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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1055

[ 6/261-265 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मन्यमानः) आत्मकृतं (निजानुष्ठितं) विपाकं (कर्मफलं) भुञ्जानः
एव हृद्वाग्वपुभिः (कायमनोवाक्यैः) ते (तुभ्यं) नमः विदधत्
(जड़ीयाहङ्कारं त्यक्त्वा आत्मसमर्पणं कुर्वन्) यः जीवेत्, सः
मुक्तिपदे दायभाक् (योग्यपात्रः) भवति।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥261॥
महाप्रभु द्वारा भागवतके पाठका समर्थन और संरक्षण :-
प्रभु कहे,-" 'मुक्तिपदे'–इहा पाठ हय।
'भक्तिपदे' केने पड़, कि तोमार आशय ॥" 262 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उनसे कहा,-"श्लोकमें तो
'मुक्तिपदे'–यह पाठ है। आप 'भक्तिपदे' पाठ क्यों कह
रहे हैं? आपका ऐसा कहनेका क्या अभिप्राय है?"॥262॥
भट्टाचार्यकी मुक्तिके स्थानपर
भक्ति-पाठ-रक्षा करनेकी इच्छा :-
भट्टाचार्य कहे,-" 'भक्ति'-सम नहे मुक्तिफल।
भगवद्भक्तिविमुखेर हय दण्ड केवल ॥ 263 ॥
पाषण्ड, मायावादी और विष्णुविद्वेषी
दैत्यगणको सायुज्य मुक्ति :-
कृष्णेर विग्रह येइ सत्य नाहि माने।
येइ निन्दा-युद्धादिक करे ताँर सने ॥ 264 ॥
सेइ दुइर दण्ड हय-'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति'।
तार मुक्ति फल नहे, येइ करे भक्ति ॥ 265 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,-" 'भक्ति'के
समान मुक्तिका फल नहीं है। मुक्ति तो भगवद्भक्ति-विमुख
लोगोंके लिये केवल दण्डमात्र है। श्रीकृष्णके विग्रहको
जो लोग सत्य नहीं मानते और जो लोग उनकी निन्दा
एवं उनसे युद्धादि करते हैं,-इन दोनों प्रकारके
लोगोंको 'ब्रह्मसायुज्य-मुक्ति' रूप दण्ड मिलता है। परन्तु
जो भक्ति करते हैं, उसका फल ऐसी मुक्ति नहीं
है॥263-265॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीभट्टाचार्यने कहा,- (प्रेम)-भक्ति
ही भक्तिका सर्वोत्तम फल है, मुक्ति भक्तिका फल नहीं
है। भगवद्भक्तिसे विमुख व्यक्तिके लिये सायुज्यमुक्ति
केवल एक प्रकारका दण्ड है॥ 263 ॥
अनुभाष्य-श्रीरूप गोस्वामी द्वारा रचित लघुभागवतामृतमें
ब्रह्मलोकके वर्णनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित कारिका-
"भक्तेरव्यभिचारायाः प्रेमसैवेव यत्फलम्।
केवलं ब्रह्मभावस्तु विद्वेषेणापि लभ्यते ॥"
अर्थात् "प्रेमसेवा ही अव्यभिचारिणी भक्तिका फल
है। (पक्षान्तरमें) यह निश्चित है कि ब्रह्मभाव (भगवान्के)
विद्वेषके द्वारा भी प्राप्त होता है।"
श्रीबलदेवविद्याभूषणके द्वारा रचित टीका-
"ननु चित्परमाणोर्जीवस्य चिद्राशौ तस्मिन् ब्रह्मणि लयेनैव
भाव्यं, न पुनस्ततो निःसृत्य तदाश्रयस्य कृष्णस्य सेवनं
सम्भवेदिति चेत्? तत्राह-भक्तेरिति। तस्मिन् ब्रह्मणि विलीनतया
स्थितिस्तु भगवता कृष्णेन् निहतानां विद्वेषिणामपि भवेत्,
'सिद्धलोकस्तु तमसाः पारे यत्र वसन्ति हि। सिद्धा ब्रह्मसुखे
मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः ॥' (ब्रह्माण्डपुराणे) इति स्मरणात्।
तस्मात् तल्लीनत्वमात्रं भक्तेः फलं न भवतीति। तमसाः-
अष्टमावरणात् प्रकृतिमण्डलात्, पारे ब्रह्मलोकः- 'चयस्त्विषाम्'
इति न्यायेन निराकारचित्पुअरूपं स्थानमित्यर्थः।
सिद्धाः-अनवज्ञातभगवदङ्घ्रयस्तादृग्ब्रह्मचिन्तकाः तच्चिन्तनात्
विध्वस्त-लिङ्गाः, यत्र वसन्ति-लीयन्ते; तच्चरणावज्ञाताणान्तु
ज्ञानलव-दग्धनामधःपातो भवति, 'येऽन्येऽरविन्दाक्ष !
विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रं
पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥" (भाः 10/2/32) इति
श्रीभागवतात्।"
अर्थात् "यदि चित्परमाणु जीवका चित्पुञ्ज ब्रह्ममें
ही लय हो गया, ऐसा होनेपर तो ब्रह्मसे निकलकर
जीवके लिये पुनः उसके आश्रय श्रीकृष्णकी सेवा
सम्भव नहीं होगी ? इस आशङ्काके उत्तरमें उल्लिखित
श्लोक कहा गया है। ब्रह्ममें लीन होकर अवस्थान
करना तो अति तुच्छ है, - वह स्थिति तो श्रीकृष्णके
हाथों मारे गये विद्वेषी दैत्योंको भी प्राप्त होती है;
क्योंकि ब्रह्माण्डपुराणमें ही इसका प्रमाण मिलता है
(आदिलीला 5/39 संख्या देखें)। इस श्लोकमें,
"चयस्त्विषाम्' –इस न्यायके अनुसार 'ब्रह्म या सिद्धलोक'
शब्दसे निराकार चित्पुञ्जरूप विशेष स्थानको समझना
होगा। 'सिद्धाः'-शब्दका तात्पर्य, जो सब जीव भगवान्के
चरणकमलोंकी अवज्ञा नहीं करते हैं, अपितु इस
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