श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछठा अध्याय 6/219-234 ]
बाहर आये हैं, तो हड़बड़ाकर वे उनके पास आये (प्रसादग्रहणविषये) कालविचारणा न (नास्ति)। तत्र
और उनके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना की। श्रीसार्वभौम (प्रसादग्रहणविषये) देशनियमः न, तथा कालनियमः न,
भट्टाचार्यने महाप्रभुको बैठनेके लिये आसन दिया तथा प्राप्तमन्नं (कृष्णप्रसादं) द्रुतं (तत्क्षणमेव) शिष्टैः (वैष्णवैः)
वे स्वयं भी बैठ गये। तब महाप्रभुने अपने आँचलको भोक्तव्यं (प्रसादार्चने स्थानकाल-व्यवधानादिकं न ग्राह्यम्) इति
खोलकर उसमेंसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके हाथमें प्रसाद हरिः अब्रवीत्।
दिया। प्रसादको पाकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 225-226 ॥
आनन्दित हो गये। यद्यपि अभी तक उन्होंने स्नान, श्रीसार्वभौमके द्वारा प्रसादका सम्मान देखकर महाप्रभुको
सन्ध्या तथा दन्त-धावन आदि कुछ भी नहीं किया था, परमानन्द और प्रेमपूर्वक दोनोंका नृत्य :-
तथापि महाप्रभुकी कृपासे उनके मनकी जड़ता दूर हो देखिया आनन्द हैल महाप्रभुर मन।
गयी और उन्होंने निम्नोक्त श्लोकका पाठ करके प्रसाद प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कैला आलिङ्गन ॥ 227 ॥
ग्रहण किया ॥ 219-224 ॥ दुइजने धरि' दुँहे करेन नर्त्तन।
अनुभाष्य- 'अरुणोदय-काल'-सूर्य उदय होनेसे प्रभु-भृत्य दुँहा स्पर्शे, दुँहे फूले मन ॥ 228 ॥
पहलेके चार दण्ड (96 मिनट) समयको 'अरुणोदय-काल' अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यकी प्रसादमें इस प्रकारकी श्रद्धाको
कहते हैं॥ 219 ॥ देखकर महाप्रभु प्रसन्न हो गये और उन्होंने प्रेमाविष्ट
अप्राकृत-प्रसादके सम्मानमें कालाकालका विचार नहीं :- होकर श्रीसार्वभौमका आलिङ्गन किया। दोनों एक-दूसरेको
पद्मपुराण- पकड़कर नृत्य करने लगे। महाप्रभु और दास-दोनोंका
शुष्कं पर्युषितं वापि नीतं वा दूरदेशतः। मन एक-दूसरेको स्पर्श करके प्रफुल्लित हो
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं नात्र कालविचारणा ॥ 225 ॥ गया ॥ 227-228 ॥
स्वेद-कम्प-अश्रु दुँहे आनन्दे भासिला।
न देशनियमस्तत्र न कालनियमस्तथा। प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कहिते लागिला ॥ 229 ॥
प्राप्तमन्नं द्रुतं शिष्टैर्भुक्तव्यं हरिरब्रवीत् ॥ 226 ॥ श्रीसार्वभौमके उद्धारसे महाप्रभुका आत्मगौरव :-
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 225-226 ॥ “आजि मुञि अनायासे जिनिनु त्रिभुवन।
अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रसाद सूख गया हो, भले आजि मुञि करिनु वैकुण्ठ आरोहण ॥ 230 ॥
ही बासा हो या किसी दूरदेशसे लाया गया हो, प्राप्त आजि मोर पूर्ण हैल सर्व अभिलाष।
करनेके साथ-ही-साथ उसे खानेकी विधि है; इसमें सार्वभौमेर हैल महाप्रसादे विश्वास ॥ 231 ॥
समयका विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सार्वभौमको महाप्रभुका आशीर्वाद :-
भगवान्ने ऐसी आज्ञा दी है कि श्रीकृष्णके अन्न-प्रसादको आजि तुमि निष्कपटे हैला कृष्णाश्रय।
प्राप्त करते ही सज्जन व्यक्ति उसका भोजन करेंगे, कृष्ण आजि निष्कपटे तोमा हैल सदय ॥ 232 ॥
इसमें देश और कालका कोई नियम नहीं है ॥ 225-226 ॥ आजि से खण्डिल तोमार देहादि-बन्धन।
अनुभाष्य- आजि तुमि छिन्न कैले मायार बन्धन ॥ 233 ॥
शुष्कं (रसरहितं) पर्युषितं (पूर्वपूर्वदिनपक्वं) दूरदेशतः आजि कृष्णप्राप्ति-योग्य हैल तोमार मन।
(सुदूरविदेशात्) नीतम् (आनीतं) वा [कृष्णप्रसादं] प्राप्ति-मात्रेण
(लाभमात्रेण) भोक्तव्यं (सादरेण गृहीत्वयं सेव्यं) अत्र वेद-धर्म लङ्घि' कैले प्रसाद भक्षण ॥ "234 ॥
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