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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1014, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1014

छठा अध्याय 6/13-18 ]
“रूढ़ोकेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम्।
यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥”170॥
अर्थात् “यह भाव श्रीकृष्णकी महिषियोंके लिये भी
अत्यन्त दुर्लभ है; केवल व्रजगोपियोंमें ही यह महाभाव
एकमात्र अनुभव योग्य है; अर्थात् गोपियोंके अतिरिक्त
अन्य ललनाओंमें महाभाव लक्षित नहीं होता। लौकिक
आस्वादनीय वस्तुओंमें अमृतकी अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ
कोई वस्तु नहीं है। अमृतके समान 'महाभाव'—प्रेमकी
विशेष अवस्था है, उसमें पृथक् रूपमें मनकी स्थिति
नहीं होती अर्थात् मन महाभावात्मक होता है। इन्द्रियोंकी
मनोवृत्तिरूपा गोपियोंका मन आदि सभी इन्द्रियाँ महाभाव
रूप होनेके कारण उनके सभी कार्योंके द्वारा श्रीकृष्णका
उनके अति वशीभूत होना युक्तिसिद्ध है। पट्टमहिषियोंमें
सम्भोगकी इच्छाके कारण पृथक् अवस्थित होनेके
कारण मन सम्पूर्णरूपसे प्रेमात्मिका नहीं है, इसलिये
उनमें महाभावकी सम्भावना नहीं है। महाभाव—'रूढ़'
और 'अधिरूढ़'के भेदसे दो प्रकारका है। जिस
महाभावमें सात्त्विक भावसमूह उद्दीप्त होते हैं, वही
'रूढ़' भाव है। रूढ़भावमें कहे गये अनुभावसमूहसे भी
सात्त्विक भावसमूह जब किसी विशेष दशाको प्राप्त
करके जो अनुभाव लक्षित होते हैं, वही
'अधिरूढ़'-महाभाव है। वह 'सुदीप्त' भाव नहीं है। यह
अधिरूढ़ भाव दो प्रकारका होता है—'मोदन' और
'मादन'। जिस अधिरूढ़ महाभावमें राधाकृष्णके सात्त्विक
भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे
'मोदन' कहते हैं। ह्लादिनीका सार प्रेम यदि सभी
भावोंके उद्गमसे उल्लासशील होता है, तब उसे 'मादन'
कहते हैं। यह परात्पर अर्थात् मोहनादि भावोंकी अपेक्षा
उत्कृष्ट है; यह केवल श्रीराधिकामें ही सब समय
सम्भव है ॥ 13 ॥
भट्टाचार्यकी चिन्ता :-
एत चिन्ति' भट्टाचार्य आछेन बसिया।
नित्यानन्दादि सिंहद्वारे उत्तरिल गिया ॥ 14 ॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य घरमें बैठकर जब
ऐसा चिन्तन कर रहे थे, तभी श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि
भक्त श्रीजगन्नाथ मन्दिरके सिंहद्वारपर आ पहुँचे ॥ 14 ॥
श्रीनित्यानन्दादिका आठारनालासे पुरीमें आनेपर लोगोंके
मुखसे महाप्रभुका श्रीभट्टाचार्यके घरमें होनेके विषयमें
सुनना :-
ताँहा शुनि' लोके कहे अन्योन्ये बात्।
'एक संन्यासी आसि' देखि' जगन्नाथ ॥ 15 ॥
मूर्च्छित हैल, चेतन ना हय शरीरे।
सार्वभौम लञा गेला आपनार घरे ॥' 16 ॥
अनुवाद—वहाँ पहुँचकर श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि
भक्तोंने लोगोंको कहते हुए सुना,—'एक संन्यासी
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये आये थे। श्रीजगन्नाथदेवके
दर्शन करके वे मूर्च्छित हो गये थे, उनके शरीरमें
चेतना नहीं रही थी। तब श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें
अपने घरमें ले गये॥'15-16॥
श्रीसार्वभौमके बहनोई श्रीगोपीनाथका वहाँपर आना :-
शुनि' सबे जानिलेन महाप्रभुर कार्य।
हेनकाले आइला ताँहा गोपीनाथाचार्य ॥ 17 ॥
नदीया-निवासी, विशारदेर जामाता।
महाप्रभुर भक्त तैं हो, प्रभुर तत्त्वज्ञाता ॥ 18 ॥
अनुवाद—यह बात सुनकर सभी भक्त जान गये
कि वे संन्यासी महाप्रभु ही हैं। उसी समय श्रीगोपीनाथाचार्य
भी वहाँ आ गये। श्रीगोपीनाथाचार्य नदीयाके निवासी,
महेश्वर विशारदके दामाद और महाप्रभुके भक्त और
उनके तत्त्वको जाननेवाले थे ॥ 17-18 ॥
अनुभाष्य—'विशारद'—नीलाम्बर चक्रवर्तीके सहपाठी
महेश्वर विशारद समुद्रगढ़के निकट स्थित 'विद्यानगर'में
वास करते थे। मधुसूदन वाचस्पति और वासुदेव
सार्वभौम उनके दो पुत्र थे और श्रीगोपीनाथाचार्य उनके
दामाद थे॥ 17 ॥
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