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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1021

[ 6/72–76 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
होते, वे 'भारती' हैं। जो तत्त्वज्ञानमें पारङ्गत एवं
पूर्णतत्त्वपदमें अवस्थित होकर सब समय परब्रह्मकी
चर्चामें रत हैं, वे 'पुरी' नामसे प्रसिद्ध हैं।
श्रीशङ्कर-सम्प्रदायमें 'ब्रह्मचारी' नामोंका अर्थ जिस
प्रकारसे प्रदान किया जाता है, वह यह है—
जो अपने स्वरूपको भलीभाँति जानते हैं, स्वधर्मका
पालन करते हैं एवं नित्यकाल अपने आनन्दमें मग्न
हैं, वे 'स्वरूप'-नामक ब्रह्मचारी हैं। जो स्वयं ज्योतिर्ब्रह्मको
विशेष रूपसे जानते हैं और तत्त्वज्ञानके प्रकाशके द्वारा
विशेषरूपसे योगयुक्त है, वे 'प्रकाश' नामसे जाने जाते
हैं। जो तत्त्वज्ञान प्राप्त करके सत्य, ज्ञान, अनन्त और
ब्रह्मका सदैव ध्यान करते हैं एवं स्वानन्दमें विहार
करते हैं, वे 'आनन्द' नामसे प्रसिद्ध हैं। जो
अचित्-मिश्रभावसे अतीत चिन्मात्र, मायाके द्वारा
चित्तविकारसे रहित, और जो अनन्त, अजर और
मङ्गलमय ब्रह्मको जानते हैं, वे विद्वान हैं और
'चैतन्य'-नामसे कहे जाते हैं (मञ्जूषा-द्वितीय संख्या)।
श्रीसार्वभौमने कहा, —“श्रीमन्महाप्रभुका नाम—
'श्रीकृष्ण' एवं ब्रह्मचारी-उपाधि—'चैतन्य' है। इसलिये
श्रीकृष्णनाम सभी नामोंकी अपेक्षा उत्तम है, किन्तु
श्रीमहाप्रभु सर्वोच्च सरस्वती-सम्प्रदायमें प्रवेश ना करके
मध्यम-सम्प्रदायमें प्रविष्ट हुए हैं।” इसके उत्तरमें
श्रीगोपीनाथने कहा, —“इनका मध्यम-सम्प्रदायमें प्रवेश
करनेका कारण यह है कि इनकी किसी प्रकारकी कोई
बाह्यापेक्षा नहीं है। भीतरमें मर्यादाका अहङ्कार रहनेपर
मनुष्य मर्यादा पानेका प्रयास करता है। अकिञ्चन
होकर दीनभावसे हरिभजन करनेकी इच्छा होनेपर
भारती-सम्प्रदायकी उपेक्षा करके सरस्वती-सम्प्रदायका
अनुसन्धान करके उसमें प्रवेश करनेकी आकाङ्क्षा नहीं
होती॥ 72–73॥
साधारण युवा समझकर महाप्रभुके प्रति भट्टाचार्यकी
गुरुकी भाँति उपदेशमूलक उक्ति :—
भट्टाचार्य कहे, —“इँहार प्रौढ़ यौवन।
केमने संन्यास-धर्म हबेक रक्षण॥ 74॥
निरन्तर इँहाके वेदान्त शुनाइब।
वैराग्य-अद्वैत-मार्गे प्रवेश कराइब॥ 75॥
कहेन यदि, पुनरपि योग-पट्ट दिया।
संस्कार करिये उत्तम-सम्प्रदाये आनिया॥” 76॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा, —“श्रीकृष्ण-
चैतन्य पूर्ण यौवनमें हैं, ये अपने संन्यास धर्मकी रक्षा
कैसे करेंगे? इसलिये मैं इन्हें निरन्तर वेदान्त सुनाकर
इनको वैराग्यमें स्थिर रखूँगा और अद्वैत-मार्गमें प्रवेश
कराऊँगा। यदि श्रीकृष्णचैतन्य कहेंगे, तो मैं उन्हें फिरसे
संन्यास-वस्त्र देकर और संस्कार करके उत्तम सम्प्रदायमें
ले आऊँगा॥” 74–76॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस मायिक जगत्‌को कौवेकी
विष्ठाके (मलके) समान तुच्छ ज्ञान करानेवाले
केवल-अद्वैतपथमें प्रवेश करा दूँा। 'योगपट्ट'—संन्यासियोंका
विशेष वेश। उत्तम सम्प्रदायके योग्य योगपट्ट अर्थात्
संन्यासियोंके द्वारा व्यवहार किये जानेवाले वस्त्रोंको
देकर पुनः संस्कार कर दूँगा॥ 75–76॥
अनुभाष्य—संन्यासिगण सदैव वेदान्तवाक्योंका
अनुशीलन करके विषयोंके प्रति वैराग्य उत्पन्न करते
हैं एवं कौपीनाश्रित होकर कौपीनकी मर्यादाकी रक्षा
करते हैं। सदैव शम-दमादि छह प्रकारके साधनोंमें
पारदर्शी होनेके लिये भक्तिरहित-विचारकोंकी युक्तिके
अनुसार ज्ञान और वैराग्यकी उपासना आवश्यक है।
द्वितीय (देहमें) अभिनिवेश होनेपर ही मायिक वस्तुओंके
पराक्रमकी आशङ्का होती है, इसलिये ज्ञान-वैराग्यसे
युक्त कराके अद्वैत-पथमें प्रवेश करानेपर युवावस्थाके
कारण कामसे उत्पन्न चेष्टाएँ बलवान् नहीं हो पायेंगी।
महाप्रभु यदि उच्च सरस्वती-सम्प्रदायमें प्रवेशाधिकारकी
इच्छा करें, तो फिर पुनः सरस्वती-सम्प्रदायके संन्यासीके
द्वारा उनको त्यागियोंके वस्त्र-दण्ड आदि प्रदान कराके
उन्नत करा सकता हूँ। शौक्रब्राह्मणके अतिरिक्त कोई भी
वर्ण उच्च 'सरस्वती' सम्प्रदायमें प्रवेश नहीं कर सकता;
इसलिये 'भारती' आदि सम्प्रदायमें विधिकी शिथिलता
172 ।