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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 519 में से

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पृष्ठ 384

द्वितीयः निष्यन्दः २८३
अथ चाति शुद्धवपुरद्भुतैकभूः,
स्फुरसि त्वमेव शिव चिन्मयो मणिः ॥
इसे विवृति में पृथक्-पृथक् रूप से व्याख्यात किया गया है—
‘सर्वात्मक एवायमात्मा’ आदि द्वारा, ‘तेनतथाविधेन’—आदि द्वारा एवं—‘एवं
स्वभावे यस्य’ आदि ग्रन्थों के द्वारा व्याख्यात किया गया है। १
पशुप्रमाता जीव सर्वमय है क्योंकि (वह भी पति प्रमाता शिव की भाँति) यह भी
समस्तभावों (घटपदादिक भावों) के साथ संवेदनात्मक तदात्मकता रखने के कारण उनका
सृजन करता रहता है ॥ २८ ॥
भट्टकल्लट कहते हैं—यह जीवात्मा सर्वात्मक है क्योंकि यह व्यक्तिगत संवेदन
के माध्यम से विश्व के भावों (पदार्थों) का सृजन करता रहता है जो भी पदार्थ उसके
अनुभव में आता है वही उसके संवेदन का आलम्बन बन जाता है । यह पशुप्रमाता
(जीवात्मा) जिस किसी भी वस्तु का संवेदन (अनुभव) करता है उसको आत्मीकृत करके
उसे अपने शरीर के रूप में स्वीकार कर लेता है । परिणामस्वरूप इस पशुप्रमाता का
यह शिर हाथ आदि अंगों से युक्त शरीर ही उसका एक मात्र शरीर नहीं रह जाता प्रत्युत्
संवेदन में आने वाले प्रत्येक पदार्थ उसके शरीरांग बन जाते हैं—
‘सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात्
बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिर पांण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य
शरीरम् २ ॥ २८ ॥
वाचकवाच्यात्मक वस्तुओं की संवेदनाओं (अनुभवों) की ऐसी कोई भी अवस्था
नहीं है जो शिवस्वरूप न हो । प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा) ही भोग्य (पदार्थ =
प्रमेय) के रूप में अवस्थित है ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि चूँकि आत्मा सर्वमयस्वभाव है अतः शब्दों एवं अर्थों से
सम्बद्ध ऐसी कोई अवस्था नहीं है जोकि शिवात्मक स्वभाव को व्यक्त न करती हो अर्थात्
जो शिव न हो । प्रत्येक स्थान में यह भोक्तारूप वेदकसत्ता आत्मा ही भोग्य पदार्थों (वेद्य
पदार्थ) के रूप में अवभासित एवं उल्लसित हो रही है । भोग्य (संवेद्य = प्रमेय) पदार्थ
भोक्ता (संवेदक = चेतन प्रमाता) से पृथक् नहीं है ॥ २९ ॥
‘तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या
शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत
भोग्यमस्ति ॥ २९ ॥
(‘ऐसी कोई अवस्था नहीं है जो शिवस्वरूप न हो’ तथा ‘समस्त प्रमेय मुझ प्रमाता
का ही शरीर है’—) इस प्रकार का, जिस योगी का, संवेदन हो वह निःशेष जगत् को
अपनी आनन्दात्मिका क्रीड़ा के रूप में देखता हुआ, अपने सत्स्वरूप के साथ एकाकार
हो जाता है अतः वह योगी निःसंशय जीवन्मुक्त है ।
१. रामकण्ठाचार्यः ‘स्पन्दकारिकाविवृति’। २. स्पन्दसर्वस्व ।