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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 696 में से

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पृष्ठ 426

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लिए आकाश ही कारण ब्रह्म है ऐसा निश्चित हो जाने पर, जगत कर्त्ता
के लिए प्रयुक्त ईक्षण आदि गुण गौण प्रतीत होते हैं । और फिर यदि
"सद्" आदि साधारण शब्दों पर ही जगत कर्त्ता का निर्णय निर्भर है तो
ईक्षण आदि अर्थों के द्वारा चेतन विशेष को ही कारण मानना चाहिए ।
आकाश शब्द का तो विशेष उल्लेख होने से निश्चित हो जाता है कि
आकाश ही जगत कर्त्ता है, अर्थ के आधार पर निर्णय करने की बात तो
उठती ही नहीं ।
ननु "आत्मन आकाशस्सम्भूतः" इत्याकाशस्यापि कार्यत्वं
प्रतीयते । सत्यम्, सर्वेषामेवाकाशवाथ्वादीनां सूक्ष्मावस्थास्थूला-
वस्थाचेत्यवस्थाद्वयमस्ति । तत्राकाशस्य सूक्ष्मावस्था कारणम् ।
स्थूलावस्था तु कार्यम् । "आत्मन आकाशस्सम्भूतः" इति स्वस्मा-
देव सूक्ष्मरूपात् स्वयं स्थूलरूपस्सम्भूत इत्यर्थः । "सर्वाणि ह वा
इमानि भूता याकाशादेव समुत्पद्यन्ते" इ त सर्वस्य जगत आकाशा-
देव प्रभवाप्ययादि श्रवणात् तदेव हि कारणं ब्रह्मेति निश्चितम् यत
एवं प्रसिद्धाकाशादनतिरिक्तं ब्रह्म अत एव च "यदेषश्राकाश
आनंदो न स्यात्" आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इत्येवमादि
निर्देशोप्युपपन्नतरः । अतः प्रसिद्धाकाशादनतिरिक्तं ब्रह्मेति ।
संशय होता है कि—"आत्मा से आकाश हुआ" इस वाक्य से तो
आकाश की कार्यता ज्ञात होती है ठीक है, आकाश वायु आदि सभी की
स्थूल और सूक्ष्म दो अवस्थायें होती हैं। आकाश की सूक्ष्मावस्था कारण
तथा स्थूलावस्था कार्य है । "आत्मा से आकाश हुआ" का तात्पर्य है कि
वह अपने सूक्ष्म रूप से स्वयं स्थूल हुआ । सारे भूत समुदाय आकाश से
उत्पन्न हुए "इस वाक्य से ज्ञात होता है कि-आकाश से ही सब का उदय
और उसी में सब लय होते हैं इसलिए आकाश ही कारण ब्रह्म निश्चित
होता है । इससे यह भी निश्चिन होता है कि-प्रसिद्ध आकाश ही ब्रह्म है"
यदि यह आनंद स्वरूप आकाश न होता "आकाश ही नामरूप को धारण
करने वाला है" इत्यादि निर्देशक वाक्य भी इसी तथ्य के उपपादक हैं ।
इससे सिद्ध होता है कि प्रसिद्ध आकाश ही ब्रह्म है ।