स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० स्पन्दकारिका
'येनेदं दृश्यते विश्वं द्रष्टा सर्वस्य यः सदा ।
दृश्यश्चराचरत्वे यः स विष्णुरिति गीयते ॥'
'जाबालिसूत्र' में भी कहा गया है कि—द्रष्टा, स्प्रष्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता,
मन्ता, बोद्धा, जिसके चैतन्यस्वभाव का कभी लोप नहीं होता वही जगत् की उत्पत्ति-
स्थिति-प्रलय का एकमात्र कारण है—भगवान् वासुदेव अर्थात् आत्मा—
'द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धाऽपरिलुप्तचैतन्यस्वभावो जगदुत्पत्ति-
स्थितिलयैकहेतुर्भगवान् वासुदेव आत्मेति ॥'
पञ्चरात्रोपनिषद् में कहा गया है—'ज्ञाता च ज्ञेयं च वक्ता च वाच्यं च भोक्ता च
भोग्यं च ॥' वहीं यह भी कहा गया है कि—सर्वान्तर, स्वयंज्योति, स्वसंबोध्य एवं
स्वयंभू वही है—'सर्वान्तरं सर्वबाह्यं स्वयंज्योतिः स्वयं सम्बोध्यं स्वयंभूरिति च ॥'
श्रुति भी कहती है—वही ज्ञाता, वही ज्ञान, वही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र भी शिव-
रूप ही है । 'स एव ज्ञाता तज्ज्ञानमिति' ।
'एवमेष एवं मन्त्रात्मा । तेषां चात एव शिवधर्मित्वं सिद्धम् ॥'
अब पक्षान्तरोपन्यासभंगिमा से प्रकरणारंभ करते हुए स्वस्वभाव शिव के
विश्वाभिव्यक्तिमय शक्तिचक्रविभवन शीलत्व को उपपत्तियों एवं उपलब्धियों द्वारा
प्रतिपादित किया जा रहा है ।
इस प्रकरण का सम्बन्ध इस कारिका से है—
'यस्य इति वा संवित्तिः स जीवन्मुक्तः ॥'
यस्य = जिस साधकोत्तम का । संवित्तिः = सम्यक् ज्ञान ।
सततम् = निरन्तर, अव्यवधानपूर्वक सभी अवस्थाओं में ।
युक्तः = समाहित । स्वभावबल परिशीलन से अप्रमत्त एवं एकाग्रचित्त । स
जीवन्म् = नियतदेहाधिकरणों एवं प्राणों को धारण करते हुए भी मुक्तः = सर्वव्यापक
सर्वात्मक, सर्वेश्वर, स्वतन्त्र, स्वस्वभावाहङ्कारी, जन्ममरणादि के चक्र से निष्क्रान्त
परमेश्वर । न संशयो = भ्रान्ति या सन्देह नहीं है । क्या करते हुए जीवन्मुक्त? अखिलं
= अशेष-अनन्त-वस्तु-व्यक्ति-विचित्र विश्व को स्वनिर्मित चराचर को क्रीडनक मानते
हुए और सृष्टि को लीला मात्र समझते हुए विभावित करते हुए ।
इस प्रकार विश्व को अपनी क्रीड़ा के रूप में देखते हुए एवं जीते हुए मुक्त
जीवन्मुक्त है । टीकाकार पूछता है? 'कथं यस्य संवित्ति?' उसी के उत्तर स्वरूप—
उन्तीसवाँ श्लोक कहा गया है—
'तेन शब्दार्थचिन्तासु .... संस्थितः ॥'
तेन = वक्ष्यमाण कारण से ।
तेन वक्ष्यमाणहेतुना 'शब्दार्थचिन्तासु सा अवस्थैव नास्ति या न शिवः'—इति
यस्य संवित्तिः स जीवन्मुक्त इति ।'