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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 696 में से

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लक्षणा भी नहीं देखी जाती। वस्तुतः एक साथ प्रयुक्त पदों के वाक्य का
यही तात्पर्य है, ऐसा निश्चित हो जाने पर दो या तीन या सभी पदों
की, उनके अविरुद्धार्थ प्रकाशन के लिए, एक जैसी लक्षणा करना
दोष नहीं है, ऐसा शास्त्रज्ञ भी स्वीकार करते हैं। कार्य वाक्यार्थ-
वादी तो लौकिक वाक्यों में सभी पदों की लक्षणा स्वीकार करते
हैं। उनके मत में लिंग आदि (विविध प्रत्यय) का मुख्य अर्थ “अपूर्व
कार्य" ही है, इससे ज्ञात होता है कि लिंग आदि से यज्ञादि क्रिया का जो
कार्य निश्चित होता है, वह भी लक्षणा द्वारा ही होता है। अन्यान्य यज्ञादि
क्रिया बोधक वाक्यों से संबद्ध पदों का जब अपूर्वकार्य संबद्ध अर्थ ही
मुख्यार्थ होता है तो, जो पद एक मात्र अनुष्ठेय कर्म संबंधी अर्थ का ही
प्रतिपादन करते हैं, वे तो लाक्षणिक ही होंगे। इसलिए वाक्य तात्पर्य
के विरोध निवारण के लिए सभी पदों की लक्षणा भी दोषावह नहीं होगी।
इस पूर्व मीमांसा के सिद्धांत का प्रतिपादन करने से ही वेदांत वाक्य
प्रामाणिक हैं।
प्रत्यक्षादि विरोधे च शास्त्रस्य बलीयस्त्वमुक्तम्, सति च
विरोध बलीयस्त्वं वक्तव्यम्, विरोध एव न दृश्यते, निर्विशेषसन्मात्र-
ब्रह्मग्राहित्वात्प्रत्यक्षस्य ।
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के पारस्परिक विरोध होने पर शास्त्र प्रमाण की
बलवत्ता कही गयी है। विरोध होने पर ही बलवान प्रमाण की बलवत्ता
माननी चाहिए, यहाँ तो कोई विरोध ही नहीं दीखता, निर्विशेष सत् स्व-
रूप ब्रह्म ही एकमात्र प्रत्यक्ष प्रमाण से ग्राह्य है।
ननु च-घटोऽस्ति पटोऽस्तीति नानाकारवस्तुविषयं प्रत्यक्षं
कथमिव सन्मात्रग्राहीत्युच्यते । विलक्षणग्रहणाभावे सति सर्वेषां
ज्ञानानामेकविषयत्वेन धारावाहिकविज्ञानवदेकव्यवहारहेतुतैव स्यात् ।
(उक्त मत पर आपत्ति) घट और पट के अस्तित्व के समान अनेक
जागतिक आकारों की प्रत्यक्ष प्रतीति होती है, तो यह कैसे कहा कि-