स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
प्रथमः निष्यन्दः ११
१. संबंध—ईश्वर एवं शास्त्र का कर्तृकार्यलक्षण संबंध है। शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य-
प्रतिपादकभावलक्षण ही संबंध है।
'स्तुमः' = स्तवन करते हैं। उपादेय वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन ही स्तुति का अर्थ
है। २. प्रयोजन क्या है? 'प्रयोजनं च आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शंकर पदादेव
अवसीयते ।।' अभिधेय-प्रयोजन में उपायोपेयभावलक्षणरूप संबंध है। इस शास्त्र का
अभिधान है—'स्पन्द' क्योंकि स्पन्दका० में 'स्पन्दतत्त्वविविक्तये' (१ नि० २१ का० २
पा०) कहा गया है।
स्पन्द का अर्थ क्या है?—'स्पन्द' का क्या अर्थ है? 'स्वस्वभावपरामर्शमात्र,
नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूत, तावन्मात्रसंरभात्मा 'शक्ति' नामवाली पारमेश्वरधर्म का
किंचिच्चलन ही 'स्पन्द' कहलाता है—'स्पन्दशब्दश्च अयं स्वस्वभाव परामर्शमात्रस्य,
नित्यस्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूतस्य, तावन्मात्रसंरंभात्मनः शक्त्यपराभिधानस्य पारमे-
श्वरस्य धर्मस्य किंचिच्चलनात् 'स्पन्द' इति अर्थानुगमात् वाचकत्वेन व्यपदिष्टः ।।'
'स्पन्द' शास्त्र नाम क्यों पड़ा?—इसी स्पन्द तत्त्व के प्रतिपादन के कारण इस
शास्त्र का नाम 'स्पन्द' शब्द द्वारा व्यपदिष्ट है 'तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्द-
शब्देन अभिधीयते ।।'
स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है?—यहाँ स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है? 'विशुद्ध-
श्रद्धा भक्ति प्रकर्ष पिशुनित परमेश्वर-परशक्तिपात-प्रोन्मील्यमानस्वभावालोक तिरस्कृत
सकलसंदेहान्धकारत्वात् प्रबुद्धः सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारो गुरुवचनचोदनामात्रावशेष-
स्वात्मैश्वर्योपलब्धिः'—यहाँ 'विषय' शब्द अधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है न
कि प्रतिपाद्यविषय के अर्थ में। 'शंकर ही हमारी आत्मा है'—'स कथं शंकरो ममैव
आत्मा ?' इसका उत्तर द्वितीय कारिका में दिया गया है।
स्पन्दशास्त्र के ज्ञान का पात्र कौन है?—स्पन्दशास्त्र के उपदेश का पात्र कोई
विरला विवेकी व्यक्ति ही संभव है—
'किंत्वेतेऽद्य विवेकिनः कतिपये सन्त्यत्र पात्रं सताम्' ।। (रामकण्ठ)।
'स्पन्द' शाक्ततत्त्व है जो कि शंभु का स्वभावभूत आत्मधर्म है—
'निजो धर्मः शंभोरनुपमचमत्कार सरसः ।
परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।। (रामकण्ठ)।
'स्वरूपस्पन्द' शब्द की सोद्देश्यता—प्रथम निष्यन्द को 'स्वरूप स्पन्द' क्यों
कहा गया? कारण निम्नांकित हैं—१. 'स्पन्दकारिका' शिवसूत्र की ही व्याख्या होने के
कारण शिवसूत्र के मुख्य प्रतिपाद्य विषय ('आत्मा') की ही प्रतिपादक होनी चाहिए
क्योंकि तभी इसका उद्देश्य पूर्ण हो सकता है। २. 'स्पन्दकारिका' सर्वात्मवाद, सर्व-
स्पन्दवाद, सर्वशिववाद एवं सर्वशक्तिवाद का पोषक होने के कारण भी 'स्वरूप' (आत्मा
या शिव या चैतन्य) का प्रधानतया प्रतिपादन करता है। ३. स्पन्दशास्त्र मुख्यतः 'शक्ति'
को प्राधान्य देता है—'स्पन्द' को प्रामुख्य प्रदान करता है और 'स्पन्द' स्वातंत्र्य शक्ति
१२ स्पन्दकारिका
(इच्छाशक्ति) परमात्मा की विमर्शशक्ति या उसके परमाद्भुत एवं परमचमत्कार ऐश्वर्य
(स्पन्द = आत्मस्वभाव = 'स्वस्वरूप') का अभिधानान्तर है । ४. 'स्पन्दशास्त्र' उद्भव-
स्थितिप्रलयकारिणी महामाया को शंकराचार्य की भाँति मिथ्या नहीं प्रत्युत् शिवकी आत्म-
भूता, हृदयरूपा, आत्मसाररूपा 'शैवीमुख' एवं शिव से अभिन्न उनका नित्यस्वभाव,
नित्यधर्म, एवं उनकी स्वसमवायिनी परमाशक्ति मानता है । वह नित्य है, सृष्टिरूपा है,
शिवात्मिका है, आत्मरूपा है, चैतन्यविग्रहा है और शिव उसके बिना 'शव' है क्योंकि
'शिव' के 'श' का इकार वही है और उसके बिना 'शिव' शव बन जाता है ।—इस
सिद्धान्त का प्रतिपादन भी स्पन्दशास्त्र का लक्ष्य है और वह शक्ति 'स्वरूपस्पन्द' ही है ।
५. शंकर की आत्मा एवं परमात्मा शक्तिरहित एवं निष्क्रिय है—
'निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरंजने ।।' (वि०चूड़ा०)
'निष्क्रयोऽस्म्यविकारोस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः ।। (वि०चूड़ा०)
'कर्तापि वा कारयितापि नाहं, भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम् । (वि०चू०)
'अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः ।' (वि०चू०)
'स्पन्दशास्त्र' का स्पन्द एवं स्पन्दवान दोनों सक्रिय हैं और स्पन्दवान की सक्रियता
इसी 'स्वरूपस्पन्द' (स्वातंत्र्यशक्ति, विमर्शशक्ति, स्पन्द) पर आधृत है क्योंकि उसके
बिना तो शिव हिल भी नहीं सकते—
१. 'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं,
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।' (सौन्दर्यलहरी)
तथा—२. परोऽपि शक्तिरहितः शक्त्या युक्तो भवेद्यदि ।
सृष्टिस्थितिलयान् कर्तुमशक्तः शक्त एव हि ।। (वामकेश्वरमहातन्त्र)
'स्पन्दसूत्र' ('शिवसूत्रविमर्शिनी में स्पन्द का० को 'स्पन्दसूत्र' कहा गया है) शिव
को विश्वोत्तीर्ण मानते हुए भी विश्वमय एवं पञ्चकृत्यकारी मानता है—
'स्वरूपस्पन्द' नामकरण की सार्थकता—'परमेश्वरः पञ्चकृत्यमयः सततम्
अनुग्रहमय्या परारूपया शक्त्या आक्रान्तो वस्तुतोऽनुग्रहैकात्मैव, नहि शक्तिः शिवात् भेद-
मामर्शयेत् ।।' (अभिनवगुप्त) 'परात्रिंशिकाविवृति' उसकी पाँच शक्तियाँ हैं—
१. प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः । (तन्त्रसार, अ०१)
२. प्रकाशश्च अनन्योन्मुख विमर्शः अहमिति । (प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी)
३. स्वातंत्र्यं आनन्द शक्तिः । (तं०सार)
४. तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः । (तं०सार)
५. आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः । ('आमर्शश्च ईषत्तया वेद्योन्मुखता) ।
६. सर्वकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः । (तं०सार)
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।। (स्वच्छन्दतन्त्र । पटल १)
प्रथमः निष्यन्दः १३
१. आभासन २. रक्ति ३. विमर्शन ४. जीवावस्थापन ५. विलापन ।
१. सृष्टि २. स्थिति ३. संहार ४. विलय (निग्रह) ५. अनुग्रह ॥
'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने । (प्र०हृ०)
आभासनरक्तिविमर्शनबीजावस्थापनविलापनतस्तानि (प्र०हृ० ११) 'तथापि तद्वत्
पञ्चकृत्यानि करोति' (प्र०हृ०सू० १०) ।
'इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्य' अयमेव विशेषः । (क्षेमराज) आचार्य
क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में भी शक्ति को प्राधान्य देते हुए प्राथमिक सूत्रों में शक्ति
विषयक सूत्र ही लिखें हैं यथा—
१. चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः । (सूत्र १)
२. स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ (सूत्र २)
३. चितिरेव चेतनपदावरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । (५)
४. स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा सप्त पञ्चस्वभावः (सू० ७)
५. तद्भूूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः । (सू० ८)
प्रत्यभिज्ञादर्शन के उद्भावक सोमानन्दपाद ने भी सर्वात्मवाद का प्रतिपादन किया
है—(स्वरूपस्पन्द या आत्मा) का प्रामुख्य प्रतिपादित किया है)
'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन निवृत्तचिद्विभुः ।
अनिरुद्धेच्छाप्रसर प्रसरद् दृक्क्रियः शिवः ।।' (शिवदृष्टि)
यही आत्मा या चितिशक्ति 'स्वरूपस्पन्द' है और स्पन्दसूत्रों के प्राथमिक निष्यन्द
में इसी स्वरूपस्पन्द एवं विशेष स्पन्द की प्रमुखता से विवेचना की जाने के कारण इस
निष्यन्द को 'स्वरूपस्पन्द' कहा गया है । 'विशेष स्पन्द' लक्ष्य नहीं है लक्ष्य है—
'स्वरूपस्पन्द' । इसी उद्देश्य से 'स्वरूपस्पन्द' प्रथम निष्यन्द की संख्या है । स्पन्द
शास्त्र का सारा प्रयत्न है—'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये (१।२१)।
शिव ही 'विश्वात्मा' या 'स्वरूपस्पन्द' है ।
'स्वरूपस्पन्द' कहकर जिस आत्मा की ओर इंगित किया गया है वह मात्र 'शक्ति'
ही नहीं शिव भी है—अतः यदि 'स्पन्दसूत्र' के प्रारंभ में 'शंकरं स्तुमः' कहा गया है तो
वह शंकर भी विश्वात्मा ही है । शिवसूत्रवार्तिक, में वरदराज ने कहा है—
१. चित्क्रियात्मकचैतन्यमूर्त्तिर्जीवजडात्मनः ।
परमः शिव एवात्मा प्रपञ्चस्येति कथ्यते ॥ (१।७)
२. चैतन्यमेव विश्वस्य स्वरूपं पारमार्थिकम् (१।१३) (चैतन्य = आत्मा)
३. चैतन्य चित्क्रियारूपं शिवस्य परमस्य यत् ।
स्वातन्त्र्यमेतदेवात्मा ततोऽसौ परमः शिवः ॥ (१।८)
४. नात्मा देहो न च प्राणो न मनः खं न शून्यभूः ।
किन्तु चैतन्यमेवात्मेत्यादिष्टं परमेष्ठिना ॥ (१।१०)
१४ स्पन्दकारिका
सर्वचैतन्यवाद एवं सर्वात्मवाद—
आचार्य क्षेमराज ने भी 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में इसी तथ्य की पुष्टि की है—
१. चैतन्यपरमार्थतः शिव एव विश्वस्य आत्मा इति आदिशति—‘चैतन्यमात्मा’।
२. न शरीर-प्राण-बुद्धि-शून्यानि लौकिक चार्वाक-वैदिक-योगाचार माध्यमिका-
द्यभ्युपगतानि आत्मा अपितु यथोक्तं चैतन्यमेव ॥
३. मृत्युजित्भट्टारक (नेत्रतन्त्र) में भी कहा गया है कि—
परमात्मस्वरूपं तु सर्वोपाधिविवर्जितम् ।
चैतन्यमात्मनो रूपं सर्वशास्त्रेषु पठ्यते ॥ (नेत्रतन्त्र)
४. ‘चैतन्यम् उक्तं स एव आत्मा स्वभाव... भावाभावरूपस्य विश्वस्य जगतः ॥’
५. जीवजडात्मनो विश्वस्य परमशिवरूपं चैतन्यमेव स्वभावः ॥
६. चैतन्यं विश्वस्य स्वभावः ।
७. चेत्यमानस्तु स्वप्रकाशचिदेकीभूतत्वात् चैतन्यमात्मैव ॥
८. शङ्करात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यं सर्वदा स्वप्रकाश परमार्थ सत् अस्ति ॥
भट्टकल्लट ने शिव को ‘स्वस्वभाव’ कहा है और सृष्टि को उसी का ‘संकल्प’
माना है—‘अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः
कारणत्वम् ॥’ (का० ११)
‘स्वस्वरूप’—शिव है—स्पन्द है—अपनी प्रत्यगात्मा है—संवित् है । ‘कथं पुनः
स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः ?’ कहकर कल्लट ने पुनः आत्मारूप शिव
को ‘स्वस्वभाव’ कहा है । (स्पन्द० का० २) पशुदशा में भी मितप्रमाता ‘स्वभाव’ से
च्युत नहीं होता—
१. न तस्य स्वरूपम् आव्रियते । न तस्य स्वरूपान्यथाभावः ।
२. निवर्तते निजाग्नैव स्वभावादुपलब्धतः ॥ (स्पं० का० ३)
३. स स्वभावः परं स्मृतः ॥
४. स्वतन्त्रता की शक्ति भी स्वस्वभाव है—
‘स्वातन्त्र्यस्य स्वस्वभावभूतस्य’ । (स्पन्द का० कल्लटः ७)
५. आत्मबल स्पर्श से स्वस्वरूप में स्थिति होती है—
‘अपितु स्वस्वरूपे स्थित्वा’ । (कल्लट)
६. तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । (स्पन्द० सर्वस्व)
स्वभावभूत ही स्पन्दरूपता है । यह सर्वानुस्यूत, सर्वसामर्थ्ययुक्त है—‘सर्वानुस्यूतः
सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः (‘स्पन्दसर्वस्व’) ‘सर्वाव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन्’—
स्वभाव एवं सर्वव्यापक है । यह चिद्रूप है—‘यस्मात् चिद्रूपत्वं आत्मनः स्वरूपं’ (वृत्तिः
प्रथमः निष्यन्दः १५
का० १३) । 'स्वभाव' विलुप्त नहीं होता क्योंकि 'स्वभावो में विलुप्त' इति अबुधो
जानाति ।। (कल्लटः १५) ।
आत्मा—'अन्तश्चक्रारूढस्वभाव एवं सर्वज्ञत्वादिगुणाश्रय है । (भट्टकल्लटः
स्पन्द सर्वस्व) ।।
स्वस्वभाव सर्वगत एवं चिद्रूप है—'तस्य चिद्रूपस्य सर्वगतस्य स्वस्वभावस्य
उपलब्धिः (स्पं० स०—कल्लट) ।।
'स्पन्दतत्त्व' स्वस्वरूप ही है—स्पन्दतत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थ' ('स्पन्दतत्त्व
विविक्तये' की व्याख्या-कल्लट) कारिका २५ में कल्लट कहते हैं—प्रत्यस्तमिते शशि-
भास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्ति न सम्यक् वृत्ता ।। (का० २५) (कल्लट) 'स्व-
स्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते' (का० २७) (कल्लट) ।
'तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन' (स्पन्दसर्वस्वः का २९) ।
'एवं स्वभावं यस्य चित्तं यथा—मन्मयमेव जगत् सर्वम् (स्पन्दसर्वस्व का० ३०)
'तादात्म्यं' तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य (स्पं० वृत्तिः कल्लटः का०
३१) 'यथास्यानभिव्यक्तस्वरूपस्य योगिनो (स्पन्द० वृत्तिः कल्लटः का० ३३) 'स्वरूप-
स्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलबिड़ाल दर्शनरूपा सृष्टिः' (वृत्ति-कल्लटः का०
३५) 'स्वबलं स्वस्वरूपमाश्रित्यस्याचिरेणैव कालेन प्रतिभाति (स्पन्दवृत्ति—कल्लटः का०
३७) 'उद्योगबलेन तथानेन स्वभावानुशीलनेन' (वृत्तिः कल्लटः का० ३८) 'अनेन
आत्मस्वभावेन अधिष्ठिते' (वृत्तिः कल्लटः का० ३९) 'यस्मात् स्वभावात् झगित्यन्या
चिन्तोत्पद्यते, (वृत्तिः कल्लटः का ४१) ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवस्वभावात् प्रच्यवितः
पशुरुच्यते' (का० ४५: वृत्तिः कल्लट) 'परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः (वृत्तिः
कल्लट का० ४६)—
स्वरूपावरणे चास्य शक्तय सततोत्थिताः ।
यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ।। (का० ४७)
'स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य' (वृत्तिकल्लट का० ४७) 'निरावरण-
स्वस्वरूप संवित्तिः' (वृत्ति का० ३२)—भट्टकल्लट के स्पन्दसर्वस्व ('वृत्ति') से दिये
गए उदाहरणों से स्पष्ट है कि भट्टकल्लट ने 'स्वरूपस्पन्द' में प्रयुक्त 'स्वरूप' शब्द को
स्वभाव, स्वस्वभाव, संवित्, शिव एवं आत्मा के अर्थ में ही प्रयुक्त किया है। चूँकि प्रथम
निष्यन्द इसी स्वस्वरूपभूत आत्मचैतन्य का प्रतिपादक है अतः इसका नामकरण भी
'स्वरूपस्पन्द' किया गया ।।
(उन्मेष-निमेष एवं निष्पंद शब्दों का प्रयोग—का० क्र० १, उन्मेष (का० ४०)
(उन्मेषेण आत्मस्वभावेन'—वृत्ति का० ४०); का० ४२ (उन्मेषात् अनुशीलयमानात्ः
वृत्तिः का० ४२) 'निष्यन्दाः प्रवाहाः' (का० १९) ।।
प्रथम निष्यन्द स्वरूपस्पन्द का निष्यन्द (प्रवाह) है ।
स्वरूपस्पन्द—स्पन्द के दो रूप है—१. सामान्य २. विशेष ।
१६ स्पन्दकारिका
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' । (का० १९)
१. प्रतिष्ठित स्पन्द २. अप्रतिष्ठित स्पन्द ॥ (प्रतिष्ठित स्पन्द सामान्य, अप्र० =
विशेष) ।
(क) अप्रतिष्ठित स्पन्द—एकत्व में अवभासित अनन्त वैचित्र्यात्मक पदार्थ एवं
पदार्थाक जगत् ॥ (माया तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व पर्यन्त प्रसृत ।)
एकत्व से निःसृत अनेकत्व ।
'सामान्य स्पन्द' प्रतिष्ठित एवं 'विशेष स्पन्द' 'अप्रतिष्ठित स्पन्द' कहलाते हैं।
नानात्मक विश्ववैचित्य में जो एकता की इकाई है वही सामान्य स्पन्द है। 'गुणादिस्पन्द'
= 'विशेष स्पन्द' हैं। 'सामान्य स्पन्द' से विशेष स्पन्द = गुणादि स्पन्द का प्रादुर्भाव ॥
'स्पन्दनिष्यन्द' क्या हैं? नानारूपात्मक एवं प्रवहमान स्पन्द धारायें ही स्पन्द के निष्यन्द
हैं। 'स्पन्द' समुद्र है और निष्यन्द उसकी अनन्त ऊर्मियाँ हैं। जड़चेतन विश्व का प्रत्येक
पदार्थ एक सर्वव्यापी एवं नित्य स्पन्दशक्ति का एक प्रवाह है। शाश्वतस्पन्दनशीला-
पारमेश्वरी सामान्यस्पन्द का रत्नाकरविशेष स्पन्दों के निष्यन्द (या स्पन्द-प्रवाह) गुणत्रय
के स्पन्दों के असंख्य प्रवाहों का मूल सामान्यस्पन्द है। (का० १९)।
विशेष स्पन्द—प्रतिक्षण पशुओं के अन्तस् में विद्यमान चिन्मात्रता पर आवरण
डालते रहते हैं (का० २०)। भावों की उत्तरोत्तर सर्जना करते रहना स्पन्द शक्ति का स्व-
भाव है। विश्व के सारे रूप शक्ति या स्पन्द के ही रूप हैं। शक्ति की सामान्यभूमिका
(पशुपति की दशा में)—चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया।
शक्ति की पशुदशा—(विशेष भूमिका) : अन्तःकरण, इन्द्रियाँ, एवं अनन्त
प्रमेयों के रूप में प्रवाहित। स्वातंत्र्य शक्ति—प्रपञ्च। एक ही पारमेश्वरी स्पन्द शक्ति है
किन्तु स्वातंत्र्यशक्ति के द्वारा इच्छा, ज्ञान, क्रिया एवं अनन्त प्रमेयों, प्रमाताओं के रूप में
तथा विराट् प्रपञ्च के रूप में प्रवहमान है। 'स्पन्द' किंचित् चलन = स्वतन्त्ररूप में
निरपेक्ष स्फुरण। स्पन्द या स्फुरण न हो तो सब कुछ जड़ हो जाय। विमर्शात्मक स्फुरण
ही सब का मूल केन्द्र है।
विमर्शात्मक स्पन्द के प्रसार के भेद
'स्पन्द तत्त्व' की अवस्थायें स्पन्द के दो रूप
स्पन्दतत्त्व
[ कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा, वेदक ] [ कार्य, भोग्य, दृश्य, वेद्य ] [ सामान्य स्पन्द प्रतिष्ठित स्पन्द ] [ विशेष स्पन्द अप्रतिष्ठित स्पन्द ]
स्पन्द शक्ति की द्विमुखी गतिमयता
अन्तर्मुख स्पन्द बहिर्मुख स्पन्द
प्रथमः निष्यन्दः १७
स्पन्द तत्त्व के विभिन्न पक्ष एवं स्वरूप
[ शिव तत्त्व ] [ विमर्शात्मिका शक्ति स्वात्मोच्छलन नित्य कम्पनशीलता ] [ अनुत्तर तत्त्व की सृष्टि हेतु सकलात्मक चलता, गतिमयता, (स्फुरण) ] [ शिव का 'अहं प्रत्यविमर्श' = 'पूर्ण अहं विमर्श' ] [ किंचित् चलता सिसृक्षा की दिशा में संकल्पात्मक स्फुरण या उन्मुखता ] [ संवित् के समुद्र की तरंग अहं विमर्शात्मक स्फुरण ]
स्पन्दनं—निस्तरंगस्यास्य तावत् परमात्मनः युगपन्निर्विकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्य-
वृत्तिता ॥—उत्पलाचार्य ।
यत् परापरभूपस्पर्शि यत्संकल्पाल्ल्योदयौ ।
स्पन्दसंज्ञं झरूपं तत् शक्तीशं स्वलं नुमः ॥ —उत्पलाचार्य ।
१. अनुत्तर मूर्ति शिव में, अपनी इच्छाशक्ति द्वारा, जगत् का सृजन करने की जो
इच्छा उत्पन्न होती है उससे समुत्पन्न कम्पन ही 'स्पन्द' है—
'यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम् ।
पस्पन्दे स स्पन्दः .... .... .... ॥ (ष०ल०सं०)
शिव के सिसृक्षा का संकल्पात्मक कम्पन = 'स्पन्द' है।
निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की योग्यता है वही
किंचित् चलन है। 'स्पदि किंचिच्चलने' धातु से 'स्पन्द' शब्द निष्पन्न हुआ है। 'स्पन्द
शक्ति' उच्छलनात्मक है।
२. 'स्पन्दकारिका'—'अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र 'स्पन्दः' प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
३. 'स्पन्द' और 'निष्यन्द'—सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण, महत्तत्व, अहंकार
के जो स्पन्द हैं उन्हीं के निष्यन्द (प्रवाह) हैं—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगे ।
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ॥ १९ ॥
४. भट्टकल्लट—अत्यन्त क्रोधी होने, हर्षित होने, अकस्मात् दौड़ पड़ने,
अकस्मात् 'मैं क्या करूँ?' इस प्रकार की चिन्ता में पड़ जाने पर जब किसी व्यक्ति के
अन्तस् में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उदय हो जाता है तब उस क्षणिक अवधान में स्पन्द
तत्त्व का स्पष्ट रूप में उदय हो जाता है—
'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्घे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि इत्येवं चिन्ता-
विशिष्टे यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो ।'
१. परतत्त्व में विश्वात्मक चेतना के रूप में नित्यावस्थित शक्ति ही—'स्पन्द
शक्ति' है ।
२. अहं विमर्शात्मिका शक्ति ही स्पन्द है ।
स्पं० २
१८ स्पन्दकारिका
३. 'विमर्श' प्रकाश का स्पन्दन है। 'प्रकाश' में स्पन्दन (प्राणभूत तत्त्व) न हो तो
प्रकाश की सत्ता ही नष्ट हो जाएगी। 'स्पन्दन' ही शिव की 'स्वातन्त्र्य शक्ति' है।
'स्पन्द शक्ति' की द्विमुखी गतिमयता
अन्तर्मुख स्पन्द बहिर्मुख स्पन्द
त्रिक् दर्शन
[प्रत्यभिज्ञादर्शन प्रकाश पक्ष पर बल] [स्पन्ददर्शन पर तत्त्व के विमर्श पक्ष पर बल]
१. पर तत्त्व के प्रकाश पक्ष का १. विश्वमयता में ही परतत्त्व के
प्राधान्य विश्वातीत रूप में पूर्णतमा का दर्शन।
परतत्त्व का प्रकाशन।
२. प्रत्यभिज्ञा दर्शन। २. स्पन्ददर्शन।
३. सोमानन्द। ३. भट्टकल्लट।
शक्ति-विशिष्ट शङ्कर की वन्दना
यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥ १ ॥
जिनके उन्मेष एवं निमेष से प्रलय एवं सृष्टि हुआ करते हैं (हम) उस शक्ति-समूह
के वैभव के आदि कारणभूत (स्रष्टा) शङ्कर की स्तुति करते हैं।
❉ सरोजिनी ❉
'यस्य'—जिसके। अर्थात् जिस विश्व-स्रष्टा एवं विश्व-संहर्ता शिव के। 'उन्मेष'
= नेत्रोन्मीलन। 'निमेष'—नेत्र-निमीलन॥ 'जगतः'—विश्व का। 'प्रलयोदयौ' =
विश्व-संहार रूप प्रलय एवं उदयरूप विश्व-सृष्टि। 'तं' = उनको। 'शक्तिचक्रविभव-
प्रभवं' = शक्तिसमूह के वैभव को उत्पन्न करने वाले (शिव) को॥ 'शङ्करं' = कल्याण
करने वाले, भगवान् शिव को। 'स्तुमः'—स्तवन करते हैं।
विशेषार्थ—'उन्मेष' एवं 'निमेष'—भगवान् शिव का चक्षु उन्मीलन ही 'सृष्टि' है
एवं उनका नेत्रोन्मीलन ही 'प्रलय' है। नेत्रोन्मीलन ही 'उन्मेष' है और 'निमीलन' ही
प्रलय है।
प्रथमः निष्यन्दः १९
१. सांख्यदर्शन का मत है कि 'पुरुष के दर्शन एवं प्रधान के कैवल्य के लिए पंगु
एवं अंधे (पुरुष-प्रकृति) का संयोग होने से जो क्रिया होती है उसी का नाम सृष्टि
है।'—अर्थात् पंग्वंध-सम्बन्ध-जन्य व्यापार ही सृष्टि है ।
'पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
पंग्वंधवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥'१
२. 'अजातिवाद'—आचार्य गौड़पाद तो यह मानते हैं कि—'कोई जीव उत्पन्न ही
नहीं होता । उसके जन्म की संभावना ही नहीं है । उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें
किसी वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं होती ।
'न कश्चिज्जायते जीवः संभवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किंचिन्न जायते ॥'२
आचार्य शङ्कर भी कहते हैं कि—'व्यवहारतः तो जीवों का जन्ममरण तो है किन्तु
वह स्वप्नवत है किन्तु परमार्थतः किसी भी जीव की उत्पत्ति नहीं होती—'व्यवहार-
सत्यविषये जीवानां जन्ममरणादि स्वप्नादिजीववदित्युक्तम् । उत्तमं तु परमार्थसत्यं न
कश्चिज्जायते जीव इति ।'३
३. न्यायशास्त्र का मत है कि परमेश्वर की सिसृक्षा के अनुसार लब्धवृत्तिक
अदृष्टवाली आत्मा के संयोग से परमाणुओं में क्रिया होने पर दो परमाणुओं में परस्पर-
संयोग से 'द्वयणुक' उत्पन्न होता है, तीन द्वयाणुकों से 'त्र्यणुक', चार त्र्यणुकों से 'चतुर-
णुक', पाँच चतुरणुकों के संयोग से 'पञ्चाणुक' छः पञ्चाणुकों के संयोग से 'षडणुक'
उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार अवयवों के संयोग से अवयावियों का उत्पाद होते-होते पृथ्वी,
जल, तेज, वायु आदि पञ्चभूत एवं पञ्चभूतों से समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है ।४
४ 'सृष्टि' = 'सृष्टि' भगवान् की विभूति है—विभूतिं प्रसवं मन्दे ।
५. 'सृष्टि' = सृष्टि स्वप्न या माया है— स्वप्नमायास्रूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिताः॥
६. 'सृष्टि' 'सृष्टि' परमात्मा की इच्छामात्र है । 'इच्छामात्रं प्रभोःसृष्टिरिति सृष्टौ
विनिश्चिताः ॥'
७. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' काल की प्रसूति है । 'कालात्प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते काल
चिन्तकाः ॥'
८. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' भोग है क्योंकि 'भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये' ।
९. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' क्रीड़ा है—'क्रीडार्थमिति चापरे' ॥
१०. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' आप्तकाम देव का 'स्वभाव' है ।५
१. सांख्यकारिका । २. माण्डूक्योपनिषद् (अलातशान्तिप्रकरण)।
३. माण्डूक्योपनिषद् (माण्डूक्यकारिका शां० भाष्य का० ७१)।
४. तर्कभाषा ।
५. आगमप्रकरण (माण्डूक्यकारिका) : गौड़पादाचार्य ।
२० स्पन्दकारिका
११. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' ब्रह्म का परिणाम है । (रामानुजाचार्य)१
१२. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' ब्रह्म का 'विवर्त' है (आचार्य शङ्कर)२
१३. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' शक्ति एवं शक्तिमान का 'आभास' है ।३
१४. 'सृष्टि' = 'सृष्टि' परमात्मा का 'प्रतिबिम्ब' है ।४
(क) संकुचित रूप से प्रकाशन ही 'आभास' है—'आभासनं—आ ईषत् संकोचेन
भासनं प्रकाशना' ।५
(ख) प्रतिबिम्ब ही आभास है—'भासनसारतैव हि प्रतिबिम्बता'६ विमर्शात्मक
प्रकाशरूपी दर्पण में अनतिरिक्त होते हुए भी अतिरिक्त के समान जड़चेतन समग्र जगत्
का प्रतिबिम्बन 'आभास' है । विमर्शात्मक प्रकाशपुरुष का अपूर्ण आत्मप्रकाशन ही
आभास है ।
१५. 'सृष्टि' = सृष्टि 'स्वातन्त्र्य' का विजृंभण है । परमात्मा की इच्छा का
अनभिहत प्रसार ही उसका 'स्वातन्त्र्य' है—'स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छाप्रसरस्य
अविघातः ।।'७
१६. 'सृष्टि' = सृष्टि भगवती चिति शक्ति का रूपान्तर है, स्फार है, क्योंकि वह
उनसे किंचिन्मात्र भिन्न नहीं है—'ननु जगदपि चितो भिन्नं नैव किंचित' क्योंकि भगवती
चित् शक्ति ही जगत् के रूप में स्फुरित होती है—'चिदेव भगवती स्वच्छस्वतन्त्ररूपा
तत्तदनन्त जगदात्मना स्फुरति ।'८
१७. 'सृष्टि' = शिवादि धरण्यन्त यह निःशेष सृष्टि शिव से अभिन्न है और शिव
इसी अनन्त एवं विराट् विश्व के रूप में ही स्फुरित हुआ करते हैं—'श्रीमत्परमशिवस्य
पुनः विश्वोत्तीर्ण विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि धरण्यन्तं
अखिलं अभेदेनैव स्फुरति न तु वस्तुतः अन्यत् किंचित ग्राह्यं ग्राहकं वा ।।९ इसीलिए
भगवान् को 'विश्वशरीर' कहा गया है—'एवं भगवान् विश्व शरीरः', 'विश्वशरीरः शिव-
भट्टारक एव' क्योंकि विश्व एवं शिव में—एकात्म्य है—तादात्म्य है दोनों में स्वात्मैक्य
है—'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थित विश्व (प्र०हृ०)।
१८. 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' 'जगतः प्रलयोदयौ'—
(क) 'उन्मेष' = उदय । 'निमेष' = प्रलय । (ख) उन्मेष = सृष्टि (ख) 'निमेष'
= प्रलय । (क) 'उन्मेष' = उन्मीलन (ख) 'निमेष' = निमीलन ।। प्रश्न उठता है कि
कारिकाकार ने 'सृष्टि' एवं 'प्रलय' शब्द का प्रयोग न करके उन्मेष-निमेष, उदय-
प्रलय का प्रयोग क्यों किया ?
१. रामानुजाचार्य—'श्रीभाष्य' । २. शंकराचार्य—'शारीरकभाष्य' ।
३. त्रिकदर्शन । ४. वेदान्ती एवं अद्वैतवादी शैव-शाक्त ।
५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी । ६. अभिनवगुप्तपादाचार्य ।
७. ई०प्र०वि० । ८. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, (क्षेमराजाचार्य) ।
९. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।
प्रथमः निष्यन्दः २१
'त्रिक दर्शन' की मान्यता यह है कि 'सृष्टि' तो किसी ऐसी वस्तु की हो सकती है
जो कभी पूर्व में अस्तित्व में न रही हो । सृष्टि का अर्थ है—किसी नव्य वस्तु का जन्म ।
चूँकि 'शिव' एवं शक्ति से पृथक् कोई भी नव्य वस्तु कल्पित ही नहीं की जा सकती
क्योंकि शिव एवं शक्ति के अतिरिक्त अन्य की सत्ता ही नहीं है । अतः किसी भी पदार्थ
का जन्म संभव नहीं है । इसी दृष्टि से कारिकाकार ने सृष्टि एवं प्रलय को 'उन्मेष' एवं
'निमेष' कहा तथा 'सृष्टि' को सृष्टि न कहकर 'उदय' कहा । सूर्य का प्रतिदिन उदय तो
होता है किन्तु इस उदय को सूर्य का जन्म कोई नहीं कहता । किसी पूर्व विद्यमान किन्तु
तिरोहित वस्तु का प्रकाश में पुनः आना ही 'उदय' है । कारिकाकार ने 'संहार' न कहकर
'प्रलय' कहा क्योंकि 'संहार' विनाश का सूचक है । चूँकि 'शिव' एवं 'शक्ति' का संहार
संभव नहीं है अतः उनसे अभिन्न जगत् का भी संहार (विध्वंस । विनाश । सत्ता का
मूलोच्छेद) भी कभी संभव नहीं है । इन्हीं कारणों से कारिकाकार ने यहाँ 'प्रलय' शब्द का
प्रयोग किया जिसका अर्थ है—'प्रकृष्टेन लयः' 'कार्य' का 'कारण' में लय अर्थात् वस्तु
का बीजात्मना अवस्थन 'संहार' तो नहीं है किन्तु 'प्रलय' हो सकता है । 'प्रलय' संहार
एवं विनाश नहीं है प्रत्युत् अपने मूल में अवस्थान है ।
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कतिपय विद्वान् 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' पदों की
व्याख्या इस प्रकार करते हैं—
(१) स्वस्वरूप-प्रकाशन = 'उन्मेष' : जगत् की सृष्टि
(२) स्वरूप-गोपन = 'निमेष' : जगत् का विनाश
अन्य विद्वान् (क्षेमराज के कथनानुसार) 'उन्मेष' एवं 'निमेष' को कादाचित्क
मानते हैं । वे कहते हैं कि 'उन्मेष-निमेष' की प्रथम व्याख्या संगत नहीं है क्योंकि
कादाचित्क जगत् के उदय एवं नाश के हेतु नित्य भगवान् में कैसे रह सकते हैं? अतः
जगत् के कारण के उन्मेष एवं निमेष धर्मक होने के कारण एक ही भगवच्छक्ति उन्मेष-
निमेष शब्दद्वय द्वारा व्यवहृत की जा सकती है । 'उन्मेष निमेष' = भगवच्छक्ति । अतः
उस शक्ति के 'उन्मेष' से जगत् का 'उदय' होता है एवं उस शक्ति के निमेष से प्रलय
होता है—
१. पराशक्ति का उन्मेष—जगत् का उदय ।
२. पराशक्ति का निमेष—जगत् का प्रलय ।
'स्पन्दसन्दोह' में क्षेमराज कहते हैं कि 'यह विभागरहित, एकात्मिका विमर्श भूमि
उन्मेषनिमेषामयी है और इसे उन्मेष-निमेष के नामों से पुकारा जाता है—'एवं इयं एका
एव अविभगा विमर्शभूमिः उन्मेषनिमेषमयी उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यामभिधीयत ॥१
यहाँ 'उन्मेष' एवं निमेषमय की, निमेष एवं उन्मेषम की—प्राधान्येतरताविभक्त
धरणी आदि सदाशिवान्त जगत् के प्रति प्रलयोदय हेतुत्व की व्याख्या की गई है ।२
'प्रलयोदयौ' = 'प्रलयौ च उदयौ च प्रलयोदयौ' २ ॥ नीलादिक की बहिरूपता जो
१. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' । २. 'स्पन्दसन्दोह' ।
२२ स्पन्दकारिका
'उदय' है वही अहन्तारूपता का 'प्रलय' है और जो बहीरूपता का प्रलय है वही
अहन्तारूपता का 'उदय' है अतः 'प्रलयोऽपि उदयरूपः उदयोऽपि प्रलयपरमार्थः' इस
विषय में 'भेदाभेद प्राधान्येतरता कृतस्तु अत्र विवेकः ।' १ वस्तुतः चिदात्मा ही उस प्रकार
प्रकाशित होती है । यहाँ अक्रमता की बात कही गई है । २
'स्पन्दनिर्णय' में आचार्य क्षेमराज ने निमेष-उन्मेष की इस प्रकार व्याख्या की
है—'चिदानन्दघनस्य उन्मेषनिमेषाभ्यां स्वरूपोन्मीलननिमीलनाभ्यां मज्जनोन्मज्जने ।' ३
'उन्मेष-निमेष'—'उन्मीलन'-'निमीलन', मज्जन उन्मज्जन ।'
'स्पन्दसंदोह' में कहा गया है कि सदाशिवादिक्षितिपर्यन्त प्राक्सृष्ट तत्त्वग्राम की
सत्ता संहारापेक्षा में 'निमेष' एवं सिसृक्षा की अपेक्षा से 'उन्मेष' कही जाती है—'सदा-
शिवादि क्षितिपर्यन्तस्य तत्त्वग्रामस्य प्राक्सृष्टस्य या संहारापेक्षया निमेषभूः सैव स्रक्ष्य-
माणभेदापेक्षया उन्मेषदशा ॥' ४
प्राक्सृष्ट तत्त्वग्राम की भेदसंहाररूपा जो 'निमेष' दशा है वही चिदभेदप्रथा 'उन्मेष'
कहलाती है 'प्राक्सृष्ट भेदसंहररूपा च या निमेषदशा सैव चिदभेदप्रथाया उन्मेषभूः ।' ५
'भेदासूत्रण रूप जो 'उन्मेष दशा' है वही चिदभेद प्रथा की 'निमेष दशा' है—भेदा-
सूत्रणरूपा च या उन्मेषदशा सैव चिदभेदप्रथाया निमेषभूः ॥' ६ भेदासूत्रणात्मक दशा
'उन्मेष' है और चित्तत्व से अभिन्न दशा 'निमेष' है ।
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां...स्तुमः' श्लोक में
वसुगुप्त ने शिव के प्रथम सूत्र 'चैतन्यमात्मा' (१।१) की व्याख्या की है—क्षेमराज
कहते हैं—'तत्र आद्यमेव सूत्रं विमृश्यते ।' वे कहते हैं—परमाद्वय प्रकाशानन्दमय महेश्वर
स्वरूप प्रत्यभिज्ञापनाय—समस्त शास्त्रगर्भा समुचितां-स्तुतिम् इमाम् उपदिदेश श्रीमान्
वसुगुप्त गुरुः—'यस्योन्मेष... स्तुमः ।'
आचार्य क्षेमराज के उपर्युक्त कथन से यह भी सिद्ध होता है कि 'स्पन्दकारिका'
का प्रथम श्लोक वसुगुप्त-प्रणीत है अतः 'स्पन्दकारिका' का प्रणयन वसुगुप्त ने ही किया
है । 'स्पन्दनिर्णय' में क्षेमराज कहते हैं कि वसुगुप्ताचार्य ने शिवसूत्रों की सामग्री के
आधार पर ही 'स्पन्दकारिका' का प्रणयन किया । इससे यह भी सिद्ध होता है कि
काश्मीरीय त्रिकनय में 'स्पन्ददर्शन' ही केन्द्र में है एवं 'स्पन्ददर्शन' का मूल ग्रन्थ
'शिवसूत्र' है तथा उसके अनन्तर स्पन्दशास्त्र का आद्यग्रन्थ 'स्पन्दकारिका' है ।
'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र—'चैतन्यमत्मा' । ७
'स्पन्दकारिका' का प्रथम श्लोक—
'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥' ८
१-२. स्पन्दसन्दोह । ३. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' ।
४-६. स्पन्दसन्दोह । ७. शिवसूत्र ।
८. स्पन्दकारिका ।
प्रथमः निष्यन्दः २३
अन्वेष्टव्य एवं अनुसंधेय बिन्दु तो यह है कि यदि 'स्पन्दकारिका' शिवसूत्रों की
व्याख्या है तो क्या इन कारिकाओं में शिवसूत्रों की व्याख्या मिलती है ? यदि हाँ तो
किस प्रकार ?
इस 'स्वतन्त्र शिवाद्वय दर्शन' में एक ही पदार्थ में अनेकत्व की अनुस्यूतता
दिखाई गई है ।१ परमार्थवादानुसृत्या एक ही अर्थ का षट्त्रिंशत्तत्वमयतात्म अनेकार्थत्व
आम्नाय में वर्णित भी है । इस प्रकार की व्याख्या की जाने पर श्री स्वच्छन्दादि शास्त्रों में
परमेश्वर का जो पञ्चविधकृत्यकारित्व वर्णित हुआ है वह भी स्वीकृत, हो जाता है ।२
'उन्मेषनिमेष' शब्द मात्र का प्रयोग करके स्पन्दकार ने शिव के पञ्चविधकृत्यकारित्व की
ओर संकेत किया है । 'षडध्व' की दो प्रकार की सृष्टि होती है—
(१) भेदासूत्रणदुल्लासन रूप 'उन्मेष' के द्वारा ।
(२) किंचित्स्वरूप निमेष के द्वारा ।
'षडध्व' की उन्मेष-निमेष मय शुद्धा शुद्धरूपा सृष्टि दो प्रकार की होती है—जिसे
इस प्रकार व्याख्यात किया जा सकता है—'तथा उन्मेषनिमेषाभ्यां लोलीभूताभ्याम्
आभासमाना भासनपरमार्था स्थितिः'—कहा भी कहा गया है—
'... लोलीभूता परा स्थितिः ।'
स्वस्वरूप का निर्यादिभोगमय पूर्ण निमेष ही विलय है—'तथोत्पन्न स्वरूपोन्मेषा-
भासरूपो वस्तुतो निर्यादिभोगमयो यः पूर्णो निमेषः स्वस्वरूपस्य स विलयः ॥'३
जो सर्वात्मना पूर्णोन्मेष है वह अशेषभेदोपशम रूप एवं निमेषमय है और
अनुग्रहात्मक है । अतः परमेश्वर के पञ्चविधकृत्यकारित्व का प्रतिपादक है ।४ (निर्विकल्प-
सविकल्परूप उन्मेषण) संस्कार के विगलन से समस्त भेदों के नष्ट हो जाने पर जहाँ नष्ट
भेद का भी संस्कार नष्ट हो जाता है वह तादृश पूर्णोन्मेषात्मा है । सृष्टि-स्थिति-संहार-
विलय में अन्योन्य की संस्कारशेषता विद्यमान है । बिना अनुग्रह के वह दुरुच्छेद्या है ।
वही संसार का कारण भी है—वस्तुतः 'इत्थं प्रलयोदयौ अपि संगमनीयौ' अर्थात् प्रलय
एवं उदय भी तत्त्वतः ऐक्यात्मक है 'प्रलयादिकं च आभास्यनिष्ठं आभाससारमेव न तु
प्रकाशात्मनोऽस्य परमेश्वरस्य तत किंचित्' कहकर क्षेमराज कहते हैं कि—'अवस्थायुगलं
चात्र कार्यकर्तृत्व शब्दितम् । कार्यताक्षयिणी चात्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ।'५ परमात्मा का
कर्तृत्व अक्षय एवं शाश्वतिक वैभव है । माया-प्रमातृभूमि में भी प्रकाशात्मा परमेश्वर का
पञ्चविधकृत्यकारित्व सिद्ध है । इस प्रकार भगवान् का नील प्रकाशादि काल में नीलाभास
में देशकाल के संभिन्न होने से स्रष्ट्रिता है तथा देशकालाकान्तर संभिन्न होने की शंका
उठाने पर संहारत्व है ।६
(१) सृष्टि के पूर्व 'नीलाद्यभाससामान्य में स्थिति हेतुता है, वहीं अभेदाशसर्ग में
विलय हेतुता है ।
१-४. स्पन्दसन्दोह । ५. स्पन्दकारिका (कारिका १४) ।
६. स्पन्दसन्दोह ।
२४ स्पन्दकारिका
(२) प्रथमाभासित नील तद्ग्राहकभावापेक्षा से संहर्तृत्व है ।
(३) अवभासमान पीत तद्ग्राहकभावापेक्षा से स्रष्टृत्व है ।
(४) विच्छिन्नताभासापेक्षा से स्थिति हेतुता है ।
(५) अन्तःसंस्काररूपतापादित आभासापेक्षा से विलयकारित्व है ।१
(६) शुद्धसंविदैक्यापन्न प्रविलापित स्मृत्यादि बीजाभावाभास की अपेक्षा से
अनुग्रहीतृत्व है ।२
इस प्रकार निष्कर्ष यह निकलता है कि ऐसी कोई भी दशा नहीं है जिसमें कि
परमात्मा का पञ्चकृत्यकारित्व सिद्ध न हो—'सर्वदा सर्वासु दशासु पञ्चविधकृत्यकारित्व
माहेश्वरमेव एक रूपं सर्वत्र जृंभमाणमेव स्थितम् इति ।।'३
चिच्चक्रैश्वर्यात्मा में स्वस्वभाव शङ्कर रूप स्वप्रकाश में किसी योगी की धिषणा
अधिरोहण करती है किन्तु संसारी लोगों की नहीं ।४ जो कुछ भी आभासित होता है वह
सब कुछ 'प्रकाश' मात्र है क्योंकि अप्रकाश में प्रकाश की वर्तमान युक्ति संगत नहीं है—
'यावत् किञ्चित आभासते तत् सर्वं प्रकाशमयमेव अप्रकाशस्य प्रकाशनानुपपत्ते इति युक्ति-
वशेन स्वप्नसंकल्पादिदौ संविद एव आभासोल्लासहेतुत्वं दृष्टम् ।'५ अर्थात् संकल्पादि में
भी संवित् तत्त्व का उल्लास ही मूल कारण है ।६
सामान्य अनुभव भी यही ज्ञापित करता है कि प्रकाशस्वरूप भगवान् शिव का
प्रकाश यह विश्व है: 'अनुभवानुसारेण च प्रकाशस्यैव भगवतः प्रकाशमानं विश्वम् ।'७
'शक्तिचक्रविभवप्रभवं'—उस परमात्मा की शक्तियों का चक्र (संयोजनादि-
वैचित्र्य-व्यवस्थित समुदाय) । 'विभव' = वह विश्व समुदाय ही उसका वैभव या
स्फीतता है । 'प्रभवः'—उसकी उत्पत्ति । (प्रभवति अस्मात् इति प्रभवः) 'अवभासन'
परमार्थस्वस्वभाव ही है जो उसको । कहा भी गया है—
'यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवः ।
तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥'
'शक्तिचक्र'—(दूसरा अर्थ)—इन्द्रिय वर्ग । 'विभव'—निज निज विषय
प्रवृत्त्यादिक वैभव ।। 'प्रभवं'—उसका प्रादुर्भाव । कहा भी गया है—
'यतः करणवर्गोऽयं विमूढो मूढवत् स्वयम् ।
सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहतीः ॥' (१।६)८
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि इस श्लोक के द्वारा 'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय'
शिव का ही कुलत्रिकादि प्रतिपादन किया गया है । आम्नायों के उपदेशों के द्वारा
स्वस्वभाव शङ्कर का ही यहाँ प्रतिपादन किया गया है न कि वेदान्तियों के ब्रह्म का ।
क्योंकि वेदान्तियों का ब्रह्म विश्वातिरिक्त है—'विश्वं यत्र तदेव ब्रह्म' ।९ क्षेमराज अपने
शब्दों में कहते हैं—
'शङ्करः इति उपपादितम् न तु वेदान्तवादिवत् 'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म ।'१०
१-७. स्पन्दसन्दोह । ८. स्पन्दकारिका । ९-१०. स्पन्दसन्दोह ।
प्रथमः निष्यन्दः २५
'शक्तिचक्रस्य' = करणेopenedचक्र का—अर्थात् करणरूप शक्तिवर्ग का । 'विभव' =
विचित्र सृष्टिसंहारादिकारित्व । 'प्रभवं' = उसके क्रमार्थावभासनकारित्वकृत अक्रम महा-
प्रकाशमय को । कहा भी गया है—'सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहती:' (१।६)१
'चक्र'—आन्तरचक्र (न कि अन्तःकरणत्रय क्योंकि वह करणवर्ग के रूप में स्वीकृत है ।)
'शक्तिचक्रं'—मन्त्रगण में मुद्रासमूह । 'विभव:'—उसका जो विभव है अर्थात्
त्रिविध सिद्धि-साधन-समर्थत्व । 'प्रभवं'—क्षितोत्पत्तिविश्रानितस्थान ।२ कहा भी गया
है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्त्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ।। (२६)३
'अत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।' (२।१)
'विभव'—त्रिविधा सिद्धि—१. पर २. अपर ३. परापर । ('विभव' ) ।।
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ'
श्लोक में यद्यपि परमात्मा के मात्र दो कृत्यों (१) सृष्टि एवं (२) प्रलय मात्र का ही उल्लेख
किया गया है तथापि यह पञ्चकृत्यों का सूचक (उपलक्षणक) है । परमात्मा के पञ्चकृत्य हैं
क्या?—'आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-विलापनात्म-पञ्चविधकृत्यानि' ।
'ईश्वराद्वयदर्शन' एवं ब्रह्मवादी दर्शन में भेद-दृष्टि—ईश्वराद्वयवादी परमात्मा में
पञ्चकृत्यों की विद्यमानता स्वीकार करते हैं किन्तु ब्रह्मवादी वेदान्ती नहीं स्वीकार करता ।
'तथापि तद्वत् पञ्चकृत्यानि करोति ।। १० ।।
इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्यः श्रयमेव विशेषः यत्—
'सृष्टि-संहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'
इति श्रीमत्स्वच्छादि शासनेाक्तनीत्या सदा पञ्चविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनो भग-
वतः । यथा च भगवान् शुद्धेतराध्व स्फारक्रमेण स्वस्वरूपविकासरूपाणि सृष्ट्यादीनि
करोति, 'तथा'—संकुचितचिच्छक्तितया संसारभूमिकायामपि 'पञ्चकृत्यानि' विधत्ते ।'४
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—देह प्राणादि पद में प्रविष्ट होते हुए, चिदात्मा
महेश्वर, बहिर्मुख होने की दशा में नीलादि वस्तु को नियत देश एवं नियत काल में वस्तु
का आभास होना ही 'सृष्टि' है । नियत देशकाल में भिन्न अन्य आभासांश ही 'संहार'
है । नीलाद्याभासांश में स्थापकता, वस्तुओं का ऐक्यभाव से प्रकाशन ही 'अनुग्रह' है ।
इसके अतिरिक्त भगवान् के सतत पञ्चविध कृत्यकारित्व का विस्तार से मैंने 'स्पन्द-
सन्दोह' में निर्णय किया है ।'५
परमात्मा के पञ्चकृत्य
आभासन रक्ति विमर्शन बीजावस्थापन विलापन
१. स्पन्दकारिका । २. स्पन्दसन्दोह ।
३. स्पन्दकारिका । ४-५. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।
२६ स्पन्दकारिका
'आभासन-रक्ति-विमर्शन-बीजावस्थापन-विलापनतस्तानि ।। ११ ।।'१
परमात्मा के पञ्चकृत्य
┌──────┬──────┬──────┬──────┐
सृष्टि संहार विलय स्थिति अनुग्रह
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'२
'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने ।
चिदानन्दघनस्वात्म परमार्थविभासिने ।।'
'शङ्कर'—शं + करं ।। 'शं'—अशेष उपद्रव (भेदप्रथनात्मक उपद्रव) से रहित
परमानन्दाद्वय चैतन्य प्रकाश प्रत्यभिज्ञापनात्मक अनुग्रह । 'करं'—करोति इति करः ।
करने वला । 'तं' = स्वात्मपरमार्थ शङ्कर को । 'स्तुमः' = समस्त देह—प्राणादि
परिमित-प्रमातृ पदं को अधस्पदीकृत करके विकल्प-अविकल्प आदि समस्त रूपों में एवं
समस्त दशाओं में 'सर्वोत्कृष्ट होने के कारण मन ही मन सोचता हूँ' ।।
'स्तुमः'—परामृशामः । 'स्तुमः'—पद में बहुवचन का प्रयोग क्यों ? 'तं' =
असाधारण स्वरूपप्रत्यभिज्ञापनार्थ' 'शक्तिचक्र' = इन्द्रिय वर्ग ।
'प्रलयोदयौ' = प्रलयोदय । निमज्जन-उन्मज्जन । समावेश ।
(१) चिदात्मा का उन्मज्जन = 'समावेश' है ।
(२) जगत् का उन्मज्जन = 'व्युत्थान' है ।
(३) अभिन्नता का जो उन्मेष है वही जगत् का 'प्रलय' है ।३
(क) वेदान्तियों का ब्रह्म—'विश्वातीतः'
(ख) तांत्रिकों का परमशिव—१) विश्वमय २) विश्वातीत ।
त्रिकनय में 'परमपद' का स्वरूप—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि न तो
'विश्वमय' और न तो 'विश्वातीत' प्रत्युत् 'विश्वमयविश्वातीत' पद ही परमपद है । शिव
विश्वमय एवं विश्वातीत दोनों है । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ।' 'जगत्
परमात्मा की शक्ति है ।'
मूल में दो ही विद्यायें हैं—(१) 'कादिविद्या' (२) 'हादिविद्या' । कादि विद्या
में सृष्टि का उदय 'काम' (संकल्प) से माना गया है । हादि विद्या में सृष्टि—आकाशवत्
अव्यक्त शिव की माया शक्ति से माना गया है । उपनिषदों में भी कादि विद्या का समर्थन
किया गया है—
(१) तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति'४ अर्थात् उसने इच्छा की कि सृष्टि करने हेतु मैं
एक से अनेक होकर उत्पन्न हो जाऊँ ।
१. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । २. स्वच्छन्दतंत्र (पटल १) ।
३. स्पन्दसन्दोह (पृ० १४)। ४. छान्दोग्योपनिषद (६।२।३) ।
प्रथमः निष्यन्दः २७
(२) स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति, स इमान लोकानसृजत् । (उसने इच्छा की कि
लोकों की सृष्टि करूँ । उसने लोकों की सृष्टि की)१
(३) स ईक्षांचक्रे, स प्राणमसृजत् ॥२
(उसने इच्छा की और प्राण का सृजन किया)
आदि इच्छाशक्ति महात्रिपुरसुन्दरी हैं । ‘तं’ = उन भगवान् परमशिव को ।
‘स्तुमो’ (नुमः) = नमस्कार करते हैं । ‘शङ्करं’ = ‘शं’ = ‘भोगापवर्गाख्यं शं’ = श्रेय
या सुख ॥ (‘भोगापवर्गाख्यं शं श्रेयः सुखं वा करोतीति शङ्करः’)३ ‘स्तुमः’—कैसी
स्तुति? ‘तत्स्वरूपानुवेश एव स्तुतिः । कः स्तोता? कः स्तुत्यः? का वा स्तुतिः?—
क्योंकि—भगवद्व्यतिरेकेण न च स्तुत्योऽस्ति मानिनाम् ।’४ स्तुति क्यों ? क्योंकि वह
‘भगवान’ है । भगवान् क्यों है? क्योंकि—उसमें छः भग विद्यमान हैं—भग क्या है?
‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य ज्ञानस्य यशसः श्रियः ।
वैराग्यस्य च मोक्षस्य षण्णां भग इति स्मृतः ॥५
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य भूतानामगतिमगतिम् ।
वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्यो भगवानिति ॥६
‘शक्तिचक्रविभवप्रभव शङ्कर’—भगवान् शङ्कर ‘प्रभव’ (शक्तियों के उत्पत्ति-
स्थान्) हैं वे अपने को ७ प्रमाताओं के रूप में प्रकट करते हैं जो निम्न हैं—१. शिव
२. मन्त्रमहेश्वर ३. मन्त्रेश्वर ४. मन्त्र ५. विज्ञानाकल ६. प्रलयाकल ७. सकल ॥ वे
समस्त शक्तियों के स्वामी हैं—उनके बीज हैं ।
‘शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः’—‘शक्तिचक्र विभवप्रभव’ शङ्कर की ही वन्दना
क्यों ? शक्ति-रहित स्वतन्त्र शङ्कर की वन्दना क्यों नहीं ? क्योंकि—
१. शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥७
भाव यह कि यदि ‘शिव’ शक्ति से युक्त न रहे तो वे इतने अशक्त एवं असमर्थ हो
जायेंगे कि अपने स्थान से हिल भी नहीं सकते ॥
२. ‘शिव’ पद में इकार शक्ति का वाचक है । यदि इसे निकाल दिया जाय तो
‘शिव’ ‘शव’ मात्र शेष रह जायेंगे ।
‘तं स्तुमः’—‘तं कम्’ (उस किसको?)८ ‘उसको’ जिसके उन्मेष से—औन्मुख्य
से, जगत् का (विश्व का) ‘प्रभव’—(सन्तति) निष्पादित होता है: ‘यदुन्मेषादौन्मुख्या-
ज्जगतो विश्वस्योदयः प्रभवः सन्ततिरिति यावत् ॥९ ‘निमेषात्’—‘जिसके विश्राम से
१. ऐतरेयोपनिषद (१।१।१) । २. प्रश्नोपनिषद (६।३) ।
३-५. स्पन्दप्रदीपिका में उद्धृत । ६. विष्णुपुराण ।
७. शंकराचार्य (सौन्दर्यलहरी) ८-९. स्पन्दप्रदीपिका ।
२८ स्पन्दकारिका
प्रलय हो जाता है । (‘निमेषाद्विश्रामात् प्रलयोऽप्ययः ।’)^१ इन शङ्कर के अतिरिक्त अन्य
किसी के द्वारा जगत् की सृष्टि एवं प्रलय हो पाना संभव नहीं है (‘न ह्येतद्व्यतिरिक्तस्य
जगतोऽस्त्युदयोऽप्ययो वा’:) ‘किन्त्वीशशक्ति प्रसरविरामौ प्रभवाप्ययौ ।’
कहा भी गया है—
‘समुदेति जगदशेषं तवोदयविमलसंविदाकारे ।
अस्तं याति समस्तं पुनरपि निजरूपरूढायाः ॥’
‘तत्त्वविचार’ में कहा गया है—
‘शक्तिप्रसरसंकोचनिबद्धावुदयव्ययौ ।
यस्यात्मा स शिवो ज्ञेयः सर्वभावप्रवर्तकः ॥’^२
‘कक्ष्यास्तोत्र’ में भी कहा गया है—
त्वदाशयोन्मेषनिमेषमात्रमयौ जगत्सर्गलयावितीदृक् ।
स्फुटे स्फुटं त्वन्महिमाऽवभाति विचित्रनिर्माणनिदर्शनेन ॥
ज्ञानक्रियादिगर्भेच्छा शक्तिर्यः प्रसरात्मकः ।
संकल्पोक्तः स उन्मेषः प्रोक्तं ह्येतत् स्वतन्त्रके ।
यत्र यत्र भवेदिच्छा ज्ञानं तत्र प्रवर्तते ।
क्रियाकरणसंयोगात् पदार्थस्योदयो भवेत् ॥^३
‘निमेष’ = उन्मेष से विरति ।^४
प्रश्न—ग्रन्थकार ने ‘उदयप्रलयौ’ न कहकर ‘प्रलयोदयौ’ क्यों कहा? पहले ‘उदय’
होता है फिर ‘प्रलय’ । लेकिन ग्रन्थकार ने ‘उदयप्रलयौ’ कहने के स्थान में ‘प्रलयोदयौ’
इसलिए कहा क्योंकि अन्यथा इस श्लोक में वृत्त-भंग दोष आ जाता ?^५ हाँ यह बात ही
ध्यातव्य है कि ग्रन्थकार ने ‘प्रलय’ शब्द के प्राथमिक प्रयोग से बचने के लिए श्लोकारंभ
में ‘उन्मेष’ शब्द का प्रयोग किया जो कि मंगलवाची है ।^६
उन्मेष-निमेष—पदों के प्रयोग में रहस्यार्थ—ग्रन्थकार ने ‘उन्मेष’ एवं ‘निमेष’
शब्द का ग्रन्थारंभ में (मंगलाचरण में) प्रयोग करके एक ओर तो वेदान्त के निष्क्रिय ब्रह्म
की अमान्यता एवं शिवाद्धयवादोक्त ब्रह्म की सक्रिया, (पञ्चकृत्यकारित्व) को संकेतित
किया वहीं उन्होंने इन शब्दों द्वारा परम पुरुषार्थों की ओर भी इंगित किया है क्योंकि
‘उन्मेष’ एवं ‘निमेष’ का अर्थ ‘भोग-मोक्ष’ भी है ‘जगत्सृष्टिसंहरयोः कारणभावः प्रोक्तो
भुक्तिमुक्तौ च । तत्रोन्मेषाद्भोगो नानाविधः । निमेषान्मोक्षो निस्तरंगरूपता ।’^७
शक्तिचक्रविभवप्रभव—‘शक्ति’-‘शक्तिचक्र’ ‘इच्छाख्यैका विभोः शक्तिः प्राग्द्विधा
ज्ञ क्रियाभिदा’ इस शक्ति के विभिन्न रूप हैं इसीलिए ‘शक्तिचक्र’ (शक्तिसमूह) कहा गया ।
‘मालिनीविजय’ में इसी अद्वितीया शक्ति के नानात्व का इस प्रकार वर्णन किया गया है।
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. तत्त्वविचार ।
३. कक्ष्यास्तोत्र । ४-७. स्पन्दप्रदीपिका ।
प्रथमः निःष्यन्दः २९
या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥
सैकाऽपि सत्यनेकत्वं यथा गच्छति तच्छृणु ।
एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् ॥
ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ।
एवं भवत्विदं सर्वमिति कार्योन्मुखी यदा ॥
जाता तदैव सा तद्वत् कुर्वन्त्यपि क्रियोच्यते ।
एवमेषा द्विरूपाऽपि पुनर्भेदैरनेकताम् ॥
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ।
तत्र मातृत्वमापन्ना पञ्चाशद्वर्णमालिनी ॥१
'शक्तीनां चक्रं शक्तिचक्रं'—मातृवर्ग ॥२ इसके मुख्यतः ४ प्रकार हैं—
खेचरी गोचरी चाथ दिक्त्वरीभूचरीभिदा ।
परादिभारतीसंस्थं शक्तिचक्रं चतुर्विधम् ॥
'शक्तिचक्र' = मातृवर्ग
खेचरी गोचरी दिक्त्वरी भूचरी
शक्तिचक्र
परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी
शक्तिचक्र
आनन्दशक्ति इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति
'आनन्देच्छाः ज्ञक्रियाख्यं खेचर्याद्यं चतुष्टयम्'
'विभव'—'विभूतिर्विस्तारः' । 'प्रभवम्' = प्रभवति अस्मादिति प्रभवः उत्पत्ति-
स्थानम् ।'३
खेचरी, गोचरी, दिक्त्वरी, भूचरी = परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी इन्हीं में
आनन्द, इच्छा, ज्ञान, एवं क्रिया निवास करती है । ये सभी शक्तियाँ आत्मसंवित् से
अभिन्न हैं । पाँचभौतिक शरीर से रहित केवल चिदात्मा में परमानन्दोल्लास है वही 'परा
वैष्णवी' शक्ति है । इन्हीं शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । हितकारिणी इन्हीं
शक्तियों से संवित् विग्रह धारण करती है । हितकारिणी होने से इन्हीं शक्तियों को 'माता'
कहा जाता है । ये शक्तियाँ विज्ञानदेह हैं । भिन्न-भिन्न मतों में—खेचरी, इच्छा, परा,
अघोरा, वामा, ब्राह्मी, वैष्णवी, शैवी, सौरी, बौद्धी आदि अनेक शक्तियाँ हैं । इन सभी
शक्तियों के मूल कारण 'स्पन्द' रूप भगवान् ही है । शक्तिसमूह ही अनन्तरूप में
१. मालिनीविजय । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।
३० स्पन्दकारिका
स्फुरित हो रहा है । शक्तिमान आत्मा महेश्वर है और शक्तियाँ जगत् है । जिस
प्रकार श्रेष्ठ सुन्दरी के अंग प्रत्यंग से राशि-राशि लावण्य छलकता है वैसे ही परमात्मा
की चिन्मात्रता ही जगत् के रूप में छलक रही है । शक्तियों के बल से ही आत्मा की
संज्ञा 'प्रभु' पड़ी है ।
प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् ।
तत्तत् प्रसिद्धावयवातिरिक्तमाभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥
तेनैतदेव शक्तीनां यतोऽन्तः प्रसरोदयौ ।
तद्बलालम्भनात्तासां प्रभुत्वं प्राप्यतेऽचिरात् ॥
‘उन्मेष-निमेष’ के सम्बन्ध में स्पन्दप्रदीपिकाकार की दृष्टि—
(१) उन्मेष (उन्मुखता) से विश्व का उदय होता है और परम्परा चलती रहती है ।
निमेष से (विश्राम से) प्रलय हो जाता है । मूल वही ‘शङ्कर’ है ।
उन्मेष-निमेष उसी प्रकार हैं यथा जाग्रत काल में दृश्य का उदय एवं सुषुप्ति
काल में दृश्य का प्रलय । आत्म संवित् के उन्मेष एवं निमेष से अतिरिक्त उत्पत्ति-प्रलय
नामक कोई अन्य वस्तु नहीं है । यह अत्मरूप ईश्वर की शक्ति का प्रसार एवं विराममात्र
है । विमल संवित् के ये दोनों ही आकार हैं । ‘तत्त्वविचार’ में ठीक ही कहा गया है
कि—जगत् का उदय और विलय शक्ति के प्रसार एवं संकोच के साथ बँधे हुए हैं ।
‘कक्ष्यास्तोत्र’ में भी कहा गया है कि—तुम्हारे आशय के उन्मेष-निमेष मात्र को ही सृष्टि
और प्रलय कहते हैं । ‘उन्मेष’ में ज्ञान-क्रिया आदि से गर्भित इच्छा शक्ति का निवास है
और वह फैलती है । इच्छा से ज्ञान प्रवृत्त होता है और क्रिया-करण के संयोग से पदार्थ
की उत्पत्ति होती है । इसका विराम ही प्रलय है ।१
(२) ‘उन्मेष’ में भुक्ति है और ‘निमेष’ में मुक्ति है । सृष्टि और संहार भी इसी
भुक्ति-मुक्ति के अपर पर्याय हैं—‘आभ्यां जगत्सृष्टिसंहारयोः कारणभावः प्रोक्ते भुक्तिमुक्तौ
च । तत्रोन्मेषाद् भोगो नानाविधः । निमेषान्मोक्षो निस्तरंगरूपता ।।'२ जिस निमेष को
‘मोक्ष’ कहा गया है वह ‘मोक्ष’ क्या है ? उत्पलदेव कहते हैं—
‘इह कि जीवन्मुक्ततैव मोक्षः ।' ‘स्पन्दकारिका’ में भी यही कहा गया है—
‘इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३
‘शक्तिचक्र विभवं’ वाक्य में ‘शक्तिचक्र’ का क्या अर्थ है?—इसका सुनिश्चित
अर्थ न बताकर स्पन्दप्रदीपिकाकार ने कहा है कि ‘शक्तिचक्र’ निम्न सभी चतुष्कों का
अर्थ-बोधन करता है—
१. खेचरी २. गोचरी ३. दिक्चरी ४. भूचरी शक्ति ।
१. इच्छा २. ज्ञान ३. क्रिया ४. चित् शक्ति ।
१-२. स्पन्दप्रदीपिका । ३. स्पन्दकारिका ।