सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ सिद्धान्त दर्पण
सूर्य सिद्धान्ते-ऊना विवस्वतः प्राच्य मस्तं चन्द्रज्ञ भार्गवाः
ब्रजन्त्य ध्यधिकाः पश्चादुदयं शीघ्र यायिनः । ६ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार- चन्द्र बुध और शुक्र सूर्य कम रहने पर पूर्व में
अस्त होते हैं । रवि से अधिक रहने पर ये पश्चिम में उदय होते हैं । बुध और
शुक्र रवि से अधिक गति होने के कारण ऐसा होता है ।
सूर्यास्त कालिकौ पश्चात् प्राच्य मुदय कालिकौ
दिवाकर ग्रहौ कुर्या दृक् कर्मार्थं ग्रहस्य तु । इति । ७ ।
उदय अस्त के लिए दृक् कर्म- प्रथम स्थूल केन्द्रांश निकाल कर उदय और
अस्त का आसन्न दिन ज्ञान करना होगा । इस दिन पश्चिम दिशा का उदय और
अस्त जानने के लिये सूर्य और ग्रह को सूर्यास्त कालिक करना होगा । पूर्व में
उदय और अस्त ठीक प्रकार निकालने के लिए ग्रह और सूर्य को उदय कालिक
करना होगा । इसके बाद दोनों का दृक् कर्म किया जायेग ।
कृत्वा यनज माक्षन्तु वक्ष्ये विक्षेप लिप्तिका ।
अक्ष भाघ्ना क्षिभू (१२) भक्ताः ख खाष्टविषु (१८००) ताड़िताः । ८ ।
पहले आयन और तब आक्षदृक् कर्म किया जाता है । यहां अक्ष दृक् कर्म
की विधि कही जाती है । ग्रह के स्फुट शर कला को पलभार से गुणा कर १२
से भाग दें । फल को १८०० से गुणा कर-
तत्कालोत्थं विलग्रासु भक्ता धनमृणं खगे ।
प्राक्स्थेऽर्के याम्य सौम्यात्थ शरयोर्व्यय मस्तगे । ९ ।
उस समय के लग्न असु से भाग देने पर फल कला आदि होगा । इस फल
कला को सूर्य पूर्व क्षितिज में रहने पर दक्षिण शर ग्रह में जोड़ा जायेगा । तथा
उत्तर शर घटाया जायेगा । सूर्य अस्त होते समय इसके विपरीत होगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-तथोर्लग्रान्तर प्राणाः कालांशा षष्टिभाजिताः
प्रतीच्यं षड्भयुतयो स्तद्वल्लग्नान्तरासवः । इति । १० ।
आक्ष कर्म संस्कृत ग्रह और रवि के अन्तर के असु को (जिस प्रकार लग्न
की उदय असु निकाला जाता है) ६० से भाग देकर कालांश निकाला जाता है ।
पश्चिम में उदय और अस्त होने के लिए आक्ष ग्रह में ६ राशि जोड़ कर उससे ६
राशि युक्त रवि के अन्तर का लग्नासु, निकाला जाता है । इससे ग्रह का संस्कार
कर पुनः कालांश निकालते हैं ।
सूक्ष्मेन्दोः स्फुट विक्षेपः स्पष्टावनति संस्कृतः
ग्राह्यस्तल्लम्बन कलाः प्राक् प्रत्यग् युतवर्जिताः । ११ ।
सूक्ष्म स्फुट चन्द्र के स्फुट शर में सूर्य ग्रहण की विधि से स्फुट नति संस्कार
होता है । उसकी लम्बन कला को पूर्व कपाल में अस्त देखने के लिए सूक्ष्म चन्द्र