श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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स्य च सत्यसत्त्वात् । रेखागवयादपि सत्यगवयबुद्धिः सादृश्यनि
बंधना सादृश्यं च सत्यमेव ।
यदि कहो कि--पिंडविशेष मे जैसे देवदत्त आदि शब्द का संकेत किया
जाता है वैसे ही चक्षु ग्राह्य रेखा विशेष में श्रोत्र ग्राह्यवर्ण विशेष के संकेत
से, रेखा विशेष मे वर्ण विशेष की बुद्धि होती है । ठीक है, यह तो सत्य से
ही सत्य की प्रतीति हुई, क्योकि रेखा और संकेत दोनो ही सत्य है । रेखा
(चित्रित) गाय में भी, सत्य गाय की बुद्धि, सादृश्य के कारण होती है,
सादृश्य तो सत्य है ही ।
न चैकरूपस्य शब्दस्य नादविशेषेणार्थ भेदबुद्धि हेतुत्वेऽप्यसत्या
त्सत्यप्रतिपत्तिः नानानादाभिव्यक्तस्यैकस्यैव शब्दस्य तत्तन्नादाभि
व्यंग्यस्वरूपेणार्थविशेषैः सह संबंधग्रहणवशात् अर्थभेदबुद्धि उत्पत्ति
हेतुत्वात् । शब्दस्यैकरूपत्वमपि न साधीयः, गकारादेवोधकस्यैव
श्रोत्राग्राह्यत्वेन शब्दत्वात् । अतोऽसत्यात् शास्त्रात् सत्यब्रह्म
विषय प्रतिपत्तिर्दु रुपपादा ।
एक आकार के शब्द की, उच्चारण के भेद से विभिन्न अर्थगत भेद
बुद्धि होती है, इसलिए असत्य से सत्य बुद्धि होती हो सो भी नही है,
क्योंकि--एक ही शब्द अनेकों ध्वनियों के अनुसार अभिव्यक्त होकर उन
ध्वनियों में अभिव्यंजित होकर भिन्न-भिन्न अर्थो से संबंध, भिन्न-भिन्न
विषयों की प्रतीति कराता है । अर्थ बोधक ग आदि वर्ण जब श्रवणे-
न्द्रिय ग्राह्य होते हैं, तभी शब्द कहलाते हैं, इसलिए विभिन्न वर्णमय
शब्दों की एक रूपता भी युक्ति संगत नही है । उक्त दृष्टान्तों से सिद्ध
होता है कि--असत्य शास्त्र से सत्य स्वरूप ब्रह्म की सिद्धि करना
कठिन है ।
ननु न शास्त्रस्य गगनकुसुमवत् असत्यत्वम् । प्रागद्वैतज्ञानात्
सद्बुद्धिबोध्यत्वात् । उत्पन्ने तत्त्वज्ञाने हि असत्यत्वं शास्त्रस्य । न
तदा शास्त्रं निरस्तनिखिलभेदचिन्मात्रब्रह्मज्ञानोपायः । यदोपायः
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