाद-उत्तर॥ 46॥
“बहुजन्मरे पुण्यफले पाइ तोमार सङ्ग।
हेन-सङ्ग विधि मोर करितेक भङ्ग॥ 47॥
शिरे वज्र पड़े यदि, पुत्र मरि' याय।
ताहा सहि, तोमार विच्छेद सहन ना याय॥ 48॥
महाप्रभुको कुछ दिन रुकनेके लिये अनुरोध :—
स्वतन्त्र-ईश्वर तुमि करिबे गमन।
दिन-कथो रह, देखि तोमार चरण॥”49॥
अनुवाद—महाप्रभुकी बात सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य
अत्यन्त दुःखी हुए और उनके चरण पकड़कर बड़े
दुःखसे कहने लगे,—“बहुत जन्मोंके पुण्योंके फलस्वरूप
मुझे आपका सङ्ग प्राप्त हुआ है, परन्तु इस सङ्गको
विधाता अब भङ्ग कर रहे हैं। यदि मेरे मस्तकपर
वज्रपात हो अथवा मेरा पुत्र मर जाय, मैं उसे सहन
कर सकता हूँ, परन्तु आपका वियोग सहन नहीं कर
सकता। आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, इसलिये आपने
जानेका निश्चय किया है, तो आप अवश्य ही जायेंगे।
परन्तु कृपा करके आप कुछ दिन और यहाँ रुक
जाँय, जिससे मैं आपके चरणोंका दर्शन कर
सकूँ॥”46-49॥
महाप्रभुकी सम्मति :—
ताहार विनये प्रभुर शिथिल हैल मन।
रहिल दिवस-कथो, ना कैल गमन॥ 50॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी विनती सुनकर
महाप्रभुके मनका सङ्कल्प शिथिल हो गया और वे उसी
समय न जाकर कुछ दिनोंके लिये वहीं रह गये॥ 50॥
भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण और
उनकी गृहिणीके द्वारा रसोई बनाना :—
भट्टाचार्य आग्रह करि' करेन निमन्त्रण।
गृहे पाक करि' प्रभुके करा'न भोजन॥ 51॥
ताँहार ब्राह्मणी, ताँर नाम—‘षाठीर माता’।
रान्धि' भिक्षा देन तेंहो, आश्चर्य ताँर कथा॥ 52॥
आगे त' कहिब ताहा करिया विस्तार।
एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-समाचार॥ 53॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने आग्रह करके
महाप्रभुको अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया और तब
अपने घरमें ही रसोई बनाकर महाप्रभुको भोजन
कराया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पत्नी जिनको ‘षाठीकी
माता’ भी कहते थे, महाप्रभुको भोजन बनाकर देती
थीं। उनकी भी एक आश्चर्यमय कथा है, जिसका मैं
216 ।

सातवाँ अध्याय 7/51-63 ]
बादमें विस्तारसे वर्णन करूँगा। अब मैं महाप्रभुकी महाप्रभुकी आलालनाथ होते हुए दक्षिणकी यात्रा :-
दक्षिण यात्राके विषयमें वर्णन करता हूँ॥ 51-53 ॥ समुद्र-तीरे-तीरे आलालनाथ-पथे।
सार्वभौम कहिलेन आचार्य-गोपीनाथे ॥ 59 ॥
पाँच दिनके बाद पुनः विदायीकी प्रार्थना :-
श्रीसार्वभौमका घरमें रखे चार कौपीन-बहिर्वास
दिन पाँच रहि' प्रभु भट्टाचार्य-स्थाने। श्रीगोपीनाथके द्वारा मँगवाकर महाप्रभुको प्रदान करना :-
चलिबार लागि' आज्ञा मागिला आपने ॥ 54 ॥ "चारि कोपीन-बहिर्वास राखियाछि घरे।
भट्टाचार्यकी सम्मति :- ताहा, प्रसादान्न, लञा आइस विप्रद्वारे ॥" 60 ॥
प्रभुर आग्रहे भट्ट सम्मत हइला।
अनुवाद-महाप्रभु समुद्रके तटके साथ-साथ
प्रभु ताँरे लञा जगन्नाथ-मन्दिरे गेला ॥ 55 ॥
आलालनाथ जानेवाले मार्गपर चले। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें पाँच दिन श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,-"घरमें चार कौपीन और
रहकर महाप्रभुने स्वयं उनसे चलनेकी आज्ञा माँगी। बहिर्वास रखे हैं, उसे और प्रसाद-अन्नको किसी
महाप्रभुके यात्रापर जानेका आग्रह करनेपर श्रीसार्वभौम ब्राह्मणकी सहायतासे ले आइये ॥" 59-60 ॥
भट्टाचार्य सहमत हो गये। तब महाप्रभु उनको साथ
अमृतप्रवाह भाष्य-समुद्रतटके साथ-साथ होते हुए
लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिर गये ॥ 54-55 ॥
दक्षिणकी ओर जानेपर पुरीसे छह कोसकी दूरीपर
'आलालनाथ' ग्राम है। 'आलालनाथ'में-चतुर्भुज-वासुदेव-
महाप्रभुके द्वारा श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जाकर उनसे यात्राकी
विग्रह है। वनके बीचमें एक छोटेसे गाँवमें उनका
आज्ञाकी याचना और प्रसादी-माला प्राप्तकर मन्दिरकी
मन्दिर है और उन्हें वहाँ बहुत ही उत्तम खीरका भोग
परिक्रमाकर यात्रा आरम्भ :-
लगता है। वहाँके पण्डे अभी भी (ठाकुरजीके अङ्गोंपर
दर्शन करि' ठाकुर-पाश आज्ञा मागिला।
पड़े) गर्म खीरके दाग श्रीविग्रहमें दिखलाते हैं॥ 59 ॥
पूजारी माला-प्रसाद प्रभुरे आनि' दिला ॥ 56 ॥
आज्ञा-माला पाञा हर्षे नमस्कार करि'। रायरामानन्दके साथ मिलनेके लिये श्रीसार्वभौमका
महाप्रभुसे अनुरोध :-
आनन्दे दक्षिण-देशे चले गौरहरि ॥ 57 ॥
तबे सार्वभौम कहे प्रभुर चरणे।
भट्टाचार्य-सङ्गे आर यत निजगण।
"अवश्य पालिबे, प्रभु, मोर निवेदने ॥ 61 ॥
जगन्नाथ प्रदक्षिण करि' करिला गमन ॥ 58 ॥
'रामानन्द राय' आछे गोदावरी-तीरे।
अनुवाद-महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवका दर्शनकर उनसे अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे ॥ 62 ॥
जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब पुजारीने श्रीजगन्नाथदेवकी शूद्र विषयि-ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे।
माला और प्रसाद लाकर उन्हें प्रदान किया। मालाके आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥ 63 ॥
रूपमें श्रीजगन्नाथदेवकी आज्ञा पाकर महाप्रभुने हर्षित
अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे प्रार्थना
होकर उन्हें प्रणाम किया। तब महाप्रभु आनन्दसे
करते हुए कहा,-"मेरा एक निवेदन आप अवश्य ही
दक्षिण देशकी यात्राके लिये तत्पर हुए। महाप्रभु अपने
स्वीकार करना, गोदावरी-तटपर स्थित विद्यानगरके
भक्तों और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीजगन्नाथदेवकी अधिकारी 'रामानन्दराय' हैं। मेरी बात मानकर आप
प्रदक्षिणा करके यात्राके लिये चल दिये॥ 56-58 ॥
॥ 217

[ 7/61-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
उनसे अवश्य ही मिलना, शूद्र और विषयी जानकर
आप उनकी उपेक्षा मत करना ॥ 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'अधिकारी'—राजाका प्रधान
कर्मचारी। विद्यानगरको आजकल 'पोरबन्दर' कहते
हैं ॥ 62 ॥
अनुभाष्य—'शूद्र'—उत्कल देश (उड़ीसा)के समाजमें
करण-जातिको 'शौक्र-शूद्र' (जन्मके कारण शूद्र) कहा
जाता है। श्रीराम force? श्रीरामानन्द करण-जातिमें जन्में थे; इसलिये
लौकिक-दृष्टिसे वे शौक्रशूद्र होनेपर भी वास्तवमें
ब्राह्मण अथवा ब्राह्मणोंके भी गुरु परमहंस-वैष्णव थे।
'विषयी'—स्त्री-पुत्रादिकी बातोंमें रत अथवा
बाह्य-रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श आदि विषयोंमें ज्ञानेन्द्रियोंको
युक्त करके उनमें प्रमत्त रहनेवालेको 'विषयी' कहते हैं।
श्रीरामानन्द बाहरी दृष्टिसे कौपीनधारी संन्यासी नहीं थे,
इसलिये लौकिक दृष्टिसे वे राजाके सेवक होनेके
कारण विषयी दिखते थे, किन्तु वास्तवमें वे परम
विद्वान अथवा नरोत्तम-संन्यासी थे।
सार्वभौम भट्टाचार्यने पहले स्वयं वैष्णव नहीं होनेपर
भी श्रीरामानन्द रायको वैष्णव जाना था। और फिर,
महाप्रभुकी कृपासे भक्त बननेके बाद श्रीरामानन्दकी
बातोंपर विचार करके उनको 'अधिकारी रसिकभक्त'के
रूपमें समझा था ॥ 63 ॥
राय-रामानन्दकी प्रशंसा :-
तोमार सङ्गेर योग्य तेंहो एकजन।
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम ॥ 64 ॥
पाण्डित्य आर भक्तिरस, —दुँहेर तेंहो सीमा।
सम्भाषिले जानिबे तुमि ताँहार महिमा ॥ 65 ॥
पहले वैष्णवोंको स्मार्त्त व्यक्तियोंकी अपेक्षा छोटा माननेके
कारण भट्टाचार्यके द्वारा उनका उपहास :-
अलौकिक वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया।
परिहास करियाछि ताँरे 'वैष्णव' जानिया ॥ 66 ॥
बादमें महाप्रभुकी कृपासे चिन्मय-वैष्णवकी
महिमाकी उपलब्धि :-
तोमार प्रसादे एबे जनिनु ताँर तत्त्व।
सम्भाषिले जानिबे ताँर येमन महत्त्व ॥ 67 ॥
अनुवाद—रामानन्दराय ही एकमात्र आपके सङ्ग
करने योग्य हैं, पृथ्वीपर उनके समान कोई भी रसिक
भक्त नहीं है। वे पाण्डित्य और भक्तिरस—दोनोंकी चरम
सीमा हैं। उनसे बातचीत करनेपर आप स्वयं ही उनकी
महिमा जान जायेंगे। मैं उनके अलौकिक वचनों और
क्रिया-कलापोंको समझ नहीं पाता था तथा मैं उन्हें
'वैष्णव' मानकर उनका उपहास करता था। अब
आपकी कृपासे मैं राय रामानन्दकी महिमाको समझ
सका हूँ। उनके साथ वार्त्तालाप करके आप भी उनकी
महिमाको जान पायेंगे ॥ 64-67 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभुसे विमुख प्रकृति-वादी ज्ञानी
और कर्मी लोग श्रीचैतन्याश्रित वैष्णवोंका ऐसे ही
उपहास किया करते हैं। महाप्रभुसे विमुख लोग—प्रत्यक्ष
और अनुमानको ही सर्वस्व माननेवाले जड़ेन्द्रियोंसे
प्राप्त ज्ञानमें ही मत्त तर्कपन्थी हैं। श्रीचैतन्याश्रित वैष्णव
शब्दप्रमाणको आश्रय माननेवाले अधोक्षज भगवान्के
सेवक और श्रौतपन्थी हैं ॥ 66 ॥
महाप्रभुके द्वारा उनके वाक्य-पालनकी सम्मति :-
अङ्गीकार करि' प्रभु ताँहार वचन।
ताँरे विदाय दिते ताँरे कैल आलिङ्गन ॥ 68 ॥
महाप्रभुके द्वारा गृहस्थ-वैष्णवको सम्मान :-
“घरे कृष्ण भजि' मोरे करिह आशीर्वादे।
नीलाचले आसिं येन तोमार प्रसादे ॥” 69 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बातको
मानकर उन्हें विदायी देनेके लिये उनका आलिङ्गन
करके कहा, —“घरमें श्रीकृष्णका भजन करते समय
आप मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहना, जिससे मैं
आपकी कृपासे पुनः नीलाचल लौट आऊँ ॥” 68-69 ॥
218 ।

सातवाँ अध्याय 7/69–77 ]
अनुभाष्य—श्रीकृष्णसेवक बाहरी दृष्टिसे गृहस्थ
आश्रमको अलङ्कृत (अर्थात् उसे स्वीकार करके उसकी
महिमा वर्धित) करनेपर भी, वास्तवमें इन्द्रियोंके दास
गृहव्रती या घर-परिवारमें ही आसक्त बुद्धिवाले गृहमेधी
व्यक्तियोंके समान नहीं है। “ये दिन गृहे भजन देखि,
गृहेते गोलोक भाय” (ठाकुर श्रील भक्तिविनोद द्वारा
रचित शरणागतिका कीर्तन)—गृहस्थ-वैष्णव ही इस
बातका तन-मन-वचनसे कीर्तन करनेके एकमात्र
अधिकारी हैं। इसलिये महाप्रभुके पदाश्रित यथार्थ
शुद्धवैष्णव-गृहस्थ संन्यासियोंके भी आदरणीय और गुरु
हैं। श्रीकृष्णभजनकी महिमाको नहीं जाननेवाले जीवोंको
शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने सार्वभौम भट्टाचार्यसे
आशीर्वादकी भिक्षा माँगकर इसे दिखलाया॥ 69 ॥
महाप्रभुकी यात्रा और श्रीसार्वभौमकी मूर्च्छा :—
एत बलि' महाप्रभु करिला गमन।
मूर्च्छित हञा ताँहा पड़िला सार्वभौम ॥ 70 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु आगे चल पड़े।
उनके विरहको सहन न कर पानेसे उसी समय
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े॥ 70 ॥
निरपेक्ष महाप्रभु :—
ताँरे उपेक्षिया कैल शीघ्र गमन।
के बुझिते पारे महाप्रभुर चित्त-मन ॥ 71 ॥
महानुभावेर चित्तेर स्वभाव एइ हय।
पुष्प-सम कोमल, कठिन वज्रमय ॥ 72 ॥
अनुवाद—महाप्रभु उसे अनदेखा करके शीघ्रतासे
वहाँसे चले गये। महाप्रभुके चित्त और मनके रहस्यको
कौन जान सकता है? महानुभाव व्यक्तियोंके चित्तका
स्वभाव ही ऐसा होता है, वे कभी पुष्पके समान कोमल
और कभी वज्रके समान कठोर होते हैं॥ 71-72 ॥
अनुभाष्य—'महाप्रभुकी निरपेक्षता'—मध्यलीला 3/212
संख्या देखें॥ 71-72 ॥
परस्पर विरुद्ध-धर्मके समाश्रय भगवान्‌की भाँति
भगवद्भक्त भी कोमल और कठोर :—
भवभूतिकृत 'उत्तर-रामचरित्र'के तृतीयांकमें 2/7-23वाँ श्लोक
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमीश्वरः ॥ 73 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अलौकिक पुरुषोंका चित्त वज्रसे
भी कठोर और कुसुमसे भी कोमल होता है; अन्य
लोग उसको समझनेके योग्य नहीं होते॥ 73 ॥
अनुभाष्य—
वज्रात् अपि कठोराणि, कुसुमात् (पुष्पात्) अपि मृदूनि
(कोमलानि); लोकोत्तराणां (असाधारणालौकिकानां) चेतांसि
(अन्तःकरणानि) विज्ञातुं (बोद्धुं) कः हि ईश्वरः (समर्थः)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥
श्रीनिताइके द्वारा श्रीसार्वभौमको घर भेजना :—
नित्यानन्दप्रभु भट्टाचार्ये उठाइल।
ताँर लोकसङ्गे ताँरे घरे पाठाइल ॥ 74 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको
उठाया और उनके लोगोंके साथ उन्हें घर भेज
दिया॥ 74 ॥
भक्तोंके साथ आलालनाथ-आगमन :—
भक्तगण शीघ्र आसि' लैल प्रभुर साथ।
वस्त्र-प्रसाद लञा तबे आइला गोपीनाथ ॥ 75 ॥
सबा-सङ्गे प्रभु तबे आलालनाथ आइला।
नमस्कार करि' तारे बहुस्तुति कैला ॥ 76 ॥
आलालनाथ नारायण-दर्शनसे महाप्रभुका
स्तव-नृत्य-गीत :—
प्रेमावेशे नृत्यगीत कैल কতক्षण।
देखिते आइला ताँहा कैसे यत जन ॥ 77 ॥
अनुवाद—सभी भक्त जल्दीसे आकर महाप्रभुके
साथ हो लिये। वस्त्र और प्रसाद लेकर श्रीगोपीनाथाचार्य
। 219

[ 7/75-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

भी तब वहाँ आ पहुँचे। सबको साथ लेकर महाप्रभु
आलालनाथ आ गये और उनको प्रणाम करके उनकी
बहुत स्तव-स्तुति की। प्रेमावेशमें महाप्रभुने कुछ देर
तक नृत्य-गीत किया और वहाँ रहनेवाले सभी लोग
उनके दर्शनके लिये आये॥ 75-77 ॥
अनुभाष्य—'साथ'—सङ्ग या साथ॥ 75॥

महाप्रभुके दर्शनोंके लिये बहुत लोगोंका
आगमन और हरि-सङ्कीर्तन :—
चौदिकेते सब लोक बले 'हरि' 'हरि'।
प्रेमावेशे मध्ये नृत्य करे गौरहरि ॥ 78 ॥
काञ्चन-सदृश देह, अरुण वसन।
पुलकाश्रु-कम्प-स्वेद ताहाते भूषण ॥ 79 ॥
देखिते लोकेर मने हैल चमत्कार।
यत लोक आइसे, केह नाहि याय घर ॥ 80 ॥
केह नाचे, केह गाय, 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल'।
प्रेमेते भासिल लोक, स्त्री-वृद्ध-आबाल ॥ 81 ॥
देखि' नित्यानन्द प्रभु कहे भक्तगणे।
“एइरूपे नृत्य आगे हबे ग्रामे ग्रामे ॥” 82 ॥

अनुवाद—चारों ओर सब लोक 'हरि' 'हरि' बोलने
लगे और उनके बीचमें श्रीगौरहरि प्रेमाविष्ट होकर नृत्य
कर रहे थे। स्वर्णके समान महाप्रभुकी देह और उसके
ऊपर अरुण वर्णके वस्त्र थे तथा पुलक, अश्रु, कम्प,
स्वेदादि अष्ट-सात्त्विकभाव उनके भूषणस्वरूप थे।
महाप्रभुके ऐसे अद्भुत रूप और भावोंको देखकर
लोगोंका मन चमत्कृत हो रहा था और कोई भी अपने
घर लौटना नहीं चाह रहा था। कुछ लोग नृत्य कर
रहे थे, कुछ लोग 'श्रीकृष्ण' 'गोपाल' नामका सङ्कीर्तन
कर रहे थे। इस प्रकार बालक-स्त्री-वृद्ध, सभी प्रेममें
डूब रहे थे। यह देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने भक्तोंसे
कहा कि अब तो गाँव-गाँवमें जहाँ महाप्रभु जायेंगे, इसी
प्रकार नृत्य होगा॥” 78-82 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/25 संख्या देखें ॥ 81 ॥

महाप्रभुको छोड़नेकी लोगोंमें अनिच्छा देखकर प्रसाद
पवानेके छलसे महाप्रभुको वहाँसे हटाना :—
अतिकाल हैल, लोक छाड़िया ना याय।
तबे नित्यानन्द-गोसाञि सृजिल उपाय ॥ 83 ॥
मध्याह्न करिते गेला प्रभुके लञा।
ताहा देखि' लोक आइसे चौदिके धाञा ॥ 84 ॥

भक्तोंका मन्दिरके भीतर प्रवेश :—
मध्याह्न करिते आइला देवता-मन्दिरे।
निजगण प्रवेशि' कपाट दिल बहिर्द्वारे ॥ 85 ॥

अनुवाद—श्रीनित्यानन्द गोसांईने देखा कि बहुत
समय हो गया है, तो उन्होंने एक उपाय निकाला
जिससे लोग महाप्रभुको छोड़ दें। वे महाप्रभुको
दोपहरका स्नान करानेके लिये ले चले, ऐसा देखकर
लोग चारों ओरसे दौड़कर उधर ही आने लगे।
दोपहरका स्नान करनेके बाद वे वापिस मन्दिरमें आ
गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपने साथ आये लोगोंको
प्रवेश करवाके बाहरका द्वार बन्द कर दिया ॥ 83-85 ॥
अनुभाष्य—'अतिकाल'—अधिक समय व्यतीत हो
जानेपर ॥ 83 ॥

श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको भिक्षा प्रदान;
भक्तोंको महाप्रभुके अवशेषकी प्राप्ति :—
तबे दुइ प्रभुरे गोपीनाथ भिक्षा कराइल।
प्रभुर शेष प्रसादान्न सबे बाँटि' खाइल ॥ 86 ॥

अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभु एवं
श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंको भोजन कराया और उनके
उच्छिष्ट अन्न-प्रसादको सब भक्तोंने बाँटकर खा
लिया ॥ 86 ॥

मन्दिरके बाहर महाप्रभुके दर्शनोंके लिये
अनेक लोगोंका समागम :—
शुनि' शुनि' लोक-सब आसि' बहिर्द्वारे।
'हरि' 'हरि' बलि' लोक कलरव करे ॥ 87 ॥

अनुवाद—महाप्रभुके आगमनकी बातको सुनकर

220 ।

सातवाँ अध्याय 7/87-96 ]
सब लोग मन्दिरके बाहिरी द्वारपर एकत्रित हो गये और
'हरि' 'हरि' बोलकर कोलाहल करने लगे॥ 87॥
मन्दिरके द्वारका खुलना और सभीको
महाप्रभुका दर्शन प्राप्त :—
तबे महाप्रभु द्वार कराइल मोचन।
आनन्दे आसिया लोक पाइल दरशन ॥ 88 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने मन्दिरका द्वार खुलवा
दिया और सभी लोगोंने आकर आनन्दपूर्वक महाप्रभुके
दर्शन किये॥ 88॥
सारा दिन लोगोंको महाप्रभुके दर्शनके
फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :—
एइमत सन्ध्या पर्यन्त लोक आसे, याय।
‘वैष्णव’ हइल लोक, सबे नाचे, गाय ॥ 89 ॥
अनुवाद—इस प्रकार सायंकाल तक लोग आते-जाते
रहे और महाप्रभुकी कृपासे सभी ‘वैष्णव’ भक्त बनकर
नाचने-गाने लगे॥ 89 ॥
आलालनाथमें भक्तोंके साथ रात्रिवास :—
एइरूपे सेइ ठाञि भक्तगण-सङ्गे।
सेइ रात्रि गोङाइल कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 90 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने वह रात वहीं
बितायी और सारी रात भक्तोंके साथ श्रीकृष्णकथाका
आनन्द लेते रहे॥ 90 ॥
प्रातः पुनः यात्रा :—
प्रातःकाले स्नान करि’ करिला गमन।
भक्तगणे विदाय दिला करि’ आलिङ्गन ॥ 91 ॥
अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने स्नान
करके सभी भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी ली और
दक्षिण भारतकी यात्रापर चल दिये॥ 91 ॥
महाप्रभुकी निरपेक्षता :—
मूर्च्छित हञा सबे भूमते पड़िला।
ताँहा-सबा पाने प्रभु फिरि’ ना चाहिला ॥ 92 ॥
अनुवाद—सभी भक्त मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर
पड़े, परन्तु महाप्रभुने उन्हें मुड़कर भी नहीं देखा और
अपनी यात्रापर अग्रसर हुए॥ 92 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 3/212 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥ 92 ॥
महाप्रभुके पीछे-पीछे जल-पात्रादि-वाहक कृष्णदास :—
विच्छेदे व्याकुल प्रभु चलिला दुःखी हञा।
पाछे कृष्णदास याय जलपात्र लञा ॥ 93 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णविरहमें व्याकुल महाप्रभु दुःखी
होकर चल रहे थे और उनका सेवक कृष्णदास
जलपात्रको हाथमें लेकर उनके पीछे-पीछे चल रहा
था॥ 93 ॥
उस दिन भक्तोंका उपवास और बादमें पुरी-गमन :—
भक्तगण उपवासी ताँहाइ रहिला।
आर दिने दुःखी हञा नीलाचले आइला ॥ 94 ॥
अनुवाद—उस दिन सभी भक्त वहीं आलालानाथमें
ही रहे और सबने उपवास किया। अगले दिन दुःखी
होकर सभी नीलाचल लौट आये॥ 94 ॥
मत्तसिंह-प्राय प्रभु करिला गमन।
प्रेमावेशे याय करि’ नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 95 ॥
अनुवाद—मत्तसिंहकी भाँति महाप्रभु यात्रामें चल
दिये। प्रेमाविष्ट होकर नाम-सङ्कीर्तन करते हुए वे चले
जा रहे थे॥ 95 ॥
श्रीमुख कीर्त्तित-श्लोक :—
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे।
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे॥
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! रक्ष माम्।
। 221

[ 7/96-103
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण!
कृष्ण! कृष्ण! पाहि माम्॥
राम! राघव! राम! राघव!
राम! राघव! रक्ष माम्।
कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव!
कृष्ण! केशव! पाहि माम् ॥96॥

अनुवाद—महाप्रभु इस प्रकार कीर्तन कर रहे थे—
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे।
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे॥
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरी रक्षा करो।
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! मेरा पालन करो॥
राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! मेरी रक्षा करो।
कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! मेरा पालन करो॥96॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'रक्ष मां'—मेरी रक्षा करो; 'पाहि मां'—मेरा पालन करो॥96॥

लोगोंको हरिनाम दान :-
एइ श्लोक पथे पड़ि' चलिला गौरहरि।
लोक देखि' पथे कहे,—बल 'हरि' 'हरि' ॥97॥

महाप्रभुके मुखसे नाम-श्रवण करनेसे लोगोंके द्वारा हरिनाम-ग्रहण :-
सेइ लोक प्रेममत्त हञा बले 'हरि' 'कृष्ण'।
प्रभुर पाछे सङ्गे याय दर्शन-सतृष्ण ॥98॥

महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारसे उस वैष्णवके द्वारा उसके ग्राममें सभीको वैष्णवताकी प्राप्ति :-
कतक्षणे रहि' प्रभु तारे आलिङ्गिया।
विदाय करिल तारे शक्ति सञ्चारिया ॥99॥

सेइजन निज-ग्रामे करिया गमन।
'कृष्ण' बलि' हासे, कान्दे, नाचे अनुक्षण॥100॥
यारे देखे, तारे कहे,—कह कृष्णनाम।
एइमत 'वैष्णव' कैल सब निज-ग्राम ॥101॥

अनुवाद—इस श्लोकका उच्चारण करते-करते श्रीगौरहरि अपने मार्गपर चले जा रहे थे। मार्गमें जिस किसी व्यक्तिको देखते, उसे भी 'हरि' 'हरि' बोलनेके लिये कहते। महाप्रभुको 'हरि' 'हरि' बोलते सुनकर वह व्यक्ति भी प्रेममें उन्मत्त होकर 'हरि' 'कृष्ण' बोलने लगता। इस प्रकार महाप्रभुके दर्शनके लिये उत्कण्ठित होकर वह उनके पीछे-पीछे चलने लगता। कुछ समयके बाद महाप्रभु उसका आलिङ्गन करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चार कर देते और उसे अपने घर जानेके लिये विदा कर देते। महाप्रभुसे शक्ति प्राप्तकर वह व्यक्ति अपने ग्राममें जाकर 'श्रीकृष्ण'-नामका कीर्तन करते हुए कभी हँसता, कभी रोता, तो कभी नृत्य करने लगता। वह जिसे भी देखता, उसे श्रीकृष्णनाम कहनेको कहता। इस प्रकार वह अपने सारे ग्रामवासियोंको वैष्णव बना देता॥97-101॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्ति सञ्चारिया'—ह्लादिनी-शक्तिका सारभाग और संवित्-शक्तिका सारभाग—दोनों मिलनेपर 'भक्ति-शक्ति' होती है। श्रीकृष्ण या भक्त कृपा करके उस शक्तिका जिसमें सञ्चार करते हैं, वह 'परमभक्त' बन जाता है। महाप्रभु जिसपर कृपा करते थे, उसमें वैसी शक्ति सञ्चार करके वैष्णवधर्मके प्रचारका भार अर्पण करते थे॥99॥

अन्य ग्रामवासियोंकी भी उस वैष्णव-दर्शनके कृपारूपी फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :-
ग्रामान्तर हैते देखिते आइल यत जन।
ताँर दर्शन-कृपाय हय ताँर सम ॥102॥

इस प्रकार सभी दक्षिण-भारतवासियोंका उद्धार और उन्हें वैष्णवताकी प्राप्ति :-
सेइ याइ' ग्रामेर लोक वैष्णव करय।
अन्यग्रामी आसि' ताँरे देखि' वैष्णव हय ॥103॥

222 ।

सातवाँ अध्याय [7/102-112 ]

सेइ याइ' अन्य ग्रामे करे उपदेश।
एइमत 'वैष्णव' हैल सब दक्षिण-देश॥ 104॥

**अनुवाद—**दूसरे गाँवोंसे भी जो लोग इन महाप्रभुसे शक्ति-प्राप्त वैष्णवके गाँवमें आते, वे भी इसके दर्शनरूपी कृपासे उसके समान वैष्णव बन जाते। जब ये वैष्णव अपने गाँवमें जाते, तो वे भी अपने गाँवके सभी लोगोंको वैष्णव बना देते। इसी प्रकार जब अन्य गाँवोंके लोग इनका दर्शन करने आते, तो वे भी वैष्णव बन जाते। इस प्रकार वैष्णव बन जानेके बाद वे दूसरे गाँवोंमें जाकर श्रीकृष्णनामका उपदेश करने लगते। इस प्रकार होते-होते समस्त दक्षिणवासी वैष्णव बन गये॥ 102-104॥

महाप्रभुके द्वारा बहुत भाग्यवान् जीवोंका उद्धार :-
एइमत पथे याइते शत शत जन।
'वैष्णव' करेन ताँरे करि' आलिङ्गन॥ 105॥

**अनुवाद—**इस प्रकार मार्गपर चलते-चलते महाप्रभुने सैकड़ों लोगोंको आलिङ्गन करके वैष्णव बना दिया था॥ 105॥

महाप्रभुको भिक्षा देनेवाले दाताओंके दर्शन करनेवालोंको भी वैष्णवताकी प्राप्ति और बादमें उनके द्वारा आचार्यरूपमें बहुत लोगोंका उद्धार :-
येइ ग्रामे रहि' भिक्षा करेन याँर घरे।
सेइ ग्रामेर यत लोक आइसे देखिबारे॥ 106॥
प्रभुर कृपाय हय महाभागवत।
सेइसब आचार्य हञा तारिल जगत्॥ 107॥

इस प्रकार समस्त दक्षिणदेशका उद्धार :-
एइमत कैला यावत् गेला सेतुबन्धे।
सर्वदेश 'वैष्णव' हैल प्रभुर सम्बन्धे॥ 108॥

**अनुवाद—**महाप्रभु जिस गाँवमें रहकर भिक्षा ग्रहण करते, उस गाँवके जितने लोग उनका दर्शन करने आते, महाप्रभुकी कृपासे वे सब महाभागवत बन जाते। बादमें उन सबने आचार्य बनकर जगत्‌का उद्धार किया। इस प्रकार सबपर कृपा करते हुए महाप्रभु सेतुबन्ध तक गये और उनके प्रभावसे सम्पूर्ण दक्षिण-देशवासी वैष्णव बन गये॥ 106-108॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'सेतुबन्ध'—सेतुबन्ध-रामेश्वर, समुद्रके तटपर, 'राम-नद' की दूसरी ओर भारतवर्षके दक्षिण प्रान्तमें है॥ 108॥

महाप्रभुकी कृपा-महिमा नवद्वीपकी अपेक्षा दक्षिणदेशमें अधिक प्रकाशित :-
नवद्वीप येइ शक्ति ना कैला प्रकाशे।
सेइ शक्ति प्रकाशि' निस्तारिल दक्षिणदेशे॥ 109॥

**अनुवाद—**नवद्वीपमें भी जिस शक्तिको प्रकाशित नहीं किया था, उस शक्तिको प्रकाशित करके महाप्रभुने दक्षिण भारतका उद्धार किया॥ 109॥

अमृतप्रवाह भाष्य—'नवद्वीप' धाम होनेपर भी वहाँ उस समय न्याय और स्मृति-शास्त्रोंकी विशेष प्रबलता थी। उन-उन शास्त्रोंके अध्यापकोंमें अनेक तो बहिर्मुख लोग थे, परन्तु उनका उद्धार करनेके लिये महाप्रभुने किसी विशेष शक्तिका प्रकाश नहीं किया, इसलिये ग्रन्थकारने ऐसा कहा है॥ 109॥

श्रीचैतन्य-भक्तोंको ही भगवद्-कृपाशक्तिमें विश्वास :-
प्रभुके ये भजे, तारे ताँर कृपा हय।
सेइ से ए-सब लीला सत्य करि' लय॥ 110॥

अप्राकृत-लीलामें विश्वासके फलस्वरूप ही नित्यकल्याणकी प्राप्ति, अन्यथा अक्षज-ज्ञानके द्वारा सर्वनाश :-
अलौकिक-लीलाय यार ना हय विश्वास।
इहलोक, परलोक तार हय नाश॥ 111॥
प्रथमेइ कहिल प्रभुर येरूपे गमन।
एइमत जानिह यावत् दक्षिण-भ्रमण॥ 112॥

**अनुवाद—**जो व्यक्ति महाप्रभुका भजन करता है, उसीपर उनकी कृपा होती है और वही उनकी इन सब लीलाओंपर विश्वास करता है। महाप्रभुकी इन अलौकिक

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