श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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भूतानि जायन्ते तद्ब्रह्म" इत्युक्ते कुत इमानि भूतानि जायन्त
इत्यादि विशेषापेक्षायां “सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव
समुत्पद्यन्ते” इत्यादिना विशेषप्रतीतेः जगज्जन्मादिकारणं आकाश
एवेति निश्चिते सति “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादिष्वपि
सदिशब्दासाधारणकारास्तमेव विशेषमाकाशमभिदधति । “आत्मा
वा इदमेक एवाग्र आसीत्” इत्यादिष्वात्मशब्दोऽपि तत्रैव वर्त्तते ।”
तस्यापि हि चेतनैकान्तत्वं न संभवति । यथा-“मृदात्मको घटः”
इति । आप्नोतीत्यात्मेति व्युत्पत्या सुतरामाकाशेऽप्यात्मशब्दो
वर्त्तते । अत एवमाकाश एव कारणं ब्रह्मेति निश्चिते सतीक्षणादय-
स्तदनुगुणांगौणावर्णनीयाः । यदि हि साधारणशब्दैरेव सदादिभिः
कारणमभ्यधायिष्यत, ईक्षणाद्यर्थानुरोधेन चेतनविशेष एव कारण-
मिति निरचेष्यत । आकाश शब्देन तु विशेष एव निश्चित इति
नार्थस्वाभाव्यान्निर्णेतव्यमस्ति ।
उक्त पक्ष पर शंका होती है कि-ब्रह्म तो जड और चेतन जीवों से
भिन्न, स्वेच्छा से सृष्टि करने वाला कहा जाता है, (तो वह आकाश कैसे
हो सकता है ?) (उत्तर) हाँ कहा तो गया है पर वह कथन ठीक नहीं
है। उस कथन पर यह शंका तो बनी ही रहती है कि-ये भूत किससे
उत्पन्न हुए ? उक्त शंका की पूर्ति ‘ये सब आकाश से ही हुए” इत्यादि
वाक्य से होती है और निश्चित होता है जगत् के जन्मादि का कारण
आकाश है । ऐसा निश्चित हो जाने पर “हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व सत्
ही था” इस वाक्य में कहे गए “सत्” शब्द का अर्थ भी आकाश ही
निश्चित होता है । तथा “यह सारा जगत् पहले आत्मा ही था” इस
वाक्य का “आत्मा” शब्द भी आकाश वाची ही सिद्ध होता है । आत्मा
शब्द एकमात्र चेतन तत्त्व का ही ज्ञापक हो सो बात भी नहीं है ।
“मृदात्मक घट” ऐसे अचेतन प्रयोग भी आत्मा के लिए होते हैं ।
“आप्नोति इति आत्मा” अर्थात् जो सर्वत्र व्याप्त है वह आत्मा है इति
व्युत्पत्ति के अनुसार भी आत्मा शब्द आकाश वाची हो सकता है । इस-
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