श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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शंकाविषबुद्धिर्मरण हेतुभूता । वस्तुभूत एव जलादौ मुखादि प्रति-
भासो वस्तुभूत मुखगत विशेष निश्चय हेतुः । एषां संवेदनानां उत्प-
त्तिमत्वात् अर्थक्रियाकारित्वाच्च सत्यत्वमवसीयते । हस्त्यादी-
नां अभावेऽपिकथं तद्बुद्धयः सत्याभवंतीति चेत् नैतत् बुद्धीनां
सालम्बनत्वमात्र नियमात् ।
यह नहीं कह सकते किं—“स्वप्न में दृष्ट, हस्ति आदि ज्ञान, असत्य
होते हुए भी, शुभाशुभ वास्तविक फलदायी होते हैं, उसी प्रकार अविद्या
मूलक असत्य होते हुए भी, शास्त्र का ब्रह्मविषयक फल वास्तविक ही
होता है । “स्वाप्न ज्ञान असत्य नहीं होता, अपितु स्वप्न में देखे गए पदार्थ
ही मिथ्या होते हैं क्योंकि जागने पर वे दीखते नहीं ऐसा तो कोई नहीं
कह सकता कि, स्वप्न में मुझे प्रतीति नहीं हुई । स्वप्न में दीखता तो
निश्चय ही है, पर स्वप्नदृष्ट विषय नहीं होते यही बाधकता है । मायावी
(जादूगर) मंत्र और औषधि के प्रभाव से जो चमत्कार दिखलाता है, वह
प्रीति और भयोत्पादक होता है, वह ज्ञान भी सत्य है क्योंकि वह ज्ञान
भी अबाधित होता है । विषय और इन्द्रियादि जन्य रस्सी में होने वाली
सर्प प्रतीति भी भयोत्पादक होने के कारण सत्य ही है, उस रस्सी रूपी
सर्प से दंशित न होते हुए भी, दंशन का भय तो होता ही है, क्योंकि-
उसमें मरण के हेतु विष की शंका रहती है । जल दर्पण आदि में मुख
आदि का जो प्रतिबिम्ब दीखता है, वह मुखगत वास्तविकता का निर्णा-
यक होता है । इस प्रकार की प्रतीतियों में उत्पत्तिशीलता और कार्य
संपादन शक्ति होने से सत्यता निश्चित होती है । यदि कहो कि-“स्वप्न
दृष्ट हस्ति आदि जब रहते नहीं तो तद्विषयक बुद्धि ही कैसे सत्य हो
सकती है ?” बुद्धि को तो एक अवलम्बन चाहिए, वह तो वस्तु के प्रति-
भासित होने मात्र से उस पर आधारित हो जाती है ।
अर्थस्य प्रतिभासमानत्वमेव हि आलम्बनत्वेऽपेक्षितम्, प्रति
भासमानता च अस्त्येव दोषवशात् । सतु बाधितोऽसत्य इत्यवसी-
यते अबाधिता हि बुद्धिः सत्यैवेत्युक्तम् ।
हस्ति आदि विषय की प्रतीति होती तो है ही, क्योंकि वह आलम्बन
सापेक्ष होती है, इसलिए उसकी प्रतिभासमानता होती है । जागने पर
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