श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाबाहो ययेदंधार्यते जगत्। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय,
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा। मत्तः परतरं नान्यत्
किंचिदस्ति धनंजय, मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव” इति।
‘व्यक्तं विष्णुस्तथा अव्यक्तं पुरुषः कालएव च” इति। “प्रकृतिर्या ‘
‘मयाऽख्याता व्यक्ताव्यक्त स्वरूपिणी, पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते
परमात्मनि परमात्मा च सर्वेषां आधारः परमेश्वरः” इति च।
श्रुति स्मृतियों में, जगत की उत्पत्ति स्थिति और लय के बोधक,
परम पुरुष की महिमा के प्रतिपादक, प्रकृति विकृति और पुरुष तदात्मक
वाक्य मिलते हैं जैसे कि— “पृथ्वी जल में लीन हो जाती है” इत्यादि से
प्रारंभ कर--“तन्मात्रा, भूतादि अहंकार में लीन हो जाती हैं, अहंकार,
महान् अव्यक्त में लीन हो जाता है, अव्यक्त अक्षर में लीन होता है,
अक्षर तम में लीन हो जाता है--तम, परमात्मा में लीन हो जाता है।”
तथा— “पृथ्वी जिसका शरीर है, जल जिसका शरीर है, तेज
जिसका शरीर है, वायु जिसका शरीर है, आकाश जिसका शरीर
है, अहंकार अक्षर जिसका शरीर है, जिसका शरीर है, बुद्धि जिसका
शरीर है, अव्यक्त जिसका शरीर है, मृत्यु जिसका शरीर है,
वह सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण ही है।” तथा—
“भूमि-जल-अग्नि-वायु-आकाश-मन-बुद्धि और अहंकार ये मेरी
आठ प्रकार की भिन्ना प्रकृति है, मेरी जीव रूपा एक अपरा
प्रकृति भी है जो कि इससे भिन्न है, उसी से यह जगत स्थिर है, ये समस्त
भूत समुदाय मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मैं ही समस्त जगत का उत्पत्ति
और विलय स्थान हूँ, मेरे अतिरिक्त कुछ और नहीं है, सूत्र में पिरोई
मणियों के समान मुझमें ही सारा जगत ग्रथित है। व्यक्त (जड) अव्यक्त
चैतन्य, विष्णु और पुरुष और काल ये सभी उसी के रूप हैं। जिस व्यक्त
और अव्यक्त प्रकृति और पुरुष को मैं बतला रहा हूँ वे दोनों ही पर-
मात्मा में लीन हो जाते हैं। परमात्मा ही सर्वाधार पुरुषोत्तम है, उसे ही
वेद और वेदांत में, विष्णु कहा गया है।” इत्यादि—
ज्ञेयत्वावचनाच्च ।१।४।४॥
यदि तंत्र सिद्धमिहाव्यक्तमविवक्षिष्यत्, ज्ञेयत्वमवक्ष्यत्, व्यक्ता-
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