श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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तत्र संदेहः किं कापिल तंत्र सिद्धिमब्रह्मात्मकं प्रधानमिहाव्यक्त
शब्देनोच्यते, उत न इति । किं युक्तम् ? प्रधानमिति, कुतः ?
“महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः” इति तंत्रसिद्धतंत्र प्रक्रिया-
प्रत्यभिज्ञानेन तस्यैव प्रतीतेः “पुरुषाान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा
परागतिः” इति पंचविंशकपुरुषातिरिक्त तत्व निषेधाच्च । अतोऽ-
व्यक्तम् कारणमिति प्राप्तम् । तदिदमुक्तम्-आनुमानिकमप्येकेषामिति
चेत्-इति । एकेषां शाखिनां शाखास्वानुमानिकं प्रधानमपि कारण-
माम्नात इति चेत्-
कठवल्ली में प्रसंग आता है कि-“इन्द्रियों से शब्दादि विषय
बलवान हैं, विषयों से मन बलवान है, मन से बुद्धि बलवती है बुद्धि से
श्रेष्ठ महत् तत्त्व है, महत् तत्त्व से बलवती अव्यक्त माया है, उस अव्यक्त
से श्रेष्ठ पुरुष है, उस पुरुष से श्रेष्ठ कोई नहीं है वही सब की परम
अवधि और परमगति है !”
इसको पढ़कर संदेह होता है कि-कपिल के सांख्य शास्त्र से सम्मत
प्रधान को ही अव्यक्त नाम से बतलाया गया है अथवा नहीं, कह सकते
हैं कि, प्रधान का ही वर्णन है, क्योंकि-अव्यक्त से पुरुष की जो बात कही
गई है, वह सांख्यतंत्र की ही प्रणाली है । तथा ‘पुरुष से श्रेष्ठ कुछ भी
नहीं है, वही परमगति और परम अवधि है” इत्यादि में जिस पुरुष का
वर्णन किया गया है वह भी सांख्यतंत्र सिद्ध पंचविंशक पुरुष का ही
वर्णन प्रतीत होता है । इसलिए जगत का कारण वह अव्यक्त प्रधान ही
है ऐसा निश्चित होता है । इसी आशय से “आनुमानिक मप्ये केषाम्”
अर्थात् किसी एक शाखा में आनुमानिक प्रधान को कारण माना गया
है । इत्यादि-
सिद्धान्त-अत्रोत्तरं नेति । नाव्यक्तशब्देनाब्रह्मात्मकं प्रधान-
मिहाभिधीयते । कुतः ? शरीररूपक विन्यस्त गृहीतेः, शरीराख्य
रूपक विन्यस्तस्य अव्यक्त शब्देनं गृहीतेः । आत्मशरीरबुद्धिमन्
इन्द्रियविषयेषु रथिरथादिभावेन रूपितेषु रथरूपेण विन्यस्तस्य
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शरीरस्यात्राव्यक्त शब्देन ग्रहणादित्यर्थः । एतदुक्तं भवति-पूर्वत्र हि-
“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च, बुद्धीं तु सारथिं विद्धि मनः
प्रग्रहमेव च, इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्” इत्यादिना;
“सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमंपदम्” इत्यनेन संसाराध्वनः
पारं वैष्णवं पदं प्रेप्संतमुपासकं रथित्वेन तच्छरीरा दीनि च रथरथां-
गरूपयित्वा यद्येते रथादयो वशे तिष्ठंति, स एवाध्वनः पारं वैष्णवं
पदमाप्नोतीत्युक्तवा, तेषु रथादिरूपित शरीरादिषु यानि येभ्यो
वशीकार्यतायां प्रधानानि तान्युच्यन्ते “इन्द्रियेभ्यः पराः” इत्यादिना ।
तत्र हयत्वेन रूपितेभ्य इन्द्रियेभ्यो गोचरत्वेन रूपिता विषयाः वशी-
कार्यत्वे पराः वश्येन्द्रियस्यापि विषयसन्निधाविन्द्रियाणां दुर्निग्रह-
त्वात् । तेभ्योऽपि परं प्रग्रहरूपितं मनः, मनसि विषय प्रवणे विषया-
सन्निधानस्याप्यकिंचित्करत्वात् । तस्मादपि सारथित्वरूपिता बुद्धिः
परा, अध्यवसायाभावे मनसोऽप्यकिंचित्करत्वात् । तस्या अपि रथित्व
रूपित आत्मा कर्तृत्वेन प्राधान्यात्परः, सर्वस्यचास्यात्मेच्छायत-
त्वादात्मैव महानिति च विशेष्यते । तस्मादपि रथरूपितं शरीरं
परम्, तदायत्तत्वाज्जीवात्मनः सकल पुरुषार्थसाधन प्रवृत्तीनाम् ।
तस्मादपि परः सर्वान्तरात्मभूतोऽन्तर्याम्यध्वनः पारभूतः परं पुरुषः,
यथोक्तस्यात्मपर्यन्तस्य समस्तस्य तत्संकल्पायत्त प्रवृत्तित्वात् । स
खल्वन्तर्यामितयोपासनस्यापि निर्वर्त्तकः । “परात्तुतच्छ्रुतेः” इति
हि जीवात्मनः कर्तृत्वं परमपुरुषायत्तमिति वक्ष्यते । वशीकार्यो-
पासन निवृत्त्युपायकाष्ठाभूतः परमप्राप्यश्च स एव । तदिदमुच्यते
“पुरुषात्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः” इति ।
सिद्धान्त—उक्त शंका का उत्तर नकारात्मक है । उक्त प्रसंग में
अव्यक्त शब्द से प्रधान का उल्लेख नहीं है, क्योंकि—अव्यक्त के लिए
शरीर के रूपक का वर्णन मिलता है जिसमें, आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन,
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इन्द्रिय, इन्द्रिय के विषय, रथी और रथ आदि के रूप में कल्पना की
गई है रथ रूप से उल्लेख्य शरीर को ही अव्यक्त शब्द से प्रस्तुत किया
गया है । यह रूपक उक्त प्रकरण के पूर्व का ही है । रूपक इस प्रकार
है—"आत्मा को ही रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी, और मन को
लगाम समझो, इन्द्रियों को घोड़ा, विषयों को उनकी विचरण भूमि"
इत्यादि से लेकर "वही संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त करते
हैं" इस अंतिम वाक्य तक, संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त
करने की इच्छावाले उपासक को रथी रूप से एवं उसके शरीर आदि
को रथ और रथांग अश्व आदि रूप से कल्पना करके; यह दिखलाया
गया है कि जो इन रथ आदि को वश में रखता है, वही संसार मार्ग से
पार जाकर वैष्णव पद प्राप्त करता है । रथादि रूप से कल्पित शरीर
आदि के मध्य में जिन्हें वशीभूत करने की बात कही गई है, उनमें भी
सर्व प्रधान, जिनको वशीभूत करना सर्वाधिक कष्ट साध्य है "इन्द्रियेभ्यः
परा" इत्यादि में उन्हीं वृत्तियों को "परा" शब्द से उल्लेख किया गया
है इस वशीकरण कार्य में, अश्वरूप से कल्पित इन्द्रियों की अपेक्षा, गोचर
रूप से कल्पित विषयों का समूह प्रधान है । क्योंकि—जिन लोगों ने एक
मात्र इन्द्रियों को संयमित कर भी लिया, विषयों से विरक्ति नहीं हुई
तो प्रायः उनकी इन्द्रियां असंयत हो जाती हैं । प्रग्रह ( लगाम ) रूप से
कल्पित मन, उन विषयों से भी प्रधान है, क्योंकि—मन के विरत होने
पर ही विषयों की न्यूनता होती है । सारथी रूप से कल्पित बुद्धि, मन
की अपेक्षा और भी प्रधान है, क्योंकि—बुद्धि के द्वारा अध्यवसाय न करने
पर मन भी कुछ नहीं कर सकता । रथी रूप से कल्पित आत्मा, सर्वकर्त्ता
होने के कारण, उस बुद्धि की अपेक्षा प्रधान है, क्योंकि उक्त सभी आत्मा-
धीन हैं, इसलिए आत्मा को ही "महान्" ऐसा विशेष नाम वाला कहा
गया है । रथ रूप से कल्पित शरीर, उस आत्मा की अपेक्षा प्रधान है,
क्योंकि— शरीर ही, जीवात्मा के हर प्रकार के पुरुषार्थ साधन में, प्रवृत्ति
प्रयोजक है । संसार मार्ग से पार सबके अन्तर्यामी, परम पुरुष परमात्मा
उसकी अपेक्षा प्रधान हैं, क्योंकि पूर्वोक्त आत्मा पर्यन्त सभी पदार्थ समस्त
प्रवृत्तियां, उन्हीं की इच्छाशक्ति के अधीन हैं, वे ही अंतर्यामी रूप से
उपासना का भी निर्वाह करते हैं। "परात्त तच्छुतेः" इस सूत्र में
जीवात्मा का कर्तृत्व, परं पुरुष के अधीन है, ऐसा बतलाते हैं। वे
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परमात्मा ही आत्मवशीकरण और उपासना सिद्धि के उपायों में चरम
उपाय एवं परं प्राप्य लक्ष्य हैं या परं पुरुषार्थ रूप हैं, यही बात "पुरुष
से श्रेष्ठ कुछ नहीं है, वही परम अवधि और परम गति है" इस श्रुति में
कहा गया है।
तथा चान्तर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादिभिः सर्वं
साक्षात् कुर्वन्तः सर्वं नियमयतोत्युक्तवा “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा”
इति नियंत्रंतरं निषिध्यते । भगवद्गीतासु च-“अधिष्ठानंतथा कर्त्ता
करणं च पृथग् विधं, विविधाश्च पृथग् चेष्टा दैव चैवात्र पंचमम्।”
दैवमत्र पुरुषोत्तम एव “सर्वस्यचाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृति-
र्ज्ञानमपोहनं च” इति वचनात् । तस्य च वशीकरणं तच्छरणागति-
रेव । यथाह-‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्
सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया, तमेव शरणं गच्छ” इति । तदेवम्
“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिना रथ्यादिरूपक विन्यस्ता इन्द्रिया-
दयः “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इत्यत्र स्वशब्दैरेव प्रत्यभिज्ञायन्ते, न
रथरूपितं शरीरमिति परिशेषात्तदव्यक्त शब्देनोच्यत इति निश्ची-
यते । अतः कापिलतंत्रसिद्धस्य प्रधानस्य प्रसंग एव नास्ति ।
इसी प्रकार अन्तर्यामी ब्राह्मण में “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादि
वाक्य में उस परमात्मा को सबका दृष्टा और नियामक बतलाकर
“नान्योऽतो” इत्यादि में इसके अतिरिक्त किसी अन्य नियामक का निषेध
किया गया है। भगवद्गीता में भी-“अधिष्ठान (शरीर) एवं कर्त्ता,
अनेक प्रकार के करण (इन्द्रियाँ) पृथक्-पृथक् विविध चेष्टायें तथा
पांचवां दैव, ये ही क्रिया प्रवृत्ति के कारण हैं।” इसमें दैव का तात्पर्य
पुरुषोत्तम ही है ऐसा-“मैं ही सबके हृदय में संन्निविष्ट हूँ, मुझसे ही
स्मरण, ज्ञान और अपोहन होते हैं”—इस वचन से ज्ञात होता है। उस
परमात्मा को वशीकरण करने का उपाय उसकी शरणागति प्राप्त करना
ही है। जैसा कि—इस गीता वाक्य से ज्ञात होता है-‘ईश्वर अपनी माया
से, सबके हृदय में विराज कर, सारे जगत् को यंत्रमयी कठपुतली की
तरह नचाते रहते हैं, तुम उन्हीं की शरण में जाओ।” इसी प्रकार
“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादि से, रथी इत्यादि रूपक में चित्रित
इन्द्रियाँ आदि “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इस वाक्य में अपने-अपने नाम
से ही बतलाए गए हैं, केवल रथ रूप से कल्पित शरीर को ही प्रकरण
के अंत में, ‘अव्यक्त’ शब्द से बतलाया गया है, ऐसा निश्चित होता है।
कपिलतंत्र सिद्ध प्रधान का तो प्रसंग ही नहीं है।
न चात्रतत्तंत्रसिद्ध प्रक्रिया प्रत्यभिज्ञा “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः”
इतीन्द्रियेभ्योऽर्थानां शब्दादीनां परत्व कीर्त्तनात् । नहि शब्दादय इन्द्रि-
याणां कारणभूताः तद्दर्शने “अर्थेभ्यश्च परंमनः”इत्यादि न तत्तत्रसंग-
तम्, बुद्धिशब्देन महत्तत्त्वस्याभिधानाभ्युपगमात् । नहि महतो
महान् परः संभवति । महत आत्मशब्देन विशेषणं च न संगच्छते
अतोरूपक निन्यस्तानामेव ग्रहणम् ।
उम प्रसंग में सांख्यतंत्र के विवेचन की प्रणाली भी ज्ञात नहीं
होती, “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इस वाक्य में, इन्द्रियों से उनके अर्थ
अर्थात् शब्द आदि विषयों को, श्रेष्ठ बतलाया गया है, सांख्य तंत्र में कहीं
भी, शब्द आदि को इन्द्रियों का कारण नहीं बतलाया गया है। इसी
प्रकार “अर्थेभ्यश्च परंमनः” वाक्य भी सांख्य तंत्र सम्मत नहीं है, इस
तंत्र में विषयों का कारण मन नहीं है। “बुद्धेरात्मा महान् परः” वाक्य
भी उक्त तंत्र के मत से विपरीत है क्योंकि-सांख्य में बुद्धि शब्द “महत्”
शब्द वाची है, महत् कभी महान् से श्रेष्ठ हो ही नहीं सकता “महत्”
शब्द आत्म शब्द का विशेषण भी नहीं हो सकता, इसलिए उक्त कल्पित
रूपक से आत्मा आदि अर्थ मानना ही युक्ति-युक्त है।
दर्शयति च तदेव-“एषु सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते,
दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः
तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि, ज्ञानंन्नात्मनि महतियच्छेद् तद्यच्छेच्छान्त-
न्नात्मनि” इति । अजित बाह्याभ्यंतरकरणैरस्य परमपुरुषस्य दुर्दर्श-
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त्वमभिधाय हयादिरूपितानामिन्द्रियादीनां वशीकार प्रकारोऽय
मुच्यते । 'यच्छेद् वाङ्मनसी” वाचं मनसि नियच्छेत्-वाक्पूर्वकाणि
कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि च मनसि नियच्छेद् इत्यर्थः । वाक्शब्दे
द्वितीयायाः "सुपां सुलुकू" इतिलुक् । “मनसी" इति सप्तम्या-
श्छान्दसो दीर्घः । “तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि" तन्मनौ बुद्धौ नियच्छेद् ।
ज्ञान शब्देनात्र पूर्वोक्ता बुद्धिरभिधीयते । ज्ञाने आत्मनि" इति
व्यधिकरणे सप्तम्यौ । आत्मनि वर्त्तमाने ज्ञाने नियच्छेदित्यर्थः ।
“ज्ञान आत्मनि महति यच्छेत्" बुद्धिं कर्त्तरि महत्यात्मनि निय-
च्छेत् !” तद्यच्छेच्छांत आत्मनि" तं कत्र्तरि परस्मिन् ब्रह्मणि
सर्वान्तर्यामिणि नियच्छेत् । व्यत्ययेन तदिति नपुंसकलिंगता ।
एवम्भूतेन रथिना वैष्णवं पदं गन्तव्यमित्यर्थः ।
उक्त रहस्य को श्रुति में इस प्रकार दिखलाया गया है कि- “यह
सबका आत्मरूप परं पुरुष, समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी, माया के
परदे में छिपा रहने से प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्म तत्त्वों को समझने
वाले पुरुषों से ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।" बुद्धिमान
साधक को चाहिए कि वाणी आदि को मन में निरुद्ध करके, उस मन
को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में विलीन करे तथा ज्ञान स्वरूप बुद्धि आत्मा
में विलीन करे तथा उस महान् आत्मा को शांत स्वरूप परमात्मा में
विलीन करे ।"
उक्त प्रसंग में, जो लोग बाह्य और आभ्यंतर को जय नहीं कर
पाते, उनके लिए परमात्म दर्शन बहुत दूर है, ऐसा बतलाते हुए, अश्व
आदि रूप से कल्पित इन्द्रियो को वशीभूत करने के विशेष उपाय का
निर्देश किया गया है। "यच्छेद् वाङ्मनसी" का तात्पर्य है, वागेन्द्रिय को
मन में लीन करो अर्थात् वागेन्द्रिय सहित कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को
लीन करो इस वाक्य में "सुपांसुलुक्" इस व्याकरणीय नियम से वाक्
शब्द की द्वितीया विभक्ति का लोप हो गया है तथा "मनसी" पद में
वैदिक व्याकरण के अनुसार सप्तमी विभक्ति में दीर्घ ईकार हो गया
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है। “तद् यच्छेद् ज्ञान आत्मनि” का अर्थ है, उस मन को बुद्धि में लीन
करो इसमें ज्ञान शब्द से पूर्वोक्त बुद्धि ही लक्षित है। “ज्ञाने आत्मनि” में
दो सप्तमी विभक्ति का प्रयोग है, जिसका तात्पर्यार्थ है आत्मा में वर्त्तमान
ज्ञान में लीन करो। ‘ज्ञानं आत्मनि महति यच्छेद्’ का तात्पर्य है बुद्धि
को महान कर्त्ता आत्मा में लीन करो। “तद् यच्छेद् शांत आत्मनि” का
तात्पर्य है—उस कर्त्ता को परब्रह्म सर्वान्तर्यामी परमात्मा में लीन करो।
इस वाक्य में तत् शब्द का नपुंसक लिंगात्मक प्रयोग, लिंग विपर्यय से
हुआ है। ऐसा रथी ही वैष्णव पद प्राप्त कर सकता है, यही प्रकरण का
तात्पर्य है।
अव्यक्त शब्देन कथं व्यक्तस्य शरीरस्याभिधानम् ? इत्याह-
अव्यक्त शब्द से, व्यक्त शरीर कैसे माना गया ? इसका निराकरण
करते हैं -
सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ।१।४।२।।
भूतसूक्ष्ममव्याकृतं ह्यवस्था विशेष मापन्नं शरीरंभवः तदव्या-
कृतमिह शरीरावस्थमव्यक्त शब्देनोच्यते । तदर्हत्वात्-तस्य अव्या-
कृतस्य अचिद् वस्तुन एव विकारापन्नस्य रथवत् पुरुषार्थ साधन
प्रवृत्त्यर्हत्वात् ।
अव्याकृत सूक्ष्म भूत ही, अवस्था विशेष योग से शरीर होते हैं।
शरीर रूप विशिष्ट अवस्था को प्राप्त इन अव्याकृतों को ही यहाँ अव्या-
कृत नाम से कहा गया है (अर्थात् अव्यक्त शब्द सूक्ष्मशरीर का वाची है)
विकृतावस्था को प्राप्त अचित् वस्तु ही, रथ की तरह पुरुषार्थ साधन
करने वाली है, यही उक्त कथन का तात्पर्य है।
यदि भूतसूक्ष्ममव्याकृतमभ्युपगम्यते, कापिल तंत्रसिद्धोपादानेकः
प्रद्वेष ? तत्रापि हि भूतकारणमेवाव्यक्तमित्युच्यते । तत्राह-
अव्याकृत भूतसूक्ष्म को ही यदि अव्यक्त मानते हैं तो सांख्योक्त
प्रकृति को ही मानने में क्या आपत्ति है ? वहाँ भी तो भूतकारण को ही
अव्यक्त कहते हैं। इसका निराकरण करते हैं—
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तदधीनत्वादर्थवत् ॥१।४।३॥
परमकारणभूत परमपुरुषाधीनत्वात् प्रयोजनवत् भूत सूक्ष्मम्।
एतदुक्तं भवति-न वयमव्यक्तं तत्परिणाम विशेषांश्च स्वरूपेण
नाभ्युपगच्छामः। अपितु परमपुरुष शरीरतया तदात्मकत्वविरहेण।
तदात्मकत्वेनैव हि प्रकृत्यादयः स्वप्रयोजनं साधयंति, अन्यथा स्वरूप-
स्थिति प्रवृत्ति भेदास्तेषां न स्युः, तथाऽनभ्युपगमादेव तंत्रसिद्ध
प्रक्रियानिरसनम् इति।
परम कारण परं पुरुष परमात्मा के अधीनस्थ अव्याकृत भूत सूक्ष्मों
का एक विशेष प्रयोजन है। कथन यह है कि-हम लोग अव्यक्त और
उसके विशेष-विशेष परिणामों को स्वतंत्र रूप से एकाएक ही स्वीकार
नही कर लेते, अपितु परमपुरुष के शरीर तदात्मक होने से ही, उनकी
कृति को मानते हैं, तदात्मक होकर ही प्रकृति आदि सभी, अपने प्रयोजनों
को पूरा कर पाते है। यदि ऐसा न होता तो, उनके स्वरूप, स्थिति और
प्रवृत्ति में भेद न होता उक्त प्रकार की प्रक्रिया सांख्यतंत्र में नहीं है,
इसलिए सांख्यतंत्र प्रक्रिया का विरोध किया गया है।
श्रुतिस्मृत्योर्हि जगदुत्पत्ति प्रलयवादेषु परमपुरुषमहिमवादेषु
च प्रकृति विकृतिपुरुषास्तदात्मकाः संकीर्त्यन्ते, यथा-“पृथिव्यप्सु-
लीयते” इत्यारम्भ-“तन्मात्राणि भूतादौलीयन्ते, भूतादिर्महति लीयते,
महानव्यक्ते लीयते, अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे
देवएकीभवति” तथा-“शस्य पृथिवी शरीरं यस्यापः शरीरं, यस्य तेजः
शरीरं यस्यवायुः शरीरं यस्याकाशः शरीरं यस्याहंकारः शरीरं यस्य
बुद्धिः शरीरं यस्य अव्यक्तं शरीरं यस्याक्षरं शरीरं यस्य मृत्युः शरीरं
एष सर्व भूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” तथा-
“भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च, अहंकार इतीयं में
प्रकृतिरष्टधा, अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम्, जीवभूतां
[email protected]
महाबाहो ययेदंधार्यते जगत्। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय,
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा। मत्तः परतरं नान्यत्
किंचिदस्ति धनंजय, मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव” इति।
‘व्यक्तं विष्णुस्तथा अव्यक्तं पुरुषः कालएव च” इति। “प्रकृतिर्या ‘
‘मयाऽख्याता व्यक्ताव्यक्त स्वरूपिणी, पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते
परमात्मनि परमात्मा च सर्वेषां आधारः परमेश्वरः” इति च।
श्रुति स्मृतियों में, जगत की उत्पत्ति स्थिति और लय के बोधक,
परम पुरुष की महिमा के प्रतिपादक, प्रकृति विकृति और पुरुष तदात्मक
वाक्य मिलते हैं जैसे कि— “पृथ्वी जल में लीन हो जाती है” इत्यादि से
प्रारंभ कर--“तन्मात्रा, भूतादि अहंकार में लीन हो जाती हैं, अहंकार,
महान् अव्यक्त में लीन हो जाता है, अव्यक्त अक्षर में लीन होता है,
अक्षर तम में लीन हो जाता है--तम, परमात्मा में लीन हो जाता है।”
तथा— “पृथ्वी जिसका शरीर है, जल जिसका शरीर है, तेज
जिसका शरीर है, वायु जिसका शरीर है, आकाश जिसका शरीर
है, अहंकार अक्षर जिसका शरीर है, जिसका शरीर है, बुद्धि जिसका
शरीर है, अव्यक्त जिसका शरीर है, मृत्यु जिसका शरीर है,
वह सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण ही है।” तथा—
“भूमि-जल-अग्नि-वायु-आकाश-मन-बुद्धि और अहंकार ये मेरी
आठ प्रकार की भिन्ना प्रकृति है, मेरी जीव रूपा एक अपरा
प्रकृति भी है जो कि इससे भिन्न है, उसी से यह जगत स्थिर है, ये समस्त
भूत समुदाय मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मैं ही समस्त जगत का उत्पत्ति
और विलय स्थान हूँ, मेरे अतिरिक्त कुछ और नहीं है, सूत्र में पिरोई
मणियों के समान मुझमें ही सारा जगत ग्रथित है। व्यक्त (जड) अव्यक्त
चैतन्य, विष्णु और पुरुष और काल ये सभी उसी के रूप हैं। जिस व्यक्त
और अव्यक्त प्रकृति और पुरुष को मैं बतला रहा हूँ वे दोनों ही पर-
मात्मा में लीन हो जाते हैं। परमात्मा ही सर्वाधार पुरुषोत्तम है, उसे ही
वेद और वेदांत में, विष्णु कहा गया है।” इत्यादि—
ज्ञेयत्वावचनाच्च ।१।४।४॥
यदि तंत्र सिद्धमिहाव्यक्तमविवक्षिष्यत्, ज्ञेयत्वमवक्ष्यत्, व्यक्ता-
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व्यक्तज्ञविज्ञानात् मोक्षं वदद्भिस्तांत्रिकै स्तेषां सर्वेषां ज्ञेयत्वाभ्युपग-
तात्, न चास्य ज्ञेयत्वमुच्यते, अतो न तंत्रसिद्धस्येह ग्रहणम् ।
यदि उपनिषदों में सांख्योक्त प्रधान को जगत का कारण माना
गया होता तो, उसी को ज्ञेय भी कहा गया होता । व्यक्त-अव्यक्त और
पुरुष, इन तीनों के विशेष ज्ञान से मोक्ष मानने वाले सांख्यवादी, इन
तीनों को ज्ञेय मानते हैं, उपनिषदों में अव्यक्त को ज्ञेय नहीं मानते
इसलिए श्रुतियों का प्रतिपाद्य, सांख्योक्त प्रधान नहीं है ।
वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् । १ । ४ । ५ ॥
“अशब्द मस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्चयत्, अनाद्य-
मनंतं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्यु मुखात्प्रमुच्यते” इत्य-
व्यक्तस्य ज्ञेयत्वमनंतरमेव वदतीयं श्रुतिरेति चेत्-तन्न, प्राज्ञः परम-
पुरुष एवेत्यत्र श्लोके निचाय्यत्वेन प्रतिपाद्यते । “विज्ञानसारः
यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं
पदम्” एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते, दृश्यते त्वग्र्यया
बुद्ध्यासूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” इति प्राज्ञस्यैव प्रकृतत्वात् । अतएव-
“पुरुषान्न परंकिंचिद् “इति न पंचविंशक पुरुषातिरिक्त तत्त्व निषेधः,
तस्य च परं पुरुषस्याशब्दत्वादयो धर्माः “यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम्”
इत्यादि श्रुति प्रसिद्धाः । “महतः परम्” इत्यपि “बुद्धेरात्मा महान्
परः” इति पूर्वप्रकृताज्जीवात्मनः परत्वमेवोच्यते ।
“शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध रहित, अनादि अनंत, महत् तत्त्व से भी
परवर्ती, उस स्थिर वस्तु की उपासना करने से, मृत्यु से छुटकारा प्राप्त
होता है” यह परवर्ती श्रुति तो अव्यक्त को ज्ञेय बतला रही है, ऐसी
शंका करना भी ठीक नहीं है, प्राज्ञ परं पुरुष परमात्मा को ही इसमें
उपास्य कहा गया है । “विज्ञान जिसका सारथी और मन जिसकी लगाम
है, वही साधक, संसार मार्ग को पार कर विष्णु के परं पद को प्राप्त
( ५६१ )
करता है”—“यह सबका आत्म रूप परम पुरुष समस्त प्राणियों में रहता
हुआ भी माया के परदे में छिपे रहने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल
सूक्ष्म तत्त्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से
देखा जाता है।” इत्यादि में प्राज्ञ परमात्मा को ही उपास्य रूप से
बतलाया गया है। “पुरुषान्न परं किंचित्” इस वाक्य में भी पंचविंशक
पुरुष से अतिरिक्त तत्त्व का निषेध प्रतीत नहीं होता। उस परम पुरुष की
अशब्दत्व आदि जो विशेषतायें हैं, वे “अदृश्यमग्राह्यम्” इत्यादि
वाक्यों में प्रसिद्ध हैं। “महतः परम्” वाक्य भी, “बुद्धेरात्मा महान्
परः” इस पूर्वकथित वाक्य के जीवात्मा से पर तत्त्व, परमात्मा की
ओर ही इङ्गन कर रहा है।
त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥१।४।६॥
अस्मिन् प्रकरणे हि उपायोपेयोपेतॄणां त्रयाणामेव चैवमुप-
न्यासः ज्ञेयत्वेनोपन्यासः तद्विषयश्च प्रश्नो दृश्यते, नान्यस्या
( ५६२ )
इस प्रकरण में उपाय (साधना) उपेय (साध्य) और उपेतृ (साधक)
इन तीनों का ही उपन्यास अर्थात् तीनों को ही ज्ञेय रूप से बतलाया
गया है, और उन्हीं के विषय में प्रश्न प्रस्तुत किया गया है, अव्यक्त
आदि का प्रश्न ही नहीं है। ऐसा वर्णन मिलता है कि-मुमुक्षु नचिकेता
ने मृत्यु प्रदत्त तीन वरों में सर्व प्रथम पुरुषार्थयोग्यतापादिनी पिता की
प्रसन्नता प्राप्त की, दूसरे वर में मोक्ष साधन भूत नाचिकेताग्नि विद्या
मांगी “हे मृत्यु ! आप स्वर्ग साधन भूत अग्नि विद्या को जानते है, मुझ
श्रद्धालु को उसका उपदेश करिये, स्वर्ग लोकगामी अमृतत्व भोग करते है,
द्वितीय वर के रूप में मैं उसी की याचना करता हूँ।” यहाँ स्वर्ग शब्द
परम पुरुषार्थ मोक्ष का द्योतक है। अमृतत्वं भजन्ते पद स्वर्गीय लोगों के
जन्म मरण के अभाव और क्षयशील कर्म की निंदा का द्योतक है। “जो
तीन बार नाचिकेताग्नि का चयन करता है, वह माता पिता और आचार्य
इन तीनो से संबंधित तीनो कर्मों से कृतकार्य हो चुका, वह जन्म मरण
को भी अतिक्रमण कर चुका” इस उत्तर से भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि
होती है। “तीसरे वर में मनुष्य के मरणोत्तर अस्तित्व को कोई मानता है,
कोई नही मानता, आपके उपदेश से इस संशयात्मक रहस्य को जानना
चाहता हूँ” इत्यादि में मोक्ष के स्वरूप विषयक प्रश्न द्वारा प्राप्तव्य,
प्रापक और उसके उपायरूप कर्म-संपादित उपासना के स्वरूप की
जिज्ञासा की गई है।
एवं मोक्षे पृष्टे तदुपदेशयोग्यतां परीक्ष्योपदिदेश-“तं दुर्दर्शं
गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन
देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति। तदेवं सामान्येनोपदिष्टे
नचिकेताः प्रीतस्सन् “देवं मत्वा” इत्युपास्यतया निर्दिष्टस्य प्राप्य-
भूतस्य देवस्य “अध्यात्मयोगाधिगमेन” इति वेदितव्यतया निर्दिष्ट-
प्राप्तुः प्रत्यगात्मनश्च “मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति निर्दिष्टस्य
ब्रह्मोपासनस्य च स्वरूप विशोधनाय पुनः पप्रच्छ-“अन्यत्र धर्मादन्य-
त्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्। अन्यत्र भूताद्भव्याच्च यत्तत्पश्यसि
तद् वद” इति। एवं सकलेतरातीतानागतवर्त्तमान साध्यसाधनसाधक-
( ५६३ )
विलक्षणे त्रये पृष्टे प्रथमं प्रणवं प्रशस्य तद्वाच्यं प्राप्यस्वरूपं,
तदंतर्गतं च प्राप्तृस्वरूपं वाचकरूपं चोपायं पुनरपि सामान्येन
ख्यापयन् प्रणवं तावदुपदिदेश–“सर्वे वेदा यत् पदमामनंति तपांसि
सर्वाणि च यद् वदंति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरंति तत्ते पदं संग्रहेण
ब्रवीम्योमित्येतत्” इति । एवमुपदिश्य पुनरपि प्रणवं प्रशस्य प्रथमं
तावत् प्राप्तुः प्रत्यगात्मनः स्वरूपमाह-“न जायते म्रियते वा
विपश्चित्”इत्यादिना । प्राप्यस्य परस्य ब्रह्मणो विष्णोः स्वरूपम्
“अणोरणीयान्” इत्यादिना “क इत्था वेद यत्र सः” इत्यंतेनोपदिशन्
मध्ये “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन”
इत्यादिनोपायभूतस्योपासनस्य भक्तिरूपतामप्याह । “ऋतं पिबन्तौ”
इति चोपास्यस्योपासकेन सहावस्थानात् सुपास्यतामुक्त्वा “आत्मानं
रथिनं विद्धि” इत्यादिना “दुर्गं पथस्तत् कवयो वदंति” इत्यंतेनो-
पासनप्रकारमुपासीनस्य च वैष्णवपरमपद प्राप्तिमभिधाय “अशब्द-
मस्पर्शम्” इत्यादिनोपसंहृतम् । अतस्त्रयाणामेवात्र ज्ञेयत्वेनोपन्यासः
प्रश्नश्च, तस्मान्नेह तांत्रिकस्याव्यक्तस्य ग्रहणम् ।
उक्त मोक्ष विषयक प्रश्न के उपरान्त, नचिकेता की उपदेश ग्राहिका
शक्ति की परीक्षा करके यमराज उपदेश देते हैं- “धीर पुरुष दुर्दर्श, गूढ़,
सर्वान्तर्यामी, गुहावस्थित, हृदयकन्दरस्थ, पुराण पुरुषोत्तम देव का
अध्यात्म बल से दर्शन करके सुख दुःख से छूटते हैं ।” ऐसे सामान्य सरल
उपदेश से संतुष्ट नचिकेता “देवं मत्वा” पद से उपास्य रूप से निर्दिष्ट
प्राप्य परमात्मा--“अध्यात्मयोगाधिगमेन” पद से वेदितव्य रूप से
निर्दिष्ट जीवात्मा--“धीरो हर्षशोकौ जहाति” पद से निर्दिष्ट ब्रह्मोपासना
और स्वरूपगत भाव को समझकर, इस तथ्य को विस्तृतरूप से जानने के
लिए प्रश्न करता है--“हे यमराज ! धर्म और अधर्म से भिन्न, कार्य और
कारण से पृथक् , अतीत और अनागत से पृथक् जो कुछ भी आप जानते
हैं उसे बतलाइये ।” नचिकेता द्वारा इस प्रकार अतीत अनागत और
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( ५६४ )
वर्त्तमान तथा साध्य, साधक और साधन से विलक्षण तत्त्व की जिज्ञासा
करने पर, यमराज ने, जिज्ञासा की प्रशंसा करते हुए, उपासना लभ्य
प्रणव के वाच्यार्थ, प्राप्य स्वरूप, प्राप्ति के उपायरूप ब्रह्मवाचक प्रणव-
स्वरूप का प्रकाश करने के लिए, प्रणवरहस्य का विवेचन किया- "सारे
वेद जिस पद का बारबार प्रतिपादन करते हैं, संपूर्ण तप जिस पद को
दिखलाते हैं, जिसको चाहने वाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद
तुम्हें संक्षेप में बतलाता हूँ वह ओम् ही है ।' ऐसा उपदेश देकर पुनः
प्रणव की प्रशंसा करते हुए, सर्व प्रथम साधक जीवात्मा के स्वरूप को
“विद्वान् का न जन्म होता है न मरता है' इत्यादि से, तथा प्राप्य परब्रह्म
विष्णु के स्वरूप को “अणु से भी अणु” इत्यादि से लेकर - “वह ऐसा कहाँ
स्थित है इसे कौन जाने" इत्यादि तक बतलाते हुए मध्य में “यह
परमात्मा, प्रवचन, मेधा और शास्त्राभ्यास से लभ्य नहीं है" इत्यादि
वाक्य से ब्रह्म प्राप्ति की उपाय रूप उपासना की भक्तिरूपता का प्रति-
पादन करते हैं। “दोनों ही भोक्ता है" इत्यादि वाक्य में उपास्य और
उपासक की एकत्र स्थिति दिखलाई गई है, इसलिए उपासना करना
सरल है, इस रहस्य की ओर लक्ष्य करते हुए “आत्मा को रथी जानो"
इत्यादि से लेकर 'ज्ञानी उसे दुर्गम पथ बतलाते हैं" इस अंतिम वाक्य
तक उपासना के विशेष प्रकार तथा उपासीन की पर वैष्णव पद की
प्राप्ति बतलाकर “वह अशब्द और अस्पर्श है" इत्यादि से प्रसंग का
उपसंहार करते हैं। इस विवेचन से ज्ञात होता है कि इसमें उपास्य-
उपासक-और उपासना की ही उक्त प्रसंग में जिज्ञासा की गई है,
सांख्योक्त अव्यक्त संबंधी कोई प्रश्न नहीं है।
महद्वच्च ।१।४।७॥
यथा-"बुद्धेरात्मा महान् परः” इत्यात्मशब्द सामानाधि-
करण्यान्न तंत्रसिद्धं महत्तत्त्वं गृह्यते, एवमव्यक्तमप्यात्मनः परत्वे-
नाभिधानान्न कपिलतंत्रसिद्धं गृह्यत इति स्थितम् ।
जैसे कि - “बुद्धि से महान् आत्मा श्रेष्ठ है" इस वाक्य में आत्मा
शब्द के साथ महान् शब्द का अभेद संबंध होने से, महान् शब्द से
सांख्योक्त महत् तत्त्व की उपलब्धि नहीं होती, वैसे ही “आत्मा से
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( ५६५ )
अव्यक्त श्रेष्ठ है” इस वाक्यगत अव्यक्त से, सांख्योक्त अव्यक्त को नहीं
स्वीकार सकते ।
२ चमसाधिकरण—
चमसवदविशेषात् ।१।४।८॥
अत्रापि तंत्रसिद्ध प्रक्रिया निरस्यते, न ब्रह्मात्मकानां प्रकृति-
महदहंकारादीनां स्वरूपम्, श्रुतिस्मृतिभ्यां ब्रह्मात्मकानां तेषां
प्रतिपादनात्, यथा आथर्वणिका अधीयते-“विकारजननीमज्ञामष्ट-
रूपामजां ध्रुवाम्। ध्यायतेऽध्यासिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः। सूयते
पुरुषार्थं च तेनैव अधिष्ठिताजगत्। गौरनाद्यंतवती सा जनित्री
भूतभाविनी। सिताऽसिता च रक्ता च सर्वकामदुघा विभोः। पिबंत्ये-
नामविषमामविज्ञाताः कुमारकाः। एकस्तु पिबते देवः स्वच्छंदोऽत्र
वशानुगाम्। ध्यानक्रियाभ्यां भगवान् भुंक्तेऽसौ प्रसभं विभुः। सर्व-
साधारणीं दोग्ध्रीं पीड्यमानां तु यज्वभिः” इति। अत्र प्रकृत्यादीनां
स्वरूपमभिहितम् यदात्मकाश्चैते प्रकृत्यादयः स परमपुरुषोऽपि “तं
षड्विंशकमित्याहुः सप्तविंशमथापरे, पुरुषं निर्गुणं सांख्यमथर्वशिरसो
विदुः” इति प्रतिपाद्यते। अपरे चाथर्वणिकाः-“अष्टौ प्रकृतयः
षोडश विकाराः” इत्यधीयते। श्वेताश्वतराश्चैवं प्रकृति पुरुषेश्वर
स्वरूपमामनंति-“संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्व-
मीशः, अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृ भावात् ज्ञात्वा देवं मुच्यते
सर्व पापैः”-“ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशानीशावजा ह्येका भोक्तृभोगार्थयुक्ता,
अनंतश्चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्त्ता त्रयंयदा विन्दते ब्रह्ममेतत्”-“क्षरं
प्रधानं अमृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः, तस्याभिध्याना-
द्योजनात्तत्वभावाद्भूयश्चांते विश्वमायानिवृत्तिः”-“छंदांसि यज्ञाः
क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदंति, अस्मान्मायी सृजते
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( ५६६ )
विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः”—“मायां तु प्रकृतिं
विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्”
इति । तथोत्तरत्रापि—“प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थिति-
बंधहेतुः” इति ।
इस प्रसंग में भी सांख्य तंत्र प्रक्रिया का खंडन किया गया है,
ब्रह्मात्मक प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार आदि का निराकरण नहीं है। श्रुति
स्मृति में ब्रह्मात्मक प्रकृति आदि का प्रतिपादन ही मिलता है, जैसे कि
आथर्वणिक श्रुति में—“समस्त कार्यों की कारण, आठ रूपों वाली, अचेतन,
नित्यरूपा अजा प्रसिद्ध है, परमेश्वर उसमें अधिष्ठान पूर्वक उसे
स्थूलादि रूपों में परिणत करते हैं, कार्योत्पादन में प्रेरित करते हैं, वह
अजा ही परमेश्वर द्वारा परिचालित होकर जगत का प्रसव करती
है। अतीत और अनागत स्वरूपा, श्वेत कृष्ण और रक्तवर्णा, जगज्जननी,
आद्यंतरहित वह अजा ही परमेश्वर की सर्वकाम प्रसविनी गौ है। अज्ञानी
बाल प्रकृति जीव, सर्वत्र समभाववाली इस गौ का भोग करता है। इस
जगत में एकमात्र वह परमात्मा ही, अपनी वशवर्त्तिनी इस अजा का
स्वच्छंद रूप से भोग करते हैं। ध्यान और क्रिया द्वारा पीड़िता और
सर्व भोग्या, दूधवाली, याज्ञिकों द्वारा सरलता से प्राप्त इस गौ का, विभु
भगवान बलपूर्वक भोग करते हैं, चौबीस प्रकार की यह अव्यक्त, व्यक्त
होती है।” इत्यादि में प्रकृति का स्वरूप वर्णन किया गया है। ये सब
जिससे आत्मीय संबंध रखती हैं उस परमपुरुष का भी जैसे—“कुछ लोग
जिसे छब्बीस तत्त्वों वाला, कोई सत्ताइस तत्त्वों वाला बतलाते हैं, अथर्व
शिखा उपनिषद् में इस संख्यावाले को निर्गुण बतलाया गया है।”
इत्यादि प्रतिपादन किया गया है। दूसरी आथर्वणिक उपनिषद् में जैसे-
“आठ प्रकार की प्रकृति और सोलह प्रकार के प्रकृति के विकार हैं।”
इत्यादि-श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी प्रकृतिपुरुष का रूप इस प्रकार कहा
गया है-“विनाशशील जड़वर्ग और अविनाशी जीवात्मा, इन दोनों के
संयुक्त रूप व्यक्त और अव्यक्त इस विश्व का, परमेश्वर ही धारण पोषण
करते हैं, जीवात्मा-इस जगत के विषयों का भोक्ता होने से प्रकृति के
अधीन होकर इसमें बँध जाता है, परमपुरुष परमात्मा को जानकर ही
( ५६७ )
हर प्रकार के बंधनों से मुक्त होता है । सर्वज्ञ और अज्ञानी, समर्थ और
असमर्थ ये दो अजन्मा हैं, भोगने वाले जीव के लिए उपयुक्त सामग्री
वाली अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है । परमात्मा अनंत रूपों वाला
होते हुए भी, कर्त्तापन के अभिमान से रहित है । जीवात्मा जब जीव,
माया और ईश्वर इन तीनों के वास्तविक स्वरूप को जान लेता है तो
ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । प्रकृति विनाश शील है, पर उसको भोगने
वाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है । इस विनाश शील और
अमृत दोनों को परमात्मा अपने वश में रखता है । उस परमेश्वर का
निरन्तर ध्यान करने से, मन को उसमें लगाये रहने से तथा तन्मय हो
जाने से अंततोगत्वा, समस्त माया की निवृत्ति हो जाती है । छंद-यज्ञ-व्रत
आदि तथा जिसका भी भूत-भविष्य-वर्त्तमान रूप से वेद वर्णन करते हैं
ऐसे संपूर्ण जगत को, मायाधीश परमेश्वर भूत समुदाय से रचता है,
मायाधीन जीवात्मा इस प्रपंच में बँधा हुआ है । माया प्रकृति तथा
मायापति महेश्वर को जानना चाहिए, उसी के अंगरूप कारण और कार्य
से यह सारा जगत व्याप्त है । प्रकृति और जीवात्मा का स्वामी, समस्त
गुणों का शासक, जन्म मृत्यु संसार में बांधने वाला, स्थिति रखने वाला,
और उससे मुक्त करने वाला परमात्मा है ।” इत्यादि ।
स्मृतिरपि—“प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि, विका-
रांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृति संभवान् । कार्यकारण कर्त्तृत्वे हेतुः
प्रकृतिरुच्यते, पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते । पुरुषः
प्रकृतिस्थोऽहि भुंक्ते प्रकृतिजान् गुणान्, कारणं गुण संगोऽस्य सदस-
द्योनि जन्मसु । सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति संभवाः, निबध्नंति
महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।” तथा—“सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं
यांति मामिकाम्, कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः, भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं
प्रकृतेर्वशात् । मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्, हेतुनानेन
कौन्तेय जगद् हि परिवर्तते” तस्माद् ब्रह्मात्मकत्वेन कापिल तंत्र-
सिद्धाः प्रकृत्यादयो निरस्यंते ।
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स्मृति में भी इसी प्रकार जैसे—"प्रकृति-पुरुष दोनों को ही अनादि
जानों, विकारों और गुणों को प्रकृति से ही उत्पन्न जानों। कार्य कारण
में प्रकृति कारण कहलाती है, सुखदुःख भोगने में पुरुष कारण कहलाता
है। पुरुष, प्रकृति में स्थित हुआ ही, प्राकृतिक गुणों को भोगता है, गुणों
की आसक्ति ही उसकी ऊंची-नीची योनि के जन्म का कारण है।
सत्व रज तम आदि प्राकृतिक गुण ही, अव्यय आत्मा को देह में
बांधते हैं।" तथा "कल्प के अंत में सारे भूत, मेरी प्रकृति को प्राप्त होते
हैं, कल्प के आदि में मैं पुनः उनकी सृष्टि करता हूँ। प्रकृति के वशीभूत
विवश समस्त भूत समुदाय को मैं, अपनी प्रकृति का अवलंबन कर, अनेक
प्रकार से बार-बार सृजन करता हूँ। मुझ अध्यक्ष द्वारा प्रेरित, प्रकृति,
समस्त चराचर जगत को उत्पन्न करती है, इसी से यह जगत चलता
रहता है।" इत्यादि उदाहरणों से अब्रह्मात्मक सांख्य तंत्र सिद्ध प्रकृति
आदि का स्वतः खंडन हो जाता है।
श्वेताश्वतरोपनिषदि श्रूयते—"अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां
बह्वीः प्रजाः सुजमानां सरूपाः, अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां
भुक्तभोगामजोऽन्यः" इति । तत्र संदेहः, किमस्मिन् मंत्रे केवला तंत्र
सिद्धा प्रकृतिरभिधीयते, उत ब्रह्मात्मिका ? इति, किं युक्तम् ?
केवलेति, कुतः ? "अजामेकाम्" इत्यस्याः प्रकृतेरकार्यत्व श्रवणात्,
“बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः” इति स्वातन्त्र्येण सरूपाणां बह्वीनां
प्रजानां स्रष्टृत्वत्व श्रवणात् । इति ।
श्वेताश्वतरोपनिषद् में प्रसंग आता है कि—"अपने ही समान भूत
समुदायों को रचने वाली रक्त-श्वेत और कृष्ण वर्णा एक अजा को,
निश्चय ही एक अज आसक्त होकर भोगता है, दूसरा अज इस भोगी
हुई श्रजा को त्याग देता है।" इस पर संदेह होता है कि—इस मंत्र में
सांख्योक्त केवला (स्वतः सिद्धा) प्रकृति का वर्णन है अथवा ब्रह्मात्मिका
प्रकृति का ? कह सकते हैं कि केवला का, क्यों कि—"अजामेकाम्" पद में
प्रकृति की अकार्यता बतलाई गई है तथा "बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः"
इस वाक्यांश में, अपने ही समान प्रजा का स्वतंत्र रूप से सर्जन कहा
( ५६६ )
गया है, जिससे ज्ञात होता है कि-सांख्य तंत्र सिद्ध केवला का ही
वर्णन है ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—“चमसवदविशेषात्”। न जायत इति
अजा इति अजात्वमात्र प्रतिपादनात् तंत्रसिद्धाब्रह्मात्मकाजाग्रहणे
विशेषाप्रतीतेः चमसवत्, यथा—“अर्वाग्विलश्चमश ऊर्ध्वबुध्नः”
इत्यस्मिन् मंत्रे चमसस्य भक्षणसाधनत्वमात्रं चमसशब्देन प्रतीयत
इति न तावन्मात्रेण चमसविशेष प्रतीतिः, यौगिकशब्दानामर्थ-
प्रकरणादिभिर्विनाऽर्थविशेषनिश्चयायोगात्, तत्र “यथेदं तच्छिरः
एष हि अर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः” इत्यादिना वाक्यशेषेण शिरसः
चमसत्वनिश्चयः, तथा अत्रापि अर्थ प्रकरणादिभिरेव अजा
निर्णोतव्या, न चात्र तंत्रसिद्धा अजाग्रहणहेतवोऽर्थ प्रकरणादयो
दृश्यन्ते, नचास्याः स्वातंत्र्येन स्रष्टृत्वत्वं प्रतीयते “बह्वीः प्रजाः
सृजमानां” इति स्रष्टृमात्रप्रतीतेः । अतोऽनेन मंत्रेण न अब्रह्मात्मि-
काऽजाऽभिधीयते ।
उक्त संशय पर “चमसवदविशेषात्’ सूत्र प्रस्तुत करते हैं, जिसका
तात्पर्य है कि-इस प्रसंग में सांख्योक्त प्रकृति का वर्ण'न नहीं है, जो जन्म
न ले उसे अजा कहते हैं, ऐसी सामान्य अजा का ही प्रतिपादन किया
गया है। इससे सांख्योक्त अब्रह्मात्मक अजाविशेष की प्रतीति नहीं होती,
जैसे कि-‘अर्वाग्विलश्चमस’’ इत्यादि मंत्र में चमस शब्द भक्षण के
साधनत्व मात्र का ही बोधक है, चमसविशेष की प्रतीति नहीं कराता ।
यौगिक शब्दों का अर्थ, प्रकरण आदि के बिना, अर्थ विशेष का बोधक
नहीं होता । जैसे कि—“यथेदं तच्छिरः” इत्यादि वाक्य के शेषांश से चमस
शब्द, शिर अर्थ की प्रतीति कराता है, उसी प्रकार उक्त प्रसंग में भी,
प्रकरण आदि से ही अजा शब्द का अर्थ निर्णय करना होगा । प्रकरण
आदि में कहीं भी सांख्योक्त अजा की अर्थ प्रतीति नहीं होती, और न
उसकी स्वतंत्र रूप से सृष्टि करने की ही प्रतीति होती है । “बह्वीः प्रजाः
[email protected]
सृजमानां' में तो केवल सृष्टिमात्र की ही चर्चा है। इससे निर्णय होता
है कि-इस मंत्र में सांण्योक्त अब्रह्मात्मिका अजा अभिधेय नहीं है।
ब्रह्मात्मकाऽजाग्रहण एव विशेषहेतुरस्तीत्याह—
इस प्रकरण में ब्रह्मात्मक अजा ही मानी जायगी इसका विशेष
कारण प्रस्तुत करते हैं—
ज्योतिरुपक्रमा तु तथाह्यधीयत एके ॥१।४।६॥
तु शब्दोऽवधारणार्थः, ज्योतिरुपक्रमैवैषाऽजा, ज्योतिः ब्रह्म
“तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते”
इत्यादि श्रुति प्रसिद्धेः । ज्योतिरुपक्रमा, ब्रह्मकारणिका इत्यर्थः ।
तथा हि अधीयत एके-हीति हेतौ, यस्मादस्या अजाया ब्रह्मकारण-
कत्वमेके शाखिनः तैत्तिरीया अधीयते- “अणोरणीयान् महतो महीयान्
आत्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः” इति हृदयगुहायामुपास्यत्वेन
सन्निहितं ब्रह्माभिधाय “सप्त प्राणाः प्रभवंति तस्मात्” इत्यादिना
सर्वेषां लोकानां ब्रह्मादीनां च तत उत्पत्तिमभिधाय सर्वकारणीभूता-
ऽजा तत उत्पन्नाऽभिधीयते “अजामेकाम्” इत्यादिना । सर्वस्य तद्-
व्यतिरिक्तस्य वस्तुजातस्य तत उत्पत्त्या तदात्मकत्वोपदेशे प्रक्रिय-
माणेऽभिधीयमानत्वात् प्राणसमुद्रपर्वतादिवदेषाप्यजा वह्वीनां
सरूपाणां प्रजानां स्रष्ट्री कर्मवश्येनात्मना भुज्यमाना अन्येन विदुषा-
त्मना त्यज्यमाना च ब्रह्मण उत्पन्ना ब्रह्मात्मिकाऽवगंतव्येत्यर्थः ।
श्रतो वाक्यशेषाच्चमसवशेषवच्छाखांतरीयादेतत्स्वरूपात् प्रत्यभिज्ञाय-
मानार्थान् वाक्यानियमिताऽजा ब्रह्मात्मिकेति निश्चीयते ।
सूत्रस्थ तु शब्द निश्चयात्मक है। इस प्रकरण में कही गई अजा
ज्योतिरुपक्रमा (ज्योतिर्मय ब्रह्मात्मिका) ही है। “देवता ज्योतियों की
ज्योति की उपासना करते हैं, वह ज्योति द्युलोक के ऊपर चमक रही