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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1013, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1013

[ 6/12-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अर्थात् “एक ही समय दो या तीन सात्त्विकभाव
अच्छी प्रकार प्रकाशित हो जाँय और बहुत कष्टसे
उनको छिपाना सम्भव हो, तब उन भावोंको 'ज्वलिता'
कहते हैं।” 'दीप्ता'—
“प्रौढास्त्रिचतुरा व्यक्तिं पञ्च वा युगपद्गताः।
सम्बरितुमशक्यास्ते दीप्ता धीरैरुदाहृताः॥”
अर्थात् तीन-चार या पाँच प्रौढ़भावोंके एक ही
समयमें उदित होनेपर उनको सम्वरणकी चेष्टा विफल
होनेपर भावको समझनेवाले धीर व्यक्ति उसे 'दीप्ता'
कहते हैं।” 'उद्दीप्ता'—
“एकदा व्यक्तिमापन्नाः पञ्चषाः सर्व एव वा।
आरूढाः परमोत्कर्षमुद्दीप्ता इति कीर्त्तिताः”॥
अर्थात् “एक ही समयमें पाँच-छह अथवा सभी
भाव प्रकाशित होकर प्रेमकी परमोत्कर्षताको प्राप्त
करते हैं, तब उसे 'उद्दीप्ता' कहते हैं।”
'उद्दीप्तानां भिदा एव सूदीप्ताः सन्ति कुत्रचित्।
सात्त्विकाः परमोत्कर्षकोटीमात्रैव बिभ्रति॥' (उः नीः 12/37)
अर्थात् “उद्दीप्त भावसमूहका अन्य प्रकार ही
किसी-किसी स्थानपर 'सुदीप्त'के नामसे कहा जाता है।
सात्त्विक भावसमूह करोड़ों गुणा होकर परमोत्कर्षता
प्राप्त करनेपर जब प्रेमकी पराकाष्ठा सुन्दररूपसे
प्रकाशित होती है, तब वे 'सुदीप्त' कहलाते हैं।”
'नित्यसिद्ध भक्त'—पार्षदभक्त, दिव्यसूरि; मध्यलीला
24/289 संख्या—
“विधिभक्त्ये नित्यसिद्ध 'पारिषद-दास'।
'सखा', 'गुरु', 'कान्तागण'—चारिविध प्रकाश॥”
अर्थात् “वैधीभक्तिके जो नित्य सिद्धभक्त हैं, वे
दास, सखा, गुरु अथवा मातापिता और कान्तागण—ये
चार प्रकारके हैं॥”12॥
महाप्रभुकी देहमें लोकातीत महाभाव :-
'अधिरूढ़-महाभाव' याँर, ताँर ए विकार।
मनुष्येर देहे देखि,–बड़ चमत्कार॥'13॥
अनुवाद—जिसमें 'अधिरूढ़-महाभाव' हो, केवल
उसीमें ऐसा विकार हो सकता है। एक मनुष्यके शरीरमें
यह भाव दिखायी दे रहा है, यह तो बड़े आश्चर्यकी
बात है॥13॥
अनुभाष्य—'अधिरूढ़-महाभाव'—(उज्ज्वलनीलमणि
14/146)—'अनुराग'—
“सदानुभूतमपि यः कुर्यान्नवनवं प्रियम्।
रागो भवन्नवनवः सोऽनुराग इतीर्यते॥”
अर्थात् “प्रीतिके पात्र नायकके रूप-गुण-माधुर्यका
पहले नित्य आस्वादन करनेपर भी अनास्वादित लगनेके
कारण अर्थात् जैसे उसका आस्वादन हुआ ही नहीं,
नायिकाके ऐसे अनुभवसे नायिकाका जो राग नायकको
नूतन-नूतन बोध कराता है, वह राग नूतन-नूतन
होकर 'अनुराग' कहलाता है।”
'भाव'—(उःनीः 14/154)—
“अनुरागः स्वसंवेद्यदशां प्राप्य प्रकाशितः।
यावदाश्रयवृत्तिश्चेद्भाव इत्याभिधीयते॥”
अर्थात् “निजानुरागके द्वारा अनुरागकी सम्वेदन-योग्य
दशा प्राप्त करके प्रकाशयुक्त होनेपर यदि अनुराग
पराकाष्ठाको प्राप्त होता है, तब उसे भाव कहते हैं।”
प्रकाशित न होनेपर यावदाश्रयवृत्तिके अभावके कारण
अपने द्वारा सम्वेदन-योग्य दशामें केवल मात्र 'अनुराग'
रहता है, उसे 'भाव' नहीं कहा जा सकता।
'महाभाव'—(उःनीः चौदहवाँ अध्याय)—
“मुकुन्दमहिषीवृन्दैरप्यसावितदुर्लभः ।
व्रजदेव्येकसंवेद्यो महाभावाख्योच्यते॥”156 ॥
रूढ़ और अधिरूढ़के भेदसे महाभाव—
“वरामृतस्वरूपश्रीः स्वं स्वरूपं मनो नयेत्॥”157 ॥
“स रूढ़श्चाधिरूढ़श्चेत्युच्यते द्विविधो बुधैः॥”158॥
रूढ़-महाभाव—
“उद्दीप्ता सात्त्विका यत्र स रूढ़ इति भण्यते॥”159॥
अधिरूढ़-महाभाव—
164 ।