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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 696 में से

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का निर्देश किया गया है । बाद में ईक्षण विशेष, आनंद विशेष, और रूप
विशेष बोधक शब्दों द्वारा प्रधान और क्षेत्रज्ञ से विलक्षण ब्रह्म का प्रति-
पादन किया गया है । अब आकाश आदि विशेष शब्दों से निर्देश करके
जगत्कारणत्व और जगदैश्वर्यवाद में भी, प्रसिद्ध जडचेतन विलक्षण
ब्रह्म को ही आकाश शब्द से बतलाते हैं—
आकाशस्तल्लिङ्गात् १।१।२३।
इदमाम्नायते छांदोग्ये “अस्य लोकस्य का गतिरिति आकाश
इति होवाच सर्वाणि हवा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते,
आकाश प्रत्यस्त यंति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम्”
इति । तत्र संदेहः किं प्रसिद्धाकाश एवात्राकाशशब्देन अभिधीयते
उतोक्तलक्षणमेव ब्रह्म इति । किं प्राप्तम् ? प्रसिद्ध आकाश इति कुतः ?
शब्दैकसमधिगम्ये वस्तुनि य एवार्थो व्युत्पत्तिसिद्धशब्देन प्रतीयते
स एव ग्रहीतव्यः । अतः प्रसिद्ध आकाश एव चराचरभूतजातस्य
कृत्स्नस्य कारणम् अतस्तस्मादनतिरिक्तं ब्रह्म ।
छांदोग्योपनिषद में पाठ है कि-“इस लोक की गति क्या है ?
उसने कहा आकाश, समस्तभूत समुदाय आकाश से ही उत्पन्न हुआ है
और आकाश में ही विलीन हो जाता है, आकाश सभी भूतों से श्रेष्ठ
है, यह सभी का आश्रय है ।”
यहाँ संदेह होता है कि-प्रसिद्ध आकाश ही यहाँ आकाश शब्द से
उल्लेख्य है अथवा उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म का निर्देश है ? (पूर्वपक्ष)
प्रसिद्ध आकाश ही हो सकता है क्यों कि-एकमात्र शब्द गम्य विषय में,
शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार शब्द से जो अर्थ प्रतीत होता है उसे ही
मानना उचित होता है । इसलिए उक्त प्रसंग में आकाश ही चराचर
जगत् का कारण है, ब्रह्म भी वही है ।
नान्वीक्षापूर्वकं सृष्ट्यादिभिरचेतनाचेतनजीवाच्च व्यतिरिक्तं
ब्रह्मेत्युक्तम् । सत्यमुक्तम् अयुक्तं तु तत् । तथाहि “यतो वा इमानि
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