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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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प्रकाश चिन्मात्र ब्रह्म में एकात्म भाव होने से, संभावित दोषों की प्रत्यक्ष
सिद्ध भेद कल्पना रूपी बंधन की विमुक्ति शास्त्र सम्मत है । प्रत्यक्ष आदि
प्रमाणों में तो किसी न किसी प्रकार के दोष की संभावना रहती है, जिससे
इस प्रपंचमय जगत् में विभिन्न भेदों की कल्पना; अनादि भेदवासना रूपी
अविद्या नामक दोष से होती है।
ननु अनादिनिधनाविच्छिन्नसंप्रदायतया निर्दोषस्यापि
शास्त्रस्यज्योतिष्टोमेन स्वर्ग “कामो यजेत् ” इत्येवमादेर्भेदावलंबिनो
बाध्यत्वं प्रसज्येत् । सत्यम् पूर्वापगपच्छेदे पूर्वशास्त्रवत् मोक्षशास्त्रस्य
निरवकाशत्वात्तेन बाध्यत एव । वेदांतवाक्येष्वपि सगुणब्रह्मोपा-
सनपराणां शास्त्राणामयमेव न्यायः निर्गुणत्वात्परस्यब्रह्मणः ।
(शंका) यदि उक्त बात मान लेंगे तो — उत्पत्ति विनाश रहित, परं-
परित, निर्दोष “स्वर्ग की कामना से ज्योतिष्टोम यज्ञ करना चाहिए”
इत्यादि भेदावलम्बी शास्त्र वाक्य भी बाधित हो जायगा । (समाधान)
पूर्व और परवर्त्ती वाक्य में अपच्छेद (व्याघात) होने पर पूर्व शास्त्र दुर्बल
माना जाता है, इसलिए निरवकाश मोक्ष शास्त्र द्वारा — भेदावलंबी पूर्व
शास्त्र का बाधित होना स्वाभाविक है । वेदांत वाक्यों में भी सगुण ब्रह्मो-
पासना के उपदेशक शास्त्रों में भी यही नियम है, क्योंकि परब्रह्म निर्गुण है ।
ननु च “स सर्वज्ञः सर्ववित्”, “परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च”, “सत्यकामः सत्य संकल्पः” इत्यादि
ब्रह्मस्वरूपप्रतिपादनपराणां शास्त्राणां कथं बाध्यत्वं निर्गुणवाक्य-
सामर्थ्यादिति ब्रूमः । एतदुक्तं भवति—“अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्”,
“सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म,” “निर्गुणं निरंजनम् ” इत्यादिवाक्यानि
निरस्तसमस्तविशेषकूटस्थनित्यचैतन्यं ब्रह्मेति प्रतिपादयन्ति, इत-
राणि च सगुणम् । उभयविधवाक्यानां विरोधे तेनैवापच्छेदन्यायेन
निर्गुणवाक्यानां गुणापेक्षत्वेन परत्वाद् बलीयस्त्वमिति न किंचिद-
पहीनम् ।