सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः प्रकाशः
सूक्ष्म पञ्चिका क्रान्त्यादि वर्णनम्
उद्वाहोपनय प्रयाण निलयक्रत्वादिषु द्राङ् महा-
रम्भोद्दिष्ट फलाप्तये किलमया सूक्ष्मोच्यते पञ्चिका
दृक् सिद्धापम मार्गण ग्रहण युग् योगोदयास्तं महा-
पाताद्यं तिथिभादि कार्य मनया सूक्ष्मार्क चन्द्रोद्भवम् । १ ।
विवाह, उपनयन, युद्ध, यात्रा, गृहारम्भ, यज्ञ और जात कर्म आदि में अति
शीघ्र फल पाने के लिए मैं अब सूक्ष्म पञ्चिका लिखता हूँ । इसकी सहायता से
क्रान्ति शर, चन्द्र और सूर्य ग्रहण, ग्रह और नक्षत्र योग, उदय और अस्त, महापात
(चन्द्र और सूर्य की समान क्रान्ति) तिथि, नक्षत्र, योग और करण आदि का साधना
होगा । पञ्चांग सूक्ष्म रवि और सूक्ष्म चन्द्र द्वारा करना चाहिये ।
वृद्धौ पञ्च (५) तिथेः क्षयेरसमिता (६) नाड्यःपुराणैर्मता
नित्यं यत्परमास्ततो व्यवहृतौ स्थूलेष्यते पञ्चिका
प्रत्यक्षानुभवं न लुम्पति वचो युक्तिर्य तस्तन्मया
तत् साक्षात्कारणाय काम्य विधये सूक्ष्मा परातन्यते । २ ।
एक तिथि के प्रायः ६० दण्डों में प्राचीन आचार्य ५ दण्ड तक की वृद्धि और
६ दण्ड तक की कमी (बाण वृद्धि रसक्षयः) - अर्थात् तिथि परिमाण ५४ से ६५
से दण्ड तक मानते थे । इस मान्यता के कारण उनकी पञ्चिका गणना स्थूल होती
थी क्योंकि तिथि में वास्तविक वृद्धि और क्षयं इससे बहुत अधिक होता है । अतः
पिछले पञ्चम प्रकाश में प्राचीन मत की स्थूल पञ्चिका रचना के बाद अब सूक्ष्म
पञ्चिका की विधि बताता हूँ । इसके नियमों के अनुसार गति आदि की गणना
करने से काम्य कर्मों के बाद तिथि आदि वास्तव में प्रत्यक्ष होंबो । प्रत्यक्ष प्रमाण
के रहते और तर्क की आवश्यकता नहीं है ।
दृक् तुल्यतां गच्छति पर्व सन्धि र्येनार्क विद्ध्वोः परिधिद्वयेन
तन्मात्र संसिद्ध फलागतांगा सत्पञ्चिका स्थूलतया पुरोक्तां । ३ ।
रवि और चन्द्र की दो मन्दपरिधियों के अनुसार जो अमावस्या और पूर्णिमा
आती है अर्थात् केवल मन्दफल संस्कार से स्फुट रवि और चन्द्र को लेकर दृग्क्
सिद्ध अमावस्या और पूर्णिमा होती है वह पञ्चिका स्थूल रूप से कही जा चुकी
है । (५ म प्रकाश में) ।
सूक्ष्मार्क दोः खण्ड फलैस्तु सूक्ष्म कार्याहिमांशोर्बहुभिर्विशेषैः ।
तत्रैश सिद्धः परिधेर भेदात् फलैस्तु दृत्यैः प्रथम ग्रहः स्यात् । ४ ।
पंजिका के पांच अंग (वार, तिथि, नक्षत्र, योग और करण) होने के कारण
इसे पञ्चांग कहते हैं, इसके प्रथम अंग (वार) को छोड़ बाकी चार सूर्य और चन्द्र