श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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उस प्रतीतिगत वस्तु की असत्यता ज्ञात हो जाती है, पर उस प्रतीति
बुद्धि का तो बाध होता नहीं, इसलिए उसे तो सत्य ही कहना होगा।
रेखायावर्णप्रतिपत्तावपि नासत्यात्सत्यबुद्धिः, रेखायास्सत्यत्वात्
ननु वर्णात्मनाप्रतिपन्नारेखा वर्णबुद्धिहेतुः, वर्णात्मतात्वसत्या ।
मैवम् वर्णात्मताया असत्याया उपायत्वायोगात्। असतो निरूपा-
ख्यस्य हि उपायत्वं न दृष्टमनुपपन्नं च । अथतस्या वर्णबुद्धे रुपाय-
त्वं एवंतर्हि असत्यात् सत्यबुद्धिर्नस्यात् बुद्धेः सत्यत्वादेव । उपायो
पेययोरेकत्वप्रसंगश्च उभयोर्वर्णबुद्धित्वाविशेषात् । रेखाया अविद्य
मानवर्णात्मनोपायत्त्वे चैकस्यामेव रेखायामविद्यमानसर्ववर्णात्मक
त्वस्य सुलभत्वादेकरेखादर्शनात्सर्ववर्णप्रतिपत्तिस्स्यात् ।
रेखाओं से जो वर्ण बनते हैं उनमें भी सत्यता की ही प्रतीति होती है
असत्यता से सत्य बुद्धि नहीं होती, क्योंकि रेखायें तो सत्य हैं हीं। रेखा
वर्ण का स्वरूप मानकर ही रेखा में वर्णबुद्धि होती है, वस्तुतः रेखा तो
वर्ण है नहीं ऐसा संशय भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि—यदि रेखा की
वर्णात्मकता को असत्य मान लेगें तो, वह वर्ण बोध की उपाय नहीं रह
जायगी असत् वस्तु की निरूपण शक्ति और उपायता कहीं भी देखी नहीं
जाती और न होती ही है। यदि रेखा में होने वाली वर्णबुद्धि को ही वर्ण
बोध का उपाय मान लें तो, बुद्धि तो सत्य ही है, फिर असत्य से सत्य
बुद्धि हो रही है, ऐसा नहीं कह सकते। साथ ही रेखा और वर्ण दोनों में
ही वर्णबुद्धिता मानने से, उपाय और उपेय दोनों एक हो जावेंगे। रेखा
यदि वस्तुतः वर्णात्मक न होकर केवल उपाय मात्र ही हैं तो, प्रत्येक रेखा
से, सारी वर्णमाला का सरलता से ज्ञान हो जाना चाहिए, तथा एक ही
रेखा को देखने से वर्णमाला की प्रतीति हो जाती चाहिए। सो तो होती
नहीं।
अर्थपिण्डविशेषे देवदत्तादिशब्द संकेतवत् चक्षुग्राह्यरेखा
विशेषे श्रोत्रग्राह्यवर्णविशेषोसंकेतवशाद् रेखाविशेष वर्णविशेष
बुद्धि हेतुरिति । हन्त तर्हि सत्यादेव सत्यप्रतिपत्तिः रेखायाः संकेत
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