श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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त्वमभिधाय हयादिरूपितानामिन्द्रियादीनां वशीकार प्रकारोऽय
मुच्यते । 'यच्छेद् वाङ्मनसी” वाचं मनसि नियच्छेत्-वाक्पूर्वकाणि
कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि च मनसि नियच्छेद् इत्यर्थः । वाक्शब्दे
द्वितीयायाः "सुपां सुलुकू" इतिलुक् । “मनसी" इति सप्तम्या-
श्छान्दसो दीर्घः । “तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि" तन्मनौ बुद्धौ नियच्छेद् ।
ज्ञान शब्देनात्र पूर्वोक्ता बुद्धिरभिधीयते । ज्ञाने आत्मनि" इति
व्यधिकरणे सप्तम्यौ । आत्मनि वर्त्तमाने ज्ञाने नियच्छेदित्यर्थः ।
“ज्ञान आत्मनि महति यच्छेत्" बुद्धिं कर्त्तरि महत्यात्मनि निय-
च्छेत् !” तद्यच्छेच्छांत आत्मनि" तं कत्र्तरि परस्मिन् ब्रह्मणि
सर्वान्तर्यामिणि नियच्छेत् । व्यत्ययेन तदिति नपुंसकलिंगता ।
एवम्भूतेन रथिना वैष्णवं पदं गन्तव्यमित्यर्थः ।
उक्त रहस्य को श्रुति में इस प्रकार दिखलाया गया है कि- “यह
सबका आत्मरूप परं पुरुष, समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी, माया के
परदे में छिपा रहने से प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्म तत्त्वों को समझने
वाले पुरुषों से ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।" बुद्धिमान
साधक को चाहिए कि वाणी आदि को मन में निरुद्ध करके, उस मन
को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में विलीन करे तथा ज्ञान स्वरूप बुद्धि आत्मा
में विलीन करे तथा उस महान् आत्मा को शांत स्वरूप परमात्मा में
विलीन करे ।"
उक्त प्रसंग में, जो लोग बाह्य और आभ्यंतर को जय नहीं कर
पाते, उनके लिए परमात्म दर्शन बहुत दूर है, ऐसा बतलाते हुए, अश्व
आदि रूप से कल्पित इन्द्रियो को वशीभूत करने के विशेष उपाय का
निर्देश किया गया है। "यच्छेद् वाङ्मनसी" का तात्पर्य है, वागेन्द्रिय को
मन में लीन करो अर्थात् वागेन्द्रिय सहित कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को
लीन करो इस वाक्य में "सुपांसुलुक्" इस व्याकरणीय नियम से वाक्
शब्द की द्वितीया विभक्ति का लोप हो गया है तथा "मनसी" पद में
वैदिक व्याकरण के अनुसार सप्तमी विभक्ति में दीर्घ ईकार हो गया
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