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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

३५४ स्पन्दकारिका
आदि स्थूल अक्षर समूह ने पुरुष के वैभव को नष्ट किया है और उसको स्वभाव से च्युत
कर दिया है । १
१. शक्ति चक्र : शब्द का प्रयोग शब्दान्तर के साथ अनेक बार प्रयुक्त हुआ है ।
यथा—(१) 'तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ (का० क्र० १)
(२) शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कला विलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (स्पन्द का० ४५)
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसंदोह' में 'शक्ति चक्र' की व्याख्या करते हुए 'शक्ति'
को इस प्रकार परिभाषित किया है—'प्रकाशस्यैव भगवतः प्रकाशमानं विश्वम् अस्य
शक्तयः, तासां यत् चक्रं संयोजनादिवैचित्र्य-व्यवस्थितः समुदायः स एव विभवः स्फीतता
तस्य प्रभवः प्रभवति अस्मात् इति ॥'
अर्थात् प्रकाशस्वरूप शिव का जो प्रकाशमान विश्व है उसकी शक्तियाँ ही 'शक्ति
चक्र' में शक्ति कही गई है । २
२. 'शक्ति चक्र' का द्वितीय अर्थ—शक्तिचक्र = इन्द्रिय वर्ग । विभव = निज
निज विषय—अर्थात् प्रवृत्ति आदि ।
३. शक्ति चक्र का अन्य अर्थ—करणेश्वरी चक्र । करण शक्तिवर्ग । विभव =
विचित्र सृष्टि संहारादिकारित्व । प्रभव—उसका प्रभव (क्रमार्थविभासनकारित्व कृतमक्रम-
महाप्रकाशमय) ।
करण वर्ग की अपनी प्रवृत्त्यादि तथा करणेश्वरी चक्र का सृष्ट्यादिकारित्वं एवं
उसकी यह व्यापार-प्रवृत्ति । ३
४. शक्ति चक्र का अन्य अर्थ—मन्त्र वर्ग में मुद्रा समूह । विभव—उसका
विभव । अर्थात् सिद्धि, साधन एवं समर्थत्व । प्रभव = प्रभवोत्पन्न—उत्पत्ति-विश्रान्ति
स्थान ॥ यथा—श्लोक (२।१) (२।२) (तदाक्रम्य बलं मन्त्राः ॥ 'इत्यादि ... निरञ्जनाः'
में व्यक्त विचार) ।
त्रिविध = पर । अपर । परापर: ३ प्रकार की सिद्धियाँ । ४
५. शक्तिचक्रविभवेन = 'मन्त्रादिसामर्थ्यात्मना प्रभादीप्तिः यस्य साधकस्य
चित्तस्य, तत वाति गच्छति प्राप्नोति अधितिष्ठति, गन्धयति च विनाशयति स्वात्मनि
विश्रमयति यः तम् ।' = 'शक्तिचक्रविभवं' । ५
६. शक्तिचक्रविभव—दीक्षानुग्रहध्येय (ध्यातव्य देवतात्मना तादात्म्यम्) समाप-
त्यादिना सामर्थ्यसंपदा विभवो यस्य आचार्यस्य उदयः तस्य (प्रभवं) ॥ (दे०
अयमेवोदयस्तस्य .... (२।६) । ६
७. शक्तिचक्रविभवप्रभवं—'शक्तयो ब्राह्मयादिदेव्यो (कादिक्षात तत्तद्वाच-कात्मनः)
ब्रह्मादि कारणमाला च, तासां सम्बंधि चक्रं स्वभावशून्यपशुः प्रमातुः अद्वय
१. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' । २-६. स्पन्दसंदोह ।

तृतीय: निष्यन्द: ३५५
रूपोर्ध्वभूम्यतारोहणक्षमो भेदमयाधरसरणिसञ्चारचतुरश्च व्यूहः तस्य यो विभवः तथा
कार्यकारित्वं तस्य प्रभवं । (दे० 'शब्दराशि... ३।१३) ।१
'तन्मात्रोदय ... (३।१७) (३।१८) आदि ॥
इस प्रकार के शक्तिचक्र का जो 'विभव' है—अर्थात् 'स्वस्वभावपदापेक्षया
अधराधर्भूत्यागेन ऊर्ध्वोर्ध्वारोहणक्षमता ।। (दे० स्वमार्गस्था ज्ञाता ... (३।१६))२
८. 'शक्तिचक्रं'—खेचरी, गोचरी, दिक्करी, भूचरी आदि—बाह्य-आन्तरताभेद-
भिन्ननानायोगिनीगण, तदुपलक्षितवीरव्रातश्च तस्य यो विभवः अतीतानागत ज्ञानाणिमादि-
प्राप्ति स्वविषयाभोग समय पूर्णप्रथावाप्त्यानन्तक्षुद्रा सिद्धिलाभम् ऐश्वर्यं, 'प्रभवः' प्राति
पूरयति यः स शक्तिचक्रविभवप्रः स च असौ अभो भवति तेन तेन रूपेण इति कृत्वा,
तं ॥ (दे० यथेच्छा.... (३।१) कुतः सा .... (३।८) आदि ।३
शक्तिचक्र—'वामेश्वर्याधिष्ठितानि खेचरी-गोचरी-दिक्करी-भूचरी चक्राणि-
आन्तराणि, बाह्यानि च ।'
वामेश्वरी शक्ति से प्रसारित आन्तर शक्तियाँ—अपर, परापर, पर, अघोर-घोर-
घोरतर, खेचरी-गोचरी-भूचरी-दिक्करी रूप चक्र एवं तथाविध वीरव्रत ।
शक्तिचक्र विभव—'आगमसंप्रदायप्रसिद्धनानादेवतापरमार्थस्य रागद्वेषविकल्पादि
प्रत्ययग्रामस्य, तथा देहाश्रित तत्तद्देवता-परमार्थनानाधात्वादिगणस्य, यो विभवः,
तत्तदुपनिषत्सिद्धः प्रभावविशेषः, मायामूढान् प्रतिबन्धहेतुत्वं च तस्य उभयस्यापि 'प्रभव' ।
(दे० गुणादि.... (१।२) 'सेयं क्रियात्मिका शक्ति .... (३।१६)) ।४
बन्धन एवं मोक्ष दोनों का साधन एक ही है—'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य
पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका (४८) ।
'येन येन निबध्यन्ते जन्तवो रौद्रकर्मणा ।
सोपायेन तु ते नैव मुच्यन्ते भवबन्धनात् ॥'
—मुक्ति किसी नूतन वस्तु की उपलब्धि नहीं है प्रत्युत भूली हुई वस्तु को पुनः
याद कर लेना एवं उसे जान लेना ही मुक्ति है एवं न जानना बन्धन का नरक मार्ग है—
'कुलसारमजानन्तो ह्यद्वये निपतन्ति ये ।
स्वचित्तोत्थविकल्पान्धा निरये निपतन्ति ते ॥'
शक्तिचक्र = स्वतन्त्र एवं अद्वय निज महाप्रकाशानुप्रवेशकारी स्वमरीचि निचय ।
विभव = स्वामोदजृंभात्मक विभव ॥५
शक्तिचक्रविभव = परसंविद्देवतास्फार । विभव = माहात्म्य ।६
प्रभव = शक्ति चक्र के विभव (माहात्म्य) से उत्पन्न ॥
शक्तिचक्र = रश्मिपुञ्ज । विभव = अन्तर्मुख विकास । प्रभव = उदय या
अभिव्यक्ति ॥७
१-५. स्पन्दसंदोह। ६-७. स्पन्दनिर्णय।

३५६ स्पन्दकारिका
सारांश— 'शक्तिचक्र' शक्तियों का समूह । (शक्तियाँ = वामेश्वरी । खेचरी ।
दिक्चरी आदि) इन्द्रियों का समूह । मन्त्रों का चक्र । ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि शक्तियों का
समुदाय (Wheel of powers) ।
रामकण्ठाचार्य की व्याख्या— पशु = 'पराधीनसर्ववृत्तित्वेन अनवभासितात्मा
पशुः । स = वह प्रतिपादयितव्य आत्मा रूपी ईश्वर जो कि प्रत्यभिज्ञा के अभाव में
'पशु' बन जाता है । स्मृतः = संसाररूपी क्रीड़ा के अनादि होने से (जो 'पशुपति'
अनादि काल से वर्तमान काल तक) 'पशु' के रूप में स्मरण किया जाता रहा है । कैसा
होकर स्मरण किया जाता है? 'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य कलाविलुप्तविभवो
भोग्यतां गतः सन्' ।
शक्ति = पारमेश्वरी शक्ति । वाक् के रूप में प्रसृत आदि शान्त वर्ण-
समुदायात्मक शक्ति ।¹ अम्बा—ज्येष्ठा-रौद्री-वामा-आदि का शक्तिचक्र ।² 'शक्तिचक्र
संधाने विश्वसंहारः । (शिवसूत्र ६) में भी 'शक्तिचक्र' शब्द का प्रयोग आया है ।
पशुत्व और पशु का स्वरूप— 'पशु' के निम्न लक्षण हैं— (१) शब्दराशि से
समुत्थित (अकारादि सकारान्त शब्द-समूह से आविर्भूत) ब्राह्मी आदि शब्दाधिष्ठात्रियों
(शाब्द शक्तियों) के वशीभूत और उनका क्रीत अनुचर ।
(२) अकारादिक्षकारान्त कला समूह के द्वारा 'स्वातन्त्र्यशक्ति' रूप वैभव से
हीन—पति प्रमाता ही 'पशु' कहलाता है ।
शब्दराशि—अकारादि क्षकारान्त वर्ण समूह । ('मातृका') ।
शक्तिवर्ग—कादिवर्गात्मक ब्राह्मी आदि शक्तियों का समूह । ब्राह्मी आदि शक्तियों
के साथ सम्बद्ध कलाओं ने (ककारादि क्षकारान्त 'शब्दराशि' ने) 'पति' के स्वातन्त्र्य
शक्ति रूप वैभव को नष्ट कर दिया है और उसे उसके स्वस्वभाव से च्युत कर दिया है ।
भोग्यताम् = शक्ति वर्ग की अधिष्ठात्री देवियों का भोग बना हुआ होना । भोक्ता
तो ब्राह्मी आदि (क आदि आठ वर्गों की अधिष्ठात्री देवियाँ) अधिष्ठात्री शक्तियाँ हैं और
भोग्य हैं पशु । ये शक्तियाँ निम्नांकित हैं—
विमर्शशक्ति के चार रूप = पीठेश्वरी
┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┐
माहेशी ब्राह्मी कौमारी वैष्णवी ऐन्द्री याम्या चामुण्डा योगेशी
वर्ण समाम्नाय के अष्टवर्ग—(नव वर्ग)—
┌───┬───┬───┬───┬───┬───┬───┬───┐
अवर्ग कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग क्षवर्ग
शब्दराशि = वर्ण समुदाय = वर्णमाला = 'मातृका'
१. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (सूत्र ४) ।

तृतीयः निष्यन्दः ३५७
'शब्दराशि' के क्रम
'मालिनी क्रम' ('मालिनीविजयोत्तर तन्त्र) 'मातृका क्रम'
(न से क तक) (अ से क्ष पर्यन्त)
'शब्दराशि' का आविर्भाव केन्द्र
प्रकाशरूप शिव विमर्शरूपा शक्ति
(सा म र स्य)
(शिवशक्ति का सामरस्य) = सामरस्य = विश्व की आत्मभूत एवं आधारभूता सत्ता
सामरस्य
('अहं'-विमर्श) 'सामरस्य' = महामन्त्र रूप अहं विमर्श
'अ' (अनुत्तर तत्त्व) 'ह्'
शिवतत्त्व शक्ति तत्त्व
पराहंता (अहन्ता)
──> (इसी भेद शून्य 'अहं' में मयूराण्डरसवत् समस्त 'शब्दराशि' = 'परावाक्'
रूप में अन्तर्निहित हैं ।) 'अहंरूपा' विमर्शशक्ति में स्थूल वाच्यवाचकभावमय विश्व का
अवभासन करने की ओर उन्मुख दशा का श्री गणेश ──> (अहंरूपा विमर्शशक्ति) ──>
'इच्छा-शक्ति' के रूप में रूपान्तरण ──> ज्ञानशक्ति ──> क्रियाशक्ति (ज्ञान + क्रिया-
शक्ति = 'माया') ──> (बहिर्मुखी प्रसार के रूप में प्रसृत) ──> 'मातृका' (का विभाजन) ।
मातृका
२ प्रकार ९ प्रकार ५० प्रकार
(बीज + योनि) (१६ स्वर ३४ व्यंजन) प्रत्येक
(क) अ से अः = स्वर = 'बीज' = शिवभाव अक्षर को शक्ति के विभिन्न एवं
(ख) क से क्ष = व्यञ्जन = 'योनि' = शक्तिभाव । पृथक्-पृथक् रूप मानकर ५०
प्रकार माने गए हैं ।
अवर्ग कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग क्षवर्ग
वर्ण समाम्नाय के अष्टवर्ग हैं या कि नववर्ग?
वर्ग तो आठ ही हैं क्योंकि 'क्ष' (क + श का मिश्रित रूप) स्वतन्त्र शब्द नहीं है ।
यह 'क' एवं 'श' का संयुक्त रूप है । फिर इसे स्वतन्त्र वर्ग का महत्त्व क्यों दिया
गया? इसे पृथक् वर्ग क्यों माना गया?

३५८ स्पन्दकारिका
(१) अनुत्तर वाचक = ककार
(२) विसर्ग वाचक = शकार
क + श का संयुक्त रूप है—'कूटबीज'।
क्ष का महत्व—'कूटबीज' (क+श)=मातृका का प्रत्येक वर्ण शिवभाग एवं शक्ति
भाग का संघट्टरूप है। इसीकारण 'क्ष' को वर्णमाला के अन्त में स्थान दिया गया है।
शक्तिवर्ग के भेदत्रय (मालिनीविजयोत्तर तन्त्र)
घोरतरा (अपरा) | घोरा (परापरा) | 'मालिनी विजय' | अघोरा (परा)
(तामसिक) | (राजसिक) | (मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्वं | (सात्विक) (सात्विक
(तामसिक प्रकृति | (राजसिक प्रकृति | वज्जनयन्ति याः। | प्रकृति वालों के लिए
वालों के लिए यह | वालों के लिए यह | मुक्तिमार्ग निरोधिन्या | यह शक्तिवर्ग
शक्तिवर्ग अत्यन्त | शक्तिवर्ग भी | स्ताः स्युर्घोरा परापराः। | कल्याणकारी है।)
भयानक है।) | भयोत्पादक है।) | विषयेष्वेव संलीना- | योगियों को शिवभाव
| | नधोऽधः पातयन्त्यणून। | तक पहुँचाने वाली
| | रुद्राणून या समालिंग्य | शक्तियाँ ।।
| | घोरतर्योऽपरा |
| | स्मृताः ॥') |
कला समूह—कला विलुप्तविभवो।
प्रश्न—कला समूह का आरंभ कवर्ग से ही क्यों किया जाता है? इसका आरंभ
अवर्ग से क्यों नहीं किया जाता?
जब स्वर और व्यञ्जन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में रहते हैं तभी विकल्प-
परम्पराओं में क्षोभ प्रारंभ होता है अन्यथा केवल स्वर या केवल व्यञ्जन पृथक्-पृथक्
किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते। इन दोनों के पारस्परिक संमिश्रण को 'बीजयोनि
संक्षोभ' के नाम से अभिहित किया जाता है।
उत्तर मालिनी क्रम—न, ऋ, ॠ, लृ, ॡ, च ध, ई, ण, उ ऊ, ब, क, ख, ग,
घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, ड, ढ, ठ, झ, ज, र, द, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष,
क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, क। (आध्या० रहस्य साधना में प्रयुक्त)।
क्रमद्वय (१) पूर्वमालिनी क्रम, मातृका क्रम, सिद्धाक्रम।
(२) उत्तर मालिनी क्रम—'न से क ॥'
(क) 'स्वच्छन्द तन्त्र' को मान्य—'पूर्वमालिनी क्रम' अकारादि क्षकारान्त क्रम
(ख) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' को मान्य—'उत्तर मालिनी क्रम'
'शब्द' एक जड़ ध्वनि नहीं प्रत्युत प्रत्येक शब्द स्पन्दमयी चेतन शक्ति है।
प्रत्येक जीव तभी तक शक्तियों का दास है जब तक कि उसे अपने भोक्ताभाव का

तृतीयः निष्यन्दः ३५९
परिज्ञान एवं अनुभव न हो । ‘मालिनीविजयोत्तरतन्त्र’ के ‘उत्तरमालिनी क्रम’ के
अनुसार—
वर्ण एवं तत्त्व—
(१) ‘क’ = अन्तिम वर्ण ॥ = पृथ्‍वी तत्त्व ॥
(२) द से झ = २३ वर्ण = जल से पदार्थतक २३ तत्त्व ॥
(३) च से अ = १४ वर्ण = पुरुष से माया पर्यन्त तत्त्व ।
(४) इ से घ = ३ वर्ण = शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव ॥
(५) घ से न = १६ वर्ण = शिव तत्त्व ॥
शक्तिपात या परमात्मानुग्रह प्राप्त योगियों को ये शाब्दी शक्तियाँ शब्दराशि में
निहित शाक्तबल का अनुभव कराकर शिव भाव पर भी पहुँचाती हैं । वाणी ही मनुष्य का
विनाश भी करती है और विकास भी-उन्नति भी अधःपतन भी ।
भट्टकल्लट को ‘मालिनी क्रम’ स्वीकार्य नहीं था । उन्होंने मातृका क्रम ही
स्वीकार किया ॥
भट्टकल्लट की व्याख्या—(‘स्पन्दसर्वस्व’)—
शब्दराशि = अकारादिक्षकारान्तवर्णमाला । समुत्थस्य = तत्समुद्भूतस्य शक्ति-
वर्गस्य = कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि शक्ति समूह का ।
भोग्यताम् = ‘भोग्यतां गतः पुरुषो’ ॥ कलाविलुप्तविभवो = ब्राह्म्यादीनां
कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्त विभवः स्वस्वभावात् प्रच्यावितः पशुरुच्यते ॥
कला = ककारादि हकारान्त समस्त स्वर-व्यञ्जन समुदाय = ‘कला समूह’ ॥
कलासमूह ने शिव की स्वात्मशक्ति (स्वातन्त्र्य शक्ति) को छीनकर जीव को दरिद्र
बना दिया है ।
शब्दराशि = मातृका (अकारादिक्षकारान्त वर्णसमाम्नाय) ॥ ‘मातृकाशक्ति’ अशेष
भेदयुक्त वाच्यवाचकस्वरूप स्थूल शब्द समूह को अपने सुक्षि में अभेदात्मना (स्पन्दनमय
विमर्श मात्र के रूप में) धारण किए हुए ‘पराशक्ति’ के रूप में अवस्थित है । यह
‘पराशक्ति’ (परावाक्) पूर्णाहन्तास्वरूपा ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ ही है—
‘स्वातन्त्र्यशक्ति रे वास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा ॥ (स्पन्दनिर्णयः ३.१३)
शब्दराशि क्या है? ‘साहि भगवती अशेष-वाच्यवाचकात्मक जगद्भेद चमत्का-
रात्मक शब्दराशि विमर्श परमार्था (स्वच्छन्द तन्त्र ११.१९९) ।
शब्दराशि ही ‘मातृका’ के नाम से भी अभिहित की जाती है क्योंकि ‘अज्ञाता माता
मातृका विश्वजननी’ (शिव सूत्रविमर्शिनी १.४) यह अज्ञाता है और विश्वमात्रा—जगत-
प्रसविनी है । पराशक्ति (परावाक् के रूप में व्यक्त होकर एवं अपना प्रसार करती हुई) अ
से क्ष पर्यन्त समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म वर्ण समूह का प्रसार करके अनन्त वाच्यों एवं
अनन्त वाचकों वाले विश्व को अवभासित करती हुई स्थित है । ‘विमर्श शक्ति’ ही अपने

३६० स्पन्दकारिका
बाह्योन्मुखी प्रसार—बहिर्मुखी अभिव्यक्ति के माध्यम से शब्दराशि के रूप में रूपान्तरित
हो जाती है।
तान्त्रिक शैवदर्शन की मान्यता है कि 'पतिप्रमाता' की स्वात्मगता स्वाभिन्ना,
स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति (स्वतन्त्र संवित् शक्ति) भेदात्मिका बहिर्विमर्शावस्था में
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' के द्वारा उच्चारित वर्णमाला के रूप में प्रसरण करती
है। यही वर्णमाला जो कि शक्ति का केन्द्र है एवं शक्ति का प्रतीक है और अपने ताने-
बाने में पतिप्रमाता को उलझाकर अस्वतन्त्र पशुप्रमाता बना देती है। समस्त वाग्व्यवहार
का आधार यही वर्णमालात्मिका वाक्शक्ति है। 'वर्ण' शक्तिरूपात्मक है अतः वे क्षोभ
एवं स्पन्दन (हलचल) भी आविर्भूत करते हैं। इन्हीं के द्वारा अनन्त विकल्प-श्रृंखलाओं
का आविर्भाव होता है और प्राणी माया बन्धन, अज्ञान एवं अशान्ति के चक्रव्यूह में फँस
जाता है।
अ से क्ष पर्यन्त शब्दराशि का प्रसार = चित् शक्ति का बहिर्मुखी प्रसार। इस
शब्द राशि का ८ वर्गों में विभाजन किया गया है। शक्ति भी ब्राह्मी आदि ८ प्रकार के
विकल्पस्वरूपात्मक शक्ति-कुटुम्ब का रूप धारण करके प्रत्येक वर्ग की एक-एक
अधिष्ठात्री बनकर स्थित हो जाती है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का कार्य यह है कि वे
चिद्रूपा आत्मसत्ता को चारों ओर से घेरकर उसे ढक लेती है। इन ८ शक्तियों के
परिवार को 'मातृका' कहा गया है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का अपना यह परिवार
अपने को जन्म देने वाली चित् शक्ति को इस प्रकार ढक लेता है कि जीवों को चित्
शक्ति की झलक तक नहीं मिल पाती।
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (२.१.१) में कहा गया है कि ब्राह्मी आदि शक्तियाँ
माताएँ कहीं गई है और उनका अपना परिवार है और परिवार के अनेक सदस्य है—
'एतदेव च ब्राह्म्यादि मातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि
चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवार वाच्येव न
जननीवाचकः ॥'
परि तो वारणात् परिवार एव—चारों ओर से रोकने के कारण इस समुदाय को
'परिवार' कहा गया है। यह शाब्दी शक्तियों का 'परिवार' चित् शक्ति को जीवों के समक्ष
प्रकट होने से रोकता है अतः इसे 'परिवार' कहा गया है। 'अहं' शब्द में 'अ' तो
अनुत्तर शिवतत्त्व है और 'ह' शक्तितत्त्व है। इनकी प्रत्याहारावस्था ही 'अहंता' है। इसी
अहंता के गर्भ में समस्त वर्ण समुदाय ('शब्दराशि') गर्भीकृत है—
'अतएव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एत-
दात्मकमेव विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहं विमर्शस्य तत्वम् ॥
(शिवसूत्रविमर्शिनी: २.७)
मालिनीविजय (३.९.१०) में इस शब्दराशि के २, ९ एवं ५० भेद किए गए
हैं— 'तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पंचाशद्धा च मालिनी ॥

तृतीयः निष्यन्दः ३६१
इस समस्त वर्ण—समुदाय को 'बीज' एवं 'योनि' में भी विभाजित किया गया
है। (क) अ से अ = बीज (स्वर समूह) (ख) क से क्ष = योनि (व्यञ्जन समूह)—
बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा बीजं स्वरा मताः ।
कादिभिश्च स्मृता योनिः ..... ।। (मा० वि० ३.१०.११)
बीज—शिवभाव। योनि—शक्तिभाग—
'म बीजत्र शिवः शक्तियोंनिरित्यभिधीयते ।।' (३.१२)
नवधावर्ग भेदतः कहकर ८ के स्थान पर शब्दराशि के ९ वर्ग भी बताए गए हैं।
सामान्यतः वर्ग ८ ही है—'तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि 'चाष्टकम्' । 'क्ष' का रहस्य यह
है कि इसमें जो 'क' एवं 'श' वर्ण हैं उनमें 'क' शिव का वाचक है और 'स' शक्ति का
वाचक है । 'क' एवं 'स' का सम्मिलित रूप 'शिवशक्तियामल' (प्रकाश विमर्श का
संघट्ट) सूचित करता है और यह यामल, संघट्टण 'सामरस्य' ही सृष्टि, अस्तित्व एवं
विश्व की आत्मभूत सत्ता है—यह 'क्ष' कूटबीज है—
तदियत्पर्यन्त यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार सकार प्रत्याहारेण अनुत्तरविसर्ग
संघट्टसारेण कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते ।। (शिवसूत्र वि० २.७)। शब्दराशि की ये अधि-
ष्ठात्री शक्तियाँ 'पीठेश्वरी' कहलाती है और प्राणियों को मायिक प्रपञ्च में हठपूर्वक
नचाती रहती है—
'करण्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः ।
पीठेश्वर्यो महाघोरा नर्तयन्ति मुहुर्मुहुः ।।'
कला—'कलाविलुप्तविभवो' में 'कला' क्या है? 'जब सर्वकर्तृत्व शक्ति संकुचित
होकर स्वल्पकर्तृत्व शक्ति बनकर आत्मा को परिमित कर देती है तब उसे 'कला' कहा
जाता है'—
'सर्वकर्तृताशक्तिः संकुचिता कतिपार्थमात्र परा ।
किंचित्कर्तारममुं कलयन्ती कीर्त्यते कला नाम ।।'
'षट्त्रिंशत्तत्त्वसन्दोह' —क्षेमराज
शब्द राशि के ९ वर्गों का विवरण—
| सं० | वर्ग | वर्ण | शक्ति |
| १ | अवर्ग | अ से अः | अमा |
| २ | कवर्ग | क से ङ | कामा |
| ३ | चवर्ग | च से ञ | चार्वङ्गी |
| ४ | टवर्ग | ट से ण | टङ्कधारिणी |
| ५ | तवर्ग | त से न | तारा |
| ६ | पवर्ग | प से म | पार्वती |
| ७ | यवर्ग | य, र, ल, व | यक्षिणी |
| ८ | शवर्ग | श, ष, स, ह | शारिका |
| ९ | क्षवर्ग | क्ष | कूटबीज |

३६२ स्पन्दकारिका
'शिवसूत्र' (३।१९) में शाब्दी-प्रभुत्व ।
'शिवसूत्र' (३।१९) के 'कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः' (३।१९) में बताया गया है कि
शब्द-साहचर्य या शब्दों की दासता प्राणियों को बन्धन में डाल देती है । आचार्य
क्षेमराज इसी तथ्य को इस प्रकार कहते हैं—
'पारमेश्वरी परावाक् प्रसरन्ती, इच्छा-ज्ञान-क्रियारूपताश्रित्वा, बीजयोनिवर्ग
वर्गादिरूपा शिवशक्तिमाहेश्वर्यादि वाचक आदि क्षान्तरूपां मातृकात्मतां श्रित्वा, सर्व-
प्रमातृषु अविकल्प-सविकल्पक तत्तत्संवेदनदशासु, अन्तःपरामर्शात्मना स्थूलसूक्ष्म-
शब्दानुवेधं विदधाना, वर्गादिदेवताधिष्ठानादिद्वारेण स्मय-हर्ष-भय-राग-द्वेषादि प्रपञ्चं
प्रपञ्चयन्ती, असंकुचितस्वतन्त्रचिद्धनस्वरूपमावृण्वाना संकुचितपरतन्त्रदेहादिमयत्वमा-
पादयति ॥'१
यही बात 'श्रीतिमिरोद्घाट' में भी कहा गया है—
'करन्ध्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः ।
पीठेश्वर्यो महाघोरा मोहयन्त्यो मुहुर्मुहुः ।।'
'ज्ञानाधिष्ठानं मातृका' (१-४) की व्याख्या में भी शब्दराशि की अधिष्ठात्री
देवियों को बन्धन का कारण कहा गया है—
'आदिक्षान्तरूपा अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी तत्तत्संकुचितवेद्याभासा-
त्मनो ज्ञानस्य 'अपूर्णोऽस्मि' कृशः स्थूलो वास्मि, अग्निष्टोमयाज्यास्मि, इत्यादि तत्तद-
विकल्पकसविकल्पकावभासपरामर्शमयस्य तत्तद्वाचकशब्दानुवेद्यद्वारेण शोक-स्मय-हर्ष-
रागादि-रूपता-मादधाना 'पीठेश्वर्यो महाघोरा मोहयन्ति मुहुर्मुहुः ।'२
'श्रीतिमिरोद्घाट' में भी कहा गया है—वर्ग कलाद्यधिष्ठातृ ब्राह्म्यादि शक्ति श्रेणी
शोभिनी श्रीसर्ववीराद्यागमप्रसिद्धलिपिक्रम संनिवेशोत्थापिका अम्बा-ज्येष्ठा-रौद्री-वामाख्य-
शक्तिचक्रचुम्बिता शक्तिरधिष्ठात्री, तदधिष्ठानादेव हि अन्तरभेदानुसंधिवन्ध्यत्वात् क्षणमपि
अलब्धविश्रान्तीनि बहिर्मुखान्येव ज्ञानानि इति युक्तैव एषां बन्धकत्वोक्तिः—
'शब्दराशि समुत्थस्य ........... ।
'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः ।।'३
विकल्पात्मक ज्ञान परामृतरस एवं स्वातन्त्र्य दोनों से वंचित होना—
परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ।
तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥ ४६ ॥
विकल्पात्मक ज्ञानों का उदित हो जाना ही उसका (जीव का) परामृतरस (शिव-
शक्ति-सामरस्य) से प्रच्युत हो जाना है । इसी के कारण वह अस्वतन्त्रता पाता है
(अस्वतन्त्र हो जाता है) वह प्रत्यय तन्मात्रगोचर (रूपाद्यभिलाषात्मक) है ॥ ४६ ॥
१-३. शिवसूत्रविमर्शिनी ।

तृतीयः निष्यन्दः ३६३

  • सरोजिनी *
    'प्रत्ययोद्भव', विकल्प-ज्ञान 'शिव' से उसके 'स्वातन्त्र्य' एवं 'परामृतरस' दोनों
    को छीन लेते हैं । विकल्पों की महासमष्टि ही बन्धनरूप जगत् है और निर्विकल्प
    शाक्तभूमि में (स्पन्द तत्त्व) में प्रवेश ही मुक्ति है ।
    तस्य = उसका । पशु का । यः प्रत्ययानां = लौकिक शास्त्रीय विकल्पों का तथा
    तदधिवासित भिन्नार्थज्ञानों के विकल्पों का । प्रत्ययोद्भव = विकल्प ज्ञान का उदय ।
    उद्भवः = विनाशान्त्रात उत्पाद ।
    परस्यामृतरसस्य = चिद्धन आनन्द के प्रसरण का ।
    अपाय = निमज्जन ॥ चिद्भूमि = The state of supreme concious-
    ness प्रत्ययोद्भव = ज्ञानोत्पत्ति (Origination of cognition) प्रत्यभिज्ञाविर्भाव ।
    परामृतरस = स्वस्वरूप (भट्टकल्लट) ।
    प्रत्ययोद्भव—स्वरूपविकल्पहीन स्वरूप में—प्रमेय पदार्थों से सम्बद्ध विकल्पा-
    त्मक संवेदनों या ज्ञानों का आविर्भाव होना ही प्रत्यय का उद्भव है । प्रत्यय—विकल्प
    ज्ञान, विचार, ज्ञान ।
    अब ग्रन्थकार यह विवेचना करता है कि बन्धनग्रस्त जीव किस प्रकार ऐसा बना
    दिया गया एवं वह अपनी प्रत्यभिज्ञाशक्ति (Cognitive power) के सीमित हो जाने से
    कष्टों में कैसे पड़ गया?
    चिद्भूमि परामृशित न होने के कारण अविद्यमान प्रतीत होती है यद्यपि जब अकेला
    पदार्थ (Individual object) प्रत्यभिज्ञात (Cognised) किया जाता है तब भी
    उसकी सत्ता बनी रहती है । इस सांसारिक ज्ञान के उद्भव के कारण प्राणी बन्धनग्रस्त
    होकर स्वातन्त्र्य से शून्य एवं बद्ध (Feltered soul) होकर जीवन यापित करता है ।
    शिवसूत्र में 'ज्ञानं बन्धः' यही प्रतिपादित करता है ।
    मदालसा ने अपने पुत्रों को यही उपदेश दिया था—
    तातेति किंचित्तनयेति किंचित्, अम्बेति किंचिद्दयितेति किंचित् ।
    ममेति किंचिन्न ममेति किंचित्, भौते संघे बहुधा मा लपेथाः ।।'
    (मा० पु० २५।१५) भौतिकवाद में अधिक संसक्त नहीं होना चाहिए । पिता,
    पुत्र, माता, प्रिय, मेरे, मेरे नहीं—के भौतिक (सांसारिक) सम्बन्धों के सम्पर्क में संलग्न
    नहीं रहना चाहिए ।
    ज्ञान के विभिन्न पदार्थों के क्षेत्र में, तीव्र एवं मन्द प्रक्रिया द्वारा प्रत्ययों का
    आविर्भाव हुआ करता है ।
    (१) जब भेदात्मिका दृष्टि बनी रहती है तभी तक जीव 'बद्ध' बना रहता है ।
    (२) जैसे ही 'सब कुछ आत्मामय है'—'सब कुछ' अपने ही स्वरूप की बाह्य
    अभिव्यक्ति है—'सब' मैं ही है—इसका ज्ञान हो जाने पर जीव मुक्त हो जाता है—

३६४ स्पन्दकारिका
(क) यावदियं भिन्नवेद्यप्रथा तावद्बद्ध इति ।
(ख) यदा तु सर्वमात्ममयमेवाविचलप्रतिपत्त्या प्रतिपद्यते तदा जीवन्मुक्त इति'—
इसीलिए कहा गया है—
'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥'
'तस्माच्छब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः ॥'
जब तक कि समस्त पदार्थों में भिन्नता की दृष्टि बनी रहती है—अभेदात्मकता का
प्रत्यय आविर्भूत नहीं हो पाता, जब तक जीव बन्धनग्रस्त बना रहता है, जब समस्त
पदार्थों की समष्टि (पूर्वोक्त विधि से) अपने से अभिन्न (Identical with ourself)
प्रतीत होने लगती है तब जीव जीवन्मुक्त हो जाता है ।¹
आचार्य उत्पलदेव की 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा गया है कि—वह पशु जब कान,
आँख आदि इन्द्रियों के द्वारा विषयों का दर्शन करता है और उसके अन्तःकरण में
स्मरणादि ज्ञान की उत्पत्ति होती है' वही परामृत-रस से अर्थात् अपने स्वरूपोदय से
च्युति है, क्योंकि ये विषय-प्रत्यय पुरुष को परतन्त्र और परिच्छिन्न सा बना देते हैं । सच
पूछिये तो ये विषय और स्मरण उसके व्यक्तिगत ही हैं अर्थात् उसी की अभिलाषा
अन्तःकरण की वृत्ति उन-उन रूपों में प्रकट हो रही है ।²
आचार्य भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या करते हुए
कहते हैं—'परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः, तस्य यः प्रत्ययोद्भवः विषयदर्शने
स्मरणोदयो यतः, तेन पुरुषोऽस्वतन्त्रताम् असर्वगत्वं च प्राप्नोति, स च प्रत्ययः, तन्मात्र
गोचरो रूपाद्यभिलाषात्मकः ॥ ४६ ॥'³
विकल्पशून्य (निर्विकल्प) स्वरूप में ज्ञेयविषयक सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों का
उदय होना—'प्रत्ययोद्भव' कहलाता है ।
शक्ति का बाह्योन्मुख प्रसार होते ही—शक्ति की बाह्य प्रसारोन्मुखता → शक्ति
की प्रत्ययोद्भवावाकार परिणति 'प्रत्ययोद्भव' का स्वस्वरूप विकल्प परम्परा है ।
'स्वातन्त्र्यशक्ति' का माया शक्ति में रूपान्तरण → शिव में अपनी स्तन्त्रता एवं
पूर्णता के सम्बन्ध में सन्देहाविर्भाव ।
'स्वतन्त्रता' की (मायाशक्ति द्वारा) का संकुचन = अस्वतन्त्रता → (१) स्वतन्त्र
ज्ञातृत्व की हानि (२) स्वतन्त्र कर्तृत्व का अबोध → आत्मस्वरूप की विस्मृति →
आत्मा से पृथक् अनात्म पदार्थों में अहंबुद्धि → देहाभिमान → अनात्मभूत पदार्थों में
अहन्ता = 'प्रत्ययोद्भव' = स्वातन्त्र्य हानि = 'आणवमल' । प्रत्ययोद्भव—'शिव
(आत्मा) का अवरोहण क्रमारंभ—चेतन ही जड़ बन जाता है । चेतन परावाक् स्थूल
१. क्षेमराज : 'स्पन्दनिर्णय' । २. उत्पलदेवः 'स्पन्दप्रदीपिका' ।
३. भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।

वैखरी वाक बन जाती है ३६ तत्त्वों का बहिर्मुखी अवभासन प्रारंभ । यह समस्त व्यापार
= 'परामृतरसापाय' है । परामृत = शिव । रस = शक्ति ॥
मायाशक्ति के उल्लसाभाव के स्तर के (१) सदाशिव (२) ईश्वर (३) शुद्ध-
विद्या—'परामृत' कहे जा सकते हैं प्रत्ययोद्भव—माया । कला । विद्या । राग । नियति ।
काल = (षटकंचुक) ॥
पशु = षट्कंचुकपाशपाशित जीव ।
प्रत्ययोद्भव—तन्मात्रपंचक
शाक्त प्रसरण की क्रीड़ा—शिवभाव से जड़भाव पर्यन्तः ३६ तत्त्वों तक ॥
व्यतिरिक्त साधन-सामग्री की अपेक्षा रखने वाला एवं उन सामग्रियों द्वारा अपनी
समस्त इच्छाओं (समीहितार्थों) को पूरा करने वाला व्यक्ति वह भाव प्राप्त करता है ।
जागर-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओं से उपमेय—'सकल' 'विज्ञानाकल' एवं 'प्रलयकेवली'
नामक योगित्रय सहजादिक मलत्रय से आवृत होकर 'पशु' बन जाता है—
('जागर-स्वप्न-सुषुप्त्यावस्थोपमेय सकल-विज्ञानाकल-प्रलयकेवलाख्य भेदत्रय
योगी सहजादिमलत्रयावृतः पशुर्भवति इत्यर्थः'—) क्योंकि उसका प्रत्ययोद्भव ही अमृत-
रसापाय है—'परामृतरसापायः ।।'
परमाम्ृतरसापायः—'परम्' = अनुत्तर । अमृत = अविनाशी अद्वय, चिन्मय,
शिवस्वरूप । रस—उसका रस ॥ रसः = तथाप्रत्यवमर्शात्मक आस्वाद । अपाय =
उससे होने वाला अपाय (पृथग्भाव) अन्यथा वृत्ति—अर्थात् 'इदम्' इत्यादिविकल्प-
रूपात्मक ॥
तस्य = उस पशु का ('स्पन्दप्रदीपिका') प्रत्ययोद्भवः = 'श्रोत्रादिद्वारेण विषय-
दर्शने स्मरणादिज्ञानोत्पत्तिः' (स्पन्दप्रदीपिका') स एव 'परामृतरसात्'—स्वरूपोदयात्
अपायः = प्रच्युतिः । यतः 'सः' पुमान् तेनास्वतन्त्रतां (पारतन्त्र्यं असर्वगतादिम्) एति =
प्राप्नोति । स च 'प्रत्ययोद्भवः तन्मात्रगोचरः ॥ = 'शब्दादिविषय विषयः' तदभिलाषा-
त्मक ॥ (स्पन्दप्रदीपिका) ॥
एक ही परमतत्त्व की स्वेच्छा-परिकल्पित अनुग्राह्य-अनुग्राहक भावों की पृथक्-
पृथक् विचारणा से विविक्त आत्मा ही अनुग्राह्य है ।
'परामृत' का क्या अर्थ है?
(१) शिव-शक्ति-सदाशिव-ईश्वर-विद्या आदि के रूप में पंचधा परिकल्पित
विभागाभास को प्रक्रिया शास्त्रों में 'परामृत' 'रस' आदि शब्दों द्वारा कहा गया है ।
(२) 'अहं' अत्यन्त भेदसंस्पर्श से शून्य 'परमशिव' नामक स्वभाव का वाचक
होने के कारण 'परामृत' कहा जाता है । वह—
परामर्शरूप शक्तितत्व का वाचक है अतः उसे 'रस' भी कहा गया । वह अत्यन्त
प्रशान्त निष्परामर्श शून्यप्राय कहा गया है । यह मत शिवतत्त्ववादियों का मत है ।
उसका निरास करने हेतु ही यहाँ 'रस' शब्द प्रयुक्त किया गया है ।

३६६ स्पन्दकारिका
परामृत—तत्त्वद्वय तो—(१) 'शिव' एवं (२) 'शक्ति' है 'तत्त्वद्वयं शिवशक्त्या-
ख्यम् ॥' यद्यपि ये अभिन्न है तथापि स्वरूप प्रतिपादन के लिए उनका अन्यथा अनुपपत्ति
द्वारा विभाजन करके उन्हें प्रकाशित किया गया है।
इसलिए गुरुदेव ने 'तत्त्वगर्भस्तोत्र' में सतताविलुप्त एवं उपलब्ध उसी का
प्रतिपादन करने के उद्देश्य से शिव तत्त्व की स्तुति की है—
'यस्या निरुपधिज्योतीरूपायाः शिवसंज्ञया ।
व्यपदेशः परां तां त्वामम्बां नित्यमुपास्महे ॥'
'शक्तितत्त्व' तो परमार्थ तत्त्वविदों के द्वारा स्वरूप प्रत्यवमर्श, सामान्य स्पन्द
आदि नामों के द्वारा व्यवहृत की गई है। उसका पर्यायभूत 'उन्मेष' आदि पद भी उसका
संसूचक है—
'किंचिदुच्छूनतापत्तेरुन्मेषादिपदाभिधाः ।
प्रवर्तन्ते त्वयि शिवे शक्तिता ते यदाम्बिके ॥'
यहाँ पर प्रयुक्त 'यदा' शब्द के प्रयोग से यह मतिभ्रम नहीं होना चाहिए कि—
कभी यह शक्त्यवस्था होती है और कभी नहीं होती है। क्योंकि स्वभावसंवेदनात्सक,
नित्य, सामान्यस्पन्द रूप ही धर्म है 'किंचिदुच्छूनता' (थोड़ा सा फूल जाना यथा पानी में
डाला चना फूल जाता है) ।¹
(३) 'सदाशिव', 'ईश्वर' एवं 'विद्या' (तत्त्वत्रय) भी परामृत शब्द वाच्य है।
ऐसा क्यों?—इसका कारण यह है कि—
भेदोद्भावन का सामर्थ्य ही माया शक्ति है—कोई वस्त्वन्तर नहीं है—'स्वभा-वस्य
विश्वरूपतया अवभासनमानस्य इदन्तोल्लेखने भेदोद्भावनसामर्थ्यं मायाख्याशक्ति-
राख्याता—न तु वस्त्वन्तरं किंचित् ॥'
इदम्—(यह जगत्)—इत्याकारक रूप में परामृश्यमान पदार्थ-जगत् (या
विषयात्मक विश्व) प्रकाशमानता का अतिक्रम करके अन्य बनने हेतु (जिसके द्वारा)
समर्थ नहीं हो पाता है उसके कारण यह भेदात्मक रूप वाली होकर भी यह माया
प्रकाशात्मक पारमेश्वर धर्म होने के कारण अतिक्रान्त न हो सकने के कारण भगवान् की
यह शक्ति ही अत्यन्त अद्भुतस्वरूपा है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥'
इसका अर्थ यह है कि मेरी यह दैवी माया, 'इत्थंक्रीडनैकरस' देव की (ईश्वर की)
यह माया शक्तित्व से सम्बद्ध है। इसका स्वरूप यह है कि यह 'गुणमयी' (सुखाद्यात्मा
सत्त्वाद्यभिधाना प्रकृति से युक्त) है, यह भेदावभासस्वस्वभावा है, शब्दादिविषयात्मिका
है, (विषय रूप सुखादिसंवेदनपर्यवसातात्मा है)—अतः मेरी यह सुखादि रूप ग्राह्याकार
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।

तृतीयः निष्यन्दः ३६७
निर्भासिनी माया 'गुणमयी' कहलाती है। यह 'दुरत्यया' है—क्योंकि इसका अतिक्रमण
करना अत्यन्त दुःखपूर्ण या कष्टकारक है—बहुत कष्टपूर्ण साधनाओं के बाद ही इसको
अतिक्रान्त या पराभूत किया जा पाना संभव हो पाता है—अत्यन्त उत्साही प्रबुद्धों के
द्वारा भी शीघ्र ही भेदव्यवहार के परे जा पाना कठिन है तथा शीघ्र ही समस्त संसारव्यवस्था
का उच्छेद कर पाना संभव नहीं है। किन्तु जो लोग मेरी उपासना करते हैं—द्वैतभाव के
छिन्न-भिन्न होने एवं संवित् तत्त्व में अधिष्ठित होने के कारण जो सुप्रबुद्ध हैं मात्र मुझ
एक ही तत्त्व को अपने से अभिन्न रूप में देखते हुए मुझे पहचानते हुए मद्भावापन्न
होकर इस माया को पार कर जाते हैं। उस दशा में ही दिनकर की भाँति द्योतित
होकर यामिनी रूपा माया को निर्मूलरूप से नष्ट करके उसके पार हो जाते हैं। स्तोत्र में
कहा भी गया है—
'समाधि वज्रेणाप्यन्यैरभेद्यो भेदभूधरः ।
परामृष्टश्च नष्टश्च त्वद्भक्तिबलशालिभिः ॥'
इस प्रकार की प्रत्ययोद्भवमात्रस्वरूपा माया तथा उसका मूलरूप क्षेत्रज्ञतत्त्व 'पशु'
के पर्याय तथा 'अस्वतन्त्र' शब्द द्वारा यहाँ प्रतिपादित किया गया है।
अस्वतन्त्र = बन्धनग्रस्त (पशु) जीव ॥
इस प्रत्योद्भवस्वरूपा माया के द्वारा स्वस्वभाव से प्रच्यवित जीवात्मा अपने तात्त्विक
स्वस्वरूपात्मक धर्म के विपरीत कालादिरूप पाशपंचक के द्वारा ग्रथित होने के कारण
'पशुत्व' प्राप्त करती है और यही पशुत्व 'पारतन्त्र्य' है—'पाशपंचकेन ग्रथितस्य
पारतन्त्र्यं पशुत्वमुद्भाव्यते ।।' यह पशु रूप जीवात्मा इस पारतन्त्र्य के कारण व्यामोहित
होकर अपने अनवच्छिन्न स्वधर्म का परामर्श न करता हुआ प्रत्युत् उसके विपरीत
अवच्छेदक पंच पाशों के द्वारा—
(१) भूत-भविष्यादिक विकल्पों में विभक्त—'काल' के द्वारा,
(२) सर्वात्मकत्व, रूप धर्म को विस्मृत कर देने के फलस्वरूप सर्वत्र
नियतकार्यकारण नामक भाव से युक्त 'नियति' के द्वारा,
(३) सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्वलक्षण लक्षण वाले धर्म से उदासीन होने के कारण-
किंचित्कर्तृत्व-किंचिज्ज्ञत्व रूप वाले—'कला' एवं 'विद्या' के द्वारा।
(४) प्रेप्सित अर्थों को न पाने के कारण नित्यनिरभिलाषत्व रूप लक्षणरूप स्वधर्म
के अपरामर्श के कारण—विषयाभिलाषिता रूप 'राग' रूप पाश के द्वारा—बध्यमान,
पराधीन वृत्ति वाला (तत्त्वतः पतिरूप) जीव 'पशु' कहलाने लगता है।१
क्योंकि पारमार्थिक रूप में परमेश्वर के एक होने पर भी उसके अपने अत्यद्भुत
ऐश्वर्यवीर्य द्वारा और विशुद्धचिन्मात्ररूप होने के कारण तथा विश्वात्मक होने के कारण
उसके आन्तर एवं बाह्य दो रूप हैं—अतः उसमें द्वैविध्य आभासित तो होता ही है। यहाँ
उसका जो विश्वात्मक स्वरूप है—
१. रामकण्ठाचार्यः— 'स्पन्दविवृति'

३६८ स्पन्दकारिका
बाह्यरूप है—उसके 'ज्ञेय' एवं 'कार्य' रूप भाव द्वारा उसके लब्ध होने से एक
तत्त्व के अद्वैत शक्ति होने पर भी उसकी शक्ति 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो रूपों में उपचरित
होती है। वह 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' जहाँ बाह्यगृहीत 'उन्मेष' के रूप में त्रिगुणात्मक
अव्यक्तावस्था में स्थित होते हैं वे परमेश्वर भोगात्मक ज्ञान-क्रिया रूप में वर्तमान होने पर
भी अन्तर्मुखी होने के कारण निमेषात्मिका सदाशिवदशा कहलाते हैं।
'शक्ति' के क्रिया-प्राधान्य पूर्ण होने पर बहिर्गृहीत उन्मेष की पराहं विश्रान्ति दशा
'ईश्वरदशा' कहलाती है। जिसमें ज्ञानशक्ति के उद्रेक होने के कारण इसका बहिर्मुखत्व
बाह्याभ्यन्तर रूप सामानाधिकरण्यपर्यवसायी होने के कारण स्वरूपविश्रान्तिनिष्ठत्व ही वह
'विद्यादशा' है।
(४) ये तीनों ही परामृत है। इन तीनों ही दशाओं में भेदप्रतिप्रतिमूलता होने के
कारण माया शक्ति के लब्ध्यात्मिका होने पर भी संवित् तत्त्व के परिपूर्णा हंकार लक्षण
वाले स्वभाव में ही विश्रान्त होने से प्रत्यस्तमिता होकर परमानन्दनिर्भर शिवरूप को
तिरोहित करने में समर्थ नहीं है अतः ये तीनों पद परामृत ही है—'इति पदत्रयमेतत्परा-
मृतमेव' तत्त्वगर्भ में कहा भी गया है—
'ज्ञानक्रियास्वरूपेण प्रवृत्तायास्तु ते शिवे।
सदाशिवत्वं जगदुर्भोंगाहं तत्त्ववेदिनः ॥
गुणीभूतज्ञशक्तित्वं व्यक्तीभूतक्रियात्मिका ।
यदा तदैश्वरं तत्त्वं व्यक्ततामेति वृत्तिमत् ॥
प्रवृत्तावुन्मुखीभूता भवेस्त्वं परमे यदा।
ज्ञान शक्तिस्तदोदारा विद्या त्वं परिगीयसे ॥'
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है कि—
एवमन्तर्बहिर्वृत्तिः क्रिया कालक्रमानुगा।
मातुरेव तदन्योन्यावियुक्ते ज्ञानकर्मणी ॥
किन्त्वान्तरदशाद्रेकात्सादाख्यां तत्त्वमादितः।
बहिर्भावपरत्वे तु परतः पारमेश्वरम् ॥
ईश्वरो बहिरुन्मेषो निमेषोऽन्तः सदाशिवः।
सामानाधिकरण्यं च सद्भिद्याहमिदं धियोः ॥
इदंभावोपपन्नानां वेद्यभूमिमुपेयुषाम्।
भावानां बोधसारत्वाद्यथावस्त्ववलोकनात् ॥'
उससे परे तो परस्पर-परिहारावस्थित-अहं प्रतीति लक्षण से भिन्न विषयापेक्षी,
अनेक भेदों के अभिमान से युक्त होने के कारण, अपने तात्विक ऐश्वर्य से अनभिज्ञ
क्षेत्रज्ञतत्त्व में मायाशक्ति ही मात्र परमात्मा के विश्वरूपैश्वर्य का प्रथमास्पदभूत होकर
विजृंभण करती है—
'यदा त्वेवंविधादत्र निजा भोगाज्ञता पशोः।
तदा मायास्वरूपेति गीयते वैभवाश्रयः ॥'

तृतीयः निष्यन्दः ३६९
प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में भी कहा गया है—
'भेदे त्वेकरसे भातेऽहंतयानात्मनीक्षते ।
शून्ये बुद्धौ शरीरे वा मायाशक्तिर्विजृंभते ॥'
यहाँ यह 'प्रत्ययोद्भव' शब्द से प्रतिपादित की गई है । 'मैं'—इत्याकारक
शिवात्मक स्वभाव का परामर्शात्मक ज्ञान सम्यक् ज्ञान है । विश्व के रूप में अवभासमान
उसके ही स्वस्वभाव का इदन्तोल्लेखन ('यह' के रूप में उल्लेख करना) है ।
मायाशक्ति के पाँच भेद—काल, कला, नियति, राग, विद्या—या माया शक्ति
के ये पाँच प्रसव (उत्पन्नभूत पदार्थ या तत्त्व या माया शक्तियाँ)—समस्त पशु प्रबन्ध
(जीवों का अविच्छिन्न क्रम, बन्धन, योजना) को अविशेष रूप से उसके स्वस्वरूप को
आच्छादित करके स्थित है—'माया शक्तेः प्रसवः समस्तस्य पशुप्रबन्धस्य अविशेषेण
स्वरूपभावृत्य व्यवस्थितः ॥' यह माया शक्ति प्रत्येक प्राणी को उसकी भिन्न-भिन्न विचित्र
बुद्धि आदि के रूप में परिणत होकर उसको आच्छादित—आवृत्त करती है उस 'प्रधान'
(प्रकृति) नामक प्रसव का प्रपंच को प्रत्योद्भवविषय के प्रतिपादन के द्वारा यह कहा
कि—'स च तन्मात्र गोचरः' ।
स च तन्मात्रगोचरः = 'स च पशुत्व कारणं'—वह पशुत्व का कारण प्रत्ययो-
त्पन्न है । 'तन्मात्रगोचर' = तन्मात्रा (शब्द स्पर्श रूप रस गंध तन्मात्रायें) गोचर हैं
(विषय हैं) जिनके वह ॥ 'प्रत्यय' विषय का आलम्बन लेकर (विषयसापेक्ष) स्थित है—
प्रत्येय हैं । विषय एवं विषयीभाव ग्रहीतृ-ग्रहण-ग्राह्य-इस त्रितय रूप में होने के कारण
युक्ति-सिद्ध है तथापि सामान्य प्रवृत्ति के कारण बिना त्रितय की सत्ता नहीं हो सकती ।
इस वाक्य के द्वारा ये चारों आक्षिप्त हैं ।
(१) इसमें 'ग्रहीता' कौन है? प्रत्ययवान् पशु
(२) इसमें 'ग्राह्य' कौन है? शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध—
अर्थात् आकाशादिक स्थूल पंचभूतों के आश्रयभूत विशेषात्मक गुण (क्योंकि
उनके द्वारा ही समस्त विषयों की प्राप्ति होती है) ।
सामान्य के उपपन्न (प्राप्त) होने पर समस्त विशेषों का उनमें अंतर्भाव समझ लेना
चाहिए ॥ अतः सामान्य वाची 'तन्मात्र' शब्द के प्रयोग के द्वारा विशेषों को भी गृहीत
किया जाना चाहिए । उनके द्वारा—शब्दादि के आश्रयभूत स्थूल तत्त्व—आकाशादिक भी
आक्षिप्त हैं क्योंकि—उनकी सत्ता निराश्रय होने की स्थिति में तो है ही नहीं । इस प्रकार
दशविध कार्य हैं ।
१. 'तथा च अयम् अनया व्यामोहितः अनवच्छिन्नत्वादिरूपं स्वधर्मम् अपरामृशन्,
तद्विपरीतेन अनवच्छेदकेन कलनात्मना भूतभविष्यदादिविकल्पविभक्तेन कालाख्येन,
तथा सर्वात्मकत्वधर्मविस्मृतेः सर्वत्र नियतकार्यकारणभावाख्यात्मकेन नियतिनाम्ना,
तथा सर्वकर्तृत्वसर्वज्ञत्वलक्षणधर्मद्वयौदासीन्यात् किंचित्कर्तृत्वकिंचिज्ज्ञत्व रूपाभ्यां
कलाविद्याभिधानाभ्यां तथा प्रेप्सितार्थविरहात् नित्यनिरभिलाषितारूपेण रागाख्येन, च
पाशेन वध्यमानः पराधीनवृत्तिः पशुः संबध्यते ॥' 'स्पन्दवृत्ति'
स्पं० २४

३७० स्पन्दकारिका
वह प्रत्ययवान्, पर वशीभूत पशु विषयी होने के कारण इष्टानिष्ट विषय में हानादि
क्रियाओं में करण की अपेक्षा रखता है । जिसके द्वारा यह विषय का निश्चय करता है
वह प्रकाशप्रधान ‘बुद्धि’ नामक करण है । जिसके द्वारा अनात्मभूत देहादिक अर्थ को
अपनी आत्मा के रूप में मानता है वह तद्विपर्ययात्मक नियमप्रधान तत्त्व ‘अहंकार’ है ।
जिसके द्वारा प्रवृत्तिप्राधान्यवश विषयों को विकल्पित करता है वह संशयात्मक तत्त्व
‘मन’ है ।
इस प्रकार—अंतःकरण त्रिविध है—बुद्धि, अहंकार, मन ॥ ‘त्रिविधं अन्तः-
करणम्’ ॥ ये कार्य हैं।
जिसके द्वारा शब्दादिक विषय ग्रहण किये जाते हैं—वे पाँच हैं—और वे श्रोत्रा-
दिक पाँच बुद्धीन्द्रिय पंचक कहलाते हैं जिसके द्वारा वचनादि क्रिया संपन्न की जाती है—
वे वागादिक पंचकर्मेन्द्रियाँ हैं । अतः ये १० बहिष्करण हैं ।१
ये अहंकार के कार्य हैं । इस प्रकार (१) बाह्य एवं (२) आभ्यन्तर दो प्रकार के
करण हैं—इन्द्रियाँ हैं । इस प्रकार २३ प्रकार के कार्य करण वर्ग विषयी होने के कारण
अन्यथानुपपत्ति द्वारा आक्षिप्त हैं ।
प्रवर्तक हेतु के बिना विषय-प्रवृत्ति का अभाव हो जाने के कारण विषयत्व भी
उपपादित नहीं किया गया । अतः यहाँ सुखाद्यात्मा भी आक्षिप्त हैं । ‘सुख’ क्या है?
प्रत्येक प्राणी की स्ववासनानुगुणेष्टविषयप्राप्ति से होने वाली अनित्य तृप्ति रूप आनन्द
ही सुख है ।
‘सुखं प्रतिप्राणिस्ववासनानुगुणेष्टविषयप्राप्तेस्तृप्तिरनित्य आनन्दः ।'—उसके द्वारा
प्रयुक्त होकर इष्टविषयों के आदान हेतु ही प्रवृत्ति होती है । उसके विपरीत ही दुःख होता
है जो कि अनिवृत्तिरूपात्मक है और अनिष्टविषयात्मक है । दोनों का न्यग्भाव मोह है ।
वृत्तिकार ने जो ‘रूपाद्यभिलाषात्मकः’ कहा है वह ‘तन्मात्रगोचरः’ का पर्याय है ।
रूपादिक में जो अभिलाषा (राग) है उसके निमित्तक होने के कारण तदात्मक
प्रत्ययोद्भव होता है । उसके कारण—अभिलाष-प्रपंच ही सुखाद्यात्मक प्रधान कारण है
अतः यह प्राधानिकी २४ तत्त्व ‘तन्मात्रगोचरः’ शब्द द्वारा आक्षिप्त है ।
पूर्व में १२ तत्त्वों को विनिर्णीत किया गया—शिवादिविद्यान्त ५, माया, काला-
दिक ५, पशुतत्त्व—इस प्रकार ३६ तत्त्वों द्वारा पारमेश्वरी शक्ति विजृंभण करती है—
‘द्वादशतत्त्वानि निर्णीतानि—दूतद्यथा-शिवादिविद्यान्तानि पंच, माया, कालादिपंचकं,
पशुतत्त्वं च इति षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपतया पारमेश्वरी एकैव शक्तिर्वृजृंभते ।।'
इस प्रकार प्रत्ययोद्भव ही पशुत्व का कारण है इस तथ्य के प्रतिपादित किये जाने
के कारण भोग्य होने के कारण जीव पशु कहा जाता है—'प्रत्ययोद्भवस्य पशुत्व-
कारणभावे प्रतिपादिते शक्तिवर्गस्य भोग्यतां गतः सन् पशुः स्मृतः ॥’२
१-२. रामकण्ठाचार्यः— ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।

तृतीयः निष्यन्दः ३७१
शाक्त प्रसार के ३ प्रकार हैं—'प्रत्ययोद्भव' । 'स्वरूपा वरण' पशुवर्तिनी स्थूल के
रूपको ग्रहण कर लेना, अर्थात्—'आणवमल' 'मायीयमल' 'कार्ममल' ।। —'स्वतन्त्र'
का अस्वतन्त्र बन जाना ।
भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दसर्वस्व'—
परामृतरसापायः = परामृतरस = स्वस्वरूप । अपायः = विच्छेद, विच्युति ।
प्रत्ययोद्भवः = 'विषयदर्शने स्मरणोदयः' तेनास्वतन्त्रता मेति = तेन + स्वतन्त्रताम् +
एति । स्वतन्त्रता प्राप्त करता है । स च तन्मात्रगोचरः = 'रूपाद्यभिलाषात्मकः ।।'
बन्धन एवं विकल्पों की भूमिका—अपने निर्विकल्प स्वरूप में विकल्पों के
ज्ञान का प्रकटीकरण होना ही परामृतरस (शिवशक्ति-सामरस्य) से च्युत हो जाना
है । इसी के कारण जीव (अपनी सहज 'स्वातन्त्र्य शक्ति' खोकर) अस्वतन्त्र (पराधीन)
हो जाता है । इस विकल्प ज्ञान के विषय पाँच तन्मात्रायें हैं ।
(क) 'विकल्पों' का प्रकटीकरण—जीव का परामृतरस से च्युत होना ।
(ख) 'विकल्पों' का उदय—स्वातन्त्र्य शक्ति से च्युत होकर अस्वतन्त्र हो जाना ।
(जीवों का स्वातन्त्र्यशक्ति से हीन होना) ।।
(ग) 'विकल्पों' के विषय पाँच तन्मात्रायें हैं ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि पंच तन्मात्राओं के
प्रति पशुप्रमाता की अभिलाषा का उत्पन्न होना ही विकल्प ज्ञान का विषय है ।
'विमर्शात्मिका स्पन्दशक्ति' की बाह्योन्मुख प्रसार-क्रीड़ा (सृष्टि विस्तार = शाक्त
प्रसार) के रूप—
(१) प्रत्ययोद्भव (२) स्वरूपावरण (३) स्थूलात्मिका क्रियाओं का ग्रहण (अर्थात्
'आणव मल' 'मायीयमल' 'कार्मकल') ।।
'शक्ति' सृष्टि-प्रसार की अपनी क्रीड़ा 'शिवभाव' (अनुत्तर कोटि) से जड़भावा-
त्मक (निम्नतम स्तरीय) पृथवीतत्त्व तक व्याप्त रखती है ।
शिव से पृथ्वी तक ३६ तत्त्व हैं । समस्त विश्व इसी में अन्तर्भूत या संलीन है ।
'शक्ति' का सृष्टि-प्रसार एवं 'प्रत्ययोद्भव'—'शक्ति जब सिसृक्षु होकर अपनी
बाह्योन्मुखी अभिव्यक्ति करती है तब वह 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में परिणत होती है ।
समस्त विकल्प-साम्राज्य प्रत्ययोद्भूत ही तो हैं । शिव के स्वातन्त्र्य शक्ति का
'मायाशक्ति' के रूप में स्वरूप-ग्रहण-शिव में अपनी पूर्णता, स्वतन्त्रता, पूर्ण ज्ञातृत्व,
पूर्ण कर्तृत्व, पूर्ण तृप्ति, पूर्ण विभुत्व के संदर्भ में संदेहाविर्भाव—प्रथम प्रत्ययोद्भव
(अपने निरपेक्ष पूर्ण स्वातन्त्र्य में विश्वास न होना)—(१) स्वतन्त्र ज्ञातृत्व की हानि (२)
स्वतन्त्र कर्तृत्व पर अविश्वास ।। अर्थात् अनात्म पदार्थों में आत्मबोध एवं आत्म बोध
की हानि ।। सबसे बड़ा प्रत्ययोद्भव यही है जो कि स्वातन्त्र्यहानिमूलक है । यही
'आणवमल' भी कहलाता है ।

३७२ स्पन्दकारिका
प्रत्ययोद्भव—स्वस्वातन्त्र्य में अविश्वास—आत्मा का अवरोहण—चेतन ही
जड़त्व प्राप्त कर लेता है तथा 'परावाक्' वैखरी वाक् तक अवरोहण कर लेती है ।
परिणाम—
(१) सर्वज्ञातृत्व—किंचिद् ज्ञातृत्व (२) सर्वकर्तृत्व—किंचित् कर्तृत्व = सर्वात्मक
ज्ञान—संकुचित ज्ञान सर्वात्मक क्रिया—अल्पक्रिया ।। परिणाम = ३६ तत्त्वों का
बाह्यावभासन । यही 'परामृतरसापाय' है ।
परामृत = प्रकाशस्वरूप शिव । संवित् शक्ति ।
रस = अहं विमर्शमयी स्पन्दशक्ति ।
परामृत = सदाशिव, ईश्वर एवं शुद्ध विद्या इन तीनों तत्त्वों को भी सूचित करता है ।
एक ही तत्त्व प्रकाश के प्राधान्य से 'शिव' एवं विमर्श के प्राधान्य से शक्ति है
और दोनों मूलतः अभिन्न है ।
प्रत्ययोद्भव = ६ तत्त्व, जिन्हें 'षट् कंचुक' कहा जाता है ये भेद बुद्धि की
सर्जना करने वाले माया के प्रसार हैं । इनका रूप निम्नांकित है—
प्रत्ययोद्भव = (१) माया तत्त्व (२) कला तत्त्व (३) विद्या तत्त्व (४) राग तत्त्व
(५) नियति तत्त्व (६) काल तत्त्व ।।
स्वतन्त्र = शिव । शक्ति ।
अस्वतन्त्र = प्रत्ययावृत पुरुष तत्त्व ।। षट् कंचुक आबद्ध पशु ।। पशुप्रमाता ।।
तन्मात्रगोचरः = प्रकृति, बुद्धि, मनस् । अहंकार । श्रोत्र । त्वक् । नेत्र । जिह्वा ।
घ्राण । वाक् । हस्त । पाद । पायु । उपस्थ । शब्द । स्पर्श । रूप । रस । गंध ।
आकाश । वायु । तेजस् । जल । एवं पृथ्‍वी तत्त्व ।।
'प्रत्ययोद्भव' क्या है? अपनी आत्मभूता स्वरूप शक्ति के विरुद्ध विकल्पहीन
स्वरूप में ज्ञेय विषयों से सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों का उदय होना ही 'प्रत्ययोद्भव'
है। 'तन्मात्र' शब्द मात्र ५ तन्मात्राओं का ही नहीं प्रत्युत् समस्त प्रकृत्योद्भूत सृष्टि का
वाचक है । ब्राह्मी आदि शाब्दी शक्तियाँ जीवों के स्वरूप पर सदैव आवरण डालकर उसे
आच्छादित करने का प्रयास करती रहती है ।
शब्दों की अनुस्यूतता न हो तो कोई भी प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकता : 'यतः
शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' (का० ४७)
'अस्वतन्त्रता' का कारण क्या है?
'... ... ... ... प्रत्ययोद्भवः ।
तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥' (का० ४६)
विकल्प ज्ञान—(१) 'परामृतरसापाय ।' (२) 'स्वातन्त्र्य हानि'
ग्राह्य विषयों की प्राप्ति होने पर तद्विषयक अनुस्मृति का उदय होना ही
प्रत्ययोद्भव का रूप है । प्रत्ययोद्भव के विषय तन्मात्र हैं ।

तृतीयः निष्यन्दः ३७३
'स्वतन्त्रता' की हानि का कारण अज्ञान या मल है जो कि निम्न हैं—(१)
'आणव मल' (२) 'मायीय मल' (३) 'कार्ममल' ।
'मल'—'आणवमल'—'मायीय मल'—'कार्ममल'। 'मल' क्या है? संकुचित
ज्ञान ही 'मल' है । परमेश्वर पूर्णज्ञान एवं पूर्ण क्रिया के स्वस्वरूप को स्वेच्छा से
आच्छादित कर लेता है और अपनी संकुचितात्मता प्रकट करता है । यह आच्छादित
(प्रच्छन्न) ज्ञानात्मरूपता ही 'मल' है । यह पूर्णत्व की अख्याति है—आत्म सङ्कोच या
अज्ञान है—यही 'मल' भी है और संसार रूपी वृक्ष का अंकुर भी है—'मलमज्ञान-
मिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।।' इस 'मल' की अनेक संज्ञायें हैं—
'मलोऽभिलाषश्चाज्ञानमविद्यालोलिकाप्रथा ।
भवदोषोऽनुप्लवश्च ग्लानिः शोषो विमूढता ।।
अहंममात्मतातङ्को मायाशक्तिरथावृतिः ।
दोषबीजं पशुत्वं च संसारांकुरकारणम् ।।'
१. आणवमल—अपने को अपूर्णमानना ('अपूर्णमन्यता' या पूर्णज्ञानात्मक
स्वरूप का अज्ञान या ज्ञान का सङ्कोच) । यह अणुता या सङ्कोच ही 'आणव मल' है ।
आणव मल के प्रकार—
(१) चिन्मात्र बोध के स्वातन्त्र्य का सङ्कोच (ज्ञातृत्व का अज्ञान)
(२) स्वातन्त्र्य या कर्तृत्व का अज्ञान—
स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता—द्विधाणवं मलमिदं स्वरूपापहानितः
।। ('ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' ३।२)
२. मायीय मल—'भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं'
स्वरूप के अज्ञान के अनन्तर सांसारिक पदार्थों को अपने से भिन्न समझना (भेद
प्रथा) ही 'मायीय मल' है ।
३. कार्ममल—जन्म तथा भोग प्रदान करने वाले शुभाशुभ कर्मों की पराधीनता
ही 'कार्ममल' है ।
इन तीनों मलों का सर्जक मायाशक्ति है । मायाशक्ति—(१) 'आणव मल' (२)
'मायीय मल' (३) 'कार्ममल' ।
'............ जन्म भोगदम् । कर्तर्यबोध कार्यम् तु माया शक्त्यैव तत्रयम् ॥'
(१) आणवमल—गोपितस्वमहिम्नोऽस्य सम्मोहाद्विस्मृतात्मनः ।
यः सङ्कोचः स एवास्य आणवो मल उच्यते ॥
(२) मायीयमल—ततः षट्कञ्चुकव्याप्ति विलोपितनिजस्थितेः ।
भूतदेहे स्थितिय्र्याऽसौ मायीयो मल उच्यते ॥
(३) कार्ममल—यदन्तःकरणाधीनबुद्धिकर्मेन्द्रियादिभिः ।
बहिर्व्याप्रियते कार्ममलमेतस्य तन्मतम् ॥