स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
तृतीयः निष्यन्दः ३४७
सर्वमारोपयेत् = निमीलन-उन्मीलन-दशाओं को अभिन्न रूप में जानना चाहिए।
('पूर्वापर कोट्यवष्टंभ दाढर्यान्मध्यभूमिमपि चिद्रसाश्यानतावरूपतयैव पश्येत् इति' ) ॥
इस प्रकार करने से योगी किसी अन्य व्यतिरिक्त वस्तु से बाधित नहीं होगा
क्योंकि वह सभी अपने को ही देखेगा । प्रत्यभिज्ञाकार ने (उ०स्तो० १३।१६) में कहा
भी है—१ 'योऽविकल्पमिदमर्थमण्डलं पश्यतीशनिखिलं भवद्वपुः ।
स्वात्मपक्षपरिपूरिते जगत्यस्यनित्यसुखिनः कुतो भयम्? ॥'
योगी को सदैव चेतना के आदि, (प्रारम्भ) मध्य एवं अन्त में, जागृति, स्वप्न एवं
सुषुप्ति में सदैव सावधान रहना चाहिए । या उसे पूर्ण प्रबोध का आश्रय ग्रहण करना
चाहिए । उसे दिव्य दृष्टि (Divine vision) के साथ, स्पन्दतत्त्व के आधार के प्रति
जाग्रत रहना चाहिए । यह कैसे संभव हों?—उसे निम्नांकित श्लोक की दृष्टि के साथ
चिन्तन-मनन करते हुए जाग्रत रहना चाहिए— २
'तस्माच्छब्दार्थ चिन्तासु न सावस्था न या शिवः ॥' (२।१४)
योगी को इस समग्र ज्ञेय को स्रष्टा शङ्कर से अभिन्न देखते हुए केवल एक यथार्थ
स्वरूप में स्थित समझना चाहिए या उसे इसे यथार्थस्वरूप से अभिन्न समझना चाहिए जो
कि Involution एवं Evolution दोनों दशाओं में स्थित है । उसे 'मध्य' की दशा
को भी चिदानन्द के भौतिकीकरण मूर्तिकरण (Materialiesation of the bliss of
concious) के साथ अभिन्न समझना चाहिए । इससे दुःखों का नाश हो जाता है ।
क्योंकि अपने से परिपूरित जगत् में भला सदाह्लादित योगी को भय या दुःख कैसे हो
सकता है? वह तो इस पदार्थान्वित विश्व को परमात्मा का शरीर मानता है । ३
समावेश की प्रक्रिया के विवेचन का परिणाम निकालते हुए ग्रन्थकार उस स्पन्द
तत्त्व को यहाँ पर प्रस्तुत करता है जो कि अनेक पदार्थों में विभक्त है । 'स्पन्दतत्त्व' में
प्रवेश उसी के लिए संभव हो जाता है जोकि पूर्णतया प्रबुद्ध (Enlightened) है और
जो प्रवेश के उपायों पर अविरत ध्यान आकृष्ट किये रहता है । 'उपपादित उपायजातं
(Varities of means) परिशीलनतः सततं स्पन्दतत्त्वसमाविष्टं सुप्रबुद्धस्य भवति ॥'४
आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं कि साधन को चाहिए कि वह
अपनी शक्तियों का सङ्कोच किये बिना प्रबुद्ध, निर्विकल्प एवं सदा उद्युक्त रहे । ज्ञान के
सम्मुख जो भी विषय उपस्थित हो, उसको देखकर संवित् की दीप्ति से ज्ञेय का लोप कर
दे, उनको अविभाग में प्रतिष्ठित कर दे, तब उसे दूसरा कोई पीड़ा नहीं पहुँचा सकता ।
भोगमोक्षप्रदीपिका में कहा गया है—अविभाग-बोध की अग्नि से विभाग को
विलुप्त करके वेद्य-पीयूष को पीकर एवं शीघ्र ही संतुत्त, नीरोग एवं एकाकी विचरण
करने लगता है । यह क्रमार्थ का सार है और शक्तियों की परधारा भूमिका । उसी की
अनुज्ञा से सच्छिष्यों के ज्ञान के लिए इसका वर्णन किया गया है क्योंकि यह परधारा
भूमिका निर्विभाग है—
१-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय ।
३४८ स्पन्दकारिका
अथवा विभागबोधज्वलनेन विलाप्य वेद्यपीयूषम् ।
पीत्वा तृप्तोविचरन्त्रीरोगो योऽचिरात् सदैकाकी ॥
एतत्क्रममार्थसारं परधाराभूमिका च शक्तीनाम् ।
तदनुज्ञयाऽत्र कथितं सच्छिष्य विबोधनाय यथा ॥
कहा भी गया है—विभाग के हेतु ये प्रसिद्ध हैं—देश, काल, क्रिया और
आकार। जिसमें ये नहीं हैं, उसमें विभाग का कोई कारण ही नहीं है—
'देशकालक्रियाकाराः प्रसिद्धा भागहेतवः ।
तेन सन्ति पुनर्यस्य विभागस्तस्य किंकृतः ॥'
अन्यत्र भी कहा गया है—विषय सहित मन भस्म करना है। ज्ञानाग्नि अपनी दृष्टि
से उसे भस्म करती है। उसके भस्म हो जाने पर अन्तर्मुखता और बहिर्मुखता दोनों
समाधि हो जाती है—
मनः सविषयं दाह्यं ज्ञानाग्निदर्शनैर्दहेत् ।
अन्तर्बहिर्मुखश्चैवं समाधिरुपपद्यते ॥
इसके अतिरिक्त भी विद्वानों द्वारा कहा गया है कि—
विज्ञान की वाडवाग्नि प्रदीप्त होकर अपनी शक्ति से ज्ञेय विषय रूप समुद्रों को
निरन्तर ग्रस्त रहती है। अन्य कोई उसको ग्रस्त करने में समर्थ नहीं है। जल न मिलने
से पिपासा संवर्द्धित नहीं होती और बहुत सा जल मिल जाने पर तृप्ति या कृत-
कृत्यता नहीं होती । यह ज्ञान ऐसा विलक्षण बड़वानल है विज्ञान वाडवो दीप्तः स्व
शक्त्या ज्ञेयतोयधीन् ।
अजस्रं ग्रसते नान्यस्तद्ग्रासे शक्तिमान् भवेत् ।
नाऽप्राप्त्या पयसां तृष्णां प्राप्त्या वा भूयसामपि ।
यस्यास्ति कृतकृत्यत्वं कोऽप्यसौ वडवामुखम् ॥
'यस्मात्सर्वमयो जीवः' में इस विषय का सयुक्तिक वर्णन किया जा चुका है। तत्त्व
का स्वभाव विद्यात्मक ज्ञान स्वरूप है । अतः संपूर्ण ज्ञेय को उससे एक कर देना
चाहिए। बस, इस ऐक्य के होते ही दूसरी कलात्मक विकल्परूप शक्तियाँ फिर किसी
प्रकार की पीड़ा-बाधा नहीं पहुँचा सकतीं-अर्थात् स्वरूप से प्रच्युत नहीं कर सकतीं ।
कहा भी गया है—
आकाश एक और व्यापक है । दीवार आदि के संयोग से उसमें बाह्य-आभ्यन्तर
का भेद प्रतीत होता है । इसी प्रकार पशुपति तत्त्वज्ञ ग्राह्य और ग्राहक को एक ही रूप
देखता है । आपके समाधि स्वरूप में विक्षेप्य और विक्षेपक, व्याक्षिप्त और व्याक्षेप्य का
कोई भेद नहीं है—
एकं व्याप्ति व्योमकुड्यादियोगात्तस्मिन् बाह्याभ्यन्तरत्वं समाधिः ।
पश्यत्येकं ग्राहक ग्राह्यरूपं व्याक्षिप्ताक्षेप्यतस्त्वत्समाधिः ॥१
१. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३४९
सर्वदा = समस्त अनुभव की दशाओं में । प्रबुद्धस्तिष्ठेत् = प्रतिपादित
उपदेशों के अभ्यास से अनिमीलितसम्यक् ज्ञान दृष्टि वाला होकर जाग्रत हुआ स्थित
रहता है । किस प्रकार? ज्ञानेन = संवेदन के द्वारा । गोचरं = विषय को । आलोच्य =
(परिच्छेद्य) = सत्यासत्य का विवेचन करके । (आलोचन = देखना, परख, गुणदोष
विवेचन) ।
आरोपयेत् = अर्पित करना चाहिए ।। अभिन्न रूप से प्रतिपादित करना चाहिए
ततश्च = और उसके द्वारा । समस्त भावों के एक प्रमातृस्वरूपाभेद की प्रतिपत्तिरूप
आरोपण से ।। अन्येन = व्यतिरिक्ततापूर्वक अवभासमान प्रमेयों के द्वारा ।। वक्ष्यमाण
कलाद्यात्मक भावजात द्वारा । न पीड्यते = पीड़ित नहीं किया जाता । अहंभाव प्रति-
पत्तिरूपविनश्वर भाव द्वारा संसार-चक्र में, बन्धन के पाश से बन्धकर तिरस्कृत नहीं
होता ।।
कदर्थना = पीड़ा, अत्याचार । कदर्थित = तिरस्कृत, घृणित । तुच्छीकृत ।।
अत्याचार पीड़ित, तुच्छ। सारांश—
प्रमाता जिन-जिन रूपादिक अर्थों को चक्षु आदि के ज्ञान से आलोचना करता
है—निश्चय करता है (निश्चिनोति)—वे वे निश्चयावस्था में प्रामातृरूप से अभिन्न होते
हैं । निश्चितत्व वस्तु का प्रकाशमानत्व है । वह प्रकाशमान होने के कारण अभिन्न है
क्योंकि वह अन्य वस्तु बन ही नहीं सकता क्योंकि प्रकाश व्यतिरिक्त रूप संभव है ही
नहीं क्योंकि तब रूप प्रकाशित ही नहीं होगा । रूप की अभिव्यक्ति प्रकाश से ही संभव
है न कि प्रकाशाभाव से ।¹
भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दकारिकावृत्ति' में भट्टकल्लट इस कारिका की
व्याख्या करते हुए कहते हैं—
'प्रबुद्धोऽसंकुचितशक्तिः सर्वकालं तिष्ठेत्, ज्ञानेनालोच्य गोचरमज्ञेयं परिच्छिद्य ।
एवमेकत्र तत्वसद्भावे विद्यात्मके आरोपयेत् सर्वम् । ततोऽन्येन वक्ष्यमाणेन कलासमूहेन न
पीड्यते ॥²
प्रत्येक भाव में आत्मस्वरूप की व्याप्ति की अनुभूति के साधन—योगी को चाहिए
कि वह प्रत्येक प्रमेय (ज्ञेय) विषय का विश्लेषण करके (पर्यालोचना करके) ज्ञेय विषय
के साक्षात्कार की तीनों कोटियों—आदिकोटि, मध्य कोटि एवं अन्त कोटि—(ग्रहणेच्छा
काल, ग्रहण काल एवं विश्रान्ति काल) के स्तरों पर अपनी स्वरूपावस्था में अवस्थित
रहे । वह ऐसा करके भावना की शक्ति के द्वारा प्रत्येक विषय को एक ही तत्त्व के सद्भाव
पर (स्पन्दसत्ता पर) अभिन्न रक्खे । ऐसा करने से साधक को कलासमूह की पीड़ा का
शिकार नहीं होना पड़ेगा ।
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं³—प्रबुद्धः =
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।
२-३. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।
३५० स्पन्दकारिका
असंकुचित शक्तिः सर्वदा = सभी समय। ज्ञानेनालोच्य गोचरम् = ज्ञेय को परिच्छेद
सहित आलोचित करके।
एकत्रारोपयेत् = तत्त्वसद्भाव में (विद्यात्मक स्वरूप में) सभी को आरोपित
करना चाहिए। ततोऽन्येन = वक्ष्यमाण कला समूह के द्वारा। पीड्यते = पीड़ित किया
जाता है।
प्रबुद्ध व्यक्ति अपने प्रातिभ ज्ञान के द्वारा सृष्टि के प्रत्येक भाववैचित्र्य, पदार्थों की
विविधता, अनेकात्मकता एवं भिन्नताओं का इतना सूक्ष्म पर्यवेक्षण करता है कि उसे
समस्त भाव-वैचित्र्यों में आत्मा का विकास मात्र ही परिलक्षित होता है और वे किसी भी
दशा में अपनी अखण्ड स्वरूप भावना से कभी भेददृष्टि के गर्त में संवलित नही होते।
प्रबुद्धः = जागरुक योगी। 'स्पन्दकारिकाविवृति' के अनुसार—'अनिमीलित-
सम्यग्ज्ञानदृष्टिः जाग्रदेव'। जो योगी प्रत्येक प्रमेय को देखने के समय उसके प्राणभूत
स्वस्वरूप स्पन्द तत्त्व प्रत्यभिज्ञान करने में समर्थ हो और अपने स्वातन्त्र्य की असीमता
का अनुभव कर चुका हो वही है 'प्रबुद्ध' ॥
ज्ञेय विषय के साक्षात्कार की प्रक्रिया के चरण—इस प्रक्रिया के तीन चरण हैं—
(१) आदि कोटि—किसी ज्ञेय विषय को इन्द्रियों द्वारा गृहीत किये जाने के पूर्व
तद्विषयक उनकी जो ग्रहणेच्छा होती है वही है 'आदिकोटि'।
(२) मध्य कोटि—बाह्येन्द्रियों के द्वारा स्थूल रूप में ग्रहण काल में माया शक्ति
(स्वातन्त्र्य शक्ति) के द्वारा अहरूप से पृथग्भूत रूप में 'इदं' द्वारा वाच्य स्थूल पाँच
भौतिक रूप। सांसारिक अवस्था का पंचविषयात्मक संसारभाव।
(३) अन्त कोटि—इन्द्रियों के द्वारा गृहीत प्रमेयों के संवेदन के उपरान्त अवबोध
में विश्रान्ति काल। 'आदि कोटि' एवं 'अन्त कोटि'—इन कोटियों के स्तर पर अहं
विमर्श से युक्त जो प्रमाता का भाव है उसमें 'प्रमेय' के साथ 'प्रमाता' तद्रूपता की
अवस्था में (तदात्मकता = तादात्म्य की स्थिति में) अवस्थित रहता है। 'पशु' (संसारी)
ज्ञेय पदार्थों के आदि एवं अन्त कोटियों के रूपों की नहीं जान पाते प्रत्युत् वे ज्ञेय
पदार्थों के मध्य कोटि वाले स्थूल रूप को यथार्थ स्वरूप मानने का भ्रम पाले रहता है।
'प्रबुद्ध' योगी ज्ञेय पदार्थों के साक्षात्कार की तीनों कोटियों पर ज्ञेय पदार्थों के
अपने स्वनिहित एवं नित्यात्मक स्वस्वरूप का साक्षात्कार करता रहता है क्योंकि 'न
सावस्था न यः शिवः ॥'
स्वस्वरूपानुभूति के उपाय—प्रत्येक अनुभव में स्वरूप का साक्षात्कार होते
रहना तथा सभी ज्ञेय पदार्थों में अपनी ही स्थिति की संवेदना होते रहना ही वास्तविक
उपलब्धि है। प्रत्येक संवेदना, प्रत्येक ज्ञान, प्रत्येक अनुभव एवं प्रत्येक साक्षात्कार की
अवस्था में अपने स्वस्वरूप में ही अवस्थित रहने की प्रक्रिया यह है—अपने तात्विक
विमर्श के द्वारा प्रत्येक प्रमेय विषय का स्वरूप-विश्लेषण करके उसके तात्विक
आत्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा।
तृतीयः निष्यन्दः ३५१
एक उदाहरण लीजिए। एक स्वर्ण केयूर है। केयूर का आकार, उसकी गोलाई,
उसका आयतन, उसका रंग, उसकी मोटाई आदि उसके स्वस्वरूप नहीं है क्योंकि वे
परिवर्तित होते रहते हैं किन्तु उसका 'स्वर्णत्व' परिवर्तित नहीं होता। स्वर्णरूपत्व प्राप्त
करने के पूर्व भी वह वैचारिक आकार में विद्यमान रहता है अतः स्वर्ण केयूर का अपना
नित्य स्वस्वरूप चित्कलात्मक अहंविमर्शयुक्त स्पन्दतत्त्व ही उसका यथार्थ स्वस्वरूप है।
स्वस्वरूप विश्लेषण की प्रक्रिया का अनुवर्ती साधक अन्त में इस सत्य का
साक्षात्कार कर ही लेता है कि—समग्र विश्व स्वरूप स्पन्द मात्र है।
साधक को अपनी प्रत्येक अनुभव दशा में स्वरूपोन्मीलन हेतु निरन्तर आत्म-
विमर्श करते रहना चाहिए। अपने सद्धिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेय विषय का स्वरूप-
विश्लेषण करके उसके यथार्थ स्वरूप की पहचान करते रहना चाहिए।
किसी भी पदार्थ का आकार-प्रकार, ऊँचाई-लम्बाई-चौड़ाई गोलाई, रंग, रूप,
रूप-रंग आदि विशेषताएँ उस पदार्थ का वास्तविक स्वरूप नहीं है क्योंकि ये बाह्य
लक्षण तो परिवर्तनशील, कल्पित एवं नश्वर हैं। इन सबका त्याग करके उस पदार्थ का
जो सारतत्त्व शेष रह जाता है वह चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त
शेष कुछ नहीं हैं। स्वरूप विश्लेषण की पद्धति द्वारा ही अपना एवं जगत् के स्वरूप
का अनुसंधान करना चाहिए क्योंकि तभी स्वस्वरूप की पहचान संभव है। विश्व स्पन्द
का ही मूर्त विग्रह है। 'ज्ञानमन्नम्' (शिवसूत्रः २-९) में इसी दृष्टि का प्रतिपादन किया
गया है। स्वरूपानुप्रवेश होने पर तो—
'मृत्युञ्च कालं च कलाकलापं विकारजातं प्रतिपत्तिसाम्यम् ।
ऐकात्म्यनानात्म्य वितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥' १
पशु कौन है? शाब्दी प्रभाव से पशुत्व प्राप्ति—
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कला विलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ ४५ ॥
शब्दसमूह से समुद्भूत शाब्दीशक्तियों के भोग का विषय बनकर एवं कलावर्ग
के कारण विलुप्त वैभव वाला होकर (वही पति प्रमाता) 'पशुप्रमाता' कहलाने
लगता है ॥ ४५ ॥
- सरोजिनी *
शब्दराशिसमुत्थस्य = कादिवर्गात्मक शब्द-समूह से समुद्भूता वर्णसमुदाय ही
'शब्दराशि' है। अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त मातृकायें ही शब्दों की जननी हैं क्योंकि
समस्त शक्तियाँ वर्णात्मक हैं। शक्तिवर्ग = शक्तिचक्र। ब्राह्मी आदि शक्तियों का समूह।
कला = ककारादिक वर्ण। विलुप्त विभवो = नष्ट वैभवों वाला। जिसके निखिल
दिव्य ऐश्वर्य नष्ट हो चुके हों वह वैभव हीन जीव (पशु)। पशुः स्मृतः = पशु के रूप
में स्मरण किया जाता है। पशु कहा जाता है। २
१. शिवसूत्र : भर्गशिखा। २. स्पन्दप्रदीपिका।
३५२ स्पन्दकारिका
पशुपति 'पशु' कैसे बन जाता है? उत्तर—ब्राह्मी आदि देवियों के शक्ति समूह की
(ककार आदि वर्णमाला रूप) कलाओं के वैखरी आदि अचेतन शब्दों को उपयोग द्वारा
पशुपति 'पशु' बन जाता है । 'पशु' इन निम्नतम स्तर के निष्प्राण शब्दों का उपभोग
करता सा प्रतीत तो होता है किन्तु कारिकाकार कहते हैं कि वह उनका भोग नहीं करता
प्रत्युत् उनकी भोग्यसामग्री बन जाता है ('भोग्यताम् गतः सन् स पशुः स्मृतः') और
इसीलिए वह 'पशु' की श्रेणी में आ जाता है१ क्योंकि—'भोगा न भुक्ताः वयमेव भुक्ता-
स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः । कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव
जीर्णाः'२ भोग्य बनने के कारण उसकी महाव्याप्ति एवं वैभव नष्ट हो जाता है जिसके
कारण देवकोटि से पशुकोटि में आ जाता है—'कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवो
हतमहाव्याप्तिः स्वभावात् प्रच्यावितोऽत एवास्य भोग्यतां गतः सन् पुरुषः पशुरुच्यते
अज्ञत्वात् ॥'३ 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में कहा गया है कि—सभी भाव अपनी क्रोड में अपनी
अंगचेष्टा के समान हैं । उनका स्वामी 'प्रमाता' 'संवित्' या 'शिव' के नाम से जाना
जाता है । किन्तु जब वह उन्हीं का दास बन करके उनके बन्धन-पाश में फंस जाता है
तब वह कर्म की कीचड़ से लथपथ होकर 'पशु' कहा जाने लगता है—
'स्वांगरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।
मायातो भेदिषु क्लेशं कर्मादिक्लुषः पशुः ॥'४
भेदात्मक ग्रंथियों के विभेदन के पूर्व व्यक्ति कर्मात्मैक्य के सम्यक् ज्ञान से रहित
होने के कारण (पशुपति होकर भी) 'पशु' ही कहा जाता है—
'भेदग्रन्थिविभेदे हि कर्मात्मैक्यं प्रपद्यते ।
सोऽविज्ञातः पशुः प्रोक्तो विज्ञातः पतिरेव सः ॥'
अर्थात् ग्रंथिभेद के अनन्तर द्वैत नहीं रह जाता अतः इसे जानने वाला व्यक्ति तो
'पशुपति' कहा जाता है किन्तु इसे न जानने वाला पशु कहा जाता है ।
'शैवपरिभाषा' में कहा गया है—'तत्र पशुर्नाम देहेन्द्रियादिव्यतिरिक्तो नित्यश्चि-
दात्मकोऽनेको विभुरनादिमलावृतोऽस्वतन्त्रः कर्ता च ।' श्रीमत्पराख्य में कहा गया है—
'देहान्योऽनश्वरो व्यापी विभिन्नः समलोऽजडः ।
स्वकर्मफलभुक्कर्ता किञ्चिज्ज्ञः सेश्वरः पशुः ॥'५
ये पशु तीन प्रकार के हैं—(१) 'सकल' (२) 'प्रलयाकल' (३) 'विज्ञानाकल'
'पशवस्त्रिविधा ज्ञेयाः सकलः प्रलयाकलः ।
विज्ञानाकल इत्येषां शृणुध्वं लक्षणं क्रमात् ॥'
'सकलपशु' : मलोपरुद्धदृक्शक्तिस्तत्सृत्यैकलादिमान् ।
भोगाय कर्म सम्बन्धः सकलः परिपठ्यते ॥
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. भर्तृहरि—'वैराग्यशतक' ।
३. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ।
५. शिवाग्र योगीन्द्रज्ञान शिवाचार्य—'शैवपरिभाषा' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३५३
'प्रलयाकल पशु' : प्राग्वन्निरुद्धच्छक्तिः कर्मपाकात्कल्लोज्झितः ।
कर्मणैव्यत्कला योग्यो यस्स च प्रलयाकलः ॥
विज्ञानाकलपशु : मलोपरुद्धशक्तित्वाच्छून्यकल्पस्वदृक्क्रियः ।
तृतीयः पठ्यते तन्त्रे नाम्ना विज्ञानकेवलः ॥१
(ज्ञानरूपा कला येषामिति विज्ञानकलाः ॥)
'पाश' क्या है—तत्र पाशत्वं शिवानन्दाभिव्यक्तिविरोधित्वम् । 'पाश' के भेद—
'अयं च पाशः पंचविधः । आणवं तिरोधायकशक्तिर्बिन्दुर्माया कर्म चेति' । (१) आणव
(२) तिरोधायक शक्ति (३) बिन्दु (४) माया (५) कर्म । इन्हीं पाशों से आवृत्त जीव
'पशु' कहलाता है ।
आत्मा की तीन अवस्थायें भी होती हैं—(१) केवलावस्था (२) सकलावस्था (३)
शुद्धावस्था ॥
भावों की दृष्टि से देखें तो तीन भाव होते हैं—(१) 'पशुभाव' (२) 'वीरभाव'
(३) 'दिव्यभाव' । पशु कौन-कौन?२
'सर्वे च पशवः सन्ति तलवद्भूतले नराः ।
तेषां ज्ञानप्रकाशाय वीरभावः प्रकाशितः ।
वीरभावं सदा प्राप्य क्रमेण देवता भवेत् ॥'
(१) जिन जीवों में अविद्या के आवरण के कारण परिपूर्ण अद्वैतज्ञान का
किंचिन्मात्र भी प्रकाश नहीं होता, उनमें तमोगुणाधिक्य के कारण जो मानसिक अवस्था
उत्पन्न होती है उसे पशुभाव कहते हैं ।
(२) इन पशुओं के द्विविध भेद हैं—(१) उत्तम (२) अधम ।
(क) संसार के मोह जाल में अधःपतित होकर बन्धनों से जकड़ा हुआ एवं जो
अधम प्राणी होता है वह है—'अधम पशु' ।
(ख) जो सत्कर्मपरायण, भगवद्विश्वासी जीव है किन्तु द्वैतभावापन्न भी है—वह है
'उत्तम पशु' । द्वैतबुद्धि इन दोनों में समान रूप से विद्यमान रहती है ।३
भट्टकल्लट ने स्पन्दकारिकावृत्ति में इस कारिका की इस प्रकार व्याख्या की है—
'शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादि वर्गात्मकस्य ब्राह्मयादिशक्तिसमूहस्य
भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः स्वस्वरूपात् प्रच्य-
वितः पशुरुच्यते ॥'
अर्थात् अकार से क्षकार पर्यन्त वर्णसमष्टि को शब्दराशि कहते हैं स्वतन्त्र पुरुष
(स्वतन्त्र पति प्रमाता) उसी शब्दराशि से समुद्भूत और क वर्ग आदि वर्गों के रूप वाली
ब्राह्मी आदि पशु शक्तियों के समूह के वश में रहता है । यह वशवर्तिनी अवस्था ही उसे
पशु बनाती है । इन्हीं ब्राह्मी आदि शक्तियों के साथ सम्बद्ध कलाओं ने ही अर्थात् ककार
१-२. 'शैवपरिभाषा' । ३. शाक्तदर्शनम् ।
स्पं० २३
३५४ स्पन्दकारिका
आदि स्थूल अक्षर समूह ने पुरुष के वैभव को नष्ट किया है और उसको स्वभाव से च्युत
कर दिया है । १
१. शक्ति चक्र : शब्द का प्रयोग शब्दान्तर के साथ अनेक बार प्रयुक्त हुआ है ।
यथा—(१) 'तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ (का० क्र० १)
(२) शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कला विलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (स्पन्द का० ४५)
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसंदोह' में 'शक्ति चक्र' की व्याख्या करते हुए 'शक्ति'
को इस प्रकार परिभाषित किया है—'प्रकाशस्यैव भगवतः प्रकाशमानं विश्वम् अस्य
शक्तयः, तासां यत् चक्रं संयोजनादिवैचित्र्य-व्यवस्थितः समुदायः स एव विभवः स्फीतता
तस्य प्रभवः प्रभवति अस्मात् इति ॥'
अर्थात् प्रकाशस्वरूप शिव का जो प्रकाशमान विश्व है उसकी शक्तियाँ ही 'शक्ति
चक्र' में शक्ति कही गई है । २
२. 'शक्ति चक्र' का द्वितीय अर्थ—शक्तिचक्र = इन्द्रिय वर्ग । विभव = निज
निज विषय—अर्थात् प्रवृत्ति आदि ।
३. शक्ति चक्र का अन्य अर्थ—करणेश्वरी चक्र । करण शक्तिवर्ग । विभव =
विचित्र सृष्टि संहारादिकारित्व । प्रभव—उसका प्रभव (क्रमार्थविभासनकारित्व कृतमक्रम-
महाप्रकाशमय) ।
करण वर्ग की अपनी प्रवृत्त्यादि तथा करणेश्वरी चक्र का सृष्ट्यादिकारित्वं एवं
उसकी यह व्यापार-प्रवृत्ति । ३
४. शक्ति चक्र का अन्य अर्थ—मन्त्र वर्ग में मुद्रा समूह । विभव—उसका
विभव । अर्थात् सिद्धि, साधन एवं समर्थत्व । प्रभव = प्रभवोत्पन्न—उत्पत्ति-विश्रान्ति
स्थान ॥ यथा—श्लोक (२।१) (२।२) (तदाक्रम्य बलं मन्त्राः ॥ 'इत्यादि ... निरञ्जनाः'
में व्यक्त विचार) ।
त्रिविध = पर । अपर । परापर: ३ प्रकार की सिद्धियाँ । ४
५. शक्तिचक्रविभवेन = 'मन्त्रादिसामर्थ्यात्मना प्रभादीप्तिः यस्य साधकस्य
चित्तस्य, तत वाति गच्छति प्राप्नोति अधितिष्ठति, गन्धयति च विनाशयति स्वात्मनि
विश्रमयति यः तम् ।' = 'शक्तिचक्रविभवं' । ५
६. शक्तिचक्रविभव—दीक्षानुग्रहध्येय (ध्यातव्य देवतात्मना तादात्म्यम्) समाप-
त्यादिना सामर्थ्यसंपदा विभवो यस्य आचार्यस्य उदयः तस्य (प्रभवं) ॥ (दे०
अयमेवोदयस्तस्य .... (२।६) । ६
७. शक्तिचक्रविभवप्रभवं—'शक्तयो ब्राह्मयादिदेव्यो (कादिक्षात तत्तद्वाच-कात्मनः)
ब्रह्मादि कारणमाला च, तासां सम्बंधि चक्रं स्वभावशून्यपशुः प्रमातुः अद्वय
१. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' । २-६. स्पन्दसंदोह ।
तृतीय: निष्यन्द: ३५५
रूपोर्ध्वभूम्यतारोहणक्षमो भेदमयाधरसरणिसञ्चारचतुरश्च व्यूहः तस्य यो विभवः तथा
कार्यकारित्वं तस्य प्रभवं । (दे० 'शब्दराशि... ३।१३) ।१
'तन्मात्रोदय ... (३।१७) (३।१८) आदि ॥
इस प्रकार के शक्तिचक्र का जो 'विभव' है—अर्थात् 'स्वस्वभावपदापेक्षया
अधराधर्भूत्यागेन ऊर्ध्वोर्ध्वारोहणक्षमता ।। (दे० स्वमार्गस्था ज्ञाता ... (३।१६))२
८. 'शक्तिचक्रं'—खेचरी, गोचरी, दिक्करी, भूचरी आदि—बाह्य-आन्तरताभेद-
भिन्ननानायोगिनीगण, तदुपलक्षितवीरव्रातश्च तस्य यो विभवः अतीतानागत ज्ञानाणिमादि-
प्राप्ति स्वविषयाभोग समय पूर्णप्रथावाप्त्यानन्तक्षुद्रा सिद्धिलाभम् ऐश्वर्यं, 'प्रभवः' प्राति
पूरयति यः स शक्तिचक्रविभवप्रः स च असौ अभो भवति तेन तेन रूपेण इति कृत्वा,
तं ॥ (दे० यथेच्छा.... (३।१) कुतः सा .... (३।८) आदि ।३
शक्तिचक्र—'वामेश्वर्याधिष्ठितानि खेचरी-गोचरी-दिक्करी-भूचरी चक्राणि-
आन्तराणि, बाह्यानि च ।'
वामेश्वरी शक्ति से प्रसारित आन्तर शक्तियाँ—अपर, परापर, पर, अघोर-घोर-
घोरतर, खेचरी-गोचरी-भूचरी-दिक्करी रूप चक्र एवं तथाविध वीरव्रत ।
शक्तिचक्र विभव—'आगमसंप्रदायप्रसिद्धनानादेवतापरमार्थस्य रागद्वेषविकल्पादि
प्रत्ययग्रामस्य, तथा देहाश्रित तत्तद्देवता-परमार्थनानाधात्वादिगणस्य, यो विभवः,
तत्तदुपनिषत्सिद्धः प्रभावविशेषः, मायामूढान् प्रतिबन्धहेतुत्वं च तस्य उभयस्यापि 'प्रभव' ।
(दे० गुणादि.... (१।२) 'सेयं क्रियात्मिका शक्ति .... (३।१६)) ।४
बन्धन एवं मोक्ष दोनों का साधन एक ही है—'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य
पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका (४८) ।
'येन येन निबध्यन्ते जन्तवो रौद्रकर्मणा ।
सोपायेन तु ते नैव मुच्यन्ते भवबन्धनात् ॥'
—मुक्ति किसी नूतन वस्तु की उपलब्धि नहीं है प्रत्युत भूली हुई वस्तु को पुनः
याद कर लेना एवं उसे जान लेना ही मुक्ति है एवं न जानना बन्धन का नरक मार्ग है—
'कुलसारमजानन्तो ह्यद्वये निपतन्ति ये ।
स्वचित्तोत्थविकल्पान्धा निरये निपतन्ति ते ॥'
शक्तिचक्र = स्वतन्त्र एवं अद्वय निज महाप्रकाशानुप्रवेशकारी स्वमरीचि निचय ।
विभव = स्वामोदजृंभात्मक विभव ॥५
शक्तिचक्रविभव = परसंविद्देवतास्फार । विभव = माहात्म्य ।६
प्रभव = शक्ति चक्र के विभव (माहात्म्य) से उत्पन्न ॥
शक्तिचक्र = रश्मिपुञ्ज । विभव = अन्तर्मुख विकास । प्रभव = उदय या
अभिव्यक्ति ॥७
१-५. स्पन्दसंदोह। ६-७. स्पन्दनिर्णय।
३५६ स्पन्दकारिका
सारांश— 'शक्तिचक्र' शक्तियों का समूह । (शक्तियाँ = वामेश्वरी । खेचरी ।
दिक्चरी आदि) इन्द्रियों का समूह । मन्त्रों का चक्र । ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि शक्तियों का
समुदाय (Wheel of powers) ।
रामकण्ठाचार्य की व्याख्या— पशु = 'पराधीनसर्ववृत्तित्वेन अनवभासितात्मा
पशुः । स = वह प्रतिपादयितव्य आत्मा रूपी ईश्वर जो कि प्रत्यभिज्ञा के अभाव में
'पशु' बन जाता है । स्मृतः = संसाररूपी क्रीड़ा के अनादि होने से (जो 'पशुपति'
अनादि काल से वर्तमान काल तक) 'पशु' के रूप में स्मरण किया जाता रहा है । कैसा
होकर स्मरण किया जाता है? 'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य कलाविलुप्तविभवो
भोग्यतां गतः सन्' ।
शक्ति = पारमेश्वरी शक्ति । वाक् के रूप में प्रसृत आदि शान्त वर्ण-
समुदायात्मक शक्ति ।¹ अम्बा—ज्येष्ठा-रौद्री-वामा-आदि का शक्तिचक्र ।² 'शक्तिचक्र
संधाने विश्वसंहारः । (शिवसूत्र ६) में भी 'शक्तिचक्र' शब्द का प्रयोग आया है ।
पशुत्व और पशु का स्वरूप— 'पशु' के निम्न लक्षण हैं— (१) शब्दराशि से
समुत्थित (अकारादि सकारान्त शब्द-समूह से आविर्भूत) ब्राह्मी आदि शब्दाधिष्ठात्रियों
(शाब्द शक्तियों) के वशीभूत और उनका क्रीत अनुचर ।
(२) अकारादिक्षकारान्त कला समूह के द्वारा 'स्वातन्त्र्यशक्ति' रूप वैभव से
हीन—पति प्रमाता ही 'पशु' कहलाता है ।
शब्दराशि—अकारादि क्षकारान्त वर्ण समूह । ('मातृका') ।
शक्तिवर्ग—कादिवर्गात्मक ब्राह्मी आदि शक्तियों का समूह । ब्राह्मी आदि शक्तियों
के साथ सम्बद्ध कलाओं ने (ककारादि क्षकारान्त 'शब्दराशि' ने) 'पति' के स्वातन्त्र्य
शक्ति रूप वैभव को नष्ट कर दिया है और उसे उसके स्वस्वभाव से च्युत कर दिया है ।
भोग्यताम् = शक्ति वर्ग की अधिष्ठात्री देवियों का भोग बना हुआ होना । भोक्ता
तो ब्राह्मी आदि (क आदि आठ वर्गों की अधिष्ठात्री देवियाँ) अधिष्ठात्री शक्तियाँ हैं और
भोग्य हैं पशु । ये शक्तियाँ निम्नांकित हैं—
विमर्शशक्ति के चार रूप = पीठेश्वरी
┌──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┬──────┐
माहेशी ब्राह्मी कौमारी वैष्णवी ऐन्द्री याम्या चामुण्डा योगेशी
वर्ण समाम्नाय के अष्टवर्ग—(नव वर्ग)—
┌───┬───┬───┬───┬───┬───┬───┬───┐
अवर्ग कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग क्षवर्ग
शब्दराशि = वर्ण समुदाय = वर्णमाला = 'मातृका'
१. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । २. शिवसूत्रविमर्शिनी (सूत्र ४) ।
तृतीयः निष्यन्दः ३५७
'शब्दराशि' के क्रम
'मालिनी क्रम' ('मालिनीविजयोत्तर तन्त्र) 'मातृका क्रम'
(न से क तक) (अ से क्ष पर्यन्त)
'शब्दराशि' का आविर्भाव केन्द्र
प्रकाशरूप शिव विमर्शरूपा शक्ति
(सा म र स्य)
(शिवशक्ति का सामरस्य) = सामरस्य = विश्व की आत्मभूत एवं आधारभूता सत्ता
सामरस्य
('अहं'-विमर्श) 'सामरस्य' = महामन्त्र रूप अहं विमर्श
'अ' (अनुत्तर तत्त्व) 'ह्'
शिवतत्त्व शक्ति तत्त्व
पराहंता (अहन्ता)
──> (इसी भेद शून्य 'अहं' में मयूराण्डरसवत् समस्त 'शब्दराशि' = 'परावाक्'
रूप में अन्तर्निहित हैं ।) 'अहंरूपा' विमर्शशक्ति में स्थूल वाच्यवाचकभावमय विश्व का
अवभासन करने की ओर उन्मुख दशा का श्री गणेश ──> (अहंरूपा विमर्शशक्ति) ──>
'इच्छा-शक्ति' के रूप में रूपान्तरण ──> ज्ञानशक्ति ──> क्रियाशक्ति (ज्ञान + क्रिया-
शक्ति = 'माया') ──> (बहिर्मुखी प्रसार के रूप में प्रसृत) ──> 'मातृका' (का विभाजन) ।
मातृका
२ प्रकार ९ प्रकार ५० प्रकार
(बीज + योनि) (१६ स्वर ३४ व्यंजन) प्रत्येक
(क) अ से अः = स्वर = 'बीज' = शिवभाव अक्षर को शक्ति के विभिन्न एवं
(ख) क से क्ष = व्यञ्जन = 'योनि' = शक्तिभाव । पृथक्-पृथक् रूप मानकर ५०
प्रकार माने गए हैं ।
अवर्ग कवर्ग चवर्ग टवर्ग तवर्ग पवर्ग यवर्ग शवर्ग क्षवर्ग
वर्ण समाम्नाय के अष्टवर्ग हैं या कि नववर्ग?
वर्ग तो आठ ही हैं क्योंकि 'क्ष' (क + श का मिश्रित रूप) स्वतन्त्र शब्द नहीं है ।
यह 'क' एवं 'श' का संयुक्त रूप है । फिर इसे स्वतन्त्र वर्ग का महत्त्व क्यों दिया
गया? इसे पृथक् वर्ग क्यों माना गया?
३५८ स्पन्दकारिका
(१) अनुत्तर वाचक = ककार
(२) विसर्ग वाचक = शकार
क + श का संयुक्त रूप है—'कूटबीज'।
क्ष का महत्व—'कूटबीज' (क+श)=मातृका का प्रत्येक वर्ण शिवभाग एवं शक्ति
भाग का संघट्टरूप है। इसीकारण 'क्ष' को वर्णमाला के अन्त में स्थान दिया गया है।
शक्तिवर्ग के भेदत्रय (मालिनीविजयोत्तर तन्त्र)
घोरतरा (अपरा) | घोरा (परापरा) | 'मालिनी विजय' | अघोरा (परा)
(तामसिक) | (राजसिक) | (मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्वं | (सात्विक) (सात्विक
(तामसिक प्रकृति | (राजसिक प्रकृति | वज्जनयन्ति याः। | प्रकृति वालों के लिए
वालों के लिए यह | वालों के लिए यह | मुक्तिमार्ग निरोधिन्या | यह शक्तिवर्ग
शक्तिवर्ग अत्यन्त | शक्तिवर्ग भी | स्ताः स्युर्घोरा परापराः। | कल्याणकारी है।)
भयानक है।) | भयोत्पादक है।) | विषयेष्वेव संलीना- | योगियों को शिवभाव
| | नधोऽधः पातयन्त्यणून। | तक पहुँचाने वाली
| | रुद्राणून या समालिंग्य | शक्तियाँ ।।
| | घोरतर्योऽपरा |
| | स्मृताः ॥') |
कला समूह—कला विलुप्तविभवो।
प्रश्न—कला समूह का आरंभ कवर्ग से ही क्यों किया जाता है? इसका आरंभ
अवर्ग से क्यों नहीं किया जाता?
जब स्वर और व्यञ्जन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में रहते हैं तभी विकल्प-
परम्पराओं में क्षोभ प्रारंभ होता है अन्यथा केवल स्वर या केवल व्यञ्जन पृथक्-पृथक्
किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते। इन दोनों के पारस्परिक संमिश्रण को 'बीजयोनि
संक्षोभ' के नाम से अभिहित किया जाता है।
उत्तर मालिनी क्रम—न, ऋ, ॠ, लृ, ॡ, च ध, ई, ण, उ ऊ, ब, क, ख, ग,
घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, ड, ढ, ठ, झ, ज, र, द, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष,
क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, क। (आध्या० रहस्य साधना में प्रयुक्त)।
क्रमद्वय (१) पूर्वमालिनी क्रम, मातृका क्रम, सिद्धाक्रम।
(२) उत्तर मालिनी क्रम—'न से क ॥'
(क) 'स्वच्छन्द तन्त्र' को मान्य—'पूर्वमालिनी क्रम' अकारादि क्षकारान्त क्रम
(ख) 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' को मान्य—'उत्तर मालिनी क्रम'
'शब्द' एक जड़ ध्वनि नहीं प्रत्युत प्रत्येक शब्द स्पन्दमयी चेतन शक्ति है।
प्रत्येक जीव तभी तक शक्तियों का दास है जब तक कि उसे अपने भोक्ताभाव का
तृतीयः निष्यन्दः ३५९
परिज्ञान एवं अनुभव न हो । ‘मालिनीविजयोत्तरतन्त्र’ के ‘उत्तरमालिनी क्रम’ के
अनुसार—
वर्ण एवं तत्त्व—
(१) ‘क’ = अन्तिम वर्ण ॥ = पृथ्वी तत्त्व ॥
(२) द से झ = २३ वर्ण = जल से पदार्थतक २३ तत्त्व ॥
(३) च से अ = १४ वर्ण = पुरुष से माया पर्यन्त तत्त्व ।
(४) इ से घ = ३ वर्ण = शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव ॥
(५) घ से न = १६ वर्ण = शिव तत्त्व ॥
शक्तिपात या परमात्मानुग्रह प्राप्त योगियों को ये शाब्दी शक्तियाँ शब्दराशि में
निहित शाक्तबल का अनुभव कराकर शिव भाव पर भी पहुँचाती हैं । वाणी ही मनुष्य का
विनाश भी करती है और विकास भी-उन्नति भी अधःपतन भी ।
भट्टकल्लट को ‘मालिनी क्रम’ स्वीकार्य नहीं था । उन्होंने मातृका क्रम ही
स्वीकार किया ॥
भट्टकल्लट की व्याख्या—(‘स्पन्दसर्वस्व’)—
शब्दराशि = अकारादिक्षकारान्तवर्णमाला । समुत्थस्य = तत्समुद्भूतस्य शक्ति-
वर्गस्य = कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि शक्ति समूह का ।
भोग्यताम् = ‘भोग्यतां गतः पुरुषो’ ॥ कलाविलुप्तविभवो = ब्राह्म्यादीनां
कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्त विभवः स्वस्वभावात् प्रच्यावितः पशुरुच्यते ॥
कला = ककारादि हकारान्त समस्त स्वर-व्यञ्जन समुदाय = ‘कला समूह’ ॥
कलासमूह ने शिव की स्वात्मशक्ति (स्वातन्त्र्य शक्ति) को छीनकर जीव को दरिद्र
बना दिया है ।
शब्दराशि = मातृका (अकारादिक्षकारान्त वर्णसमाम्नाय) ॥ ‘मातृकाशक्ति’ अशेष
भेदयुक्त वाच्यवाचकस्वरूप स्थूल शब्द समूह को अपने सुक्षि में अभेदात्मना (स्पन्दनमय
विमर्श मात्र के रूप में) धारण किए हुए ‘पराशक्ति’ के रूप में अवस्थित है । यह
‘पराशक्ति’ (परावाक्) पूर्णाहन्तास्वरूपा ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ ही है—
‘स्वातन्त्र्यशक्ति रे वास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा ॥ (स्पन्दनिर्णयः ३.१३)
शब्दराशि क्या है? ‘साहि भगवती अशेष-वाच्यवाचकात्मक जगद्भेद चमत्का-
रात्मक शब्दराशि विमर्श परमार्था (स्वच्छन्द तन्त्र ११.१९९) ।
शब्दराशि ही ‘मातृका’ के नाम से भी अभिहित की जाती है क्योंकि ‘अज्ञाता माता
मातृका विश्वजननी’ (शिव सूत्रविमर्शिनी १.४) यह अज्ञाता है और विश्वमात्रा—जगत-
प्रसविनी है । पराशक्ति (परावाक् के रूप में व्यक्त होकर एवं अपना प्रसार करती हुई) अ
से क्ष पर्यन्त समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म वर्ण समूह का प्रसार करके अनन्त वाच्यों एवं
अनन्त वाचकों वाले विश्व को अवभासित करती हुई स्थित है । ‘विमर्श शक्ति’ ही अपने
३६० स्पन्दकारिका
बाह्योन्मुखी प्रसार—बहिर्मुखी अभिव्यक्ति के माध्यम से शब्दराशि के रूप में रूपान्तरित
हो जाती है।
तान्त्रिक शैवदर्शन की मान्यता है कि 'पतिप्रमाता' की स्वात्मगता स्वाभिन्ना,
स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति (स्वतन्त्र संवित् शक्ति) भेदात्मिका बहिर्विमर्शावस्था में
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं 'वैखरी' के द्वारा उच्चारित वर्णमाला के रूप में प्रसरण करती
है। यही वर्णमाला जो कि शक्ति का केन्द्र है एवं शक्ति का प्रतीक है और अपने ताने-
बाने में पतिप्रमाता को उलझाकर अस्वतन्त्र पशुप्रमाता बना देती है। समस्त वाग्व्यवहार
का आधार यही वर्णमालात्मिका वाक्शक्ति है। 'वर्ण' शक्तिरूपात्मक है अतः वे क्षोभ
एवं स्पन्दन (हलचल) भी आविर्भूत करते हैं। इन्हीं के द्वारा अनन्त विकल्प-श्रृंखलाओं
का आविर्भाव होता है और प्राणी माया बन्धन, अज्ञान एवं अशान्ति के चक्रव्यूह में फँस
जाता है।
अ से क्ष पर्यन्त शब्दराशि का प्रसार = चित् शक्ति का बहिर्मुखी प्रसार। इस
शब्द राशि का ८ वर्गों में विभाजन किया गया है। शक्ति भी ब्राह्मी आदि ८ प्रकार के
विकल्पस्वरूपात्मक शक्ति-कुटुम्ब का रूप धारण करके प्रत्येक वर्ग की एक-एक
अधिष्ठात्री बनकर स्थित हो जाती है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का कार्य यह है कि वे
चिद्रूपा आत्मसत्ता को चारों ओर से घेरकर उसे ढक लेती है। इन ८ शक्तियों के
परिवार को 'मातृका' कहा गया है। ब्राह्मी आदि शक्तियों का अपना यह परिवार
अपने को जन्म देने वाली चित् शक्ति को इस प्रकार ढक लेता है कि जीवों को चित्
शक्ति की झलक तक नहीं मिल पाती।
ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (२.१.१) में कहा गया है कि ब्राह्मी आदि शक्तियाँ
माताएँ कहीं गई है और उनका अपना परिवार है और परिवार के अनेक सदस्य है—
'एतदेव च ब्राह्म्यादि मातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि
चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवार वाच्येव न
जननीवाचकः ॥'
परि तो वारणात् परिवार एव—चारों ओर से रोकने के कारण इस समुदाय को
'परिवार' कहा गया है। यह शाब्दी शक्तियों का 'परिवार' चित् शक्ति को जीवों के समक्ष
प्रकट होने से रोकता है अतः इसे 'परिवार' कहा गया है। 'अहं' शब्द में 'अ' तो
अनुत्तर शिवतत्त्व है और 'ह' शक्तितत्त्व है। इनकी प्रत्याहारावस्था ही 'अहंता' है। इसी
अहंता के गर्भ में समस्त वर्ण समुदाय ('शब्दराशि') गर्भीकृत है—
'अतएव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एत-
दात्मकमेव विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहं विमर्शस्य तत्वम् ॥
(शिवसूत्रविमर्शिनी: २.७)
मालिनीविजय (३.९.१०) में इस शब्दराशि के २, ९ एवं ५० भेद किए गए
हैं— 'तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पंचाशद्धा च मालिनी ॥
तृतीयः निष्यन्दः ३६१
इस समस्त वर्ण—समुदाय को 'बीज' एवं 'योनि' में भी विभाजित किया गया
है। (क) अ से अ = बीज (स्वर समूह) (ख) क से क्ष = योनि (व्यञ्जन समूह)—
बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा बीजं स्वरा मताः ।
कादिभिश्च स्मृता योनिः ..... ।। (मा० वि० ३.१०.११)
बीज—शिवभाव। योनि—शक्तिभाग—
'म बीजत्र शिवः शक्तियोंनिरित्यभिधीयते ।।' (३.१२)
नवधावर्ग भेदतः कहकर ८ के स्थान पर शब्दराशि के ९ वर्ग भी बताए गए हैं।
सामान्यतः वर्ग ८ ही है—'तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि 'चाष्टकम्' । 'क्ष' का रहस्य यह
है कि इसमें जो 'क' एवं 'श' वर्ण हैं उनमें 'क' शिव का वाचक है और 'स' शक्ति का
वाचक है । 'क' एवं 'स' का सम्मिलित रूप 'शिवशक्तियामल' (प्रकाश विमर्श का
संघट्ट) सूचित करता है और यह यामल, संघट्टण 'सामरस्य' ही सृष्टि, अस्तित्व एवं
विश्व की आत्मभूत सत्ता है—यह 'क्ष' कूटबीज है—
तदियत्पर्यन्त यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार सकार प्रत्याहारेण अनुत्तरविसर्ग
संघट्टसारेण कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते ।। (शिवसूत्र वि० २.७)। शब्दराशि की ये अधि-
ष्ठात्री शक्तियाँ 'पीठेश्वरी' कहलाती है और प्राणियों को मायिक प्रपञ्च में हठपूर्वक
नचाती रहती है—
'करण्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः ।
पीठेश्वर्यो महाघोरा नर्तयन्ति मुहुर्मुहुः ।।'
कला—'कलाविलुप्तविभवो' में 'कला' क्या है? 'जब सर्वकर्तृत्व शक्ति संकुचित
होकर स्वल्पकर्तृत्व शक्ति बनकर आत्मा को परिमित कर देती है तब उसे 'कला' कहा
जाता है'—
'सर्वकर्तृताशक्तिः संकुचिता कतिपार्थमात्र परा ।
किंचित्कर्तारममुं कलयन्ती कीर्त्यते कला नाम ।।'
'षट्त्रिंशत्तत्त्वसन्दोह' —क्षेमराज
शब्द राशि के ९ वर्गों का विवरण—
| सं० | वर्ग | वर्ण | शक्ति |
| १ | अवर्ग | अ से अः | अमा |
| २ | कवर्ग | क से ङ | कामा |
| ३ | चवर्ग | च से ञ | चार्वङ्गी |
| ४ | टवर्ग | ट से ण | टङ्कधारिणी |
| ५ | तवर्ग | त से न | तारा |
| ६ | पवर्ग | प से म | पार्वती |
| ७ | यवर्ग | य, र, ल, व | यक्षिणी |
| ८ | शवर्ग | श, ष, स, ह | शारिका |
| ९ | क्षवर्ग | क्ष | कूटबीज |
३६२ स्पन्दकारिका
'शिवसूत्र' (३।१९) में शाब्दी-प्रभुत्व ।
'शिवसूत्र' (३।१९) के 'कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः' (३।१९) में बताया गया है कि
शब्द-साहचर्य या शब्दों की दासता प्राणियों को बन्धन में डाल देती है । आचार्य
क्षेमराज इसी तथ्य को इस प्रकार कहते हैं—
'पारमेश्वरी परावाक् प्रसरन्ती, इच्छा-ज्ञान-क्रियारूपताश्रित्वा, बीजयोनिवर्ग
वर्गादिरूपा शिवशक्तिमाहेश्वर्यादि वाचक आदि क्षान्तरूपां मातृकात्मतां श्रित्वा, सर्व-
प्रमातृषु अविकल्प-सविकल्पक तत्तत्संवेदनदशासु, अन्तःपरामर्शात्मना स्थूलसूक्ष्म-
शब्दानुवेधं विदधाना, वर्गादिदेवताधिष्ठानादिद्वारेण स्मय-हर्ष-भय-राग-द्वेषादि प्रपञ्चं
प्रपञ्चयन्ती, असंकुचितस्वतन्त्रचिद्धनस्वरूपमावृण्वाना संकुचितपरतन्त्रदेहादिमयत्वमा-
पादयति ॥'१
यही बात 'श्रीतिमिरोद्घाट' में भी कहा गया है—
'करन्ध्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः ।
पीठेश्वर्यो महाघोरा मोहयन्त्यो मुहुर्मुहुः ।।'
'ज्ञानाधिष्ठानं मातृका' (१-४) की व्याख्या में भी शब्दराशि की अधिष्ठात्री
देवियों को बन्धन का कारण कहा गया है—
'आदिक्षान्तरूपा अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी तत्तत्संकुचितवेद्याभासा-
त्मनो ज्ञानस्य 'अपूर्णोऽस्मि' कृशः स्थूलो वास्मि, अग्निष्टोमयाज्यास्मि, इत्यादि तत्तद-
विकल्पकसविकल्पकावभासपरामर्शमयस्य तत्तद्वाचकशब्दानुवेद्यद्वारेण शोक-स्मय-हर्ष-
रागादि-रूपता-मादधाना 'पीठेश्वर्यो महाघोरा मोहयन्ति मुहुर्मुहुः ।'२
'श्रीतिमिरोद्घाट' में भी कहा गया है—वर्ग कलाद्यधिष्ठातृ ब्राह्म्यादि शक्ति श्रेणी
शोभिनी श्रीसर्ववीराद्यागमप्रसिद्धलिपिक्रम संनिवेशोत्थापिका अम्बा-ज्येष्ठा-रौद्री-वामाख्य-
शक्तिचक्रचुम्बिता शक्तिरधिष्ठात्री, तदधिष्ठानादेव हि अन्तरभेदानुसंधिवन्ध्यत्वात् क्षणमपि
अलब्धविश्रान्तीनि बहिर्मुखान्येव ज्ञानानि इति युक्तैव एषां बन्धकत्वोक्तिः—
'शब्दराशि समुत्थस्य ........... ।
'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः ।।'३
विकल्पात्मक ज्ञान परामृतरस एवं स्वातन्त्र्य दोनों से वंचित होना—
परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ।
तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥ ४६ ॥
विकल्पात्मक ज्ञानों का उदित हो जाना ही उसका (जीव का) परामृतरस (शिव-
शक्ति-सामरस्य) से प्रच्युत हो जाना है । इसी के कारण वह अस्वतन्त्रता पाता है
(अस्वतन्त्र हो जाता है) वह प्रत्यय तन्मात्रगोचर (रूपाद्यभिलाषात्मक) है ॥ ४६ ॥
१-३. शिवसूत्रविमर्शिनी ।
तृतीयः निष्यन्दः ३६३
- सरोजिनी *
'प्रत्ययोद्भव', विकल्प-ज्ञान 'शिव' से उसके 'स्वातन्त्र्य' एवं 'परामृतरस' दोनों
को छीन लेते हैं । विकल्पों की महासमष्टि ही बन्धनरूप जगत् है और निर्विकल्प
शाक्तभूमि में (स्पन्द तत्त्व) में प्रवेश ही मुक्ति है ।
तस्य = उसका । पशु का । यः प्रत्ययानां = लौकिक शास्त्रीय विकल्पों का तथा
तदधिवासित भिन्नार्थज्ञानों के विकल्पों का । प्रत्ययोद्भव = विकल्प ज्ञान का उदय ।
उद्भवः = विनाशान्त्रात उत्पाद ।
परस्यामृतरसस्य = चिद्धन आनन्द के प्रसरण का ।
अपाय = निमज्जन ॥ चिद्भूमि = The state of supreme concious-
ness प्रत्ययोद्भव = ज्ञानोत्पत्ति (Origination of cognition) प्रत्यभिज्ञाविर्भाव ।
परामृतरस = स्वस्वरूप (भट्टकल्लट) ।
प्रत्ययोद्भव—स्वरूपविकल्पहीन स्वरूप में—प्रमेय पदार्थों से सम्बद्ध विकल्पा-
त्मक संवेदनों या ज्ञानों का आविर्भाव होना ही प्रत्यय का उद्भव है । प्रत्यय—विकल्प
ज्ञान, विचार, ज्ञान ।
अब ग्रन्थकार यह विवेचना करता है कि बन्धनग्रस्त जीव किस प्रकार ऐसा बना
दिया गया एवं वह अपनी प्रत्यभिज्ञाशक्ति (Cognitive power) के सीमित हो जाने से
कष्टों में कैसे पड़ गया?
चिद्भूमि परामृशित न होने के कारण अविद्यमान प्रतीत होती है यद्यपि जब अकेला
पदार्थ (Individual object) प्रत्यभिज्ञात (Cognised) किया जाता है तब भी
उसकी सत्ता बनी रहती है । इस सांसारिक ज्ञान के उद्भव के कारण प्राणी बन्धनग्रस्त
होकर स्वातन्त्र्य से शून्य एवं बद्ध (Feltered soul) होकर जीवन यापित करता है ।
शिवसूत्र में 'ज्ञानं बन्धः' यही प्रतिपादित करता है ।
मदालसा ने अपने पुत्रों को यही उपदेश दिया था—
तातेति किंचित्तनयेति किंचित्, अम्बेति किंचिद्दयितेति किंचित् ।
ममेति किंचिन्न ममेति किंचित्, भौते संघे बहुधा मा लपेथाः ।।'
(मा० पु० २५।१५) भौतिकवाद में अधिक संसक्त नहीं होना चाहिए । पिता,
पुत्र, माता, प्रिय, मेरे, मेरे नहीं—के भौतिक (सांसारिक) सम्बन्धों के सम्पर्क में संलग्न
नहीं रहना चाहिए ।
ज्ञान के विभिन्न पदार्थों के क्षेत्र में, तीव्र एवं मन्द प्रक्रिया द्वारा प्रत्ययों का
आविर्भाव हुआ करता है ।
(१) जब भेदात्मिका दृष्टि बनी रहती है तभी तक जीव 'बद्ध' बना रहता है ।
(२) जैसे ही 'सब कुछ आत्मामय है'—'सब कुछ' अपने ही स्वरूप की बाह्य
अभिव्यक्ति है—'सब' मैं ही है—इसका ज्ञान हो जाने पर जीव मुक्त हो जाता है—
३६४ स्पन्दकारिका
(क) यावदियं भिन्नवेद्यप्रथा तावद्बद्ध इति ।
(ख) यदा तु सर्वमात्ममयमेवाविचलप्रतिपत्त्या प्रतिपद्यते तदा जीवन्मुक्त इति'—
इसीलिए कहा गया है—
'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥'
'तस्माच्छब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न या शिवः ॥'
जब तक कि समस्त पदार्थों में भिन्नता की दृष्टि बनी रहती है—अभेदात्मकता का
प्रत्यय आविर्भूत नहीं हो पाता, जब तक जीव बन्धनग्रस्त बना रहता है, जब समस्त
पदार्थों की समष्टि (पूर्वोक्त विधि से) अपने से अभिन्न (Identical with ourself)
प्रतीत होने लगती है तब जीव जीवन्मुक्त हो जाता है ।¹
आचार्य उत्पलदेव की 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा गया है कि—वह पशु जब कान,
आँख आदि इन्द्रियों के द्वारा विषयों का दर्शन करता है और उसके अन्तःकरण में
स्मरणादि ज्ञान की उत्पत्ति होती है' वही परामृत-रस से अर्थात् अपने स्वरूपोदय से
च्युति है, क्योंकि ये विषय-प्रत्यय पुरुष को परतन्त्र और परिच्छिन्न सा बना देते हैं । सच
पूछिये तो ये विषय और स्मरण उसके व्यक्तिगत ही हैं अर्थात् उसी की अभिलाषा
अन्तःकरण की वृत्ति उन-उन रूपों में प्रकट हो रही है ।²
आचार्य भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या करते हुए
कहते हैं—'परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः, तस्य यः प्रत्ययोद्भवः विषयदर्शने
स्मरणोदयो यतः, तेन पुरुषोऽस्वतन्त्रताम् असर्वगत्वं च प्राप्नोति, स च प्रत्ययः, तन्मात्र
गोचरो रूपाद्यभिलाषात्मकः ॥ ४६ ॥'³
विकल्पशून्य (निर्विकल्प) स्वरूप में ज्ञेयविषयक सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों का
उदय होना—'प्रत्ययोद्भव' कहलाता है ।
शक्ति का बाह्योन्मुख प्रसार होते ही—शक्ति की बाह्य प्रसारोन्मुखता → शक्ति
की प्रत्ययोद्भवावाकार परिणति 'प्रत्ययोद्भव' का स्वस्वरूप विकल्प परम्परा है ।
'स्वातन्त्र्यशक्ति' का माया शक्ति में रूपान्तरण → शिव में अपनी स्तन्त्रता एवं
पूर्णता के सम्बन्ध में सन्देहाविर्भाव ।
'स्वतन्त्रता' की (मायाशक्ति द्वारा) का संकुचन = अस्वतन्त्रता → (१) स्वतन्त्र
ज्ञातृत्व की हानि (२) स्वतन्त्र कर्तृत्व का अबोध → आत्मस्वरूप की विस्मृति →
आत्मा से पृथक् अनात्म पदार्थों में अहंबुद्धि → देहाभिमान → अनात्मभूत पदार्थों में
अहन्ता = 'प्रत्ययोद्भव' = स्वातन्त्र्य हानि = 'आणवमल' । प्रत्ययोद्भव—'शिव
(आत्मा) का अवरोहण क्रमारंभ—चेतन ही जड़ बन जाता है । चेतन परावाक् स्थूल
१. क्षेमराज : 'स्पन्दनिर्णय' । २. उत्पलदेवः 'स्पन्दप्रदीपिका' ।
३. भट्टकल्लट 'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।
वैखरी वाक बन जाती है ३६ तत्त्वों का बहिर्मुखी अवभासन प्रारंभ । यह समस्त व्यापार
= 'परामृतरसापाय' है । परामृत = शिव । रस = शक्ति ॥
मायाशक्ति के उल्लसाभाव के स्तर के (१) सदाशिव (२) ईश्वर (३) शुद्ध-
विद्या—'परामृत' कहे जा सकते हैं प्रत्ययोद्भव—माया । कला । विद्या । राग । नियति ।
काल = (षटकंचुक) ॥
पशु = षट्कंचुकपाशपाशित जीव ।
प्रत्ययोद्भव—तन्मात्रपंचक
शाक्त प्रसरण की क्रीड़ा—शिवभाव से जड़भाव पर्यन्तः ३६ तत्त्वों तक ॥
व्यतिरिक्त साधन-सामग्री की अपेक्षा रखने वाला एवं उन सामग्रियों द्वारा अपनी
समस्त इच्छाओं (समीहितार्थों) को पूरा करने वाला व्यक्ति वह भाव प्राप्त करता है ।
जागर-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओं से उपमेय—'सकल' 'विज्ञानाकल' एवं 'प्रलयकेवली'
नामक योगित्रय सहजादिक मलत्रय से आवृत होकर 'पशु' बन जाता है—
('जागर-स्वप्न-सुषुप्त्यावस्थोपमेय सकल-विज्ञानाकल-प्रलयकेवलाख्य भेदत्रय
योगी सहजादिमलत्रयावृतः पशुर्भवति इत्यर्थः'—) क्योंकि उसका प्रत्ययोद्भव ही अमृत-
रसापाय है—'परामृतरसापायः ।।'
परमाम्ृतरसापायः—'परम्' = अनुत्तर । अमृत = अविनाशी अद्वय, चिन्मय,
शिवस्वरूप । रस—उसका रस ॥ रसः = तथाप्रत्यवमर्शात्मक आस्वाद । अपाय =
उससे होने वाला अपाय (पृथग्भाव) अन्यथा वृत्ति—अर्थात् 'इदम्' इत्यादिविकल्प-
रूपात्मक ॥
तस्य = उस पशु का ('स्पन्दप्रदीपिका') प्रत्ययोद्भवः = 'श्रोत्रादिद्वारेण विषय-
दर्शने स्मरणादिज्ञानोत्पत्तिः' (स्पन्दप्रदीपिका') स एव 'परामृतरसात्'—स्वरूपोदयात्
अपायः = प्रच्युतिः । यतः 'सः' पुमान् तेनास्वतन्त्रतां (पारतन्त्र्यं असर्वगतादिम्) एति =
प्राप्नोति । स च 'प्रत्ययोद्भवः तन्मात्रगोचरः ॥ = 'शब्दादिविषय विषयः' तदभिलाषा-
त्मक ॥ (स्पन्दप्रदीपिका) ॥
एक ही परमतत्त्व की स्वेच्छा-परिकल्पित अनुग्राह्य-अनुग्राहक भावों की पृथक्-
पृथक् विचारणा से विविक्त आत्मा ही अनुग्राह्य है ।
'परामृत' का क्या अर्थ है?
(१) शिव-शक्ति-सदाशिव-ईश्वर-विद्या आदि के रूप में पंचधा परिकल्पित
विभागाभास को प्रक्रिया शास्त्रों में 'परामृत' 'रस' आदि शब्दों द्वारा कहा गया है ।
(२) 'अहं' अत्यन्त भेदसंस्पर्श से शून्य 'परमशिव' नामक स्वभाव का वाचक
होने के कारण 'परामृत' कहा जाता है । वह—
परामर्शरूप शक्तितत्व का वाचक है अतः उसे 'रस' भी कहा गया । वह अत्यन्त
प्रशान्त निष्परामर्श शून्यप्राय कहा गया है । यह मत शिवतत्त्ववादियों का मत है ।
उसका निरास करने हेतु ही यहाँ 'रस' शब्द प्रयुक्त किया गया है ।
३६६ स्पन्दकारिका
परामृत—तत्त्वद्वय तो—(१) 'शिव' एवं (२) 'शक्ति' है 'तत्त्वद्वयं शिवशक्त्या-
ख्यम् ॥' यद्यपि ये अभिन्न है तथापि स्वरूप प्रतिपादन के लिए उनका अन्यथा अनुपपत्ति
द्वारा विभाजन करके उन्हें प्रकाशित किया गया है।
इसलिए गुरुदेव ने 'तत्त्वगर्भस्तोत्र' में सतताविलुप्त एवं उपलब्ध उसी का
प्रतिपादन करने के उद्देश्य से शिव तत्त्व की स्तुति की है—
'यस्या निरुपधिज्योतीरूपायाः शिवसंज्ञया ।
व्यपदेशः परां तां त्वामम्बां नित्यमुपास्महे ॥'
'शक्तितत्त्व' तो परमार्थ तत्त्वविदों के द्वारा स्वरूप प्रत्यवमर्श, सामान्य स्पन्द
आदि नामों के द्वारा व्यवहृत की गई है। उसका पर्यायभूत 'उन्मेष' आदि पद भी उसका
संसूचक है—
'किंचिदुच्छूनतापत्तेरुन्मेषादिपदाभिधाः ।
प्रवर्तन्ते त्वयि शिवे शक्तिता ते यदाम्बिके ॥'
यहाँ पर प्रयुक्त 'यदा' शब्द के प्रयोग से यह मतिभ्रम नहीं होना चाहिए कि—
कभी यह शक्त्यवस्था होती है और कभी नहीं होती है। क्योंकि स्वभावसंवेदनात्सक,
नित्य, सामान्यस्पन्द रूप ही धर्म है 'किंचिदुच्छूनता' (थोड़ा सा फूल जाना यथा पानी में
डाला चना फूल जाता है) ।¹
(३) 'सदाशिव', 'ईश्वर' एवं 'विद्या' (तत्त्वत्रय) भी परामृत शब्द वाच्य है।
ऐसा क्यों?—इसका कारण यह है कि—
भेदोद्भावन का सामर्थ्य ही माया शक्ति है—कोई वस्त्वन्तर नहीं है—'स्वभा-वस्य
विश्वरूपतया अवभासनमानस्य इदन्तोल्लेखने भेदोद्भावनसामर्थ्यं मायाख्याशक्ति-
राख्याता—न तु वस्त्वन्तरं किंचित् ॥'
इदम्—(यह जगत्)—इत्याकारक रूप में परामृश्यमान पदार्थ-जगत् (या
विषयात्मक विश्व) प्रकाशमानता का अतिक्रम करके अन्य बनने हेतु (जिसके द्वारा)
समर्थ नहीं हो पाता है उसके कारण यह भेदात्मक रूप वाली होकर भी यह माया
प्रकाशात्मक पारमेश्वर धर्म होने के कारण अतिक्रान्त न हो सकने के कारण भगवान् की
यह शक्ति ही अत्यन्त अद्भुतस्वरूपा है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥'
इसका अर्थ यह है कि मेरी यह दैवी माया, 'इत्थंक्रीडनैकरस' देव की (ईश्वर की)
यह माया शक्तित्व से सम्बद्ध है। इसका स्वरूप यह है कि यह 'गुणमयी' (सुखाद्यात्मा
सत्त्वाद्यभिधाना प्रकृति से युक्त) है, यह भेदावभासस्वस्वभावा है, शब्दादिविषयात्मिका
है, (विषय रूप सुखादिसंवेदनपर्यवसातात्मा है)—अतः मेरी यह सुखादि रूप ग्राह्याकार
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।