श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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स्वरूप लक्षण बोधक (सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म) वाक्य अखंड, एकरस अद्वैत
ब्रह्म का प्रतिपादक है ।
ननु च—सत्यज्ञानादिपदानां स्वार्थप्रहाणेन स्वार्थविरोधि-
व्यावृत्तवस्तुस्वरूपोपस्थापनपरत्वे लक्षणा स्यात् । नैष दोषः,
अभिधानवृत्तेरपि तात्पर्यवृत्तेर्बलीयस्त्वात् । सामानाधिकरण्यस्य हि
ऐक्य एव तात्पर्यमिति सर्वसम्मतम् ।
(शंका) सत्य ज्ञान आदि पद यदि अपने शब्दार्थ का परित्याग कर
स्वार्थ विरुद्ध किसी विशेष वस्तुस्वरूप का स्थापन करते है तो, उन पदों
में लक्षणा करनी होगी ।
(समाधान) उक्त दोष नहीं होगा, क्योकि अभिधा वृत्ति (शब्द के
मुख्यार्थ) से तात्पर्यार्थ वृत्ति (तात्पर्यार्थ) बलवान होती है । सामानाधिकरण्य
(अभेद विशेषण विशेष्य मानने) में ऐसा ही तात्पर्य होता है, ऐसा सर्व-
सम्मत सिद्धान्त है ।
ननु च—सर्वपदानां लक्षणा न दृष्टचरी । ततः किम् ? वाक्य-
तात्पर्याविरोधे सत्येकस्यापि न दृष्टा, समभिव्याहृतपदसमुदाय-
स्यैतत्तात्पर्यमिति निश्चिते सति द्वयोस्त्रयाणां सर्वेषां वा तदविरोधाय
एकस्यैव लक्षणा न दोषाय, तथा च शास्त्रस्थैरभ्युपगम्यते । ( कार्य-
वाक्यार्थवादिभिर्लौकिकवाक्येषु सर्वेषां पदानां लक्षणा समाश्रीयते,
अपूर्वकार्य एव लिंगादेर्मुख्यवृत्तत्वात् लिंगादिभिः क्रियाकार्यं लक्षणया
प्रतिपाद्यते । कार्यान्वितस्वार्थाभिधायिनां चेतरेषां पदानामपूर्वकार्या-
न्वित एव मुख्यार्थ इति क्रियाकार्यान्वितप्रतिपादनं लाक्षणिकमेव ।
अतो वाक्यतात्पर्याविरोधाय सर्वपदानां लक्षणापि न दोषः, अत
इदमेवार्थजातं प्रतिपादयन्तो वेदान्ताः प्रमाणम् । )
(शंका) सभी पदों की लक्षणा तो कही भी नहीं देखी जाती । (उत्तर)
इससे क्या होता है ? वाक्य के विरुद्ध तात्पर्य होने पर तो एक पद की