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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 519 में से

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पृष्ठ 459

३५८ स्पन्दकारिका
(१) अनुत्तर वाचक = ककार
(२) विसर्ग वाचक = शकार
क + श का संयुक्त रूप है—'कूटबीज'।
क्ष का महत्व—'कूटबीज' (क+श)=मातृका का प्रत्येक वर्ण शिवभाग एवं शक्ति
भाग का संघट्टरूप है। इसीकारण 'क्ष' को वर्णमाला के अन्त में स्थान दिया गया है।
शक्तिवर्ग के भेदत्रय (मालिनीविजयोत्तर तन्त्र)
घोरतरा (अपरा) | घोरा (परापरा) | 'मालिनी विजय' | अघोरा (परा)
(तामसिक) | (राजसिक) | (मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्वं | (सात्विक) (सात्विक
(तामसिक प्रकृति | (राजसिक प्रकृति | वज्जनयन्ति याः। | प्रकृति वालों के लिए
वालों के लिए यह | वालों के लिए यह | मुक्तिमार्ग निरोधिन्या | यह शक्तिवर्ग
शक्तिवर्ग अत्यन्त | शक्तिवर्ग भी | स्ताः स्युर्घोरा परापराः। | कल्याणकारी है।)
भयानक है।) | भयोत्पादक है।) | विषयेष्वेव संलीना- | योगियों को शिवभाव
| | नधोऽधः पातयन्त्यणून। | तक पहुँचाने वाली
| | रुद्राणून या समालिंग्य | शक्तियाँ ।।
| | घोरतर्योऽपरा |
| | स्मृताः ॥') |
कला समूह—कला विलुप्तविभवो।
प्रश्न—कला समूह का आरंभ कवर्ग से ही क्यों किया जाता है? इसका आरंभ
अवर्ग से क्यों नहीं किया जाता?
जब स्वर और व्यञ्जन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में रहते हैं तभी विकल्प-
परम्पराओं में क्षोभ प्रारंभ होता है अन्यथा केवल स्वर या केवल व्यञ्जन पृथक्-पृथक्
किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते। इन दोनों के पारस्परिक संमिश्रण को 'बीजयोनि
संक्षोभ' के नाम से अभिहित किया जाता है।
उत्तर मालिनी क्रम—न, ऋ, ॠ, लृ, ॡ, च ध, ई, ण, उ ऊ, ब, क, ख, ग,
घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, ड, ढ, ठ, झ, ज, र, द, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष,
क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, क। (आध्या० रहस्य साधना में प्रयुक्त)।
क्रमद्वय (१) पूर्वमालिनी क्रम, मातृका क्रम, सिद्धाक्रम।
(२) उत्तर मालिनी क्रम—'न से क ॥'
(क) 'स्वच्छन्द तन्त्र' को मान्य—'पूर्वमालिनी क्रम' अकारादि क्षकारान्त क्रम
(ख) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' को मान्य—'उत्तर मालिनी क्रम'
'शब्द' एक जड़ ध्वनि नहीं प्रत्युत प्रत्येक शब्द स्पन्दमयी चेतन शक्ति है।
प्रत्येक जीव तभी तक शक्तियों का दास है जब तक कि उसे अपने भोक्ताभाव का