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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 519 में से

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पृष्ठ 391

२९० स्पन्दकारिका
(क) जीवात्मा जो जो संवेदन करती है वह वह उसका शरीर बन जाता है 'एवञ्च
यद् यदयं जीवः संवेत्ति तत्तदस्य शरीरमेव संपद्यते न तु नियत शिरः पाण्याद्यवयव-
सन्निवेश एव (स्पन्दकारिकाविवृतिः ३.३) ।
(ख) संवेद्यमानतावस्था में ही संवेदक शरीरी बन जाता है—संवेद्यमानतावस्थाया-
मेव शरीरीभवति ।। (रामकण्ठाचार्य ३.३) ।
(ग) संवेद्यमानता तत् तत् विषयों का प्रकाशन है । संवेद्यमानता च तेन तेन
रूपेण प्रकाशमानता । (स्प०का०वि० ३.३)। संवेदक की जिस भी विषय की ओर
औन्मुख्य होता है—संवेद्यमानता के काल में वे ही समस्त विषय उसके शरीर बन जाते
हैं । संवेद्यमानता के समय किसी भी विषय के शरीर बनने का अर्थ है—संवेदन के काल
में संवेदन के द्वारा उस विषय का सर्जन करना । संवेदनात्मक औन्मुख्य—एक का संहार
दूसरे का सृजन । परमात्मा की भाँति निरन्तर प्रतिक्षण मितात्मा द्वारा प्रलयोद्भव =
संहार + सृजन ।
तदात्मता महासमापत्ति—
अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्यध्यायिचेतसि ।
तादात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य वा ॥ ३१ ॥
इयमेवाऽमृत प्राप्तिरयमेवाऽऽत्मनो ग्रहः ।
इयं निर्वाणदीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥ ३२ ॥
ध्याता (योगी) के चित्त में ध्येय (देवता) का साक्षात्कार होना यही है कि इच्छा
होते ही (तत्काल) (ध्याता का अपने देवता के साथ एकता रूप समापत्ति (समाधि = देव
साक्षात्कार रूप समावेश) प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥
यही (तदात्मता समापत्ति) अमृतत्त्व की संप्राप्ति है, यही आत्मग्रहण है । यही
निर्वाण दीक्षा है और (यही) शिवभावप्रदायिका है ॥ ३२ ॥

  • सरोजिनी *
    प्रस्तुत इस श्लोक में यह बताया गया है कि मन्त्रात्मा शिवभाव के उदय की अन्य
    युक्ति क्या है । इसी प्रयोजन से कहा गया—'अयमेवो.... साधकस्य वा ।।' इसमें 'महा-
    समापत्ति' का भी वर्णन किया गया है ।¹
    'समापत्ति' ध्याता के मस्तिष्क में केवल यही उस ध्येय वस्तु का 'उदय' है जिसके
    साथ ध्याता ऐकात्म्य प्राप्त कर चुका है । यह तदात्मता समापत्ति ही अमृतत्त्व की प्राप्ति
    है । यही आत्मसाक्षात्कार है । यह वह निर्वाण है जो कि शिव के साथ ऐकात्म्यभाव या
    तद्रूपता की प्राप्ति का विधान करता है ।²
    अयमेव = यही । उदयः = आविर्भाव प्रकटीकरण । मन्त्र के देवता का उदय ।
    प्रकटीभाव ।
    १. स्पन्दप्रदीपिका । २. स्पन्दनिर्णय ।