स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १३
१. आभासन २. रक्ति ३. विमर्शन ४. जीवावस्थापन ५. विलापन ।
१. सृष्टि २. स्थिति ३. संहार ४. विलय (निग्रह) ५. अनुग्रह ॥
'नमः शिवाय सततं पञ्चकृत्यविधायिने । (प्र०हृ०)
आभासनरक्तिविमर्शनबीजावस्थापनविलापनतस्तानि (प्र०हृ० ११) 'तथापि तद्वत्
पञ्चकृत्यानि करोति' (प्र०हृ०सू० १०) ।
'इह ईश्वराद्वयदर्शनस्य ब्रह्मवादिभ्य' अयमेव विशेषः । (क्षेमराज) आचार्य
क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में भी शक्ति को प्राधान्य देते हुए प्राथमिक सूत्रों में शक्ति
विषयक सूत्र ही लिखें हैं यथा—
१. चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः । (सूत्र १)
२. स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥ (सूत्र २)
३. चितिरेव चेतनपदावरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम् । (५)
४. स चैको द्विरूपस्त्रिमयश्चतुरात्मा सप्त पञ्चस्वभावः (सू० ७)
५. तद्भूूमिकाः सर्वदर्शनस्थितयः । (सू० ८)
प्रत्यभिज्ञादर्शन के उद्भावक सोमानन्दपाद ने भी सर्वात्मवाद का प्रतिपादन किया
है—(स्वरूपस्पन्द या आत्मा) का प्रामुख्य प्रतिपादित किया है)
'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन निवृत्तचिद्विभुः ।
अनिरुद्धेच्छाप्रसर प्रसरद् दृक्क्रियः शिवः ।।' (शिवदृष्टि)
यही आत्मा या चितिशक्ति 'स्वरूपस्पन्द' है और स्पन्दसूत्रों के प्राथमिक निष्यन्द
में इसी स्वरूपस्पन्द एवं विशेष स्पन्द की प्रमुखता से विवेचना की जाने के कारण इस
निष्यन्द को 'स्वरूपस्पन्द' कहा गया है । 'विशेष स्पन्द' लक्ष्य नहीं है लक्ष्य है—
'स्वरूपस्पन्द' । इसी उद्देश्य से 'स्वरूपस्पन्द' प्रथम निष्यन्द की संख्या है । स्पन्द
शास्त्र का सारा प्रयत्न है—'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये (१।२१)।
शिव ही 'विश्वात्मा' या 'स्वरूपस्पन्द' है ।
'स्वरूपस्पन्द' कहकर जिस आत्मा की ओर इंगित किया गया है वह मात्र 'शक्ति'
ही नहीं शिव भी है—अतः यदि 'स्पन्दसूत्र' के प्रारंभ में 'शंकरं स्तुमः' कहा गया है तो
वह शंकर भी विश्वात्मा ही है । शिवसूत्रवार्तिक, में वरदराज ने कहा है—
१. चित्क्रियात्मकचैतन्यमूर्त्तिर्जीवजडात्मनः ।
परमः शिव एवात्मा प्रपञ्चस्येति कथ्यते ॥ (१।७)
२. चैतन्यमेव विश्वस्य स्वरूपं पारमार्थिकम् (१।१३) (चैतन्य = आत्मा)
३. चैतन्य चित्क्रियारूपं शिवस्य परमस्य यत् ।
स्वातन्त्र्यमेतदेवात्मा ततोऽसौ परमः शिवः ॥ (१।८)
४. नात्मा देहो न च प्राणो न मनः खं न शून्यभूः ।
किन्तु चैतन्यमेवात्मेत्यादिष्टं परमेष्ठिना ॥ (१।१०)