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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 461, कुल 519 में से

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पृष्ठ 461

३६० स्पन्दकारिका
बाह्योन्मुखी प्रसार—बहिर्मुखी अभिव्यक्ति के माध्यम से शब्दराशि के रूप में रूपान्तरित
हो जाती है।
तान्त्रिक शैवदर्शन की मान्यता है कि 'पतिप्रमाता' की स्वात्मगता स्वाभिन्ना,
स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति (स्वतन्त्र संवित् शक्ति) भेदात्मिका बहिर्विमर्शावस्था में
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' के द्वारा उच्चारित वर्णमाला के रूप में प्रसरण करती
है। यही वर्णमाला जो कि शक्ति का केन्द्र है एवं शक्ति का प्रतीक है और अपने ताने-
बाने में पतिप्रमाता को उलझाकर अस्वतन्त्र पशुप्रमाता बना देती है। समस्त वाग्व्यवहार
का आधार यही वर्णमालात्मिका वाक्शक्ति है। 'वर्ण' शक्तिरूपात्मक है अतः वे क्षोभ
एवं स्पन्दन (हलचल) भी आविर्भूत करते हैं। इन्हीं के द्वारा अनन्त विकल्प-श्रृंखलाओं
का आविर्भाव होता है और प्राणी माया बन्धन, अज्ञान एवं अशान्ति के चक्रव्यूह में फँस
जाता है।
अ से क्ष पर्यन्त शब्दराशि का प्रसार = चित् शक्ति का बहिर्मुखी प्रसार। इस
शब्द राशि का ८ वर्गों में विभाजन किया गया है। शक्ति भी ब्राह्मी आदि ८ प्रकार के
विकल्पस्वरूपात्मक शक्ति-कुटुम्ब का रूप धारण करके प्रत्येक वर्ग की एक-एक
अधिष्ठात्री बनकर स्थित हो जाती है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का कार्य यह है कि वे
चिद्रूपा आत्मसत्ता को चारों ओर से घेरकर उसे ढक लेती है। इन ८ शक्तियों के
परिवार को 'मातृका' कहा गया है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का अपना यह परिवार
अपने को जन्म देने वाली चित् शक्ति को इस प्रकार ढक लेता है कि जीवों को चित्
शक्ति की झलक तक नहीं मिल पाती।
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (२.१.१) में कहा गया है कि ब्राह्मी आदि शक्तियाँ
माताएँ कहीं गई है और उनका अपना परिवार है और परिवार के अनेक सदस्य है—
'एतदेव च ब्राह्म्यादि मातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि
चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवार वाच्येव न
जननीवाचकः ॥'
परि तो वारणात् परिवार एव—चारों ओर से रोकने के कारण इस समुदाय को
'परिवार' कहा गया है। यह शाब्दी शक्तियों का 'परिवार' चित् शक्ति को जीवों के समक्ष
प्रकट होने से रोकता है अतः इसे 'परिवार' कहा गया है। 'अहं' शब्द में 'अ' तो
अनुत्तर शिवतत्त्व है और 'ह' शक्तितत्त्व है। इनकी प्रत्याहारावस्था ही 'अहंता' है। इसी
अहंता के गर्भ में समस्त वर्ण समुदाय ('शब्दराशि') गर्भीकृत है—
'अतएव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एत-
दात्मकमेव विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहं विमर्शस्य तत्वम् ॥
(शिवसूत्रविमर्शिनी: २.७)
मालिनीविजय (३.९.१०) में इस शब्दराशि के २, ९ एवं ५० भेद किए गए
हैं— 'तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पंचाशद्धा च मालिनी ॥