सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 306, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रहर्क्षोदयास्तसमय वर्णनम् २०७
में जोड़ते हैं तथा पश्चिमी कपाल में देखने के लिए घटाते हैं ।
सूर्यादन्त रितो दृश्यो रुद्र (११) कालांशतोऽधिकः ।
न्यूनस्ततो न दृशेत शीतराशि र्भुवि स्थितैः । १२ ।
इस प्रकार लम्बन संस्कृत स्फुट चन्द्र जब सूर्य से ११ कालांश दूर रहता है ।
तब वह भू पृष्ठ पर दिखायी देता है । उसकी सूर्य से दूरी ११ कालांश से कम
होने पर चन्द्रमा दिखायी नहीं देता ।
भानां विक्षेप बाहुल्यात् प्राग् वद् विक्षेपत स्फुटा
क्रान्ति साध्या ततस्तेषां दिन माना सव स्तथा । १३ ।
नक्षत्रों का शर बहुत होता है । अतः उनके शर से स्फुट क्रान्ति निकाली
जाती है । इस स्फुट क्रान्ति का चर निकाल कर उनका दिनमान असु निकाला
जायेगा ।
नित्योदयास्त समयौ लग्नौ तत्काल सम्भवौः
तत्सूर्यान्तर जा सुध्यः कालांशै र्मील नोद् गमौ । १४ ।
इससे दैनिक उदयास्त काल और तात्कालिक लग्न मध्य ज्ञात होगा ।
तत्कालिक लग्न और तत्कालिक सूर्य के अन्तर असु को ६० से भाग देने पर इष्ट
कालांश होगा ।
पश्चादस्त मयं प्राच्य मुदयं यान्ति सर्वदा
भानि प्राग् गति शून्यत्वात् सूर्याजीव कुजार्किवत् । १५ ।
इष्ट कालांश और पहले कहे गये अपने अपने कालांश के अनुसार केवल
रवि गति द्वारा ही नक्षत्रों का उदय अस्त ज्ञात होगा । नक्षत्रों की पूर्व गति नहीं
है अतः वे मंगल, गुरु और शनि की तरह सूर्य से कालांश के बराबर दूर रह कर
पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होते हैं ।
पश्चादस्त मयात् पूर्वे येषां प्रागुदयो भवेत् ।
उदयास्त मयौ तेषां नेष्टो प्रत्यह मीक्षणात् । १६ ।
पश्चिम में अस्त होने के पहले जो नक्षत्र पूर्व में उदय होते हैं उनका उदयास्त
साधन करने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि उनकी यह दैनिक अवस्था है,
उसका रवि की निकटता से कोई सम्बन्ध नहीं है ।
यद् यन्मान विलिप्तानां भानामस्तोदयां शकाः ।
ये ये कालात्मकास्तेऽत्र की र्त्यन्ते दृक् समा क्रमात् । १७ ।
नक्षत्रों का बिम्ब मान जितना कला में होगा उसके अनुसार उदय और अस्त
का काल अंश में कहा जाता है जो कि स्फुट (वास्तव में दीखता है) मान है ।