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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

तृतीयः निष्यन्दः ३५७
'शब्दराशि' के क्रम
'मालिनी क्रम' ('मालिनीविजयोत्तर तन्त्र) 'मातृका क्रम'
(न से क तक) (अ से क्ष पर्यन्त)
'शब्दराशि' का आविर्भाव केन्द्र
प्रकाशरूप शिव विमर्शरूपा शक्ति
(सा म र स्य)
(शिवशक्ति का सामरस्य) = सामरस्य = विश्व की आत्मभूत एवं आधारभूता सत्ता
सामरस्य
('अहं'-विमर्श) 'सामरस्य' = महामन्त्र रूप अहं विमर्श
'अ' (अनुत्तर तत्त्व) 'ह्'
शिवतत्त्व शक्ति तत्त्व
पराहंता (अहन्ता)
──> (इसी भेद शून्य 'अहं' में मयूराण्डरसवत् समस्त 'शब्दराशि' = 'परावाक्'
रूप में अन्तर्निहित हैं ।) 'अहंरूपा' विमर्शशक्ति में स्थूल वाच्यवाचकभावमय विश्व का
अवभासन करने की ओर उन्मुख दशा का श्री गणेश ──> (अहंरूपा विमर्शशक्ति) ──>
'इच्छा-शक्ति' के रूप में रूपान्तरण ──> ज्ञानशक्ति ──> क्रियाशक्ति (ज्ञान + क्रिया-
शक्ति = 'माया') ──> (बहिर्मुखी प्रसार के रूप में प्रसृत) ──> 'मातृका' (का विभाजन) ।
मातृका
२ प्रकार ९ प्रकार ५० प्रकार
(बीज + योनि) (१६ स्वर ३४ व्यंजन) प्रत्येक
(क) अ से अः = स्वर = 'बीज' = शिवभाव अक्षर को शक्ति के विभिन्न एवं
(ख) क से क्ष = व्यञ्जन = 'योनि' = शक्तिभाव । पृथक्-पृथक् रूप मानकर ५०
प्रकार माने गए हैं ।
अवर्ग कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग क्षवर्ग
वर्ण समाम्नाय के अष्टवर्ग हैं या कि नववर्ग?
वर्ग तो आठ ही हैं क्योंकि 'क्ष' (क + श का मिश्रित रूप) स्वतन्त्र शब्द नहीं है ।
यह 'क' एवं 'श' का संयुक्त रूप है । फिर इसे स्वतन्त्र वर्ग का महत्त्व क्यों दिया
गया? इसे पृथक् वर्ग क्यों माना गया?