स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
२७४ स्पन्दकारिका
कोई अपूर्णमन्यता मन्तव्य नहीं है प्रत्युत् चिद्घनशिवस्वभावता ही भंग्योपदेश द्वारा यहाँ
प्रतिपाद्य है ।¹
भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की
है—यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह स्वीय संवेदनों के माध्यम से प्रत्येक भाव का
सृजन करता है । अनुभव में आने वाला प्रत्येक पदार्थ उसके संवेदन का विषय बन
जाता है । यह मितप्रमाता किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के अनन्तर उसे
अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है । इसका शरीर मात्र सिर, पैर आदि अंगों
वाला शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत् बाह्यार्थ भी अनुभव के विषय बन जाने पर उसका
शरीर बन जाते हैं—
'सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात् बाह्यार्थ-
मनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरः पाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य शरीरम्' ।।
'तेन शब्दार्थचिन्तासु ..... संस्थितः ।'
इस कारिका की व्याख्या भट्टकल्लट ने 'स्पन्दकारिकावृत्ति' में इस प्रकार की
है—'तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या
शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो न त्वन्यत्
भोग्यमस्ति ।। २९ ।।
साधकों के चित्त में 'मन्त्र' लीन हो जाते हैं और इस प्रकार आत्मा ही शिव है ।
इसको प्रमाणित करने हेतु ग्रन्थकार ने २८, २९ कारिकायें कही हैं ।
उत्पलदेव कहते हैं—
सह साधकचित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् ।
शिवात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥
बोद्धा होने के कारण जीव या आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है ।
उत्पलदेव कहते हैं—
'यस्माज्जीव आत्मैव सर्वमयः सर्वात्मको विश्वरूपः बोद्धृरूपत्वात् । कहा भी
गया है—तत्त्व ज्ञान के होते ही सब चिन्मय हो जाता है । वेद्य का ऐसा कोई भाग नहीं
है जो कि वेदक से बाहर हो । 'वेद्य' ही वेदक है । 'वेदक' संवित् है । 'संवित्' आत्मा
है ।' तब तो सबसे बड़ा यथार्थ यही है कि—आत्मा ही जगत् है ।
'यदैव विदितं विश्वं तदानीमेव चिन्मयम् ।
यन्नास्ति भागो वेद्योऽसौ नाथ यो वेदकाद् बहिः ॥
वेद्यो वेदकतामाप्तो वेदकः संविदात्मकम् ।
संवित् त्वदात्मा चेत् सत्यं तदिदं त्वन्मयं जगत् ।।'
छान्दोग्य श्रुति में भी कहा गया है—
'आत्मैवेदं जगत् सर्वं नेह नानास्ति किंचन' ।।' (छा० ३।९।१२)
१. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २७५
अर्थात् इदम् के रूप में प्रतीयमान यह सब जगत् आत्मा ही है। आत्मा में
नानात्व किंचिन्मात्र भी नहीं है।
समस्त भावों का समुद्भव आत्मा से ही होता है। संविद् के आरोहण से ही 'परा'
'पश्यन्ती' 'मध्यमा' आदि वाणियों का उदय होता है और समस्त सत्तायें इसीसे सिद्ध
होती है। आचार्यों ने भी कहा है कि—सभी के कारण तुम्हीं हो क्योंकि घट में मृत्तिका
के समान सभी में तुम्हारा अन्वय है। जब संवित् के बिना विश्व की सिद्धि हो ही नहीं
सकती—संपूर्ण विश्व संविद्—समन्वित है—तब तो असंवित् विश्व का कारण कैसे हो
सकता है? संवित् ही सत् है और सत् ही संवित् है। संवित् की उपासना किये बिना
वहीं संपूर्ण सत् है—यह अनुभव में नहीं आ सकता—
त्वत्कारणत्वं सर्वस्मिन्नपि ज्ञातं त्वदन्वयात् ।
संवित्समन्विते विश्वे नाऽसंवित् कारणं भवेत् ॥
संविदायतनं ज्ञातं तत् सदाख्यां प्रपद्यते ।
तावतैव न लभ्या स्यादनुपासितसंविदा ॥
तथा यह भी कहा है कि—
त्वदात्मकत्वं भावानां विवदन्ते न केचन ।
यत्प्रकाशदशां याता नाऽप्रकाशः प्रकाशते ॥
अर्थात् सभी भाव तुम्हारे ही स्वरूप है इसमें किसी का विवाद नहीं है क्योंकि सब
प्रकाशित होते हैं। क्या कहीं अप्रकाश भी प्रकाशित होता है? और भी कहा गया है—
'तुम प्रकाशक एक ही हो। सर्जन भाषण और बोधन-ये तीनों तुम्हारे प्रकाश हैं। तुम
अन्य प्रकाशों से व्यतिरिक्त हो, जैसे दूसरे प्रकाशक सूर्य आदि। किन्तु तुम्हारे प्रकाश के
उदय के बिना कोई दूसरा प्रकाश प्रकाशित नहीं हो सकता। श्रुति, पंचरात्र भी तो यही
कहते हैं कि वहाँ सूर्य चन्द्र आदि का प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब
प्रकाशित हो रहा है—
'सृजन् वदन् ज्ञापयंश्च त्रिधैकस्त्वं प्रकाशकः ।
व्यतिरिक्तः प्रकाशेभ्यो न यथाऽन्ये प्रकाशकाः ।
न प्रकाशाः प्रकाशन्ते त्वत्प्रकाशोदयं विना ॥'
पंचरात्र में भी कहा गया है कि—'न तत्रादित्यो भाति' अर्थात् वहाँ सूर्य-चन्द्रादि
प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है।
संवित् सर्वमय है—इसका अन्य उदाहरण भी है। जितने संवेद्य हैं वे संवेदनरूप
अनुभव के द्वारा ही संविदित होते हैं। उनसे तादात्म्य होता है। तद्भावरूपता होती है
और अभेद का संवेदन होता है।
'स्वात्मसप्तति' में कहा गया है—सभी वस्तुएं ज्ञानस्वभाव का ही विषय होती हैं
और उसके साथ तादात्म्य प्राप्त हो जाती है। जीव ज्ञान स्वरूप है अतः वह
सर्वमय है—
२७६ स्पन्दकारिका
'यद्वद् वस्तुस्वभावेन ज्ञानेन विषयीकृतम्।
तद्वत्तादात्म्यमायाति जीवः सर्वमयो ह्यतः॥'
'संवित्प्रकाश' में कहा गया है—अग्नि से समाविष्ट सब अग्निरूप ही दिखता है,
वैसे ही ज्ञान समाविष्ट सब ज्ञानरूप ही देखिए'—
'यथाऽग्निना समाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यते।
तथा ज्ञानसमाविष्टं सर्वं तद्रूपमीक्ष्यताम्॥'
'आगमरहस्य' में भी कहा गया है—ज्ञान से आकार वर्ग भासित होता है अतः
यह विश्वमयी विभूति ज्ञान ही है। तुम्हीं विश्वात्मक हो, यह केवल शास्त्रसिद्ध ही नहीं
है, आत्मसंवित् से संविदित् होने के कारण अनुभवसिद्ध भी है—
आकार वर्ग उपरि प्रतिभासतेऽस्य,
ज्ञानस्य सापि तव विश्वमयीविभूतिः।
विश्वात्मकस्त्वमिति नाऽऽगमसिद्धमेतत्,
किन्तु स्वसंविदितरूपतयापि सिद्धम्॥
संवित् तत्त्व ही प्राण के माध्यम से वाणी का रूप धारण करता है—'संविदेव
प्राणद्वारेण वायूरूपतां धत्ते॥'
इसीलिए कहा भी गया है—संवित् तत्त्व वाणी का रूप-अर्थात् परा-पश्यन्ती-
मध्यमा एवं वैखरी भी बन जाता है। इन चारों वाणियों का वक्ता निर्विशेष परमस्थायी
और नित्योदित निजाकृति है। सूर्य के समान तेज का विस्तार करता हुआ वह हृदय में
प्रकाशित होता है और चिदिच्छा-शक्ति से संबुद्ध है और आत्मबल ही उसका बल है—
स्थानेषु विवृते वायौ कृतवर्णपरिग्रहा।
वैखरी वाक् प्रयोक्तॄणां प्राणवृत्तिनिबन्धना॥
केवलं बुद्धयुपादानात् क्रमरूपानुपातिनी।
प्राणवृत्तिमतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्तते॥
अविभागात्तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतक्रमा।
स्वरूप ज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा वागनपायिनी॥
स्वयं रौति य एषोन्तर्निर्विशेषनवात्मकः।
स परः परमः स्थायी नित्योदित निजाकृतिः॥
चिदिच्छाशक्तिसम्बुद्धः स्पन्द आत्मबलेरितः।
सवितेव स तेजांसि विचिन्वन् हृदि राजते॥
'प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है—प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही सरस परावाक् है।
परमात्मा का यह स्वातन्त्र्य ही मुख्य ऐश्वर्य है। वह सर्वदेशकाल में स्फुरित होती हुई
सभी का आधार है और परमेश्वर का हृदय है—और उसका रूप है अन्तः संकल्प—
'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः॥
द्वितीयः निष्यन्दः २७७
सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी ।
सैषाऽऽभारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'
इस महासत्ता का रूप है अन्तःसंकल्प। उसमें शब्द एवं अर्थ-दोनों एक साथ
स्फुरित होते हैं। अतः दोनों का अभेद ही प्रख्यात है। ग्रन्थकार कहते हैं—'शब्दानुवेधन
के बिना प्रत्यय का उदय नहीं होता'—
'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥'
'वाक् का मूल संवित् है'। कहा भी गया है—
जैसे निजात्मा संवित् से संपूर्ण जगत् अनुविद्ध है वैसे ही संवित् से सम्पूर्ण
वाणी अनुबिद्ध है—
'यथा तथा जगद्विद्धं सर्वमेव निजात्मना ।
तथा तयाऽनुविद्धेयं सर्वतो भाति भारती ॥'
योगिनाथ का कथन है कि—परतत्त्व में किसी भी वस्तु की सिद्धि के लिए वाणी
को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि रूप के अनुसंधान से वस्तु का निश्चय होता है।
उसकी उन्मुख वृत्ति से ही वस्तु के सद्भावना की कल्पना होती है। उसके बिना किसी
को आत्मलाभ नहीं हो सकता क्योंकि उस अवस्था में केवल स्वरूप ज्योति रहती है।
वहाँ विभाग और क्रम की अपेक्षा नहीं होती। उसका रूप योगिगम्य होता है। उसी
उन्मुखता से चिन्तनमयी वाग्धारा बनती है। तदनन्तर विशिष्ट शब्द के विषय की
स्फुरणात्मिका विवक्षा होती है। इसके बाद वह शब्द का रूप धारण करके अर्थ को
प्रकट करती है। इसलिए संवित्प्रसूत वाणी के बिना किसी अर्थ का अवधारण नहीं हो
सकता।'-
'तस्मात् सर्वस्य सिद्ध्यर्थं भारती कारणं परे ।
परेष्वप्या तदा रूपान्वेषणार्थं निश्चयात् ॥
तस्या औन्मुख्यवृत्त्यैव सद्भावपरिकल्पनात् ।
नहि तामन्तरेणैषा लभेताऽऽत्मानमम्बिके ॥
सा च तस्यामवस्थायां स्वरूपज्योतिरित्यते ।
निर्विभागक्रमापेक्षा योगिगम्यानुरूपिणी ॥
तत औन्मुख्यतश्चिन्तामयी भवति वाक् शिवे ।
विशिष्टशब्दविषयविवक्षास्फुरणात्मिका ॥
ततः शब्दात्मकत्वेन विवृतार्थमयी भवेत् ।
तदात्मतामन्तरेण यस्मान्नार्थावधारणम् ॥'
इस प्रकार सर्वप्रकाशक संवित्स्वरूप की प्रभा के समान प्रकाशन शक्ति
अन्तस्संकल्परूपा वाणी बनकर फिर वर्ण, पद, वाक्य को जीवन-दान करती है और
पदार्थ के रूप में बाहर दीखती है। यह प्रबुद्धों के लिए स्वानुभवसिद्ध है।
२७८ स्पन्दकारिका
है। अन्तस्थ भावों को जो स्वामी है, वही उन्हें प्रकाशित करता है, बिना उसकी इच्छा,
अमर्श स्वल्प भी प्रवृत्त नहीं हो सकते—
चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद् बहिः।
योगीव निरुपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ॥
स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम्।
अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्शः प्रवर्तते ॥
इसके अतिरिक्त—'जो कुछ बाहर दिखाई पड़ रहा है वह सब तुम्हारे ही भीतर है
आँख बन्द करके जैसे सब कुछ भीतर देखा जा सकता है वैसे ही यह समस्त
प्रपंच है— 'यत्किंचदाभाति बहिस्तदीश नूनं तवास्त्येव समस्तमन्तः।
निमीलिताक्षा हृदि लक्षयेयुस्तथैव सर्वं कथमन्थया ॥'
इस प्रकार 'स्वभाव' ही सर्वरूप में स्थित है। इस सर्वात्मक स्वभाव के कारण
शब्द और अर्थ की चिन्ता करने पर ऐसी कोई अवस्था नहीं मिलती जो शिवस्वभाव को
प्रकट नहीं करती हो—अर्थात् चित्स्वरूप न हो। संविद् में सब एक है उसी में सभी का
अस्तित्व स्थित है। कहा भी गया है—
'जिन-जिन कारणों से भाव-नदियाँ पृथक्-पृथक् प्रवाहित होती हैं। उन्हीं-उन्हीं
कारणों से बोध-समुद्र में एक हो जाती हैं'—
'येन येन विभिद्यन्ते हेतुना भावनिम्नगाः।
तेन तेनैक्यमायान्ति बोधोदधिसमागताः ॥'
ग्रन्थकार ने पहले ही कहा है कि—शारीरिक, शाब्दिक या मानसिक ऐसा कोई
व्यवहार नहीं है जिसके प्रारंभ में आप विराजमान न हों। अतः ठीक ही कहा गया है कि
संविदात्मा भोक्ता अर्थात् अनुभविता ही भोग्य भाव से अनुभाव्य के रूप में सर्वदा और
सर्वत्र स्थित हैं। उससे पृथक् भोग्य नाम का कोई पदार्थ नहीं है।१
श्रुति कहती है—मैं अन्न भी हूँ और भोक्ता भी हूँ—'अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्।
अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः ॥'२
'तत्त्वविचार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—'स्वभावस्थित भाव' ही परस्पर
भोक्ता और भोग्य के रूप में सम्बद्ध होते हैं। उनकी कोई पृथक् सत्ता नहीं है। 'ज्ञान'
के ये ही नाम हैं—द्रष्टा, अनुभविता, स्मर्ता, ग्राहक, भोक्ता वेदक, कर्ता, उपलब्धा,
संवेत्ता और ज्ञाताः—३
'स्वस्वभावस्थिता भावाः संबध्यन्ते परस्परम्।
भोग्यभोक्तृत्वभावेन न कदाचित् स्वभावतः ॥
द्रष्टाऽनुभविता स्मर्ता ग्राहको भोक्तृवेदकः।
कर्तोपलब्धा संवेत्ता ज्ञातेति ज्ञानसंज्ञकाः ॥'
१-३. स्पन्दप्रदीपिका।
द्वितीयः निष्यन्दः २७९
इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञान ही ज्ञेय के रूप में चमकता है, फैलता है। कहा
भी गया है कि—'आपसे भिन्न जो भाव दिखायी पड़ते हैं, वे तो अपने आत्मा ही हैं,
परन्तु मुग्धतावश अन्य भोग्य के रूप में मालूम पड़ते हैं। मूर्खजन पशु के समान उसके
भोग के लिए संसार में भटकते हैं। जो इन दृश्य भावों को आपके वैभव के रूप में देखते
हैं वे आपके समान ही प्रभु हो जाते हैं और विश्व को अपने वश में कर सकते हैं'—
ज्ञान ही ज्ञेय रूप में प्रथित हो जाता है—'ज्ञानमेव ज्ञेयरूपतया प्रथत इति' ।
'भोक्तुर्विभोर्ये भवतो विभिन्नः स दृश्यते मुग्धतया स्व आत्मा ।
ते भोग्यभूताः पशुवत् परेषां भोगाय भूयोऽत्र भवे भ्रमन्ति ॥
भवं भवद्रै भवभूतमेव विभावयन्तो भगवन् भवेयुः ।
भवद्गदेव प्रभुभावभाजो विश्वं वशे वर्तयितुं समर्थाः ॥'
'ज्ञानसंबोध' में कहा गया है कि—'ज्ञान' ही तीन रूपों में स्थित है (१) 'ज्ञाता'
(२) 'ज्ञेय' (३) 'ज्ञान' ।१
गीता में— 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्महवि ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ॥'
उत्पलाचार्य कहते हैं कि—द्रष्टा ही है। अज्ञानी जन इस दृश्य को अध्यात्मरूप
से नहीं देखते। शीशे में प्रतिबिम्ब के समान यह जगत् द्रष्टा और दृश्य के रूप में दो
प्रकार से भासित हो रहा है। बोधानुवेध से ही घट पटादि बाह्य सद्भाव प्राप्त करते हैं
अतः ज्ञानाद्वैत ही सत्य है। कहीं भी ज्ञेय की सत्ता है ही नहीं। 'ज्ञानसंबोध' की
दृष्टि इस प्रकार है—
'ज्ञाता ज्ञेयं ज्ञानमिति ज्ञानस्यैव त्रिधा स्थितिः ।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविरित्यत्रोक्तं तदेव यत् ॥'२
उत्पलाचार्य की दृष्टि इस प्रकार है—
'द्रष्टैवाऽस्ति न दृश्यमेतदबुधैरध्यात्मना ज्ञायते ।
आदर्श प्रतिबिम्बवज्जगदिदं भिन्नं द्विधा भाति यत् ॥
सत्तां यान्ति घटादयो बहिरमी बोधानुवेधात् सदा ।
ज्ञानाद्वैतमतः स्वतोऽस्ति न पुनज्ञेयस्य सत्ता क्वचित् ॥'३
'आत्मसप्तति' में कहा गया है कि—यह जो कुछ दीख रहा है वह दर्शन से भिन्न
नहीं है। 'दर्शन' द्रष्टा से भिन्न नहीं है अतः द्रष्टा ही जगत् है।'
'यदिदं दृश्यते किंचिद्दर्शनात्तन्न भिद्यते ।
दर्शनं द्रष्टृतो नान्यद् द्रष्टैव हि ततो जगत् ॥'४
'संकर्षण सूत्र' में भी कहा गया है कि—जिससे यह विश्व दृष्टिगत होता है, जो
समस्त विश्व का द्रष्टा और जो चराचर रूप में दृश्य हो रहा है उसी का नाम है विष्णु—
१-४. स्पन्दप्रदीपिका ।
२८० स्पन्दकारिका
'येनेदं दृश्यते विश्वं द्रष्टा सर्वस्य यः सदा ।
दृश्यश्चराचरत्वे यः स विष्णुरिति गीयते ॥'
'जाबालिसूत्र' में भी कहा गया है कि—द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता,
मन्ता, बोद्धा, जिसके चैतन्यस्वभाव का कभी लोप नहीं होता वही जगत् की उत्पत्ति-
स्थिति-प्रलय का एकमात्र कारण है—भगवान् वासुदेव अर्थात् आत्मा—
'द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाऽपरिलुप्तचैतन्यस्वभावो जगदुत्पत्ति-
स्थितिलयैकहेतुर्भगवान् वासुदेव आत्मेति ॥'
पञ्चरात्रोपनिषद् में कहा गया है—'ज्ञाता च ज्ञेयं च वक्ता च वाच्यं च भोक्ता च
भोग्यं च ॥' वहीं यह भी कहा गया है कि—सर्वान्तर, स्वयंज्योति, स्वसंबोध्य एवं
स्वयंभू वही है—'सर्वान्तरं सर्वबाह्यं स्वयंज्योतिः स्वयं सम्बोध्यं स्वयंभूरिति च ॥'
श्रुति भी कहती है—वही ज्ञाता, वही ज्ञान, वही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र भी शिव-
रूप ही है । 'स एव ज्ञाता तज्ज्ञानमिति' ।
'एवमेष एवं मन्त्रात्मा । तेषां चात एव शिवधर्मित्वं सिद्धम् ॥'
अब पक्षान्तरोपन्यासभंगिमा से प्रकरणारंभ करते हुए स्वस्वभाव शिव के
विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्रविभवन शीलत्व को उपपत्तियों एवं उपलब्धियों द्वारा
प्रतिपादित किया जा रहा है ।
इस प्रकरण का सम्बन्ध इस कारिका से है—
'यस्य इति वा संवित्तिः स जीवन्मुक्तः ॥'
यस्य = जिस साधकोत्तम का । संवित्तिः = सम्यक् ज्ञान ।
सततम् = निरन्तर, अव्यवधानपूर्वक सभी अवस्थाओं में ।
युक्तः = समाहित । स्वभावबल परिशीलन से अप्रमत्त एवं एकाग्रचित्त । स
जीवन्म् = नियतदेहाधिकरणों एवं प्राणों को धारण करते हुए भी मुक्तः = सर्वव्यापक
सर्वात्मक, सर्वेश्वर, स्वतन्त्र, स्वस्वभावाहङ्कारी, जन्ममरणादि के चक्र से निष्क्रान्त
परमेश्वर । न संशयो = भ्रान्ति या सन्देह नहीं है । क्या करते हुए जीवन्मुक्त? अखिलं
= अशेष-अनन्त-वस्तु-व्यक्ति-विचित्र विश्व को स्वनिर्मित चराचर को क्रीडनक मानते
हुए और सृष्टि को लीला मात्र समझते हुए विभावित करते हुए ।
इस प्रकार विश्व को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते हुए एवं जीते हुए मुक्त
जीवन्मुक्त है । टीकाकार पूछता है? 'कथं यस्य संवित्ति?' उसी के उत्तर स्वरूप—
उन्तीसवाँ श्लोक कहा गया है—
'तेन शब्दार्थचिन्तासु .... संस्थितः ॥'
तेन = वक्ष्यमाण कारण से ।
तेन वक्ष्यमाणहेतुना 'शब्दार्थचिन्तासु सा अवस्थैव नास्ति या न शिवः'—इति
यस्य संवित्तिः स जीवन्मुक्त इति ।'
द्वितीयः निष्यन्दः २८१
शब्द = अर्थप्रत्यायक पदसमूह ।
अर्थो = जात्यादिभेद से बहुविध अभिधेय वस्तुजात ।
चिन्ता = उसकी चिन्ता उस-उस प्रकार की विकल्पना । अनन्त चिन्तनीय
वस्तुओं के प्रति अपने उपराग से विचित्र ज्ञान से युक्त व्यवहारों से सम्बद्ध शब्द एवं
अर्थों में उत्पन्न चिन्ताओं में । सा अवस्था—वह दशा । (वह दशा कोई नहीं है न तो
शब्द रूपा चिन्ता और न तो अर्थरूपा चिन्ता जो कि साक्षात् शिव न हो ।) भोक्तैव =
अनुभविता ही, ईश्वर ही ।
सदा = नित्य । सर्वत्र = समस्त अवस्थाओं में ।
भोग्यभावेन = अनुभवनीयवत् स्वात्मा द्वारा ।
स्थितेः = अवस्थित है । (भोग्य पदार्थ कोई भिन्न पदार्थ नहीं हैं ।) चूँकि तत्त्वों के
अनवमर्शमात्र से भोक्तृभोग्य विभाजन रूप द्वैत विजृंभित (प्रकटीभूत) हुआ है । ऐसा क्यों
कहा गया? इसलिए कि—‘न सावस्था न या शिवः ॥’
यस्मात् जीवः = जिससे कि आत्मा । सर्वमयः = विश्वरूप ॥ परस्पर व्यतिरिक्त
(भिन्न) प्रतिपत्ति (उपलब्धि) । जीव का जो व्यवहार है वह भी वेद्य-वेदकाभेदपूर्वक ही
उपपन्न है ।
लेकिन यह कहाँ से?—इसके उत्तर में ग्रन्थकार कहता है—‘तत्संवेदनरूपेण
तादात्म्यप्रतिपातिप्रतिपत्तितः सर्वभावसमुद्भावात् सर्वमयो जीवः ।’
—उस किसी संवेद्य का (घट, सुख-दुःखादिक का) जो संवेदन या ज्ञान होता है
उसका जो ‘रूप’ (स्वभाव) है उसके कारण—‘तादात्म्य प्रतिपत्ति’ (अभेदसंवित्) होती है
और इसके कारण जो ‘सर्वभावसमुद्भव’ (समस्त भावो की उत्पत्ति) है उसके निर्वर्तमान
हो जाने के कारण जीव सर्वमय हो जाता है ।
यह आत्मा अपने विषय को जानकर ही उनका समुद्भव (सृजन करती है अन्यथा
नहीं क्योंकि संवेद्यमान वस्तु ही रूप प्राप्त कर सकती है असंवेद्यमान वस्तु नहीं ।
संवेद्यमानता क्या है? यह है उन-उन रूपों द्वारा प्रकाशमानता । प्रकाशमानता क्या है?
प्रकाशमानता है—प्रकाश से अव्यतिरिक्तता । इसीलिए न्यायवादी भी कहता है—चेतना-
च्चापि वेद्यत्वादतद्रूपाप्रवेदनात् ॥’)
इस प्रकार यह जीव जिस-जिस वस्तु को जानता है वह उसका शरीर ही बन
जाता है ।
संवेद्यमानता सामान्यतः द्विविध प्रकारी है—(१) ‘भूतात्मक’ (२) ‘भावात्मक’।
(१) भूतात्मक संवेद्यमानता—माया शक्ति के वैभव से विस्मारित तात्विकस्वभाव
वाला होने के कारण वस्तु संवेदनावसर पर स्वरूप के अपरामर्शत्व के कारण मुकुलित
सामर्थ्य वाला होकर यह जीव अविच्छिन्न अहंकार का आस्पद बन कर शिर-पाणि आदि
शरीरांगों से युक्त शरीर को अपना स्वरूप समझने लगता है और यह जन्ममरणादि के
चक्र में फँस जाने से इसकी भूतात्मक संवेद्यमानता हुआ करती है ।
२८२ स्पन्दकारिका
(२) भावात्मक संवेद्यमानता—जब यह जीव शब्दादि विषयों को अपने से
व्यतिरिक्त मानकर उनका स्वभिन्न वेद्य पदार्थ समझकर उनका परामर्श करता है तब
उसकी वह संवेद्यमानता भावात्मक कही जाती है।
इस प्रकार जीव संवेद्यमानता लक्षण वाले भावसंसर्ग की अवस्था में संवेद्यवस्तु से
अव्यतिरिक्त होने के कारण सर्वमय, विश्वरूप होने पर भी वस्तु संवेदन तत्त्व परामर्श के
उन्मिषित न होने के कारण सभी को आत्मा से व्यतिरिक्त कारणान्तरलब्धात्मक मानकर
और सभी आत्माओं को अपने से भिन्न मानकर और अपनी आत्मा को देहादि अनित्य
एवं अनात्म वेद्य में अहंबुद्धि स्थापित करके जन्ममरणादिक आवागमन के चक्र में
फँसकर संसारी जीव कहलाने लगता है। किन्तु जब शिव रूपी सूर्य की शक्ति रूपी
रश्मि के शक्तिपात से उत्पन्न प्रबोध से उन्मिषित विशद् दृष्टि वाला होकर स्फुटतर
प्रकाश से प्रकाशित होकर अपने को अनित्य देहादिक से मुक्त होकर सत्यात्मस्वभाव में
स्थित हुआ देखता है और जब यथावस्थित वस्तु संवेदन का यथार्थ परामर्श करता है
तब वह संकल्पमात्रविलिखित-विचित्र-विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्र वाला शिव बन जाता
है। इसीलिए कहा गया है कि 'तत्संवेदनरूपेण तादात्म्याप्रतिपत्तिः' उन उन वस्तुओं के
संवेदन स्वभाव के बल से जो तादात्म्य प्रतिपत्ति (संवेद्यमानवस्तु के साथ अभेद
संवित्ति) होती है उससे समस्त भावों की उत्पत्ति होती है अतः तब जीव सर्वमय बन
जाता है। उससे उसकी सर्वमयत्वप्रतिपत्ति के कारण ऐसी कोई अवस्था है ही नहीं जो
कि शिव नहीं होती।
'सा अवस्था नास्ति या शिवमयी न भवति ॥'
ऐसी स्थिति में भोक्ता ही ईश्वर बनकर भोग्यभाव से ईशितव्य वस्तु रूप में सदा
सर्वत्र संस्थित रहता है। जिसकी ऐसी संवित्ति है वही 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है।
आत्मा ही विश्वरूप में स्थित है—'आत्मन एव विश्वरूपत्वेन स्थितिः ।'
विश्वप्रपञ्च का कोई निमित्तान्तर नहीं है। ब्रह्मवादियों ने कहा भी है—
'कल्पयत्यात्म-नात्मानमात्मा देवः स्वमायया ।
स एव बुद्ध्यते भेदादिति वेदान्तनिश्चयः ॥
अन्य विद्वानों ने भी कहा है—
विविधैरुपाधिभिरवस्थितैर्बहिः, स्फटिकादिवत्तव विचित्रतोच्यताम् । यदि ते कदाचन
कथञ्चन क्वचिद्भवितुं क्षमास्त्वदवभासतः पृथक् ॥
परमाणु पाकपरिणाम विभ्रमा,
द्युत वा विवर्त इति विश्वमिष्यताम् ।
विबुधोत्तमैर्यदिह तद्विकल्पना-
स्तव शक्तिरेव न तथोपपादयेत् ॥
तदिहापि च प्रतिनिमेषमुन्मिष-
त्रिमिषषद्विकल्पविविधाशु मण्डलः ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८३
अथ चाति शुद्धवपुरद्भुतैकभूः,
स्फुरसि त्वमेव शिव चिन्मयो मणिः ॥
इसे विवृति में पृथक्-पृथक् रूप से व्याख्यात किया गया है—
‘सर्वात्मक एवायमात्मा’ आदि द्वारा, ‘तेनतथाविधेन’—आदि द्वारा एवं—‘एवं
स्वभावे यस्य’ आदि ग्रन्थों के द्वारा व्याख्यात किया गया है। १
पशुप्रमाता जीव सर्वमय है क्योंकि (वह भी पति प्रमाता शिव की भाँति) यह भी
समस्तभावों (घटपदादिक भावों) के साथ संवेदनात्मक तदात्मकता रखने के कारण उनका
सृजन करता रहता है ॥ २८ ॥
भट्टकल्लट कहते हैं—यह जीवात्मा सर्वात्मक है क्योंकि यह व्यक्तिगत संवेदन
के माध्यम से विश्व के भावों (पदार्थों) का सृजन करता रहता है जो भी पदार्थ उसके
अनुभव में आता है वही उसके संवेदन का आलम्बन बन जाता है । यह पशुप्रमाता
(जीवात्मा) जिस किसी भी वस्तु का संवेदन (अनुभव) करता है उसको आत्मीकृत करके
उसे अपने शरीर के रूप में स्वीकार कर लेता है । परिणामस्वरूप इस पशुप्रमाता का
यह शिर हाथ आदि अंगों से युक्त शरीर ही उसका एक मात्र शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत्
संवेदन में आने वाले प्रत्येक पदार्थ उसके शरीरांग बन जाते हैं—
‘सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात्
बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिर पांण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य
शरीरम् २ ॥ २८ ॥
वाचकवाच्यात्मक वस्तुओं की संवेदनाओं (अनुभवों) की ऐसी कोई भी अवस्था
नहीं है जो शिवस्वरूप न हो । प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (पदार्थ =
प्रमेय) के रूप में अवस्थित है ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि चूँकि आत्मा सर्वमयस्वभाव है अतः शब्दों एवं अर्थों से
सम्बद्ध ऐसी कोई अवस्था नहीं है जोकि शिवात्मक स्वभाव को व्यक्त न करती हो अर्थात्
जो शिव न हो । प्रत्येक स्थान में यह भोक्तारूप वेदकसत्ता आत्मा ही भोग्य पदार्थों (वेद्य
पदार्थ) के रूप में अवभासित एवं उल्लसित हो रही है । भोग्य (संवेद्य = प्रमेय) पदार्थ
भोक्ता (संवेदक = चेतन प्रमाता) से पृथक् नहीं है ॥ २९ ॥
‘तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या
शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत
भोग्यमस्ति ॥ २९ ॥
(‘ऐसी कोई अवस्था नहीं है जो शिवस्वरूप न हो’ तथा ‘समस्त प्रमेय मुझ प्रमाता
का ही शरीर है’—) इस प्रकार का, जिस योगी का, संवेदन हो वह निःशेष जगत् को
अपनी आनन्दात्मिका क्रीड़ा के रूप में देखता हुआ, अपने सत्स्वरूप के साथ एकाकार
हो जाता है अतः वह योगी निःसंशय जीवन्मुक्त है ।
१. रामकण्ठाचार्यः ‘स्पन्दकारिकाविवृति’। २. स्पन्दसर्वस्व ।
२८४ स्पन्दकारिका
भट्टकल्लट कहते हैं—जिस योगी का यह विश्वात्मक स्वभाव हो अर्थात्—'यह
समस्त जगत् मन्मय है'—वह समस्त जगत् को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते रहने तथा
नित्ययुक्त (अपने चिरन्तन आत्मस्वभाव से अपृथक्) रहने के कारण जीवित रहता हुआ
भी ईश्वर के समान मुक्त रहता है तथा उसकी शरीरादिक वस्तुओं पर कोई भी
(प्रतिबन्धात्मक, आवरणात्मक मायात्मक) बन्धन नहीं रहता (अर्थात् सारे बन्धनों से मुक्त
रहता है) ।¹
जीवन्मुक्ति का स्वरूप—
इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥ ३० ॥
जिसका (जिस योगी का) ऐसा संवेदन हो कि समस्त विश्व मेरी क्रीडा है—वह
संपूर्ण विश्व को अपनी क्रीडा के रूप में देखता हुआ चारों ओर से (सभी जागतिक
भावों के साथ) युक्त (समस्त पदार्थों के साथ तद्रूपतावश उनसे एकाकार) होता हुआ
'जीवन्मुक्त' (कहलाता) है—इसमें कोई शंका नहीं है ॥ ३० ॥
- सरोजिनी *
इस कारिका में आत्मा की विश्व के साथ अभेदात्मकता एवं 'विश्वोऽहं' के
विमर्श में 'जीवन्मुक्तित्व' का प्रतिपादन किया गया है । परमात्मा तो विश्ववपु है ही
किन्तु मितात्मा भी विश्ववपु है । परमात्मा तो अपनी अखण्ड स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति
के द्वारा अनन्त प्रमाता-प्रमेयों, वेदक-वेद्यों से पूर्ण जगत् को अस्तित्व प्रदान करके उन्हें
अपने शरीर के रूप में धारण करता है किन्तु मितात्मा (पशु) अपने संवेदनों के द्वारा
प्रत्येक भूतात्मक एवं भावात्मक पदार्थ की सृष्टि करके उन्हें अपने शरीर के रूप में ग्रहण
करके अवस्थित रहता है अतः वह भी ईश्वरवत् है ।
संवित्ति = ज्ञान । संवेदन ।
अखिल = समग्र ।
वा = 'वा' शब्द का प्रयोग स्वार्थ में है । वा = किं बहुना ॥ कहाँ तक कहें?
इति = इस प्रकार (उक्त प्रकार रूप) ।
क्रीडात्वेन = क्रीडाराम, खेलने का बगीचा । 'खेलने के बगीचे के रूप में ।।'
पश्यन् = विभावयन् । विभावित करता हुआ ।
जीवन्मुक्ति = जीते हुए भी ईश्वरवत् मुक्त ।²
जीवन्मुक्ति और उसका स्वरूप—
स्पन्दशास्त्र में मुक्ति का स्वरूप = 'जीवन्मुक्ति'—बहुत कहाँ तक कहें? जिसको
इस प्रकार की 'संवित्ति' (ज्ञान) हो गया है कि समस्त दृश्यमान जगत् मेरा ही स्वरूप
है—मन्मय है वह समग्र जगत् को अपने खेल के बगीचे के रूप में देखता है क्योंकि वह
नित्ययुक्त एवं नित्यमुक्त है । बन्धन के कारण अज्ञान के नष्ट हो जाने पर एवं प्रबोध की
१. स्पन्दसर्वस्व । २. स्पन्दप्रदीपिका ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८५
प्राप्ति हो जाने से वह साधक जीवितावस्था में ही ईश्वरवत् मुक्त है। आत्मबोध में
सम्यक् विश्रान्ति हो जाने पर जो अलुप्तानुभव है रूप में स्थित है वह तत्त्ववित्
विषयोपभोग करता हुआ भी जीवन्मुक्त रहता है—
‘सम्यक् स्वबोधविश्रान्तौ योऽलुप्तानुभवः स्थितः ।
विषयानपि सोऽश्नन् स्याज्जीवन्मुक्तस्तु तत्त्ववित् ॥’१
जिन लोगों की यह मान्यता है कि उत्क्रान्ति के बिना मोक्ष नहीं होता उनका पक्ष
असमीचीन है क्योंकि—‘यदि स्वभाव का अनुभव किये बिना ही केवल उत्क्रान्ति के बल
से पुरुष को कैवल्य की प्राप्ति हो जाय तो जो मूर्ख फाँसी पर चढ़कर मरता है उसको भी
मोक्ष मिल जाय’।
‘बिना स्वभावानुभवेन पुंसः कैवल्यमुत्क्रान्तिबलाद्यदि स्यात् ।
अत्राऽपि पक्षे ननु मोक्षभाक्त उद्बन्धनं यः कुरुते प्रमूढः ॥’
यह भी कहा गया है कि ‘गुण वासना वासित पुरुष भी प्रलयकाल में विदेह होने
पर भी बद्ध ही रहते हैं। विशुद्ध ज्ञान के आश्रय से शरीरधारी भी मुक्त हो जाते हैं।’—
‘विदेहा अपि बुद्ध्यन्ते प्रलये गुणवासिताः ।
शरीरिणोऽपि मुच्यन्ते विशुद्धज्ञानसंश्रयात् ॥’२
‘ज्ञानगर्भ’ में भी कहा गया है—‘हे त्रिलोकीनाथ! जो मनुष्य आपकी उपासना
करके किल्बिष रूप उपद्रवों का नाश कर चुके हैं उन्हें बहुत शीघ्र ही अद्वैत भावना के
आवेश से यह अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह भावना के आवेश से यह
अनुभव प्राप्त हो जाता है कि मुझमें ही यह समस्त जगत् स्थित है। मैं ही सब हूँ एवं मैं
ही सर्वत्र हूँ।’ यह संवित् किस स्वरूप का है?—इसी अभिप्राय से कहा गया है—
‘तेन शब्दार्थचिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥’
—जिसकी इस प्रकार की संवित्ति है वह ‘जीवन्मुक्त’ है।३
अर्थात् शब्द चिन्तारूप एवं अर्थचिन्तारूप ऐसी कोई भी अवस्था नहीं है जो शिव
न हो—यही संवित्ति ‘जीवन्मुक्ति’ है।
जीवन्मुक्त कौन है? ‘Who possess this sort of recognition or he
who regards this whole universe as a play and is always united, is
beyond doubt liberated in life’.
वा—यह शब्द प्रथम निष्यन्दोक्त निमीलन समाधि को विकल्पित करते हुए
उसकी समापत्ति की दुर्लभता को ध्वनित करता है। अतः उसका यह अर्थ है—इस
प्रकार की संवित्ति दुर्लभा है। इसका ज्ञान केवल उसको होता है जो जन्म-मरण के चक्र
से निर्मुक्त है।
१-२. स्पन्दप्रदीपिका। ३. रामकण्ठाचार्य (स्पन्दकारिकाविवृति)।
२८६ स्पन्दकारिका
वा—'प्रथम अध्याय में प्रयुक्त (Involutive meditation) (निमीलन समाधि)
ऐच्छिक बताने के लिए 'वा' प्रयुक्त हुआ है । ब्रह्माण्ड के साथ अपनी अभिन्नता या
तादात्म्यभाव आवश्यक तो है किन्तु है कठिन । अतः उसका अर्थ इस प्रकार होगा—इस
प्रकार की प्रत्यभिज्ञा या अवबोध (Recognition) केवल उस व्यक्ति को प्राप्त होता है
जिसके कोई आगामी जन्म नहीं होते । जो अपुनर्भवता । जन्ममरण के चक्र से मुक्ति
प्राप्त कर लेता है वह संपूर्ण जगत् को क्रीड़ा के रूप में देखता है या वह चैतन्य के
विकास के द्वारा विश्व की रचना करता है एवं संहार करता है तथा सतत् रूप से
एकीकृत (United) है जैसे कि एक योगी होता है—'वे जो कि सदा एकात्म्यभाव से
मुझ में ध्यान लगाकर मेरी अर्चना करते हैं'—(मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता
उपासते ।। (गीता १२।२) अर्थात्—ऐसे योगी जगत् को खेल समझते हुए अपने संवित्
के उन्मेष एवं निमेष द्वारा सृजन एवं संहार करते हुए नित्य उपासना करते हैं—
'अखिल जगत् क्रीड़ात्वेन पश्यन् निज संविदुन्मेषनिमेषाभ्यां सृजन् संहरन्
नित्ययुक्ता उपासते ।।'
ऐसा व्यक्ति जीवितावस्था में ही सारे बन्धनों को भस्मसात् कर देता है? कैसे
करता है? ज्ञानाग्नि के द्वारा । वह भौतिक शरीर के पञ्चत्व प्राप्त करने पर शिव बन
जाता है । वह जीवित रहकर भी कभी बन्धनग्रस्त (Feltered) नहीं होता ।। 'सततं
समाविष्टो महायोगी जीवन्नेव प्राणादिमानापि विज्ञानाग्नि-निर्दग्ध-अशेषबन्ध्नो देहपाते तु
शिव एव । जीवश्चेन्जीवन्मुक्तः । न तु कथञ्चित् बद्धः ।।'
दीक्षा एवं मुक्ति—‘दीक्षादिना गुरुप्रत्ययो मुक्तिः' 'ईदृशात्तु ज्ञानात्समाचाराद्वा
स्वप्रत्ययतो एव मुक्ति:'—योगी दीक्षा एवं गुरु की शक्तिपात की शक्ति पाकर मुक्त हो
जाता है—'महासमापत्ति' प्राप्त कर लेता है ।'१
आत्म संवित् के मुख्यतः दो भाव हैं—(१) पशुभाव (२) पतिभाव ये भावद्वय ही
आत्मा के द्विविध आसन हैं ।
यह चैतन्य सत्ता चाहे पशुभाव में अवस्थित हो या पतिभाव में किन्तु है तो वेदक
ही । विश्व वेद्य है । वेद्य सत्ताओं की सत्ता का अधिष्ठान तो वेदक सत्ता ही है । 'यावन्न
वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये? वेदकं वेद्यमेकं तु ।।'
भट्टकल्लट कहते हैं इस दृष्टि से तो मुख, हस्त, चरण आदि अंगों से युक्त
पाञ्चभौतिक शरीर ही 'पशु' का शरीर नहीं है प्रत्युत् प्रत्येक वेद्य पदार्थ के संपर्क में आने
पर या उसका संवेदन करने पर यह पशुप्रमाता उन वेद्य्रों में संवेदन के साथ अनुप्रविष्ट
भी होता है अतः उनमें संवेदन द्वारा प्रविष्ट होने के कारण वे समस्त वेद्य पदार्थ भी
उसके शरीर हैं और इसी कारण उनमें 'ममायं' की भावना एवं रागानुग समापत्ति हुआ
करती है—तादात्म्य हुआ करता है ।
जीवात्मा (पशुप्रमाता, मितात्मा) भी विश्वशरीरी है ।
१. आचार्य क्षेमराजः 'स्पन्दनिर्णय' ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८७
शिवसूत्र एवं स्पन्दशास्त्र - एक तुलना-
(१) शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः ॥ (१।२१)
(२) विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था (२।१५)
(३) कलादीनां तत्त्वानांमविवेको माया (३।३)
(४) धीवशात्सत्वसिद्धिः (३।१२) विद्याविनाशे जन्मविनाशः (३।१८)
(५) कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । (३।१९)
(६) मात्रास्वप्रत्ययसंधानेनष्टस्य पुनरुत्थानम् । (३।२४)
(७) शिवतुल्यो जायते । (३।२५)
(८) भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् (३।३६)
(९) भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । (३।४२) तदारूढप्रमितेस्तत्क्ष-
याज्जीवसंक्षयः ॥ ४१ ॥
इसी कारिका में शक्ति के दो रूपों का परिचय दिया गया है जो निम्नांकित है-
(१) भोग्य रूप- बन्धन (२) 'सर्वं शक्तिमयं जगत्' 'शक्तयोऽस्य जगत् कृत्स्नं
शक्तिमांस्तु महेश्वरः'- मानकर शक्ति का उपास्य रूप ग्रहण करके उसकी उपासना-
मुक्ति ॥
'बन्धयित्री' बन्धन प्रदान करने वाली । 'बन्धन' क्या है? क्षेमराज के कथनानुसार
(१) शिवाभेदाख्यात्यात्मका ज्ञानस्वभावो अपूर्णमन्यतात्मकाणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा
बन्धः ॥ (२) आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बन्धो ।
(३) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव ॥ (४)
'ज्ञानं बन्धः (शिवसूत्र १।२) (५) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ॥
स्वातन्त्र्य हानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता ।
द्विधाणवं मलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥
अर्थात् आत्म तत्त्व में अनात्म तत्त्व का एवं अनात्म तत्त्व में आत्म तत्त्व की
प्रतीति ही बन्ध है । मल या अज्ञान ही इस बन्धन रूप संसार का अंकुर है ।
'क्रियाशक्ति' बन्धन एवं मोक्ष दोनों का कारण है ।
इस सिद्धान्त में जीवन्मुक्ति ही मुक्ति है । कहीं अन्यत्र जाने का नाम मोक्ष नहीं
प्रत्युत् अज्ञानग्रंथि का उद्भेद ही मोक्ष है-
नान्यत्र गमनं स्थानं मोक्षोस्ति सुरसुन्दरि ।
अज्ञानग्रंथिभेदो यः स मोक्ष इति उच्यते ॥
विशेष- त्रिकदर्शन में योगसाधना एवं कुण्डलिनी योग मान्य है अतः
'स्वमार्गस्था' का यौगिक अर्थ भी लिया जा सकता है । मूलाधार में अवस्थित कुल-
कुण्डलिनी (शिव कला) ब्रह्ममार्ग के द्वार पर फण रखकर सो रही है । जब तक वह
जागकर स्वमार्ग (अपने पति परमशिव के पास पहुँचने के मार्ग) (सुषुम्णा मार्ग) का
२८८ स्पन्दकारिका
आश्रय नहीं लेती तब तक न तो जीव का उद्धार होता है और न तो यह कुल शक्ति ही
कृतार्थ हो पाती है अतः 'स्वमार्गस्था' का अर्थ है—सुषुम्णा स्थित ब्रह्म नाड़ी में संप्रविष्ट
होकर संस्थित ॥
'मयि स्थितमिदं जगत् सकलमेव सर्वत्र वा ।
स्थितोऽहमिति धारणाद्वितयभावनावेशतः ॥
जगत्त्रितयनाथ तानतिचिरेण सम्प्राप्यते ।
नृभिस्तव सपर्यया दलितकिल्बिषोपप्लवैः ॥'१
गीता में भी कहा गया है—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
'पंचरात्र' में भी कहा गया है कि 'प्रज्ञा के राजमहल पर आरूढ़ पुरुष अशोच्य
हो जाता है मानों पर्वत के उच्च शिखर पर स्थित पुरुष नीचे की वस्तु को देख
रहे हों ॥'— प्रज्ञा प्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान् ।
भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ॥'२
यहाँ नित्य उद्युक्तता एवं उन्मुक्तता को ही उपाय के रूप में ध्वनित किया गया
है—'अत्र च नित्योद्युक्तरूपत्वमेवोपायो युक्त्याध्वनितः ॥' कहा भी गया है—
'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥' (२१)३
जीवन्मुक्त कौन है? 'यस्य इति वा संवित्तिः स जीवन्मुक्तः ॥'४
यस्य वा—जिस साधकोत्तम की । संवित्तिः = सम्यक् ज्ञान ॥ सततम् = सभी
अवस्थाओं में व्यवधानरहित होकर अखण्ड रूप में । युक्तः = समाहित । स्वभावबल
परिशीलन अप्रमत्त-एकाग्रमानस साधक । स जीवन = नियत देहाधिकरणों एवं प्राणों को
धारण करता हुआ । मुक्तः = सर्वव्यापक-सर्वात्मक-सर्वेश्वर स्वतन्त्र स्वस्वभावाहंकार
प्रतिपत्ति की दृढ़ता से जन्ममरण के चक्र से मुक्त होकर रहने वाला यह साधक परमेश्वर
ही है । न संशयो = इस विषय में कोई भ्रान्ति नहीं है ।
प्रश्न उठता है कि क्या करता हुआ जीवन्मुक्त? 'अखिलम्' अर्थात् अशेष ।
अनन्त वस्तु व्यक्ति विचित्र इस 'विश्व' या जगत् को 'क्रीडात्वेन'—अर्थात् स्वनिर्मित-
चराचर भावक्रीडनको परचितलीलामात्र के रूप में 'पश्यन्' अर्थात् विभावित करता
हुआ ॥५
अनुन्मिषित स्वस्वभावनिभालनक्षमविमलविज्ञान दृष्टि वाला व्यक्ति अपने को दूसरे
से भिन्न मानकर उसके कारण उत्पन्न हर्ष एवं शोक तथा भय आदि विकारों का
अनुभव करता हुआ आवागमन के चक्र में पड़ा हुआ दुःख भोगता है । किन्तु जो साधक
१. ज्ञानगर्भ । २. पञ्चरात्र ।
३-४. स्पन्दप्रदीपिका । ५.स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।
द्वितीयः निष्यन्दः २८९
उपर्युक्त रीति से क्रीड़ापरायण होकर स्वपरिकल्पित भय क्रोध शोक के कारणभूत
भावप्रतिच्छकों के द्वारा क्रीड़ा करता हुआ तद्याथात्म्य को जानकर कालुष्य से भय
आदि विकारों के कालुष्य से स्वल्पमात्र भी दुष्प्रभावित नहीं होता एवं भावों को
स्वस्वभाव शक्ति का विजृंभण मात्र मानकर याथात्म्यवेदी होकर स्वल्पमात्र भी विकारग्रस्त
नहीं होता वह जगत् एवं उसके समस्त व्यापारों को अपनी क्रीड़ा मानकर जीवितावस्था
में ही मुक्त हो जाता है ।१
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं—
'एवं स्वभावं यस्य चित्तं' यथा 'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति'—स सर्वं क्रीडात्वेन
पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन वर्तते ।।'२
अर्थात् जिस योगी के चित्त का इस प्रकार का स्वभाव विकास हो उठा हो कि—
'यह निखिल विश्व मेरा अपना ही स्वरूप है'—वह संपूर्ण प्रमेयात्मक जगत् को अपने
क्रीडनक (खिलौने) के रूप में देखता हुआ नित्ययुक्त (स्वरूप सत्ता से निरन्तर
आश्लिष्ट) होने के कारण षाटकौशिकक्षर काया में रहता हुआ भी ईश्वर के समान मुक्त
रहता है । ऐसे प्रबुद्ध योगी के लिए उसके शरीरादिक बन्धनरूप नहीं रहा करते ।।
संवेद्य विषयों के प्रकार—आत्मा वेदक है और उसके संवेदन के विषय वेद्य
(संवेद्य) पदार्थ है । इनके दो प्रकार है—
(१) पाञ्चभौतिक विषय (२) भावात्मक विषय ।
(१) पाञ्चभौतिक विषय—विषयों के वे प्रकार जो कि पृथिव्यादिक पञ्चभूतों से
निर्मित हैं—बाह्येन्द्रियों से ग्राह्य हैं: स्थूल शरीर एवं उनके अनेक संघटक भौतिक अंग ।
(२) भावात्मक विषय—ये शरीरांग युक्त कोई काया नहीं है प्रत्युत् अमूर्त भाव
हैं—संवेदनों, भावनायें, संवेगों, विचारों, अनुभूतियों अमूर्त भाव हैं—संवेदनायें,
भावनायें, संवेगों, विचारों, अनुभूतियों के अमूर्त अस्तित्व हैं यथा-सुख, दुःख, मान,
अपमान, धर्म, अधर्म, जय, पराजय, आह्लाद, निराशा आदि ।।
इन्हें 'भावाभाव' के आधार पर भी विभक्त कर सकते हैं यथा—
(क) भावात्मक विषय—जगत् में भावसत्ताक पदार्थ यथा—घट, पट, शरीर,
इन्द्रियाँ, सुख, दुःख, अमर्ष, हर्ष आदि ।।
(ख) अभावात्मक विषय—जगत् में अविद्यमान पदार्थ यश—वन्ध्यापुत्र,
खपुष्प, शश-विषाण, सर्प-कर्ण आदि ।।
संवेदन की विशेषता—(१) संवेदन में मूर्तामूर्त दोनों विषयों की समान अनुभूति
होती है । (२) संवेदन में समस्त अनुभूतियाँ भावात्मक ही हुआ करती हैं अभावात्मक
नहीं । (३) जो कुछ संवेदन के विषय हैं उन्हीं का अस्तित्व होता है अन्य का नहीं ।
१. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।
२. स्पन्दसर्वस्व (स्पन्दकारिकावृत्ति) ।
स्पं० १९
२९० स्पन्दकारिका
(क) जीवात्मा जो जो संवेदन करती है वह वह उसका शरीर बन जाता है 'एवञ्च
यद् यदयं जीवः संवेत्ति तत्तदस्य शरीरमेव संपद्यते न तु नियत शिरः पाण्याद्यवयव-
सन्निवेश एव (स्पन्दकारिकाविवृतिः ३.३) ।
(ख) संवेद्यमानतावस्था में ही संवेदक शरीरी बन जाता है—संवेद्यमानतावस्थाया-
मेव शरीरीभवति ।। (रामकण्ठाचार्य ३.३) ।
(ग) संवेद्यमानता तत् तत् विषयों का प्रकाशन है । संवेद्यमानता च तेन तेन
रूपेण प्रकाशमानता । (स्प०का०वि० ३.३)। संवेदक की जिस भी विषय की ओर
औन्मुख्य होता है—संवेद्यमानता के काल में वे ही समस्त विषय उसके शरीर बन जाते
हैं । संवेद्यमानता के समय किसी भी विषय के शरीर बनने का अर्थ है—संवेदन के काल
में संवेदन के द्वारा उस विषय का सर्जन करना । संवेदनात्मक औन्मुख्य—एक का संहार
दूसरे का सृजन । परमात्मा की भाँति निरन्तर प्रतिक्षण मितात्मा द्वारा प्रलयोद्भव =
संहार + सृजन ।
तदात्मता महासमापत्ति—
अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्यध्यायिचेतसि ।
तादात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य वा ॥ ३१ ॥
इयमेवाऽमृत प्राप्तिरयमेवाऽऽत्मनो ग्रहः ।
इयं निर्वाणदीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥ ३२ ॥
ध्याता (योगी) के चित्त में ध्येय (देवता) का साक्षात्कार होना यही है कि इच्छा
होते ही (तत्काल) (ध्याता का अपने देवता के साथ एकता रूप समापत्ति (समाधि = देव
साक्षात्कार रूप समावेश) प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥
यही (तदात्मता समापत्ति) अमृतत्त्व की संप्राप्ति है, यही आत्मग्रहण है । यही
निर्वाण दीक्षा है और (यही) शिवभावप्रदायिका है ॥ ३२ ॥
- सरोजिनी *
प्रस्तुत इस श्लोक में यह बताया गया है कि मन्त्रात्मा शिवभाव के उदय की अन्य
युक्ति क्या है । इसी प्रयोजन से कहा गया—'अयमेवो.... साधकस्य वा ।।' इसमें 'महा-
समापत्ति' का भी वर्णन किया गया है ।¹
'समापत्ति' ध्याता के मस्तिष्क में केवल यही उस ध्येय वस्तु का 'उदय' है जिसके
साथ ध्याता ऐकात्म्य प्राप्त कर चुका है । यह तदात्मता समापत्ति ही अमृतत्त्व की प्राप्ति
है । यही आत्मसाक्षात्कार है । यह वह निर्वाण है जो कि शिव के साथ ऐकात्म्यभाव या
तद्रूपता की प्राप्ति का विधान करता है ।²
अयमेव = यही । उदयः = आविर्भाव प्रकटीकरण । मन्त्र के देवता का उदय ।
प्रकटीभाव ।
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २९१
तस्य = उसका ।
ध्येये = ध्यान का विषय ।
ध्यायिचेतसि = ध्याता के चित्त में । १
तदात्मता = तादात्म्यभाव ॥
समापत्ति = समाधि । आत्मसाक्षात्कार ।
(१) यही ध्याता के मस्तिष्क में अभिव्यक्ति है : उदय है : प्रकटीभाव है ॥
(२) यह अभिव्यक्ति ध्येय की अभिव्यक्ति है । २
(३) इस ध्येयाकार अभिव्यक्ति में साधक आत्मा के साथ ऐकात्म्य प्राप्त कर लेता
है—तद्रूप हो जाता है : तादात्म्यभाव प्राप्त कर लेता है । 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्'—के
अनुसार ध्याता के चित्त में—'न सावस्था न या शिवः'—इस प्रकार प्रतिपादित
शिवस्वभाव ध्येय का तथा किसी सिद्धि के लिए किसी विशेष मन्त्र के देवता का यही
'उदय' या प्रकटीभाव है । 'तदात्मता समापत्ति' शिवैक्यावेश है । यह 'न सावस्था न या
शिवः' की अनुभूति है । यह पञ्चवक्त्र (शिव) आदि का साधक के अपने से पृथक् रूप
में अपना स्वरूप प्रदर्शित करना नहीं है—यह देवता का साधक से पृथक् व्यक्तित्व
प्रदर्शन नहीं है—यह साधक से पृथक् होकर उसे दर्शन देना नहीं है 'न तु पञ्चवक्त्रा-
देर्व्यतिरिक्तस्याकारस्य दर्शनं' । ३ यह तदात्मतासमापत्ति की निश्चयात्मिका बुद्धि भी नहीं
है—'न तु निश्चयमात्रेण तदात्मता समापत्तिः' ४ प्रत्युत् यह है—इच्छा करने वाले साधक
का अविकल्प विश्वाहन्तात्मक शिवैक्यरूप इच्छा परामर्श-शिवैक्यावेश । ५ इसी बात को
इस प्रकार भी कहा गया है—'मैं ही तत्संवेदन रूप से तादात्म्यप्रतिपत्ति से विश्वशरीर
चिदानन्दघन शिव हूँ' । ६
—'अहमेव तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितो विश्वशरीरश्चिदानन्दघनः शिव
इति'—इस प्रकार का सङ्कल्प अविकल्प शेषीभूत रूप से फल प्रदान करता हूँ—उसका
ध्येय मन्त्र देवता सभी साधकों के समक्ष अभिमुख होता है । परमेष्ठिपाद द्वारा भी कहा
गया है—
'साक्षाद्भवन्मये नाथ सर्वस्मिन्भुवनान्तरे ।
किं न भक्तिमतां क्षेत्रं मन्त्रः केषां न सिध्यति ॥' (उ०स्तो० १।४)
यही समापत्ति—परमाद्वयरूप अमृत की प्राप्ति है—'इयमेव च समापत्तिः परमा-
द्वयरूपस्य अमृतस्य प्राप्तिः।।'
अन्य अमृत में तो कतिपय काल तक शरीर अमर रहता है किन्तु बाद में साधक
की मृत्यु हो जाती है किन्तु इस अमृतत्व की प्राप्ति में ऐसा नहीं होता । 'स्वच्छन्दतन्त्र'
में भी इसकी पुष्टि की गई है—
(१) नैव चामृतयोगेन कालमृत्युजयो भवेत्,
१-६. स्पन्दनिर्णय ।
२९२ स्पन्दकारिका
—इस प्रकार कहकर इस तन्त्र द्वारा अंत में उपसंहार में यह कहा गया है—
(२) अथवा परतत्त्वस्थः सर्वकालैर्न बाध्यते ॥ (७।२२३)
(३) सर्वं शिवशक्तिमयं स्मरेत्—
जीवन्नेव विमुक्तोऽसौ यस्येयं भावना सदा ।
यः शिवं भावयेन्नित्यं न कालः कलयेत्तु तम् ॥
योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा ।
स स्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ॥
स्वच्छन्दश्चैव स्वच्छन्दः स्वच्छन्दो विचरेत् सदा ॥ (७।२५८)
(४) यही ‘ज्ञान’ भी है—‘अयमेव आत्मनो ग्रहो ज्ञानं यदुच्यते आत्मा
ज्ञातव्य इति तत्र इदमेव—सर्वज्ञसर्वकर्तृस्वतन्त्रशिवस्वरूपतया प्रत्यभिज्ञानं
आत्मनो ज्ञानम्’ ।
(५) त आत्मोपासकाः सर्वे न गच्छन्ति परं पदम् ॥ (स्व० ४।३८८)
आत्मसाक्षात्कार के लिए ‘दीक्षा’ भी आवश्यक है—१
(१) दीक्षा गुरु का शिष्य की आत्मा के प्रति अनुग्रह है जो कि दीक्षा के समय
शिष्य की आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने की पद्धति के लिए अनिवार्य है । गुरु
उपलब्धि के मार्ग को जानकर (सम्प्राप्ति की इस पद्धति को जानकर) शिष्य की आत्मा
को शिव के साथ मिलाकर एकाकार देता है ।
(२) पारमार्थिक स्वरूपदायिनी दीक्षा निर्वाण दीक्षा है जो निम्नांकित है—
‘एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी ।
दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० २५)
यह मोक्षदायिनी दीक्षा (Liberative initiation) है । यह ‘पुत्रक’ आदि की
दीक्षा शिवाभिन्न रूप में स्थित है और शिव से एकता प्राप्त कराती है । जो परासत्ता को
जानता है वह उस दीक्षा को प्राप्त करता है जो कि तिल एवं घी की आहुतियों
(Offerings) से रहित रहकर भी मोक्ष प्रदान करती है ।२
इस दीक्षा में यह भावना की जाती है कि—‘मैं स्वयमेव शिव हूँ । मैं ज्ञान एवं
आनन्द से परिपूर्ण हूँ । मेरा शरीर यह विश्व है क्योंकि इसके साथ मेरी पूर्ण एकता
है । यह एकता इसकी चेतना के रूप में स्थित है । मेरी विश्व के साथ अभिन्नता
एवं एकता है ॥’
‘ओ परमात्मन्! इस विश्व में ऐसा कौन है जो कि साधकों के लिए पवित्र स्थान
की भाँति पवित्र नहीं है? सभी आपके साथ अभिन्न हैं। ऐसा कौन सा स्थान है जहाँ मन्त्र
अपना फल नहीं देते?’
‘ऐसी कौन सी अवस्था है जो शिव नहीं है?’ साधक को शिव बनकर शिव की
१-२. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २९३
पूजा करनी चाहिए ।। 'समग्र विश्व को शिव एवं शक्ति का ही रूप मानना चाहिए ।।'—
जिसे इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान हो चुका है वह चाहे जीवित ही क्यों न हो स्वच्छन्द
(स्वतन्त्र) है। वह योगी 'स्वच्छन्द' पर ध्यान करता है। वह 'स्वच्छन्द' के साथ योग के
द्वारा ऐकात्म्य प्राप्त कर लेता है और 'स्वच्छन्द' की भाँति जीवन व्यतीत करने लगता
है। वह स्वच्छन्द बनकर स्वतन्त्र एवं आत्मनिर्भर, निरावलम्ब एवं निर्बन्ध जीवन जीने
लगता है।¹ यही 'प्रत्यभिज्ञा' (Cognition) है और यही 'आत्मज्ञान' है। 'आत्मा का
ज्ञान होना चाहिए'—इसका अर्थ यह है कि आत्मा शिव के साथ अभिन्न है।²
पूर्वोक्त मन्त्रात्मा ध्येय का यही ध्याता के चित्त में उदय है। जो साधक या ध्याता
मन्त्रात्मा से एकत्व चाहता है, उसकी यही तदात्मता अथवा ध्येयस्वरूपापत्ति है।
'विश्वसंहिता' में कहा गया है—'जब चित्त ध्येय में लीन हो जाता है तब उसे 'ध्यान'
कहते हैं। इसमें ध्येय प्रत्यक्ष हो जाता है और ध्याता तन्मय हो जाता है।'—
'ध्येये चित्तं यदा लीनं तदा ध्यानमुदाहृतम् ।
ध्येयः प्रत्यक्षतां याति ध्याता तन्मयतां व्रजेत् ॥
ऋच्छतस्त्विति पाठाद्वा ध्येयं चिन्तयतोऽत्र या ।
तदात्मतासमापत्तिरैक्यं तस्योदयः स तु ।।'
(मूल श्लोक में 'इच्छतः' के स्थान में 'ऋच्छतः' पाठ भी माना जाता है।) उसका
अभिप्राय यह है कि ध्येय का चिन्तन करते करते जो उसके साथ तदात्मतापत्ति है अर्थात्
एकता है, वही उसका उदय है। ग्रन्थकर्ता 'इच्छतः' एवं 'ऋच्छतः' दोनों का आशय
ठीक मानते हैं क्योंकि मन्त्रोच्चारण की इच्छा से मन्त्रदेवता के साथ जो तादात्म्य है, वह
वस्तुतः संवेदन द्वारा उससे एकता ही है। मन्त्र न्यास द्वारा जीवन में देवता का आविर्भाव
ही होता है।
यह जो स्वरूप-संवेदन है, यही आत्मा की अमृतत्व की प्राप्ति है। जरा एवं मरण
की परम्परा का विच्छेद होने से जो अपुनर्भवता है उसे हम 'मुक्ति' नहीं कहते। दुग्ध-
समुद्र से स्वतः उद्भूत यही आत्मा का अनुग्रह है। यही 'निर्वाण-दीक्षा' है और यही
परमात्मा से मिलन है।
'मोक्षधर्म' में कहा गया है—सभी संकल्पों का त्याग करके सत्व में चित्त को
निविष्ट कर देना चाहिए। जब चित्त सत्व में विलीन हो जाता है तब काल पर विजय
प्राप्त हो जाती है—
'हित्वा तु सर्वसंकल्पान् सत्वे चित्तं निवेशयेत् ।
सत्वे चित्तं यदा लीनं ततः कालञ्जयो भवेत् ॥'
यह जो स्वरूप-संवित्ति है यही आत्मा को अमृतत्त्व-प्राप्ति है। जरामरण की
परम्परा का उच्छेद होने से यही अपुनर्भवता है और हम इसे ही जन्ममरण के चक्र का
अभाव कहते हैं—
१-२. स्पन्दनिर्णय ।