श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1070, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवाँ अध्याय 7/87-96 ]
सब लोग मन्दिरके बाहिरी द्वारपर एकत्रित हो गये और
'हरि' 'हरि' बोलकर कोलाहल करने लगे॥ 87॥
मन्दिरके द्वारका खुलना और सभीको
महाप्रभुका दर्शन प्राप्त :—
तबे महाप्रभु द्वार कराइल मोचन।
आनन्दे आसिया लोक पाइल दरशन ॥ 88 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभुने मन्दिरका द्वार खुलवा
दिया और सभी लोगोंने आकर आनन्दपूर्वक महाप्रभुके
दर्शन किये॥ 88॥
सारा दिन लोगोंको महाप्रभुके दर्शनके
फलसे वैष्णवताकी प्राप्ति :—
एइमत सन्ध्या पर्यन्त लोक आसे, याय।
‘वैष्णव’ हइल लोक, सबे नाचे, गाय ॥ 89 ॥
अनुवाद—इस प्रकार सायंकाल तक लोग आते-जाते
रहे और महाप्रभुकी कृपासे सभी ‘वैष्णव’ भक्त बनकर
नाचने-गाने लगे॥ 89 ॥
आलालनाथमें भक्तोंके साथ रात्रिवास :—
एइरूपे सेइ ठाञि भक्तगण-सङ्गे।
सेइ रात्रि गोङाइल कृष्णकथा-रङ्गे ॥ 90 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने वह रात वहीं
बितायी और सारी रात भक्तोंके साथ श्रीकृष्णकथाका
आनन्द लेते रहे॥ 90 ॥
प्रातः पुनः यात्रा :—
प्रातःकाले स्नान करि’ करिला गमन।
भक्तगणे विदाय दिला करि’ आलिङ्गन ॥ 91 ॥
अनुवाद—अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने स्नान
करके सभी भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी ली और
दक्षिण भारतकी यात्रापर चल दिये॥ 91 ॥
महाप्रभुकी निरपेक्षता :—
मूर्च्छित हञा सबे भूमते पड़िला।
ताँहा-सबा पाने प्रभु फिरि’ ना चाहिला ॥ 92 ॥
अनुवाद—सभी भक्त मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर
पड़े, परन्तु महाप्रभुने उन्हें मुड़कर भी नहीं देखा और
अपनी यात्रापर अग्रसर हुए॥ 92 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 3/212 संख्याका अनुभाष्य
देखें॥ 92 ॥
महाप्रभुके पीछे-पीछे जल-पात्रादि-वाहक कृष्णदास :—
विच्छेदे व्याकुल प्रभु चलिला दुःखी हञा।
पाछे कृष्णदास याय जलपात्र लञा ॥ 93 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णविरहमें व्याकुल महाप्रभु दुःखी
होकर चल रहे थे और उनका सेवक कृष्णदास
जलपात्रको हाथमें लेकर उनके पीछे-पीछे चल रहा
था॥ 93 ॥
उस दिन भक्तोंका उपवास और बादमें पुरी-गमन :—
भक्तगण उपवासी ताँहाइ रहिला।
आर दिने दुःखी हञा नीलाचले आइला ॥ 94 ॥
अनुवाद—उस दिन सभी भक्त वहीं आलालानाथमें
ही रहे और सबने उपवास किया। अगले दिन दुःखी
होकर सभी नीलाचल लौट आये॥ 94 ॥
मत्तसिंह-प्राय प्रभु करिला गमन।
प्रेमावेशे याय करि’ नाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 95 ॥
अनुवाद—मत्तसिंहकी भाँति महाप्रभु यात्रामें चल
दिये। प्रेमाविष्ट होकर नाम-सङ्कीर्तन करते हुए वे चले
जा रहे थे॥ 95 ॥
श्रीमुख कीर्त्तित-श्लोक :—
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे।
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! हे॥
कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण ! कृष्ण !
कृष्ण ! कृष्ण ! रक्ष माम्।
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