श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1068, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय 7/69–77 ]
अनुभाष्य—श्रीकृष्णसेवक बाहरी दृष्टिसे गृहस्थ
आश्रमको अलङ्कृत (अर्थात् उसे स्वीकार करके उसकी
महिमा वर्धित) करनेपर भी, वास्तवमें इन्द्रियोंके दास
गृहव्रती या घर-परिवारमें ही आसक्त बुद्धिवाले गृहमेधी
व्यक्तियोंके समान नहीं है। “ये दिन गृहे भजन देखि,
गृहेते गोलोक भाय” (ठाकुर श्रील भक्तिविनोद द्वारा
रचित शरणागतिका कीर्तन)—गृहस्थ-वैष्णव ही इस
बातका तन-मन-वचनसे कीर्तन करनेके एकमात्र
अधिकारी हैं। इसलिये महाप्रभुके पदाश्रित यथार्थ
शुद्धवैष्णव-गृहस्थ संन्यासियोंके भी आदरणीय और गुरु
हैं। श्रीकृष्णभजनकी महिमाको नहीं जाननेवाले जीवोंको
शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने सार्वभौम भट्टाचार्यसे
आशीर्वादकी भिक्षा माँगकर इसे दिखलाया॥ 69 ॥
महाप्रभुकी यात्रा और श्रीसार्वभौमकी मूर्च्छा :—
एत बलि' महाप्रभु करिला गमन।
मूर्च्छित हञा ताँहा पड़िला सार्वभौम ॥ 70 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु आगे चल पड़े।
उनके विरहको सहन न कर पानेसे उसी समय
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े॥ 70 ॥
निरपेक्ष महाप्रभु :—
ताँरे उपेक्षिया कैल शीघ्र गमन।
के बुझिते पारे महाप्रभुर चित्त-मन ॥ 71 ॥
महानुभावेर चित्तेर स्वभाव एइ हय।
पुष्प-सम कोमल, कठिन वज्रमय ॥ 72 ॥
अनुवाद—महाप्रभु उसे अनदेखा करके शीघ्रतासे
वहाँसे चले गये। महाप्रभुके चित्त और मनके रहस्यको
कौन जान सकता है? महानुभाव व्यक्तियोंके चित्तका
स्वभाव ही ऐसा होता है, वे कभी पुष्पके समान कोमल
और कभी वज्रके समान कठोर होते हैं॥ 71-72 ॥
अनुभाष्य—'महाप्रभुकी निरपेक्षता'—मध्यलीला 3/212
संख्या देखें॥ 71-72 ॥
परस्पर विरुद्ध-धर्मके समाश्रय भगवान्की भाँति
भगवद्भक्त भी कोमल और कठोर :—
भवभूतिकृत 'उत्तर-रामचरित्र'के तृतीयांकमें 2/7-23वाँ श्लोक
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमीश्वरः ॥ 73 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अलौकिक पुरुषोंका चित्त वज्रसे
भी कठोर और कुसुमसे भी कोमल होता है; अन्य
लोग उसको समझनेके योग्य नहीं होते॥ 73 ॥
अनुभाष्य—
वज्रात् अपि कठोराणि, कुसुमात् (पुष्पात्) अपि मृदूनि
(कोमलानि); लोकोत्तराणां (असाधारणालौकिकानां) चेतांसि
(अन्तःकरणानि) विज्ञातुं (बोद्धुं) कः हि ईश्वरः (समर्थः)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 73 ॥
श्रीनिताइके द्वारा श्रीसार्वभौमको घर भेजना :—
नित्यानन्दप्रभु भट्टाचार्ये उठाइल।
ताँर लोकसङ्गे ताँरे घरे पाठाइल ॥ 74 ॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको
उठाया और उनके लोगोंके साथ उन्हें घर भेज
दिया॥ 74 ॥
भक्तोंके साथ आलालनाथ-आगमन :—
भक्तगण शीघ्र आसि' लैल प्रभुर साथ।
वस्त्र-प्रसाद लञा तबे आइला गोपीनाथ ॥ 75 ॥
सबा-सङ्गे प्रभु तबे आलालनाथ आइला।
नमस्कार करि' तारे बहुस्तुति कैला ॥ 76 ॥
आलालनाथ नारायण-दर्शनसे महाप्रभुका
स्तव-नृत्य-गीत :—
प्रेमावेशे नृत्यगीत कैल কতক्षण।
देखिते आइला ताँहा कैसे यत जन ॥ 77 ॥
अनुवाद—सभी भक्त जल्दीसे आकर महाप्रभुके
साथ हो लिये। वस्त्र और प्रसाद लेकर श्रीगोपीनाथाचार्य
। 219