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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पाँचवाँ अध्याय 5/140-143 ]
चैतन्यभागवतमें भुवनेश्वर-दर्शन आदिका वर्णन है :-
भुवनेश्वर-पथे यैछे कैल दरशन।
विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 140 ॥
अनुवाद-भुवनेश्वरके मार्गमें महाप्रभुने जिन-जिन
स्थानोंका दर्शन किया, उसका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने
अपने श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णन किया है॥ 140 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-चैतन्यभागवत अन्त्यलीलाका
दूसरा अध्याय देखें। कटकसे राजमार्गसे बाहर होकर
बलिहस्ता या बालकाटिचाटिसे भुवनेश्वर दो-तीन कोसकी
दूरीपर है ॥ 140 ॥
अनुभाष्य-चैःभाः अन्त्य, दूसरा अध्याय-
"तबे प्रभु आइलेन श्रीभुवनेश्वर।
गुप्तकाशी-वास यथा करेन शङ्कर ॥ 307 ॥
सर्वतीर्थ-जल यथा बिन्दु-बिन्दु आनि'।
'बिन्दुसरोवर' शिव सृजिला आपनि ॥ 308 ॥
'शिवप्रिय सरोवर जानि' श्रीचैतन्य।
स्नान करि' विशेषे करिला अति धन्य ॥ "309॥
अर्थात् "तब महाप्रभु श्रीभुवनेश्वर पहुँचे। श्रीभुवनेश्वर
गुप्त काशी है, जहाँ शङ्कर निवास करते हैं। सभी
तीर्थोंसे बिन्दु-बिन्दु भर जल लाकर स्वयं शिवजीने
यहाँ 'बिन्दुसरोवर'का निर्माण किया है। इस सरोवरको
शिवजीका प्रिय सरोवर जानकर महाप्रभुने इसमें स्नान
करके इसे कृतार्थ किया।"
स्कन्दपुराणमें शिवजीका एकाम्रकानन (श्रीभुवनेश्वर)
को प्राप्त करनेके इतिहासका वर्णन है। 'काशीराज'-नामक
एक राजाने पूजा करके शिवजीको सन्तुष्ट किया। जब
काशीराज श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेमें प्रवृत्त हुआ,
तब शिवजीने उसकी सहायता की। श्रीकृष्णने सुदर्शन
चक्रके द्वारा काशीराजका वध करके काशीको जला
दिया। काशीको जलते देखकर शिवजीने पाशुपत
अस्त्रका प्रयोग किया, परन्तु श्रीसुदर्शनके आगे वह भी
विफल हो गया। तब शिवजीने श्रीकृष्णकी महिमाको
जानकर अपने द्वारा किये गये अपराधके लिये
क्षमा-याचना की। श्रीकृष्णने उन्हें क्षमा करके नीलाचलके
निकट एकाम्रकानन स्थान प्रदान किया। एकाम्रकाननको
केशरीवंशीय राजाओंने राजधानी बनाकर कुछेक शताब्दी
उत्कलदेशपर राज्य किया॥ 140 ॥
महाप्रभुका श्रीनिताइको संन्यास-दण्ड देना और
कमलपुरमें भार्गीनदीमें स्नान :-
कमलपुरे आसि भार्गीनदी-स्नान कैल।
नित्यानन्द-हाते प्रभु दण्ड धरिल ॥ 141 ॥
महाप्रभु द्वारा कपोतेश्वर-दर्शन और पीछेसे
श्रीनिताइके द्वारा महाप्रभुके दण्डको तोड़ना :-
कपोतेश्वर देखिते गेला भक्तगण-सङ्गे।
एथा नित्यानन्दप्रभु कैल दण्ड भङ्गे ॥ 142 ॥
तिन खण्ड करि' दण्ड दिल भासाञा।
भक्त-सङ्गे आइला प्रभु महेश देखिञा ॥ 143 ॥
अनुवाद-कमलपुरमें आकर महाप्रभुने भार्गीनदीमें
स्नान किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथोंमें अपने
संन्यास-दण्डको पकड़ाकर महाप्रभु भक्तोंके साथ
कपोतेश्वरका दर्शन करने चले गये। इधर श्रीनित्यानन्द
प्रभुने महाप्रभुके दण्डको तोड़कर उसके तीन टुकड़े
करके उसे भार्गी नदीमें बहा दिया। तभी श्रीशिवका
दर्शन करके महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ लौट
आये ॥ 141-143 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'भार्गीनदी'-आजकल 'दण्डभाङ्गा'-
नदीके नामसे विख्यात है; यह पुरीसे तीन कोस उत्तरमें
है। 'कपोतेश्वर'-दण्डभाङ्गा नदीके निकटमें है।
'दण्ड'-संन्यासके समय महाप्रभुने जिस दण्डको प्राप्त
किया था, उसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथमें देकर वे
कपोतेश्वर गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डके तीन
टुकड़े करके भार्गी नदीके जलमें बहा दिये, तबसे भार्गी
नदीका नाम 'दण्डभाङ्गा' हो गया है। काय, वाक् और
मनको दण्डित (शासन) करनेके लिये संन्यासी त्रिदण्ड
धारण करते हैं। शङ्कराचार्यकी एकदण्ड धारण करनेकी
विधि है। श्रीमहाप्रभुको उस प्रकार दण्ड धारण करनेकी
। 155

[ 5/141-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा विचार करके श्रीनित्यानन्द
प्रभुने उस दण्डको तोड़कर फेंक दिया ॥ 141-143 ॥
अनुभाष्य- 'कपोतेश्वर' - शिवलिङ्ग। 'दण्ड'—
श्रीगौरसुन्दरने काटोयामें शाङ्कर-भारती-सम्प्रदायमें
एकदण्ड-संन्यास ग्रहण किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस
संन्यास दण्डके तीन टुकड़े करके भार्गी (वर्तमान
'दण्डभाङ्गा') नदीमें फेंक दिया। संन्यासाश्रममें 'कुटीचक'
और 'बहूदक' - अवस्थामें दण्डकी रक्षा करनेकी आवश्यकता
है, किन्तु 'हंस' और 'परमहंस' अवस्थामें दण्डका त्याग
करना ही विधि है। श्रीगौरहरि तो चौदह भुवनोंके पति
(स्वामी) हैं, इसलिये उन्हें दूसरे संन्यासियोंकी भाँति
न्यून-अधिकार प्रदर्शनकी कोई आवश्यकता नहीं है,
ऐसा जानकर श्रीनित्यानन्द-स्वरूपने उस दण्डको तोड़कर
फेंक दिया ॥ 142-143 ॥
अमृतानुकणा-चैतन्यभागवत अन्त्यखण्ड, दूसरा
अध्याय-
“दण्ड हाते करि' हासे नित्यानन्द-राय।
दण्डेर सहित कथा कहेन लीलाय ॥ 206 ॥
'अहे दण्ड, आमि याँरे बहिये हृदये।
से तोमारे बहिबेक ए'त युक्त नहे ॥'207॥
एत बलि' बलराम परम प्रचण्ड।
फेलिलेन दण्ड भाङ्गि' करि तीन खण्ड ॥ ”208 ॥
इनकी टीका 'गौड़ीय भाष्य'में जगद्गुरु श्रीश्रील
भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने जनाया है, - “श्रीनित्यानन्द
प्रभुने दण्डको सम्बोधित करते हुए कहा, - 'चौदह
भुवनोंके पति श्रीकृष्णको हम सब सर्वदा हृदयमें धारण
करते हैं; हम उनके नित्य सेवक हैं; तुम हमारे उन
नित्य प्रभुको अपने वाहकके रूपमें बनाकर अपराध
कर रहे हो। इसलिये श्रीकृष्णने भक्तभावको अङ्गीकार
करके जिन सब विधि-ग्रहण या निषेध-त्यागके चिह्न
(दण्ड) को अपने हाथों और कन्धोंपर वहन किया है,
वह वहनकार्य केवल हम सबको ही शोभा देता है।
हे दण्ड ! तुम मेरे प्रभुके प्रभु मत बनो, महाप्रभुके द्वारा
तुम स्वयंको मत उठवाओ।'
'प्राकृत सहजिया भक्तब्रुव' अर्थात् प्राकृत-जो
भगवान्‌की अप्राकृत लीलाओंको प्राकृत काम-क्रीड़ाकी
भाँति समझते हैं; सहजिया-जो भक्त होनेका अभिनय
करते हैं; भक्तब्रुव-जो दिखनेमें तो भक्त हैं, परन्तु
वास्तवमें भक्त नहीं हैं, वे श्रीकृष्णसे धर्म, अर्थ, काम
एवं मोक्ष-आदिकी इच्छा करके उनके द्वारा सेवा
करवाकर अपने इन्द्रिय-भोग करते हैं। (वास्तविक)
भक्तोंका इस प्रकार मनका भाव नहीं होता।
“केवलाद्वैतवादी तथाकथित परमहंस एकदण्डी संन्यासी
त्रिदण्डी संन्यासियोंका सदा ही अनादर करते हैं।
श्रीगौरसुन्दरके द्वारा एक-दण्ड ग्रहण करनेकी छलनेवाली
लीला प्रदर्शित करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डको
तीन भागोंमें खण्डित करके उसको त्रिदण्डके रूपमें
परिणत कर दिया और इस दण्डको वहन करनेका भार
भगवद्-सेवकोंके ऊपर दे दिया (अर्थात् भगवान्
दण्डको वहन नहीं करेंगे)। इसलिये अति प्राचीनकालसे
महाभारतमें जो हंस-गीति है, उसमें “वाचो वेगम्”
श्लोक त्रिदण्ड-ग्रहणके प्रमाण और योग्यताको सूचित
करता है। और त्रिदण्डिगणोंमें जो रूपानुगत्व है, इसे
श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने 'उपदेशामृत'में लिपिबद्ध किया है।
ब्रह्ममें लीन होनेके इच्छुक सम्प्रदाय आदिमें दीक्षित
प्रच्छन्न बौद्ध-मतावलम्बी मायावादियोंने त्रिदण्डके विरुद्ध
'परिमल' नामकी टीकाममें प्रचुर गाली-गलौज की है।
भविष्यमें मायावादी मतमें दीक्षित 'न्यायरक्षामणि',
शिवार्क-मणिदीपिका'-आदि ग्रन्थोंके भीतरमें जो भक्ति-विरोधी
मतवाद लिखेंगे, उनकी अयोग्यता दिखानेके लिये
श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीगौरसुन्दरके एकदण्डको त्रिदण्डमें
परिणत कर दिया। (और) 'शुद्धाद्वैत'-मतावलम्बियोंकी
(जैसे श्रीमाध्व-सम्प्रदायकी) शिष्य-परम्परामें जो एकदण्ड
ग्रहणकी प्रथा प्रचलित थी और प्रचलित है, वह
श्रीमाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायमें अनुमोदित नहीं है। इसे ही
समझानेके लिये श्रीबलदेवप्रभुने (श्रीनित्यानन्द प्रभुने)
संन्यास-वेषधारी श्रीचैतन्यदेवके एकदण्डको त्रिदण्डमें
परिणत किया है—यही श्रीमद्भागवत-सम्मत एवं गौड़ीय
156 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/142-151 ]
वैष्णवोंका एकमात्र विचार है। 'त्रिदण्डी' न होनेसे कोई
भी आत्मसंयम करनेमें समर्थ नहीं होता। कर्मकाण्डीय
त्रिदण्डमें इन्द्रदण्ड, वज्रदण्ड और ब्रह्मदण्डके साथ
जीवदण्डका समावेश है। श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने त्रिदण्डकी
व्याख्यामें काय-मनोवाक्-दण्डकी बात पारमार्थिक
त्रिदण्डिगणोंको बतलायी है। त्रिदण्डके साथ जीवदण्डके
संयोगमें प्राकृत बुद्धिसे चालित विचारसे त्रिदण्डका
पारमहंस-धर्ममें एकदण्ड ही परिलक्षित होता है। किन्तु
जिस एकदण्डमें जड़ीय मायाके तीन गुणोंके सम्मिलनमें
'गुणविधौत अवस्था' अर्थात् गुणोंको सम्पूर्ण रूपसे
धोनेकी अवस्था नामक एकदण्ड है, वह एकायन
पद्धतिमें कलङ्क आरोपित करता है, इसलिये
त्रिदण्ड-सम्मिलनमें एकदण्ड ही एकायन पद्धतिमें स्वीकृत
हुआ है। ब्रह्मसम्प्रदायमें, ब्रह्म-माध्व-सम्प्रदायमें और
ब्रह्म-माध्व-गौड़ीय-सार्वजनिक-वैष्णव-समाजमें वह प्रथा
चिरकालसे ही व्यक्त एवं अव्यक्तभावसे विद्यमान
है॥ 142-143॥

तीन कोसकी दूरी भी उन्हें हजार योजन जितनी लम्बी
लगने लगी॥ 144-146॥
अनुभाष्य—देउल—देवालय। अनङ्गभीम नामक राजाके
द्वारा निर्मित वर्तमान श्रीजगन्नाथजीका मन्दिर। उपलभोगका
मन्दिर, भोगवर्द्धन खण्ड एवं बाहर बना हुआ ऊँचा
चबूतरा उस समयमें नहीं बना था।
'राजमार्ग'—श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये यात्री बङ्गालसे
जिस रास्तेसे होते हुए पुरुषोत्तम आते थे। तीन कोस
दूरसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके दर्शन करके श्रीमन्महाप्रभुमें
अत्यधिक विरहके कारण सात्त्विक विकार उदित हो
गये और वे भगवद्दर्शनके लिये अत्यन्त व्याकुल और
उत्कण्ठित हो उठे। बहुत तीव्र विप्रलम्भमें (विरहमें)
जिस प्रकार क्षणकालका विरह भी युगके समान प्रतीत
होता है, नेत्रोंपर पलकें होनेके कारण गोपियाँ जिस
प्रकार विधिकी (सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माकी) मूर्खता बताती हैं,
उसी प्रकार तीन कोसका रास्ता महाप्रभुको सुदूर सैकड़ों
योजनका लगने लगा॥ 144-146॥

पुरीके मन्दिरको देखकर श्रीकृष्णविरहमें
आतुर महाप्रभुका नृत्य और आवेश :—
जगन्नाथेर देउल देखि' आविष्ट हैला।
दण्डवत् हञा प्रेमे नाचिते लागिला ॥ 144 ॥
भक्तगण आविष्ट हञा, सबे नाचे गाय।
प्रेमावेशे प्रभु-सङ्गे राजमार्गे याय ॥ 145 ॥
हासे, कान्दे, नाचे प्रभु हुङ्कार गर्जन।
तिनक्रोश पथ हैल—सहस्र-योजन ॥ 146 ॥

अनुवाद—दूरसे ही श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरको देखकर
महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और वहींसे दण्डवत्
प्रणाम करके वे प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य करने लगे।
भक्तगण भी प्रेमाविष्ट होकर नाचने और गाने लगे और
महाप्रभुके साथ राजमार्गपर चलने लगे। कभी हँसते,
कभी रोते, कभी नृत्य करते और कभी हुँकार-गर्जन
करते हुए महाप्रभु प्रेमावेशमें चल रहे थे। मन्दिरकी

आठारनालामें आकर महाप्रभुकी बाह्य दशा :—
चलिते चलिते प्रभु आइला 'आठारनाला'।
ताँहा आसि' प्रभु किछु बाह्य प्रकाशिला ॥ 147 ॥

श्रीनिताइसे अपने संन्यास-दण्डकी याचना :—
नित्यानन्दे कहे प्रभु,—"देह मोर दण्ड।"
नित्यानन्द बले,—"दण्ड हैल तिनखण्ड ॥ 148 ॥

निताइकी चतुरता ओर दण्डभङ्ग-वार्त्ता-निवेदन :—
प्रेमावेशे पड़िला तुमि, तोमारे धरिनु।
तोमा-सह तेरछे दण्ड-उपरे पड़िनु ॥ 149 ॥
दुइजनार भरे दण्ड खण्ड खण्ड हैल।
सेइ दण्ड काँहा पड़िल, किछु ना जानिल ॥ 150 ॥
मोर अपराधे तोमार दण्ड हइल खण्ड।
ये उचित हय, मोर कर तार दण्ड ॥" 151 ॥

अनुवाद—चलते-चलते महाप्रभु 'आठारनाला' नामक
स्थानपर पहुँचे और वहाँ कुछ बाहरी-ज्ञान प्रकाशित

। 157

[ 5/147-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
करते हुए उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा, - "मेरा
संन्यास दण्ड दो।" श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- "उस
दण्डके तो तीन टुकड़े हो गये हैं। प्रेमके आवेशमें जब
आप गिर रहे थे, तब मैंने आपको पकड़ा, किन्तु हम
दोनों ही दण्डके ऊपर गिर पड़े। हम दोनोंके भारसे
दण्ड टुकड़े-टुकड़े हो गया। अब उस दण्डके टुकड़े
कहाँ हैं, मुझे कुछ पता नहीं। मेरे अपराधके कारण
ही आपका दण्ड टूट गया, इसलिये अब आप जैसा
भी उचित समझे, वैसा दण्ड मुझे दे सकते हैं।" 147-151 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आठारनाला'-पुरीमें प्रवेश करनेके
लिये जो पुल है, उसका नाम 'आठारनाला' है; उस
पुलके नीचे अठारह मेहराब (दो खम्बोंके ऊपर
अर्द्ध-मण्डलाकार भाग) हैं॥ 147 ॥
पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
महाप्रभुका दुःख और थोड़ा क्रोध :-
शुनि' किछु महाप्रभु दुःख प्रकाशिला।
ईषत् क्रोध करि' किछु कहिते लागिला ॥ 152 ॥
महाप्रभुकी डाँट और अकेले श्रीजगन्नाथके
दर्शनकी इच्छाका प्रकाश :-
“नीलाचले आसि' मोर सबे हित कैला।
सबे दण्डधन छिल, ताहा ना राखिला ॥ 153 ॥
तुमि-सब आगे याह ईश्वर देखिते।
किवा आमि आगे याइ, ना याह सहिते ॥” 154 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बात सुनकर महाप्रभुने
थोड़ा दुःख प्रकाशित किया और थोड़ा क्रोध करते हुए
कुछ कहने लगे, - "मेरे साथ नीलाचल तक आकर
आप सबने मेरा बहुत उपकार किया है। संन्यास-दण्ड
मेरा एकमात्र धन था, उसे भी आपने सम्भालकर नहीं
रखा। अब आप सब आगे चलकर श्रीजगन्नाथका दर्शन
करो अथवा मैं आगे जाऊँगा, अब मैं आपके साथ
नहीं जाऊँगा॥”152-154 ॥
अनुभाष्य-वैध-संन्यासके योग्य एकदण्ड धारण
करना महाप्रभुके लिये अनावश्यक है, क्योंकि महाप्रभु
किसी विधिके अधीन नहीं हैं, श्रीनित्यानन्द प्रभुने ऐसा
जानकर कि उस दण्डको ढोनेसे महाप्रभुको छुट्टी दे
दी। महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुपर क्रोध इसलिये
दिखलाया कि उनके द्वारा दण्डत्यागको देखकर भविष्यमें
संन्यास लेनेवाले अयोग्य संन्यासी योग्यता प्राप्त करनेसे
पहले ही अपने दण्डको तोड़ देंगे और इससे
वैदिक-विधि शिथिल हो जायेगी। श्रेष्ठ व्यक्तिके आचरणका
जगत्के अन्यान्य लोग अनुसरण करते हैं। भ्रान्त
चित्तवाले व्यक्ति श्रुति-स्मृति-पुराणादिमें कहे गये भक्तिके
अनुकूल वैधमार्गके तात्पर्यको नहीं समझनेसे उसकी
अवहेलना करके मनोकल्पित-मार्गको अनुराग-मार्ग अथवा
अवधूताचार मानते हैं। ऐसे लोगोंको भक्तिमें बहुत
असुविधा होगी, इसी कारणसे महाप्रभुकी यह क्रोध-
प्रदर्शन-लीला है॥ 152 ॥
मुकुन्दका महाप्रभुको पहले जानेका अनुरोध :-
मुकुन्द दत्त कहे,-"प्रभु, तुमि याह आगे।
आमि-सब पाछे याब, ना याब तोमार सङ्गे ॥” 155 ॥
अनुवाद-श्रीमुकुन्द दत्तने कहा, - "प्रभो! आप आगे
चलिये। हम सब आपके पीछे चलेंगे। हम आपके साथ
नहीं जायेंगे॥" 155 ॥
दोनों प्रभुओंका भाव-अचिन्त्य :-
एत शुनि' प्रभु आगे चलिला शीघ्रगति ।
बुझिते ना पारे কেহ दुइ प्रभुर मति ॥ 156 ॥
इँहो केने दण्ड भाङ्गे, तँहो केने भाङ्गाय।
भाङ्गाञा क्रोधे तँहो इँहाके दोषाय ॥ 157 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु तेज़ीसे आगे चल
पड़े। महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु-इन दोनोंके गूढ़
भावोंको कोई नहीं जान सकता। श्रीनित्यानन्द प्रभुने
दण्डको क्यों तोड़ा अथवा महाप्रभुने ही उन्हें दण्ड
तोड़नेकी अनुमति क्यों दी? और अनुमति देकर फिर
क्रोध करके श्रीनित्यानन्द प्रभुको दोष क्यों दे रहे
हैं? ॥ 156-157 ॥
158 ।

पाँचवाँ अध्याय 5/158-161 ]
दोनोंमें अभेद-दर्शनकारी भक्त ही
इस लीलाको समझनेमें समर्थ :-
दण्डभङ्ग-लीला एइ-परम गम्भीर।
सेइ बुझे, दुँहार पदे याँर भक्ति धीर ॥ 158 ॥
अनुवाद-दण्डभङ्ग-लीला अत्यन्त गम्भीर है। जिसकी महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंके चरणकमलोंमें अचला भक्ति है, वही इस लीलाको समझ सकता है॥ 158 ॥
अनुभाष्य-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको वास्तविक रूपमें धीर होकर जिन्होंने समझा है, वे ही दोनों प्रभुओंके स्वरूप और इस दण्डभङ्ग-लीलाके तात्पर्यको समझ पायेंगे। पूर्व महाजनोंने श्रीकृष्ण-चरणसेवाके लिये दण्ड ग्रहणकर संसारके अभिनिवेशको त्याग किया है। साधकरूपसे महाजनोंके मार्गका अनुगमन करके वैध-संन्यासकी जो आवश्यकता है, उसको महाप्रभुने भी स्वीकार किया। यद्यपि विद्वत-संन्यासमें (परमहंस अवस्थामें) दण्डकी आवश्यकता नहीं रहती, तथापि लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुने दिखलाया कि वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यास अथवा विषय-त्याग करते हुए भक्तिके अनुकूल अनुष्ठानके लिये साधक जीवनमें यह आवश्यक है। दास श्रीनित्यानन्द प्रभु इस बातको जानते हैं कि संन्यासकी प्रारम्भिक अवस्थामें जो दण्ड वहनका कार्य है, वह वास्तवमें महाप्रभुका उच्च परमहंसका अधिकार होनेके कारण उनके लिये आवश्यक नहीं है। परन्तु दूसरे जड़बुद्धिवाले व्यक्ति महाप्रभुको 'कुटीचक' या 'बहुदक' संन्यासकी अवस्थामें स्थित समझकर कहीं भ्रमित होकर अपराध ना करें, इसलिये परम उच्चतम अवस्थाका आदर्श दिखलानेके लिये महाप्रभुसे दण्ड-त्याग करवाया ॥ 158 ॥
वक्ता और श्रोता, दोनोंके ही भगवान् होनेके कारण
श्रीसाक्षी-गोपालका वृत्तान्त-अलौकिक :-
ब्रह्मण्यदेव-गोपालेर महिमा एइ धन्य।
नित्यानन्द-वक्ता यार, श्रोता-श्रीचैतन्य ॥ 159 ॥
अनुवाद-ब्रह्मण्यदेव श्रीगोपालकी महिमा भी धन्य है, जिसके वक्ता श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रोता महाप्रभु हैं॥ 159 ॥
अनुभाष्य-श्रीसाक्षी-गोपालकी कथामें चार निर्देशोंपर विचार करना चाहिये-1) श्रीगोपालमूर्ति नित्यसत्य विग्रह है; 2) 'स्वयंसत्य विग्रह'-जड़जगत्की लौकिक विधिको लाँघकर सदैव सत्यकी मर्यादा स्थापित करते हैं; 3) ब्राह्मण-जीवनमें सत्यमें स्थित होना विशेष रूपसे आवश्यक है; 4) श्रीकृष्णभक्त स्वतः ही ब्राह्मण हैं और ऐसे ब्राह्मणके वशीभूत स्वयं श्रीकृष्ण हैं, इसलिये श्रीकृष्णाश्रित ब्राह्मण केवल मायाबद्ध जीव नहीं हैं॥ 159 ॥
पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
श्रद्धावान श्रोताको श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति :-
श्रद्धायुक्त हञा इहा शुने येइ जन।
अचिरे मिलये तारे गोपाल-चरण ॥ 160 ॥
अनुवाद-जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस साक्षी-गोपालकी लीलाको श्रवण करता है, उसे शीघ्र ही श्रीगोपालके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 160 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 161 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णनं
नाम पञ्चम-परिच्छेदः।
अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 161 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णन
नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त।
। 159

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छठा अध्याय

कथासार-श्रीमन्महाप्रभुमें श्रीजगन्नाथके दर्शनसे महाप्रेममें
महाभावरूप सात्त्विक विकार उदित होनेपर श्रीसार्वभौम
उन्हें उठवाकर अपने घर ले गये। श्रीसार्वभौमके
बहनोई श्रीगोपीनाथाचार्यने पूर्व परिचित श्रीमुकुन्दसे मिलकर
उनसे श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करने और नीलाचलमें
आगमनकी बातको सुना। लोगोंके मुखसे महाप्रभुके
महाभावकी बातको सुनकर सभी श्रीसार्वभौमके घरमें
गये। श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि सभी भक्त श्रीसार्वभौमके
पुत्र चन्दनेश्वरके साथ श्रीजगन्नाथके दर्शन करके आये,
और तृतीय प्रहरमें महाप्रभुकी चैतन्य (बाह्यदशा) हुई।
श्रीसार्वभौमने आदरपूर्वक सभीको महाप्रसाद सेवन करवाया।
श्रीसार्वभौमके साथ महाप्रभुका परिचय होनेपर श्रीसार्वभौमने
उनको अपनी मौसीसासके घरपर रहने योग्य स्थान दे
दिया। श्रीगोपीनाथाचार्यने जब महाप्रभुको 'ईश्वर' बतलाया,
तब श्रीसार्वभौम और उनके शिष्योंके साथ उनका बहुत
तर्क-वितर्क हुआ। परमेश्वरकी कृपाके बिना परमेश्वरके
तत्त्वको नहीं जाना जा सकता और पाण्डित्यके द्वारा
भी ईश्वरको जाना नहीं जा सकता,—ये सब बातें
श्रीगोपीनाथने अच्छी तरहसे समझा दीं। उन्होंने भागवत
और महाभारतके आधारपर प्रमाणित किया कि महाप्रभु
साक्षात् भगवान् हैं, तो भी श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने
उनकी बातोंका मजाक उड़ाया। महाप्रभुने उनकी सब
बातें सुनी और उन्होंने कहा,—श्रीभट्टाचार्य हमारे गुरु हैं,
स्नेहपूर्वक वे जो कुछ बोलते हैं, वह हमारे मङ्गलके
लिये है। श्रीभट्टाचार्यके साथ जब महाप्रभुकी आमने-सामने
बात होनेपर श्रीभट्टाचार्यने उन्हें वेदान्त श्रवण करनेकी
आज्ञा दी। महाप्रभुने उसे स्वीकार करके सात दिन
तक मौन रहकर वेदान्त श्रवण किया। श्रीभट्टाचार्यने
कहा,—हे कृष्णचैतन्य, क्या तुम वेदान्त नहीं समझ रहे
हो?' महाप्रभुने उत्तर दिया,—'आपने श्रवण करनेके
लिये कहा था, मैं श्रवण कर रहा हूँ; श्रीव्यासदेवके
द्वारा लिखे गये सूत्रोंको तो मैं बहुत अच्छी तरहसे
समझता हूँ, केवल आप जिस मायावादी-भाष्यको पढ़
रहे हैं, उसको नहीं समझ पा रहा हूँ।' श्रीभट्टाचार्यके
प्रश्नोंके उत्तरमें महाप्रभुने उपनिषद् और वेदान्तकी
व्याख्या करते हुए 'सविशेषवाद'को स्थापित किया।
उन्होंने कहा,—'मायावादियोंके मतानुसार, ब्रह्म-निराकार
और शक्तिहीन है। मायावादियोंके यह दो महाभ्रम हैं।
वेदमें सर्वत्र ब्रह्मकी शक्तिको स्वीकार किया गया है
और उनके सच्चिदानन्द, अप्राकृत विग्रहको स्वीकार
किया गया है। वेदके मतानुसार ईश्वर और जीव-युगपत्
(एक ही साथ) स्वरूपतः और स्वभावतः नित्य भिन्न
और नित्य अभिन्न हैं। फलस्वरूप अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्त
ही वेद और वेदान्तका मत है। मायावादी वास्तवमें
नास्तिक हैं।' श्रीभट्टाचार्य बहुत विचार करके हार गये।
(उसके बाद महाप्रभुने) श्रीभट्टाचार्यकी प्रार्थनापर 'आत्माराम'
श्लोकके अठारह प्रकारके अर्थ किये। श्रीभट्टाचार्यमें
जब ज्ञानका उदय हुआ, तब महाप्रभुने उन्हें अपना
रूप दिखाया। श्रीभट्टाचार्यने एक सौ श्लोक उच्चारण
करके उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। महाप्रभुकी अलौकिक
कृपाको देखकर श्रीगोपीनाथ आदि सभी बहुत प्रसन्न
हुए। बादमें एकदिन महाप्रभुने अरुणोदयके समय
(श्रीजगन्नाथजीके) शय्योत्थान लीला (मङ्गल आरती)के
दर्शन करनेके बाद 'पाकाल' प्रसादको लाकर श्रीभट्टाचार्यको
दिया। श्रीभट्टाचार्यने तब पूर्व संस्कारोंका त्याग करके
अत्यधिक आनन्दसे 'महाप्रसाद'को प्राप्त किया। और
किसी दिन श्रीभट्टाचार्यके द्वारा भक्तिके श्रेष्ठ साधन-अङ्गको
जाननेकी इच्छा करनेपर महाप्रभुने उन्हें 'नाम-सङ्कीर्तन'

। 161

[ 6/1-5 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

करनेका उपदेश दिया। और एक दिन श्रीसार्वभौमने
‘तत्तेऽनुकम्पां’ श्लोकके अन्तिम अंशमें ‘मुक्ति-पद’के
स्थानपर ‘भक्ति-पद’ शब्द लगाकर महाप्रभुको सुनाया।
महाप्रभुने कहा,–‘श्रीमद्भागवतके श्लोकमें परिवर्तन करनेकी
कोई आवश्यकता नहीं है। ‘मुक्तिपद’-शब्दसे श्रीकृष्णको
समझना चाहिये।’ श्रीभट्टाचार्यने उस समय शुद्धभक्तिका
पात्र बनकर कहा,–‘यद्यपि ‘मुक्तिपद’-शब्दका अर्थ
‘श्रीकृष्ण’ होता है, तथापि आश्लिष्य-दोषके कारण
‘मुक्तिपद’-शब्द प्रयोग करनेकी रुचि नहीं होती; ‘भक्तिपद’
कहनेसे भक्तोंको बहुत सुख होता है।’ श्रीभट्टाचार्यके
मायावादके चङ्गुलसे छूटनेकी बातको सुनकर नीलाचलवासी
पण्डित महाप्रभुके शरणागत हुए।
–(अमृतप्रवाहभाष्य)

सार्वभौम-विजयी श्रीगौरको प्रणाम :–
नौमि तं गौरचन्द्रं यः कुतर्क-कर्कशाशयम्।
सार्वभौमं सर्वभूमा भक्तिभूमानमाचरत्॥1॥

अनुवाद–अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
अमृतप्रवाह भाष्य–जिन सर्वभूमा पुरुषने
कुतर्क-कर्कश हृदयवाले श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको भक्तिपूर्ण
कर दिया था, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता
हूँ॥1॥
अनुभाष्य–
यः सर्वभूमा (सर्वेभ्यः देवीधामान्तर्गत-सर्वोपाधिधारिभ्यः
देव-नरेभ्यः ब्रह्मलोक-वैकुण्ठगोलोकाद्यवस्थितेभ्यः
कृष्णोतर-सर्ववस्तुभ्यः भूमा महत्त्वं यस्य सः परमपरमात्मा
गौरचन्द्रः) कुतर्क-कर्कशाशयं (कुतर्केन स्वरूपस्ववृत्त्यादिभ्रान्त्य
कृष्ण-सेवनेतर-चेष्टया कुज्ञानाश्रितेन कर्कशः जड़ाभिमानपूर्णः
आशयः चित्तं यस्य तं) सार्वभौमं (वासुदेवाख्यं पण्डितराजं)
भक्तिभूमानं (शुद्धभक्तिपूर्णं पात्रम्) आचरत् (कारयामास, स्वपदसेवकं
चकार इत्यर्थः) तं (गौरचन्द्रं) नौमि।

श्लोक-भावानुवाद–देवीधामके अन्तर्गत सभी
देवता-नरादि उपाधिधारी, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, गोलोकादिमें
अवस्थित कृष्णेतर-सभी वस्तुओंसे भी श्रेष्ठ जिन
परमपरमात्माने स्वरूप-स्ववृत्तिसे भ्रान्त अर्थात् श्रीकृष्णसेवासे
इतर चेष्टाओंके द्वारा कुज्ञानका आश्रय करके जड़ाभिमानपूर्ण
चित्तवाले वासुदेव सार्वभौम पण्डितराजको शुद्धभक्तिका
पात्र बनाया, उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥1॥

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥

अनुवाद–श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो,
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥2॥

प्रेमके आवेशमें श्रीजगन्नाथको आलिङ्गन करनेके लिये
जाते हुए महाप्रभुकी मूर्च्छा :–
आवेशे चलिला प्रभु जगन्नाथ-मन्दिरे।
जगन्नाथ देखि' प्रेमे हइला अस्थिरे॥3॥
जगन्नाथ आलिङ्गिते चलिला धाञा।
मन्दिरे पड़िला प्रेमे आविष्ट हञा॥4॥

अनुवाद–[नित्यानन्द प्रभु आदिको पीछे छोड़कर
आठारनालासे अकेले] महाप्रभु प्रेमके आवेशमें श्रीजगन्नाथ
मन्दिरकी ओर चल पड़े और श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन
करके वे प्रेममें आविष्ट हो गये। महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवका
आलिङ्गन करनेके लिये दौड़े, परन्तु प्रेममें आविष्ट
होकर वे मन्दिरमें मूर्च्छित होकर गिर पड़े॥3-4॥

दैववशतः श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुका दर्शन और
महाप्रभुको चोट लगनेसे रक्षा करना :–
दैवे सार्वभौम ताँहाके करे दरशन।
पड़िछा मारिते तँहो कैल निवारण॥5॥

अनुवाद–श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुको गिरते
हुए देखा। पड़िछा जब महाप्रभुको मारने जा रहे थे,
तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने उन्हें ऐसा करनेसे रोक
दिया॥5॥
अमृतप्रवाह भाष्य–‘पड़िछा’–श्रीमन्दिरका दारोगा जैसा

162

छठा अध्याय 6/5-12 ]
विशेष कर्मचारी। वे पड़िछा श्रीसार्वभौमके शिक्षा-शिष्य
थे॥5॥
श्रीसार्वभौमका विस्मय :-
प्रभुर सौन्दर्य आर प्रेमेर विकार।
देखि' सार्वभौम हैला विस्मित अपार॥6॥
अनुवाद—महाप्रभुके सौन्दर्य और उनके प्रेमके
विकारोंको देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आश्चर्यचकित
हो गये॥6॥
महाप्रभुकी चेतनता आनेमें विलम्ब देखकर
महाप्रभुको अपने घरमें लाना :-
बहुक्षणे चैतन्य नहे, भोगेरा काल हैल।
सार्वभौम मने तबे उपाय चिन्तित॥7॥
शिष्य पड़िछा-द्वारा निल बहाञा।
घरे आनि' पवित्र-स्थाने राखिल शोयाञा॥8॥
अनुवाद—बहुत देरतक भी जब महाप्रभुकी चेतनता
नहीं आयी और उधर श्रीजगन्नाथदेवको भोग लगानेका
समय भी हो गया, तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें
एक उपाय सोचा। वे अपने पड़िछा शिष्योंके द्वारा
महाप्रभुको उठवाकर अपने घरमें ले गये और वहाँ
उन्हें एक पवित्र स्थानपर लिटा दिया॥7-8॥
अनुभाष्य—'घरे'—श्रीवासुदेव सार्वभौम उस समय
श्रीमन्दिरके दक्षिणकी ओर स्थित बालूखण्डपर
मार्कण्डेय-सरोवरके तटपर वास करते थे। आजकल
उनका वह घर 'गङ्गामातामठ'के नामसे प्रसिद्ध है॥8॥
महाप्रभुको मृतकी भाँति अचेतन देखकर
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको आशङ्का :-
श्वास-प्रश्वास नाहि उदर-स्पन्दन।
देखिया चिन्तित हैल भट्टाचार्येर मन॥9॥
अनुवाद—महाप्रभुकी श्वास भी नहीं चल रही थी
और उनके उदरमें भी किसी प्रकारके स्पन्दनको न
देखकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य चिन्तित हो गये॥9॥
महाप्रभुकी चेतनताकी परीक्षा और
भट्टाचार्यको कुछ धैर्यकी प्राप्ति :-
सूक्ष्म तुला आनि' नासा-अग्रेते धरिल।
ईषत् चलये तुला देखि' धैर्य हैल॥10॥
अनुवाद—तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने रुईकी पतली
बत्ती महाप्रभुके नाकके आगे रखी और उस रुईको
थोड़ा-सा हिलता हुआ देखकर उनको कुछ धैर्य हुआ
कि श्वास कुछ चल रही है॥10॥
भट्टाचार्यको महाप्रभुके देहमें महाप्रेमके विकारका ज्ञान :-
बसि' भट्टाचार्य मने करेन विचार।
'एइ कृष्ण-महाप्रेमेर सात्त्विक विकार॥11॥
अनुवाद—महाप्रभुके पास बैठकर श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्यने मनमें विचार किया,—'ये तो कृष्ण-महाप्रेमके
सात्त्विक विकार हैं॥11॥
अनुभाष्य—मध्यलीला, 3/162 संख्या देखें॥11॥
'सुदीप्त भाव' :-
'सुदीप्त सात्त्विक' एइ नाम ये 'प्रणय'।
नित्यसिद्ध-भक्ते से 'सुदीप्त भाव' हय॥12॥
अनुवाद—इसमें जो सुदीप्त सात्त्विकभाव दिख रहे
हैं, इसका नाम 'प्रणय' है। केवल भगवान्‌के नित्यसिद्ध
भक्तोंमें ये 'सुदीप्त भाव' देखे जाते हैं॥12॥
अनुभाष्य—'सुदीप्त'—(भःरःसिः दःविः तीसरी
लहरी)—अष्टसात्त्विक विकारोंको गोपन करनेकी चेष्टा
दो प्रकार की है—'धूमायिता' और 'ज्वलिता'। 'धूमायिता'—
“अद्वितीया अमी भावा अथवा सद्वितीयकाः।
ईषद्व्यक्ता अपहोतुं शक्या धूमायिता मताः॥
अर्थात् “एक या दो भाव सहज-भावुकके शरीरमें
थोड़ेसे प्रकाशित होनेपर जिन भावोंको छिपाया जा
सकता है, उन भावोंको 'धूमायिता' कहते हैं। 'ज्वलिता'—
“द्वौ वा त्रयो वा युगपद् यान्तः सुप्रकटां दशाम्।
शक्याः कृच्छ्र
। 163

[ 6/12-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अर्थात् “एक ही समय दो या तीन सात्त्विकभाव
अच्छी प्रकार प्रकाशित हो जाँय और बहुत कष्टसे
उनको छिपाना सम्भव हो, तब उन भावोंको 'ज्वलिता'
कहते हैं।” 'दीप्ता'—
“प्रौढास्त्रिचतुरा व्यक्तिं पञ्च वा युगपद्गताः।
सम्बरितुमशक्यास्ते दीप्ता धीरैरुदाहृताः॥”
अर्थात् तीन-चार या पाँच प्रौढ़भावोंके एक ही
समयमें उदित होनेपर उनको सम्वरणकी चेष्टा विफल
होनेपर भावको समझनेवाले धीर व्यक्ति उसे 'दीप्ता'
कहते हैं।” 'उद्दीप्ता'—
“एकदा व्यक्तिमापन्नाः पञ्चषाः सर्व एव वा।
आरूढाः परमोत्कर्षमुद्दीप्ता इति कीर्त्तिताः”॥
अर्थात् “एक ही समयमें पाँच-छह अथवा सभी
भाव प्रकाशित होकर प्रेमकी परमोत्कर्षताको प्राप्त
करते हैं, तब उसे 'उद्दीप्ता' कहते हैं।”
'उद्दीप्तानां भिदा एव सूदीप्ताः सन्ति कुत्रचित्।
सात्त्विकाः परमोत्कर्षकोटीमात्रैव बिभ्रति॥' (उः नीः 12/37)
अर्थात् “उद्दीप्त भावसमूहका अन्य प्रकार ही
किसी-किसी स्थानपर 'सुदीप्त'के नामसे कहा जाता है।
सात्त्विक भावसमूह करोड़ों गुणा होकर परमोत्कर्षता
प्राप्त करनेपर जब प्रेमकी पराकाष्ठा सुन्दररूपसे
प्रकाशित होती है, तब वे 'सुदीप्त' कहलाते हैं।”
'नित्यसिद्ध भक्त'—पार्षदभक्त, दिव्यसूरि; मध्यलीला
24/289 संख्या—
“विधिभक्त्ये नित्यसिद्ध 'पारिषद-दास'।
'सखा', 'गुरु', 'कान्तागण'—चारिविध प्रकाश॥”
अर्थात् “वैधीभक्तिके जो नित्य सिद्धभक्त हैं, वे
दास, सखा, गुरु अथवा मातापिता और कान्तागण—ये
चार प्रकारके हैं॥”12॥
महाप्रभुकी देहमें लोकातीत महाभाव :-
'अधिरूढ़-महाभाव' याँर, ताँर ए विकार।
मनुष्येर देहे देखि,–बड़ चमत्कार॥'13॥
अनुवाद—जिसमें 'अधिरूढ़-महाभाव' हो, केवल
उसीमें ऐसा विकार हो सकता है। एक मनुष्यके शरीरमें
यह भाव दिखायी दे रहा है, यह तो बड़े आश्चर्यकी
बात है॥13॥
अनुभाष्य—'अधिरूढ़-महाभाव'—(उज्ज्वलनीलमणि
14/146)—'अनुराग'—
“सदानुभूतमपि यः कुर्यान्नवनवं प्रियम्।
रागो भवन्नवनवः सोऽनुराग इतीर्यते॥”
अर्थात् “प्रीतिके पात्र नायकके रूप-गुण-माधुर्यका
पहले नित्य आस्वादन करनेपर भी अनास्वादित लगनेके
कारण अर्थात् जैसे उसका आस्वादन हुआ ही नहीं,
नायिकाके ऐसे अनुभवसे नायिकाका जो राग नायकको
नूतन-नूतन बोध कराता है, वह राग नूतन-नूतन
होकर 'अनुराग' कहलाता है।”
'भाव'—(उःनीः 14/154)—
“अनुरागः स्वसंवेद्यदशां प्राप्य प्रकाशितः।
यावदाश्रयवृत्तिश्चेद्भाव इत्याभिधीयते॥”
अर्थात् “निजानुरागके द्वारा अनुरागकी सम्वेदन-योग्य
दशा प्राप्त करके प्रकाशयुक्त होनेपर यदि अनुराग
पराकाष्ठाको प्राप्त होता है, तब उसे भाव कहते हैं।”
प्रकाशित न होनेपर यावदाश्रयवृत्तिके अभावके कारण
अपने द्वारा सम्वेदन-योग्य दशामें केवल मात्र 'अनुराग'
रहता है, उसे 'भाव' नहीं कहा जा सकता।
'महाभाव'—(उःनीः चौदहवाँ अध्याय)—
“मुकुन्दमहिषीवृन्दैरप्यसावितदुर्लभः ।
व्रजदेव्येकसंवेद्यो महाभावाख्योच्यते॥”156 ॥
रूढ़ और अधिरूढ़के भेदसे महाभाव—
“वरामृतस्वरूपश्रीः स्वं स्वरूपं मनो नयेत्॥”157 ॥
“स रूढ़श्चाधिरूढ़श्चेत्युच्यते द्विविधो बुधैः॥”158॥
रूढ़-महाभाव—
“उद्दीप्ता सात्त्विका यत्र स रूढ़ इति भण्यते॥”159॥
अधिरूढ़-महाभाव—
164 ।

छठा अध्याय 6/13-18 ]
“रूढ़ोकेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम्।
यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥”170॥
अर्थात् “यह भाव श्रीकृष्णकी महिषियोंके लिये भी
अत्यन्त दुर्लभ है; केवल व्रजगोपियोंमें ही यह महाभाव
एकमात्र अनुभव योग्य है; अर्थात् गोपियोंके अतिरिक्त
अन्य ललनाओंमें महाभाव लक्षित नहीं होता। लौकिक
आस्वादनीय वस्तुओंमें अमृतकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ
कोई वस्तु नहीं है। अमृतके समान 'महाभाव'—प्रेमकी
विशेष अवस्था है, उसमें पृथक् रूपमें मनकी स्थिति
नहीं होती अर्थात् मन महाभावात्मक होता है। इन्द्रियोंकी
मनोवृत्तिरूपा गोपियोंका मन आदि सभी इन्द्रियाँ महाभाव
रूप होनेके कारण उनके सभी कार्योंके द्वारा श्रीकृष्णका
उनके अति वशीभूत होना युक्तिसिद्ध है। पट्टमहिषियोंमें
सम्भोगकी इच्छाके कारण पृथक् अवस्थित होनेके
कारण मन सम्पूर्णरूपसे प्रेमात्मिका नहीं है, इसलिये
उनमें महाभावकी सम्भावना नहीं है। महाभाव—'रूढ़'
और 'अधिरूढ़'के भेदसे दो प्रकारका है। जिस
महाभावमें सात्त्विक भावसमूह उद्दीप्त होते हैं, वही
'रूढ़' भाव है। रूढ़भावमें कहे गये अनुभावसमूहसे भी
सात्त्विक भावसमूह जब किसी विशेष दशाको प्राप्त
करके जो अनुभाव लक्षित होते हैं, वही
'अधिरूढ़'-महाभाव है। वह 'सुदीप्त' भाव नहीं है। यह
अधिरूढ़ भाव दो प्रकारका होता है—'मोदन' और
'मादन'। जिस अधिरूढ़ महाभावमें राधाकृष्णके सात्त्विक
भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे
'मोदन' कहते हैं। ह्लादिनीका सार प्रेम यदि सभी
भावोंके उद्गमसे उल्लासशील होता है, तब उसे 'मादन'
कहते हैं। यह परात्पर अर्थात् मोहनादि भावोंकी अपेक्षा
उत्कृष्ट है; यह केवल श्रीराधिकामें ही सब समय
सम्भव है ॥ 13 ॥
भट्टाचार्यकी चिन्ता :-
एत चिन्ति' भट्टाचार्य आछेन बसिया।
नित्यानन्दादि सिंहद्वारे उत्तरिल गिया ॥ 14 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य घरमें बैठकर जब
ऐसा चिन्तन कर रहे थे, तभी श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि
भक्त श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारपर आ पहुँचे ॥ 14 ॥
श्रीनित्यानन्दादिका आठारनालासे पुरीमें आनेपर लोगोंके
मुखसे महाप्रभुका श्रीभट्टाचार्यके घरमें होनेके विषयमें
सुनना :-
ताँहा शुनि' लोके कहे अन्योन्ये बात्।
'एक संन्यासी आसि' देखि' जगन्नाथ ॥ 15 ॥
मूर्च्छित हैल, चेतन ना हय शरीरे।
सार्वभौम लञा गेला आपनार घरे ॥' 16 ॥
अनुवाद—वहाँ पहुँचकर श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि
भक्तोंने लोगोंको कहते हुए सुना,—'एक संन्यासी
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये आये थे। श्रीजगन्नाथदेवके
दर्शन करके वे मूर्च्छित हो गये थे, उनके शरीरमें
चेतना नहीं रही थी। तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें
अपने घरमें ले गये॥'15-16॥
श्रीसार्वभौमके बहनोई श्रीगोपीनाथका वहाँपर आना :-
शुनि' सबे जानिलेन महाप्रभुर कार्य।
हेनकाले आइला ताँहा गोपीनाथाचार्य ॥ 17 ॥
नदीया-निवासी, विशारदेर जामाता।
महाप्रभुर भक्त तैं हो, प्रभुर तत्त्वज्ञाता ॥ 18 ॥
अनुवाद—यह बात सुनकर सभी भक्त जान गये
कि वे संन्यासी महाप्रभु ही हैं। उसी समय श्रीगोपीनाथाचार्य
भी वहाँ आ गये। श्रीगोपीनाथाचार्य नदीयाके निवासी,
महेश्वर विशारदके दामाद और महाप्रभुके भक्त और
उनके तत्त्वको जाननेवाले थे ॥ 17-18 ॥
अनुभाष्य—'विशारद'—नीलाम्बर चक्रवर्तीके सहपाठी
महेश्वर विशारद समुद्रगढ़के निकट स्थित 'विद्यानगर'में
वास करते थे। मधुसूदन वाचस्पति और वासुदेव
सार्वभौम उनके दो पुत्र थे और श्रीगोपीनाथाचार्य उनके
दामाद थे॥ 17 ॥
। 165

[ 6/19-30 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पूर्व परिचयके अनुसार मुकुन्दादिके साथ बातचीत करनेपर महाप्रभुके संवादका श्रवण :-
मुकुन्द-सहित पूर्वे आछे परिचय।
मुकुन्द देखिया ताँर हइल विस्मय॥ 19॥
मुकुन्द ताँहारे देखि' कैल नमस्कार।
तेंहो आलिङ्गिया पूछे प्रभुर समाचार॥ 20॥
मुकुन्द कहे,—"प्रभुर इँहा हैल आगमने।
आमि-सब आसियाछि महाप्रभुर सने॥" 21॥
नित्यानन्द-गोसाञिके आचार्य कैल नमस्कार।
सबे मेलि' पुछे प्रभुर वार्त्ता बार बार॥ 22॥
मुकुन्द कहे,—"महाप्रभु संन्यास करिया।
नीलाचले आइला सङ्गे आमा-सबा लञा॥ 23॥
आमा-सबा छाड़ि' आगे गेला दरशने।
आमि-सब पाछे आइलाङ ताँर अन्वेषणे॥ 24॥
अन्योन्ये लोकेर मुखे ये कथा शुनिल।
सार्वभौम-गृहे प्रभु,—अनुमान कैल॥ 25॥
ईश्वर-दर्शने प्रभु प्रेमे अचेतन।
सार्वभौम लञा गेला आपन-भवन॥ 26॥
तोमार मिलने यबे आमार हैल मन।
दैवे सेइ क्षणे पाइलुँ तोमार दरशन॥ 27॥
श्रीजगन्नाथकी अपेक्षा महाप्रभुके प्रति अधिक प्रेम :-
चल, सबे याइ सार्वभौमेर भवन।
प्रभु देखि' पाछे करिब ईश्वर-दर्शन॥" 28॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यका श्रीमुकुन्द दत्तके साथ पहलेसे ही परिचय था, इसलिये श्रीमुकुन्द दत्तको वहाँ देखकर वे आश्चर्यचकित हुए। श्रीमुकुन्द दत्तने उनको देखकर प्रणाम किया। श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीमुकुन्द दत्तका आलिङ्गन करके उनसे महाप्रभुका समाचार पूछा। श्रीमुकुन्द दत्तने कहा,—"महाप्रभु यहाँ नीलाचलमें आये हैं और हम सब उनके साथ ही आये हैं।" श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीनित्यानन्द प्रभुको प्रणाम किया और फिर सबसे मिलकर वे बार-बार महाप्रभुके बारेमें पूछने लगे कि वे कहाँ हैं? श्रीमुकुन्दने कहा,—"महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया है। वे हम सबको अपने साथ लेकर नीलाचल आये हैं। हम सबको छोड़कर वे आगे श्रीजगन्नाथका दर्शन करने आये थे और हम सब उन्हें ढूँढ़ते हुए आ रहे हैं। दूसरे लोगोंके मुखसे हमने जो बात सुनी है, उससे तो यह अनुमान लग रहा है कि वे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरमें हैं। हमने उनसे सुना कि भगवान् श्रीजगन्नाथके दर्शन करके वे प्रेममें आविष्ट होकर अचेतन हो गये थे और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें अपने घर ले गये हैं। इस परिस्थितिमें सहायताके लिये मैं आपका स्मरण कर ही रहा था कि भाग्यसे मुझे आपका दर्शन प्राप्त हो गया है। चलो, हम सब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर जाकर पहले महाप्रभुका दर्शन करें। बादमें श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करेंगे॥" 19-28॥
सभी भक्तोंका श्रीसार्वभौमके घरकी ओर गमन :-
एत शुनि' गोपीनाथ सबारे लञा।
सार्वभौम-घरे गेला हरषित हञा॥ 29॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीगोपीनाथाचार्य हर्षित होकर सब भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर गये॥ 29॥
वहाँ महाप्रभुका दर्शन, गोपीनाथको महाप्रभुके दर्शनसे एकसाथ हर्ष और विषाद :-
सार्वभौम-स्थाने गिया प्रभुके देखिल।
प्रभु देखि' आचार्येर दुःख-हर्ष हैल॥ 30॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर जाकर सभीने देखा कि महाप्रभु मूर्च्छित पड़े हैं। महाप्रभुकी ऐसी दशा देखकर श्रीगोपीनाथाचार्यको दुःख हुआ और साथ ही उनके दर्शनसे उन्हें हर्ष भी हुआ॥ 30॥
166 ।

छठा अध्याय 6/31-40 ]
सभी भक्तोंको घरके अन्दर भेजना और सबके साथ
यथायोग्य बातचीत :-
सार्वभौमे जानाञा सबे निल अभ्यन्तरे।
नित्यानन्द-गोसाञिरे तँहो कैल नमस्कारे ॥ 31 ॥
सबा सहित यथायोग्य करिल मिलन।
प्रभु देखि' सबार हैल हरषित मन ॥ 32 ॥
अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्यसे भक्तोंके विषयमें जानकर
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य सभीको अपने घरके भीतर ले गये
और श्रीनित्यानन्द प्रभुको देखकर उन्हें प्रणाम किया।
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने सभी भक्तोंके साथ यथायोग्य
व्यवहार करते हुए भेंट की। महाप्रभुको देखकर सबका
मन आनन्दित हो गया॥ 31-32॥
पुत्र चन्दनेश्वरके साथ सभीको श्रीजगन्नाथके
दर्शनके लिये भेजना :-
सार्वभौम पाठाइल सबा दर्शन करिते।
'चन्दनेश्वर' निजपुत्र दिल सबार साथे ॥ 33 ॥
अनुवाद-तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अपने पुत्र
'चन्दनेश्वर'के साथ उन सब भक्तोंको श्रीजगन्नाथदेवके
दर्शनके लिये भेज दिया ॥ 33 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'दर्शन करिते'- श्रीजगन्नाथदेवके
दर्शन करनेके लिये ॥ 33 ॥
श्रीजगन्नाथके दर्शनसे निताइमें प्रेमका आवेश :-
जगन्नाथ देखि' सबार हइल आनन्द।
भावेते आविष्ट हैला प्रभु नित्यानन्द ॥ 34 ॥
सबे' मेलि' धरि' ताँरे सुस्थिर करिल।
ईश्वर-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल ॥ 35 ॥
प्रसाद पाञा सबे हैला आनन्दित मने।
पुनरपि आइला सबे महाप्रभुर स्थाने ॥ 36 ॥
अनुवाद-श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करके सभीको
बहुत आनन्द हुआ। श्रीनित्यानन्द प्रभु तो भावमें
आविष्ट हो गये। सभी भक्तोंने मिलकर श्रीनित्यानन्द
प्रभुको पकड़ा तथा उन्हें स्थिर किया। तभी श्रीजगन्नाथदेवके
सेवकने उन्हें प्रसाद और माला लाकर दिये।
श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद पाकर सभीका मन बहुत प्रसन्न
हुआ। इसके बाद वे सब फिरसे महाप्रभुके पास
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घरपर आ गये॥ 34-36 ॥
महाप्रभुके निकट सभी भक्तोंके द्वारा उच्च-स्वरसे
कीर्तन और महाप्रभुको बाह्य-दशाकी प्राप्ति :-
उच्च करि' करे सबे नाम-सङ्कीर्त्तन ।
तृतीय प्रहरे हैल प्रभुर चेतन ॥ 37 ॥
श्रीसार्वभौमका शिष्टाचार :-
हुङ्कार करिया उठे 'हरि' 'हरि' बलि' ।
आनन्दे सार्वभौम ताँर लैल पदधूलि ॥ 38 ॥
अनुवाद-महाप्रभुकी चेतना लौटानेके लिये सभी
भक्त उच्चस्वरसे नाम-सङ्कीर्तन करने लगे, तब तीसरे
प्रहर महाप्रभुको चेतनता आयी। महाप्रभु हुँकार करते
हुए उठे और जोरसे 'हरि' 'हरि' बोला। उनकी चेतनता
लौटनेपर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बड़े प्रसन्न हुए और
उन्होंने महाप्रभुके श्रीचरणोंकी धूलिको ग्रहण किया॥ 37-38 ॥
श्रीसार्वभौमका निमन्त्रण :-
सार्वभौम कहे, - “शीघ्र करह मध्याह्न।
मुञि भिक्षा दिब आजि महाप्रसादान्न ॥" 39 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने सभीसे कहा,- "आप
शीघ्र ही अपना मध्याह्नका स्नान कर लीजिये। मैं आप
सबको आज श्रीजगन्नाथदेवका महाप्रसाद लाकर भोजन
कराऊँगा ॥ " 39 ॥
अनुभष्य- 'करह मध्याह्न'-दिनके समय किये
जानेवाले स्नानके बाद आहारको ग्रहण करो ॥ 39 ॥
स्नानके बाद भक्तों सहित महाप्रभुका प्रसाद-सम्मान :-
समुद्रस्नान करि' प्रभु शीघ्र आइला।
चरण पाखालि' प्रभु आसने बसिला ॥ 40 ॥
। 167

[ 6/40-49 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

बहुत प्रसाद सार्वभौम आनाइल।
तबे महाप्रभु सुखे भोजन करिल ॥ 41 ॥
सुवर्ण-थालाते अन्न उत्तम व्यञ्जन।
भक्तगण-सङ्गे प्रभु करेन भोजन ॥ 42 ॥

अनुवाद—समुद्रमें स्नान करके महाप्रभु और उनके भक्त शीघ्र ही लौट आये। महाप्रभु चरणोंको धोनेके बाद प्रसाद पानेके लिये आसनपर बैठ गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने अनेक प्रकारका श्रीजगन्नाथदेवका महाप्रसाद मँगवाकर रखा था। महाप्रभुने तब बड़े आनन्दके साथ भोजन किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने स्वर्णकी थालीमें महाप्रभुको विशेष चावल और उत्तम व्यञ्जन परोसे। अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने महाप्रसाद ग्रहण किया॥ 40-42 ॥

श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रसाद परोसना :—
सार्वभौम परिवेशन करेन आपने।
प्रभु कहे,—“मोरे देह लाफरा-व्यञ्जने ॥ 43 ॥
पीठा-पाना देह तुमि इँहा-सबाकारे।”
तबे भट्टाचार्य कहे युड़ि' दुइ करे ॥ 44 ॥
“जगन्नाथ कैछे करियाछेन भोजन।
आजि सब महाप्रसाद कर आस्वादन ॥” 45 ॥
एत बलि' पीठा-पाना सब खाओयाइला।
भिक्षा कराञा आचमन कराइला ॥ 46 ॥

अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य स्वयं ही महाप्रसाद परोस रहे थे। महाप्रभुने उनसे कहा,—“आप मुझे केवल लाफरा व्यञ्जन दीजिये और सभी भक्तोंको पीठा-पाना दीजिये। तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने हाथ जोड़कर कहा,—“आज श्रीजगन्नाथदेवने जो-जो भोजन किया है, उस सबका आप स्वयं महाप्रसादके रूपमें आस्वादन करें।” इतना कहकर उन्होंने महाप्रभु और सभी भक्तोंको पीठा-पाना आदि सब कुछ खिलाया और भोजन करानेके बाद आचमन कराया॥ 43-46 ॥

अनुभाष्य—‘लाफरा-व्यञ्जन’—बहुत सी सब्जियोंको काटकर एक साथ मिलाकर जीरा, मिर्च और सरसों आदिका तड़का लगाकर बनाया गया व्यञ्जन ॥ 43 ॥

श्रीगोपीनाथ और श्रीसार्वभौमका महाप्रभुके पास आना :—
आज्ञा मागि' गोपीनाथ आचार्यके लञा।
प्रभुर निकट आइला भोजन करिया ॥ 47 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके भोजनके बाद श्रीसार्वभौमने उनकी आज्ञा लेकर श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ बैठकर भोजन किया और पुनः महाप्रभुके पास आये ॥ 47 ॥

श्रीसार्वभौमका प्रणाम और महाप्रभुका आशीर्वाद :—
'नमो नारायणाय' बलि' नमस्कार कैल।
'कृष्णे मति रहु' बलि' गोसाञि कहिल ॥ 48 ॥

अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने ‘नमो नारायणाय’ कहकर महाप्रभुको प्रणाम किया। उसके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,—‘श्रीकृष्णमें तुम्हारी मति रहे।' 48 ॥

अनुभाष्य—चतुर्थ-आश्रमी संन्यासियोंको ‘ॐ नमो नारायणाय' कहकर सम्बोधन करनेकी प्रथा है। संन्यासियोंके लिये 'निराशीर्निर्नमष्क्रियः' (नमस्कार भी नहीं करेगा तथा आशीर्वाद भी नहीं देगा, ऐसी) विधि स्मृतिशास्त्रोंमें कही गयी है; किन्तु वैष्णव-संन्यासिगण अपने आपको श्रीकृष्णदास और श्रीकृष्णकी सेवाको ही सर्वोत्तम जानकर जगत्में सभीको 'श्रीकृष्णचरणकमलोंमें तुम्हारी मति हो' ऐसा करुणापूर्ण आशीर्वाद देते हैं ॥ 48 ॥

श्रीसार्वभौमका महाप्रभुको वैष्णव-सम्प्रदायका मानना :—
'शुनि' सार्वभौम मने विचार करिल।
वैष्णव-संन्यासी इँहो, वचने जानिल ॥ 49 ॥

अनुवाद—महाप्रभुके उत्तरको सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने मनमें विचार किया कि इनके वचनोंसे लगता है ये वैष्णव-संन्यासी हैं॥ 49 ॥

168 ।

छठा अध्याय 6/50-58 ]
श्रीगोपीनाथसे महाप्रभुके पूर्व आश्रमके सम्बन्धमें पूछना :-
गोपीनाथ आचार्ये कहे सार्वभौम।
“गोसाञिर जानिते चाहि काँहा पूर्वाश्रम॥”50॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यसे पूछा,—“मैं इन संन्यासीके पूर्वाश्रमके बारेमें जानना चाहता हूँ॥” 50॥
अनुभाष्य—‘पूर्वाश्रम’—संन्यासाश्रम ग्रहण करनेसे पहले गृहमें रहते समय किस नामसे परिचित थे और किस स्थानपर वास करते थे॥50॥
गोपीनाथके द्वारा परिचय-प्रदान :-
गोपीनाथाचार्य कहे,–“नवद्वीपे घर।
‘जगन्नाथ’–नाम, पदवी–‘मिश्र पुरन्दर’॥51॥
‘विश्वम्भर’–नाम इँहार, ताँर इँहो पुत्र।
नीलाम्बर चक्रवर्त्तीर हयेन दौहित्र॥”52॥
सार्वभौम कहे,-“नीलाम्बर चक्रवर्त्ती।
विशारदेर समाध्यायी,-एइ ताँर ख्याति॥53॥
‘मिश्र पुरन्दर’ ताँर मान्य, हेन जानि।
पितार सम्बन्धे दोँहाके पूज्य करि’ मानि॥”54॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“नवद्वीपमें श्रीजगन्नाथ नामके एक व्यक्ति रहते हैं, जिनकी पदवी—‘मिश्र पुरन्दर’ है। इनका नाम ‘विश्वम्भर’ है और ये उनके पुत्र तथा श्रीनीलाम्बर चक्रवर्तीके नाती हैं।” श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“नीलाम्बर चक्रवर्ती तो मेरे पिताजी श्रीमहेश्वर विशारदके सहपाठी थे, उनके विषयमें मैं यही जानता हूँ। श्रीजगन्नाथ मिश्र पुरन्दरका भी मेरे पिताजी बहुत सम्मान करते हैं। इसलिये पिताजीके सम्बन्धसे मैं श्रीनीलाम्बर चक्रवर्ती तथा श्रीजगन्नाथ मिश्र दोनोंको ही अपना पूजनीय मानता हूँ॥”51-54॥
महाप्रभुके परिचय-श्रवणसे श्रीसार्वभौमको आनन्द :-
नदीया-सम्बन्धे सार्वभौम हृष्ट हैला।
प्रीत हञा गोसाञिरे कहिते लागिला॥55॥
श्रीसार्वभौमका दैन्य-विनय :-
“सहजेइ पूज्य तुमि, आरे त’ संन्यास।
अतएव हङ तोमार आमि निज दास॥”56॥
अनुवाद—महाप्रभुको नदीयावासी जानकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत प्रसन्न हुए और वे महाप्रभुसे कहने लगे,—“आप तो सहज ही हमारे पूज्य हैं और आप संन्यासी भी हैं। इसलिये मैं आपका निज-दास हूँ॥” 56॥
अनुभाष्य—आपकी स्वाभाविक-वृत्तिके उत्कर्षका विचार करनेपर आप मेरे पूजनीय हो; और बाह्य आश्रम विचारसे भी आप संन्यास ग्रहण करनेके कारण हमारे जैसे गृहस्थोंके पूजनीय हो। इसलिये मैं आपका दास हूँ और आप मेरे सेव्य हो॥56॥
महाप्रभुका दूसरोंको सम्मान देनेका धर्म :-
शुनि’ महाप्रभु कैल श्रीविष्णु-स्मरण।
भट्टाचार्ये कहे किछु विनय वचन॥57॥
“तुमि जगद्गुरु—सर्वलोक-हितकर्त्ता।
वेदान्त पड़ाओ, संन्यासीर उपकर्त्ता॥58॥
अनुवाद—अपनी प्रशंसा सुनकर महाप्रभुने लज्जित होकर श्रीविष्णुका स्मरण किया और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको विनम्रतासे कहने लगे,—“आप तो वेदान्त पढ़ाते हैं, इसलिये जगद्गुरु और सबके हितकारी हैं। आप तो संन्यासियोंका भी उपकार करनेवाले हैं॥57-58॥
अनुभाष्य—आप तो जगत्के गुरुपदपर आसीन हैं, वेदान्तके अध्यापक, अज्ञानी छात्रोंको शिक्षा प्रदान करनेवाले, संन्यासियोंके शुभाकाङ्क्षी; उन्हें वेदान्तके अर्थोंका श्रवण कराके वैराग्यका उपदेश देकर उनके अज्ञानको दूर करनेवाले और भिक्षुओंको (त्यागियोंको) अपने घरमें भिक्षा (भोजन) कराके उनका उपकार करनेवाले हैं॥58॥
। 169

Here is the complete Devanagari text transcribed from the image:

[ 6/59-69 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
महाप्रभुका अपनेको पाल्य और
श्रीसार्वभौमको पालक मानना :-
आमि बालक-संन्यासी—भाल-मन्द नाहि जानि।
तोमार आश्रय निलुँ, गुरु करि' मानि ॥ 59 ॥
तोमार सङ्ग लागि' मोर इँहा आगमन।
सर्वप्रकारे करिबे आमाय पालन ॥ 60 ॥
महाप्रभुके द्वारा कृतज्ञता दिखलाना :-
आजि ये हैल आमार बड़इ विपत्ति।
ताहा हैते कैले तुमि आमार अव्याहति ॥" 61 ॥
अनुवाद-मैं तो एक युवा संन्यासी हूँ, अपना
अच्छा-बुरा कुछ नहीं जानता हूँ। इसलिये मैं आपको
गुरु मानकर आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। आपका
सङ्ग प्राप्त करनेके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ, आप
मेरा सब प्रकारसे पालन कीजिये। आज जो मुझपर
इतनी बड़ी विपत्ति आ पड़ी थी, उससे आपने ही मेरी
रक्षा की थी॥" 59-61 ॥
अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथके दर्शनसे मैं मूर्च्छित होकर
संज्ञाहीन हो गया था, आपने मेरी सेवाके भारको ग्रहण
करके अज्ञानको दूर करके चेतन किया है अर्थात्
अन्तर्दशासे बहिर्दशामें पहुँचा दिया है॥ 61 ॥
भट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुके प्रति स्नेहपूर्ण उपदेश :-
भट्टाचार्य कहे,- “एकले तुमि ना याइह दर्शने।
आमार सङ्गे याबे, किंवा आमार लोक-सने ॥" 62 ॥
अनुवाद-श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, - "अब आप
अकेले श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मत जाना। मेरे
साथ जाना या मेरे किसी आदमीके साथ जाना ॥ "62 ॥
महाप्रभुकी सम्मतिसूचक उक्ति :-
प्रभु कहे, - "मन्दिर-भितरे ना याइब।
गरुड़ेर पाशे रहि' दर्शन करिब ॥ " 63 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "अब मैं मन्दिरके भीतर
नहीं जाऊँगा। गरुड़-स्तम्भके पास खड़े होकर ही
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करूँगा ॥" 63 ॥
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा अपने बहनोईको
महाप्रभुकी देखरेख करनेकी प्रार्थना :-
गोपीनाथाचार्यके कहे सार्वभौम।
"तुमि गोसाञिरे कराइह दर्शन ॥ 64 ॥
आमार मातृस्वसा-गृह—निर्जन स्थान।
ताँहा वासा देह, कर सर्व समाधान ॥"65 ॥
गोपीनाथ प्रभु लञा ताँहा वासा दिल।
जलपात्र आदि सर्व समाधान कैल ॥ 66 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने श्रीगोपीनाथाचार्यको
कहा, - "आप गोसाईं जीको अपने साथ ले जाकर इन्हें
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन कराना। मेरी मौसीका घर निर्जन
स्थानमें है, वहाँ आप इनके रहनेकी और जो-जो
आवश्यक वस्तुएँ हैं, उन सबकी व्यवस्था कर दीजिये।"
तब श्रीगोपीनाथाचार्यने महाप्रभुको साथ ले जाकर उन्हें
उनके रहनेका स्थान दिखाया। उन्होंने जलपात्र आदि
सभी आवश्यक वस्तुओंकी भी व्यवस्था कर दी ॥ 64-66 ॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुको
श्रीजगन्नाथकी सेवाका प्रदर्शन :-
आर दिन गोपीनाथ प्रभु-स्थाने गिया।
शय्योत्थान दरशन कराइल लञा ॥ 67 ॥
अनुवाद-अगले दिन श्रीगोपीनाथाचार्य महाप्रभुके
स्थानपर गये और उन्हें श्रीजगन्नाथदेवके शय्योत्थान
दर्शन कराये ॥ 67 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'शय्योत्थान' - श्रीजगन्नाथदेवका
शय्यासे उठना ॥ 67 ॥
श्रीमुकुन्दके साथ श्रीसार्वभौमके घरमें आगमन :-
मुकुन्ददत्त लञा आइला सार्वभौम-स्थाने।
सार्वभौम किछु ताँरे बलिला वचने ॥ 68 ॥
श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुके प्रति स्नेहप्रीति और
उनके संन्यास-परिचयकी जिज्ञासा :-
"प्रकृति-विनीत, संन्यासी देखिते सुन्दर।
आमार बहुप्रीति बाड़े इँहार उपर ॥ 69 ॥
170

छठा अध्याय 6/68-73 ]
कोन् सम्प्रदाये संन्यास करयाछेन ग्रहण।
कि नाम इँहार, शुनिते हय मन॥”70॥
अनुवाद—तब श्रीगोपीनाथाचार्य श्रीमुकुन्द दत्तको
लेकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके घर आये। श्रीसार्वभौम
भट्टाचार्य कहने लगे,—“ये संन्यासी विनम्र स्वभावके हैं
और देखनेमें भी बहुत सुन्दर हैं। उनके प्रति मेरी प्रीति
बढ़ती ही जा रही है। मुझे यह सुननेकी बहुत उत्कण्ठा
हो रही है कि इन्होंने किस सम्प्रदायसे संन्यास ग्रहण
किया है तथा इनका नाम क्या है?”॥68-70॥
अनुभाष्य—महाप्रभुने वास्तविक संन्यासीके अधिकारको
ग्रहण करनेपर भी दैन्यपूर्वक संन्यासीके शिष्य
'ब्रह्मचारी'-नामसे ही अपना परिचय देना उचित समझा।
वास्तविक संन्यासी होनेपर भी 'ब्रह्मचारी'-परिचय प्रदान
करना स्वाभाविक विनयका आदर्श है॥69॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा परिचय-प्रदान :-
गोपीनाथ कहे,—“इँहार नाम श्रीकृष्णचैतन्य।
गुरु इँहार केशव-भारती महाधन्य॥”71॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने बतलाया,—“इनका नाम
श्रीकृष्णचैतन्य है और इनके संन्यास गुरु परम
सौभाग्यवान् श्रीकेशव-भारती हैं॥”71॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा सम्प्रदायकी समालोचना :-
सार्वभौम कहे,—“इँहार नाम सर्वोत्तम।
भारती-सम्प्रदाय एइ—हयेन मध्यम॥”72॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“इनका नाम
'श्रीकृष्णचैतन्य' तो सर्वोत्तम है, परन्तु ये भारती-सम्प्रदायके
हैं, इसलिये ये मध्यम श्रेणीके संन्यासी हैं॥”72॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुके सम्प्रदायका समर्थन :-
गोपीनाथ कहे,—“इँहार नाहि बाह्यापेक्षा।
अतएव बड़ सम्प्रदायरे नाहिक अपेक्षा॥”73॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा,—“ये किसी बाहरी
औपचारिकचाकी आवश्यकता नहीं समझते, इसलिये
इन्हें बड़े सम्प्रदायकी कोई अपेक्षा नहीं है॥”73॥
अनुभाष्य—शङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित दशनामी
संन्यासियोंमें 'तीर्थ', 'आश्रम' और 'सरस्वती'—ये सर्वोच्च
हैं। शृङ्गेरि मठमें 'सरस्वती'—उत्तम, 'भारती'—मध्यम
और 'पुरी'—कनिष्ठ—ये तीन संन्यासियोंकी उपाधियाँ
हैं।
श्रीशङ्कर-सम्प्रदायकी जिस प्रकार तीर्थ आदि दशनामी
संन्यासियोंकी व्याख्या प्रकाशित है, वह यह है—
जो त्रिवेणी-सङ्गम तीर्थमें 'तत्त्वमसि' आदि लक्षणोंसे
युक्त वाक्यके अनुसार तत्त्वका अर्थ समझकर स्नान
करते हैं, वे 'तीर्थ' नामसे जाने जाते हैं। जिनका
संन्यासाश्रममें रहनेका विशेष आग्रह है अथवा गुरु-गृहमें
शिक्षा पूर्ण होनेपर गृहस्थ आश्रममें जानेके अनिच्छुक
और सांसारिक आशाके बन्धनोंसे मुक्त एवं योनिभ्रमणमुक्त
(कोई सांसारिक आसक्ति नहीं होनेके कारण जन्म-मरणके
चक्रसे मुक्त) हैं, वे 'आश्रम' नामसे परिचित होते हैं।
जो मनोहर निर्जनस्थान या वनमें वास करते हैं और
आशाबन्धनसे मुक्त हैं, वे 'वन'-नामसे कहे जाते हैं।
जो नित्यकाल अरण्यमें रहकर आनन्दरूपी नन्दनकाननमें
वास करनेके लिये इस विश्वके समस्त सम्बन्धोंका
त्याग करते हैं, वे 'अरण्य' हैं। जो पर्वतोंपर वनमें वास
करके सदैव गीता-अध्ययनमें रत हैं, जिसकी बुद्धि
पर्वतके समान गम्भीर हैं, वे 'गिरि' हैं। जिन्होंने
पर्वतवासी प्राणियोंके मध्य वास करके अत्यन्त गूढ़
ज्ञान लाभ करके संसारके सार एवं असार वस्तुओंके
भेदको जान लिया है, वे 'पर्वत' हैं। जो तत्त्व-सागरसे
ज्ञानरूपी रत्न एकत्रित करके कभी भी मर्यादाका
उल्लङ्घन नहीं करते, वे 'सागर' हैं। जो उदात्तादि
अथवा षड्ज-ऋषभ आदि स्वरज्ञानकी चर्चामें रत हैं,
स्वर-आलापादिमें निपुण एवं असार-संसार विनाशकारी
हैं, वे 'सरस्वती' कहलाते हैं। जिन्होंने विद्यामें पूर्णता
लाभ करके अविद्याके सम्पूर्ण भारका परित्याग कर
दिया है और जो किसी भी प्रकारके दुःखसे दुःखी नहीं
। 171

[ 6/72–76 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
होते, वे 'भारती' हैं। जो तत्त्वज्ञानमें पारङ्गत एवं
पूर्णतत्त्वपदमें अवस्थित होकर सब समय परब्रह्मकी
चर्चामें रत हैं, वे 'पुरी' नामसे प्रसिद्ध हैं।
श्रीशङ्कर-सम्प्रदायमें 'ब्रह्मचारी' नामोंका अर्थ जिस
प्रकारसे प्रदान किया जाता है, वह यह है—
जो अपने स्वरूपको भलीभाँति जानते हैं, स्वधर्मका
पालन करते हैं एवं नित्यकाल अपने आनन्दमें मग्न
हैं, वे 'स्वरूप'-नामक ब्रह्मचारी हैं। जो स्वयं ज्योतिर्ब्रह्मको
विशेष रूपसे जानते हैं और तत्त्वज्ञानके प्रकाशके द्वारा
विशेषरूपसे योगयुक्त है, वे 'प्रकाश' नामसे जाने जाते
हैं। जो तत्त्वज्ञान प्राप्त करके सत्य, ज्ञान, अनन्त और
ब्रह्मका सदैव ध्यान करते हैं एवं स्वानन्दमें विहार
करते हैं, वे 'आनन्द' नामसे प्रसिद्ध हैं। जो
अचित्-मिश्रभावसे अतीत चिन्मात्र, मायाके द्वारा
चित्तविकारसे रहित, और जो अनन्त, अजर और
मङ्गलमय ब्रह्मको जानते हैं, वे विद्वान हैं और
'चैतन्य'-नामसे कहे जाते हैं (मञ्जूषा-द्वितीय संख्या)।
श्रीसार्वभौमने कहा, —“श्रीमन्महाप्रभुका नाम—
'श्रीकृष्ण' एवं ब्रह्मचारी-उपाधि—'चैतन्य' है। इसलिये
श्रीकृष्णनाम सभी नामोंकी अपेक्षा उत्तम है, किन्तु
श्रीमहाप्रभु सर्वोच्च सरस्वती-सम्प्रदायमें प्रवेश ना करके
मध्यम-सम्प्रदायमें प्रविष्ट हुए हैं।” इसके उत्तरमें
श्रीगोपीनाथने कहा, —“इनका मध्यम-सम्प्रदायमें प्रवेश
करनेका कारण यह है कि इनकी किसी प्रकारकी कोई
बाह्यापेक्षा नहीं है। भीतरमें मर्यादाका अहङ्कार रहनेपर
मनुष्य मर्यादा पानेका प्रयास करता है। अकिञ्चन
होकर दीनभावसे हरिभजन करनेकी इच्छा होनेपर
भारती-सम्प्रदायकी उपेक्षा करके सरस्वती-सम्प्रदायका
अनुसन्धान करके उसमें प्रवेश करनेकी आकाङ्क्षा नहीं
होती॥ 72–73॥
साधारण युवा समझकर महाप्रभुके प्रति भट्टाचार्यकी
गुरुकी भाँति उपदेशमूलक उक्ति :—
भट्टाचार्य कहे, —“इँहार प्रौढ़ यौवन।
केमने संन्यास-धर्म हबेक रक्षण॥ 74॥
निरन्तर इँहाके वेदान्त शुनाइब।
वैराग्य-अद्वैत-मार्गे प्रवेश कराइब॥ 75॥
कहेन यदि, पुनरपि योग-पट्ट दिया।
संस्कार करिये उत्तम-सम्प्रदाये आनिया॥” 76॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, —“श्रीकृष्ण-
चैतन्य पूर्ण यौवनमें हैं, ये अपने संन्यास धर्मकी रक्षा
कैसे करेंगे? इसलिये मैं इन्हें निरन्तर वेदान्त सुनाकर
इनको वैराग्यमें स्थिर रखूँगा और अद्वैत-मार्गमें प्रवेश
कराऊँगा। यदि श्रीकृष्णचैतन्य कहेंगे, तो मैं उन्हें फिरसे
संन्यास-वस्त्र देकर और संस्कार करके उत्तम सम्प्रदायमें
ले आऊँगा॥” 74–76॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस मायिक जगत्‌को कौवेकी
विष्ठाके (मलके) समान तुच्छ ज्ञान करानेवाले
केवल-अद्वैतपथमें प्रवेश करा दूँा। 'योगपट्ट'—संन्यासियोंका
विशेष वेश। उत्तम सम्प्रदायके योग्य योगपट्ट अर्थात्
संन्यासियोंके द्वारा व्यवहार किये जानेवाले वस्त्रोंको
देकर पुनः संस्कार कर दूँगा॥ 75–76॥
अनुभाष्य—संन्यासिगण सदैव वेदान्तवाक्योंका
अनुशीलन करके विषयोंके प्रति वैराग्य उत्पन्न करते
हैं एवं कौपीनाश्रित होकर कौपीनकी मर्यादाकी रक्षा
करते हैं। सदैव शम-दमादि छह प्रकारके साधनोंमें
पारदर्शी होनेके लिये भक्तिरहित-विचारकोंकी युक्तिके
अनुसार ज्ञान और वैराग्यकी उपासना आवश्यक है।
द्वितीय (देहमें) अभिनिवेश होनेपर ही मायिक वस्तुओंके
पराक्रमकी आशङ्का होती है, इसलिये ज्ञान-वैराग्यसे
युक्त कराके अद्वैत-पथमें प्रवेश करानेपर युवावस्थाके
कारण कामसे उत्पन्न चेष्टाएँ बलवान् नहीं हो पायेंगी।
महाप्रभु यदि उच्च सरस्वती-सम्प्रदायमें प्रवेशाधिकारकी
इच्छा करें, तो फिर पुनः सरस्वती-सम्प्रदायके संन्यासीके
द्वारा उनको त्यागियोंके वस्त्र-दण्ड आदि प्रदान कराके
उन्नत करा सकता हूँ। शौक्रब्राह्मणके अतिरिक्त कोई भी
वर्ण उच्च 'सरस्वती' सम्प्रदायमें प्रवेश नहीं कर सकता;
इसलिये 'भारती' आदि सम्प्रदायमें विधिकी शिथिलता
172 ।

छठा अध्याय 6/74-83 ]
रहनेसे 'सरस्वती' संन्यासियोंकी भाँति उच्च सम्प्रदायके
विचारसे 'भारती' संन्यासियोंकी मध्यमता और 'पुरी'
संन्यासियोंकी कनिष्ठता सिद्ध है॥ 74-76 ॥
महाप्रभुके प्रति शासन-वाणीको सुनकर
दोनों भक्तोंको दुःख :-
शुनि' गोपीनाथ मुकुन्द, दुँहे दुःखी हैला।
गोपीनाथाचार्य किछु कहिते लागिला ॥ 77 ॥
श्रीसार्वभौमके अज्ञानको देखकर गोपीनाथके द्वारा
महाप्रभुकी महिमाका कीर्तन :-
“भट्टाचार्य, तुमि इँहार ना जान महिमा।
भगवत्ता-लक्षणेर इँहातेइ सीमा ॥ 78 ॥
ताहाते विख्यात इँहो परम-ईश्वर।
अज्ञ-स्थाने किछु नहे विज्ञेर गोचर ॥" 79 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी बात सुनकर
श्रीगोपीनाथाचार्य और श्रीमुकुन्द दत्त, दोनों बहुत दुःखी
हुए। श्रीगोपीनाथाचार्य कुछ कहने लगे, - “भट्टाचार्य !
आप इनकी महिमा नहीं जानते। इनमें भगवत्ताके
समस्त लक्षण परम सीमा तक विराजमान हैं। इसलिये
ये परम-ईश्वरके रूपमें विख्यात हैं। इस विषयमें विज्ञ
व्यक्ति जिन सिद्धान्तोंको जानते हैं, उन्हें अज्ञ व्यक्तियोंके
द्वारा समझना बहुत कठिन है॥" 77-79 ॥
तर्कपन्थी और श्रौतपन्थीके विचार; तर्कपन्थाके द्वारा
भगवान् अलभ्य और श्रौतपन्थाके द्वारा सुलभ :-
शिष्यगण कहे, - “ईश्वर कह कोन प्रमाणे।”
आचार्य कहे, - "विज्ञमत ईश्वर-लक्षणे ॥" 80 ॥
शिष्य कहे,-“ईश्वर-तत्त्व साधि अनुमाने।”
आचार्य कहे,-"अनुमाने नहे ईश्वर-ज्ञाने ॥" 81 ॥
अनुमान प्रमाण नहे ईश्वरतत्त्व-ज्ञाने।
कृपा बिना ईश्वरेरे केह नाहि जाने ॥ 82 ॥
ईश्वरेर कृपा-लेश हयत' याहारे।
सेइ त' ईश्वर-तत्त्व जानिबारे पारे ॥ 83 ॥
अनुवाद-यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके शिष्योंने
पूछा, - "आप किस प्रमाणके आधारपर इन्हें ईश्वर कह
रहे हैं।" श्रीगोपीनाथाचार्यने उत्तर दिया, - "ईश्वरके लक्षणके
सम्बन्धमें विज्ञ (तत्त्वको जाननेवाले) व्यक्तियोंका मत
ही प्रमाण है।" शिष्य कहने लगे, - "ईश्वर-तत्त्व अनुमानके
द्वारा ही प्रमाणित होता है।" श्रीगोपीनाथाचार्यने
कहा, - “अनुमानके द्वारा ईश्वर-तत्त्वका ज्ञान नहीं
होता। ईश्वर-तत्त्वको जाननेके लिये अनुमान प्रमाण
नहीं है। ईश्वरकी कृपाके बिना उनको कोई भी नहीं
जान सकता। जिसपर ईश्वरकी लेशमात्र भी कृपा होती
है, वही ईश्वर-तत्त्वको जान सकता है॥ 80-83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - विज्ञको जो तत्त्व दिखलायी
देता है, वह अज्ञ व्यक्तियोंके लिये कुछ भी नहीं
है, - इसी कारणसे ही तुम इनको 'सामान्य मनुष्य' मान
रहे हो; वास्तवमें इनमें भगवत्ता-लक्षणोंकी सीमा है।
श्रीसार्वभौमके शिष्योंने श्रीगोपीनाथको कहा, - 'तुम किस
प्रमाणके द्वारा इनको 'ईश्वर' कह रहे हो?' गोपीनाथने
उत्तर दिया, - 'विज्ञ व्यक्ति जिन लक्षणोंके आधारपर
ईश्वरको स्थापित करते हैं, मैं उन्हीं लक्षणोंके आधारपर
ही इनको ईश्वर कह रहा हूँ।' शिष्योंने कहा, - ईश्वरतत्त्व
अनुमानके द्वारा जाना जाता है। व्याप्तिज्ञान-लक्षण ही
अनुमान है; जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' अर्थात् 'जहाँ
धुआँ देखा जायेगा, वहाँ अग्नि है, ऐसा जानना होगा;
'धुआँ दिखाई दे रहा है, इसलिये पर्वतपर अग्नि हैं',
यही बात यहाँ प्रमाणित होती है। ईश्वरके विषयमें
अनुमान ऐसे कार्य करता है, - जैसे, जितनी वस्तुएँ
देखी जाती हैं, सभीका ही कारण है; यह परिदृश्यमान
जगत् भी एक वस्तु है; इसलिये इसका कोई कारण
नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता। इसलिये ईश्वर-विश्वका
कारण हैं', यह तत्त्व प्रमाणित हुआ। हम इसी प्रणालीसे
ईश्वरतत्त्वका निरूपण करते हैं। आप यदि दिखा पायें
कि ये संन्यासी इस युक्तिके अनुसार ईश्वर हो सकते
हैं, तब हम मान सकते हैं।' श्रीगोपीनाथने उत्तर
। 173

[ 6/78-88
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दिया,—‘ईश्वरतत्त्वको जाननेके लिये अनुमान प्रमाणके
रूपमें कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि ईश्वरकी कृपाके
बिना कोई भी उनको नहीं जान सकता॥' 78-83॥
कृपाके बिना केवल ज्ञानमार्गसे भगवान् अगोचर :—
श्रीमद्भागवत (10/14/29)—
तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-
प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 84॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे देव, आपके
श्रीचरणकमल-युगलोंकी लेशमात्र कृपाको प्राप्त करनेवाला
व्यक्ति ही केवल आपकी महिमाके तत्त्वको जान
सकता है; किन्तु जो चिरकालसे भी अनुमानके द्वारा
शास्त्रोंका विचार करते हुए अन्वेषण करते हैं, उनमेंसे
कोई भी उस तत्त्वको नहीं जान पाता॥ 84॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अहङ्कार चूर्ण
होनेपर श्रीकृष्णके परमैश्वर्यके दर्शनसे उनके माहात्म्यको
जानकर ब्रह्माने इस प्रकार स्तव किया—
हे देव [तव महिमा सर्वत्र व्याप्तः], तथापि ते (तव)
पदाम्बुजद्वय-प्रसादलेशानुगृहीतः (चरणकमलद्वयानुकम्पा-
कणया-सुभगान्वितः) एव हि जनः भगवन्महिम्नः (भगवतस्तव
महिम्नः ऐश्वर्यस्य) तत्त्वं जानाति; अन्यः (कृष्णप्रसादरहितः)
एकः (कश्चित्) अपि चिरं (दीर्घकालं) विचिन्वन् (विचारयन्)
अपि न च जानाति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 84॥
भट्टाचार्यकी नास्तिकताको देखकर मानद होते हुए भी
गोपीनाथके द्वारा उनका अनादर :—
यद्यपि जगद्गुरु तुमि—शास्त्र-ज्ञानवान्।
पृथिवीते नाहि पण्डित तोमार समान॥ 85॥
ईश्वरेर कृपा-लेश नाहिक तोमाते।
अतएव ईश्वरतत्त्व ना पार जानिते॥ 86॥
तोमार नाहिक दोष, शास्त्रे एइ कहे।
पाण्डित्याद्ये ईश्वरतत्त्व-ज्ञान कभु নহে॥” 87॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यसे
कहा,—“यद्यपि आप जगद्गुरु हो तथा सभी शास्त्रोंका
आपको ज्ञान है, पृथ्वीपर आपके समान और कोई
पण्डित भी नहीं है, तथापि आपपर ईश्वरकी लेशमात्र
कृपा भी नहीं है। इसलिये आप ईश्वरके तत्त्वको नहीं
जान पा रहे हैं। इसमें आपका कोई दोष नहीं है।
शास्त्र यह कहते हैं कि पाण्डित्यादिके द्वारा ईश्वरतत्त्वका
ज्ञान कभी नहीं होता॥” 85-87॥
अनुभाष्य—कठोपनिषद् 1/2/23 वाँ मन्त्र—
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥”
9 वाँ मन्त्र—
“नैषा तर्केण मतिरापनेया॥”
अर्थात् “परमात्म-भगवद् वस्तु व्याख्यानके द्वारा
प्राप्त नहीं होती; अपनी बुद्धिके बलपर भी प्राप्त नहीं
होती; श्रुति-परम्पराको छोड़कर बहुत अधिक श्रवणके
द्वारा भी प्राप्त नहीं होती। किन्तु भगवान् जिसको
स्वीकार करते हैं अर्थात् जिसके प्रति प्रसन्न होते हैं,
उसीको ही वे दिखलायी देते हैं अथवा प्राप्त होते हैं।
भक्त ही भगवान्‌की कृपाके पात्र हैं, इसलिये उनपर ही
कृपा करके वे उन्हें अपना दर्शन देते हैं। इस ब्रह्मका
साक्षात्कार करानेवाली मतिका तर्कके द्वारा खण्डन
करना कर्त्तव्य (उचित) नहीं है॥” 87॥
श्रीसार्वभौमका कुतर्क :—
सार्वभौम कहे,—“आचार्य, कह सावधाने।
तोमाते ईश्वर-कृपा इथे कि प्रमाणे॥” 88॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“आचार्य !
सावधानीपूर्वक बात कीजिये। आपपर भगवान्‌की कृपा
है, इसका क्या प्रमाण है?”॥ 88॥
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