सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
निरंशता, निरन्तरता, निश्चलता, निश्चयता, निर्विकल्प-
तेति पञ्चगुणा सूक्ष्मशक्तिः ॥ १३ ॥
परमेश्वर शिव की सूक्ष्मा शक्ति के पाँच गुण—अवस्था अथवा धर्म हैं।
(यह सूक्ष्म शक्ति विद्यारूप विमर्शशक्ति है ।) इसका पहला गुण निरंशता है। इसमें
अयं (यह) और त्वम् (तुम) के व्यवहार का अभाव है, सृष्टि के पहले निरंशता
शक्ति सूक्ष्म रूप से 'अहम्' के रूप में अन्तर्लीन रहती है, सृष्टि के बाद 'एकोऽहं
बहुस्याम' के रूप में यह व्यवहार में अभिव्यक्त होती है। दूसरा गुण निरन्तरता
है। यह देश-कालकृत व्यवधान से शून्य होने के कारण परमेश्वर में निरन्तर
नित्य अभिव्यक्त है। तीसरा गुण निश्चलता है, यह अच्युत है, आदिनाथ शिव में
सम्पूर्ण अभिव्यक्त होकर व्याप्त है। चौथा गुण निश्चयता है, सत्वरूप की
अभिव्यक्ति है, संशय, भ्रम, द्वन्द्व आदि दोष से रहित सच्चिदानन्दस्वरूप बोध
की योगज्ञानमयी शक्ति है, निरञ्जनता है। पाँचवां गुण निर्विकल्पता है, सृष्टि के
पहले सिसृक्षा की संकल्प-शक्ति के रूप में परमेश्वर शिव में विशेष्य-विशेषण
(उपाधि) रहित स्वाभिव्यक्त है ॥ १३ ॥
पूर्णता, प्रतिबिम्बता, प्रबलता, प्रोच्चलता प्रत्यङ्मुखतेति
कुण्डलिनी शक्तिः ॥ १४ ॥
(कुण्डलिनी महाशक्ति सहस्रार से भी परे आकाश चक्र में स्वस्थ
आदिनाथ, अलख निरंजन, परमेश्वर की ज्योतिस्वरूपिणी, नित्य विहारिणी,
शाश्वत लीलाधारिणी परमेश्वरी है ।) यह परमेश्वर में नित्य सच्चिदानन्द
स्वरूपिणी होने से पूर्ण है, अखण्ड, अनन्त, शाश्वत एकरस है। इसका पहला
गुण पूर्णता है। यह सर्वव्यापक, अपरिच्छिन्न और नित्य है । शब्द-अर्थरूपगत
इसका परिणाम होना ही इसकी प्रतिबिम्बता है। प्रतिबिम्बता इसका दूसरा
गुण है। योगी द्वारा नवचक्रादिभेदनपूर्वक इसका प्रबोधन—जागरण होने पर
ज्योतिरूप में उसके शरीर में यह महाशक्ति प्रतिबिम्बित हो उठती है । योगी के
शरीर का तेजोमय रूप में ज्योतित होना ही कुण्डलिनी की प्रतिबिम्बता है।
कुण्डलिनी शक्ति का तीसरा गुण प्रबलता है। यह गुण उसके महाशक्तिसम्पन्न
होने का प्रतिपादक है। चौथा गुण प्रोच्चलता है । यह नित्य वर्धमान है,
सुप्ताकार से जागृति—प्रबोधनरूप में नित्य-निरन्तर ज्योतित अथवा अभिव्यक्त होती
रहती है । यह सदाशिव में सायुज्यलाभमयी होकर ऊर्ध्वमुखी रहती है।
६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
पाँचवां गुण प्रत्यङ्मुखता (सृष्टिकर्मसम्पादन में नित्य तत्परता) है। सृष्टिकर्म
के सम्पादन की सम्पूर्ण सामग्री की परिपूर्णता प्रत्यङ्मुखता है ॥१४॥
परपिण्डोत्पत्ति
एवं शक्तितत्त्वे पञ्च पञ्च गुणयोगात् परपिण्डोत्पत्तिः ॥ १५ ॥
इस तरह शक्तितत्व में प्रत्येक (निजा शक्ति, पराशक्ति, अपराशक्ति, सूक्ष्मा-
शक्ति और कुण्डलिनो शक्ति) के पाँच-पाँच गुण, धर्म अथवा अवस्था (पचीस
गुणों) में परपिण्ड (सगुण-साकार परमेश्वर के पिण्ड) की उत्पत्ति (प्राकट्य
अथवा आविर्भाव) होती है। (जिस तरह हमारा पाञ्चभौतिक शरीर पञ्च
भूतों का पिण्ड है और उसका अधिष्ठाता जीवात्मा है, इसी तरह शक्ति के पचीस
गुणों वाले परपिण्ड-व्यापक पिण्ड का अधिष्ठाता सगुण साकार परमेश्वर है।)
परपिण्ड में व्याप्त यह परमेश्वर सर्वज्ञ, चैतन्यस्वरूप, कूटस्थ, असंग, सत्स्वरूप
में जगत् की सृष्टि, पालन और संहार के लिए अभिव्यक्त अथवा प्रकट है।
उत्पत्ति का तात्पर्य आविर्भाव है, उत्पत्तिधर्मी का विनाश होता है, परपिण्ड की
उत्पत्ति विनाशधर्मी नहीं है यह लय को प्राप्त होता है। साकार-सगुण परमेश्वर
का पिण्ड द्वैताद्वैतविवर्जित अलख निरञ्जन, परमेश्वर में लय को प्राप्त हो जाता
है, उसका विनाश नहीं होता है ॥ १५ ॥
उक्तञ्च—
निजापराऽपरासूक्ष्माकुण्डलिन्यासु पञ्चधा ।
शक्तिचक्रक्रमेणोत्थो जातः पिण्डपरः शिवः ॥ १६ ॥
निजा, परा, अपरा, सूक्ष्मा और कुण्डलिनी, इन पांच शक्तियों में शक्तिचक्र
क्रम द्वारा सदाशिव पाँच प्रकार से प्रकट होते हैं। एक-एक शक्ति के विकास से
एक-एक पिण्ड आविर्भूत होता है, इन पाँच पिण्डों के अधिष्ठातारूप पाँच देव होते
हैं, यही शक्तिचक्र-क्रम है, शक्तिचक्रत्रिकोण में विन्दु रहता है, विन्दु से आशय है
अविकृत कारण, आदिनाथ परमेश्वर, परब्रह्म शिव, सदाशिव की शक्ति के विकास
के समय यह शक्ति इच्छा, ज्ञान, क्रिया का रूप धारण करती है। इन तीनों
(गौरी, लक्ष्मी, सरस्वतीरूपिणी) शक्तियों से परमेश्वर व्यापक शिव का आविर्भाव
होता है ॥१६॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७
अनादि पिण्ड के पाँच तत्व और पचीस गुण
अपरम्परं परमपदं शून्यं निरञ्जन परमात्मेति ॥ १७ ॥
इन पाँच शक्तियों के ( शक्तिचक्र-क्रम से ) प्रकट पाँच अधिष्ठाता देव
अपरम्पर सदाशिव—निजा शक्ति के अधिष्ठाता ), परमपद (परमेश्वर—परा शक्ति
के अधिष्ठाता ), शून्य ( रुद्र—अपरा शक्ति के अधिष्ठाता), निरंजन ( विष्णु,
रागद्वेषादिरहित, ज्ञानशक्तिविशिष्ट सूक्ष्मशक्ति के अधिष्ठाता ) और परमात्मा
(ब्रह्मा—कुण्डलिनी शक्ति के साक्षी जगत् के स्रष्टा) हैं ॥ १७ ॥
अपरम्परात् स्फुरतामात्रमुत्पन्नं परमपदाद् भावनामात्र-
मुत्पन्नं शून्यात्स्वसत्तामात्रमुत्पन्नं निरञ्जनात् स्वसाक्षात्कार-
मात्रमुत्पन्नं परमात्मनः परमात्मोत्पन्नः ॥ १८ ॥
अपरम्पर ( सदाशिव ) से स्फुरता .( उत्साह ), परमपद ( परमेश्वर )
से भावना ( समालोचनात्मक—क्रियासामान्य ज्ञान ), शून्य ( रुद्र ) से
स्वसत्तामात्र, निरञ्जन ( विष्णु ) से स्वसाक्षात्कारमात्र ( अहंकार ) और
परमात्मा ( ब्रह्मा ) से सृष्टि के उत्पादन के लिये उपयोगी ( बीजरूप )
समष्टिपिण्ड उत्पन्न हैं । यह समष्टिपिण्ड अस्मदादि व्यष्टिपिण्डों की अपेक्षा
उत्कृष्ट है, इसलिये यह परमात्मा कहा गया है ॥ १८ ॥
अकलंकत्वमनुपमत्वमपारत्वममूर्तत्वमनुदयत्वमिति पञ्च-
गुणमपरम्परम् ॥ १६ ॥
अपरम्पर ( सदाशिव ) के पाँच गुण हैं । पहला गुण अकलंकत्व ( दोष-
शून्यता—रागद्वेषादि का अभाव ) है । दूसरा गुण अनुपमत्व ( सजातीयतारहित—
अद्वितीय सत्तामात्र ) है । तीसरा गुण अपारत्व असीमत्व ( अनन्तता ) है ।
चौथा गुण अमूर्तत्व ( परिच्छेदरहितता—अमापकत्व ) है—'न तस्य प्रतिमा
अस्ति' । ( श्वेताश्वतर ४ । १६ ) पाँचवां गुण अनुदयत्व ( प्रागभावशून्यता ) है,
क्योंकि वह उत्पत्ति से परे है, सर्वव्यापक, अकाल और सनातन—शाश्वत है ॥ १६ ॥
निष्कलत्वमणुतरत्वमचलत्वमसंख्यत्वमनाधारत्वमिति पञ्च-
गुणं परमपदम् ॥ २० ॥
८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
परमपद ( परमेश्वर ) निष्कल ( अवयवशून्य निराकार ), अणु-से-भी
अणु ( सूक्ष्म ), अचल ( व्यापक ), असंख्य ( अद्वय ) और निराधार ( आधार-
रहित, स्वाश्रित अथवा स्वाभिव्यक्त ) है । ये ही परमेश्वर परमपद के पाँचगुण
हैं ॥ २० ॥
लीनता, पूर्णतोन्मनी, लोलता, मूर्च्छतेति पञ्चगुणं
शून्यम् ॥ २१ ॥
शून्य ( रुद्र ) के पाँच गुण-धर्म हैं । पहला गुण लीनता ( अव्यक्तावस्था )
है -, कारण में कार्य का लय ही लीनता है । दूसग गुण पूर्णता ( सर्वव्यापकता,
अखण्डता ) है । तीसरागुण उन्मनी ( सहज स्वरूप में प्रतिष्ठा ) है, चौथागुण
लोलता ( संहार आदि कार्यसम्पादन में तरलता ) है और पाँचवां गुण मूर्च्छा
( महाप्रलय में एकरसात्मक भावापन्नता, विलीनता ) है ॥ २१ ॥
सत्यत्वं सहजत्वं समरसत्वं सावधानत्वं सर्वगतत्वमिति पञ्च-
गुणंनिरञ्जनम् ॥ २२ ॥
निरञ्जन ( रागद्वेषादि से रहित-द्वन्द्वातीत विष्णु ) पाँचगुणों से युक्त
है । पहला गुण सत्यत्व ( तीनों काल में अकाल रूप से उत्पत्ति-विनाश से परे
सच्चिदानन्दस्वरूपत्व ) है । दूसरा गुण सहजत्व ( स्वरूपस्थता ) है, तीसरा
गुण समरसता ( निर्विकारता ) है, चौथा गुण सावधानता ( प्रमादादिदोष-
रहितता ) है और पाँचवां गुण सर्वगतत्व ( सर्वव्यापकत्व ) है ॥ २२ ॥
अक्षयत्वमभेद्यत्वमच्छेद्यत्वमविनाशित्वमदाह्यत्वमिति पञ्च-
गुणाः परमात्मा । इत्यनादिपिण्डस्य पञ्चतत्वं पञ्चविंशति
गुणाः ॥ २३ ॥
परमात्मा (ब्रह्मा:सृष्टिकर्ता) के पाँच गुण हैं । पहला गुण अक्षयत्व
(संसाररूप उपाधि के क्षय होने पर भी स्वरूप की अक्षयता-सत्ता) है । दूसरा
गुण अभेद्यता (अनेक उपाधिगत भेद रहने पर भी स्वरूप में अभेद रहना) है,
तीसरा गुण अच्छेद्यता ( शाश्वत-सनातन सत्ता में अधिष्ठता ) है, चौथा गुण
अविनाशित्व (उत्पत्ति-विनाश के अभाव में स्वाभिव्यक्तता) है और पाँचवां गुण
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६
अदाह्यत्वं (आन्तरिक आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक त्रिविध ताप
अतीतता) है। यही अनादि पिण्ड पञ्चतत्वात्मक सदाशिवादि (अपरम्पदादि) के
पचीस गुण अथवा धर्म का निरूपण है ॥ २३ ॥
उक्तञ्च । अपरम्परं, परमपदं, शून्यं, निरञ्जनपर-
मात्मानौ, पञ्चभिरेतैः सगुणैरनाद्यपिण्डः समुत्पन्नः ॥ २४ ॥
महाप्रलय में समस्त जगत् महाशक्ति में लय को प्राप्त होकर विलीन रहता
है । चिद्रूपा महाशक्ति भी चिद्रूप परमेश्वर से अभिन्न रहती है । सृष्टि की रचना
के समय पाँच-पाँच गुणों से युक्त पाँच महाशक्तियों का प्राकट्य होता है, ( वे
(पाँच- पाँच देवों से) पृथक्-पृथक् (कार्य-भेद से) युक्त होती हैं । ) ये ही पाँच
देव--शक्तियों के अनुरूप अपरम्पर, परमपद, शून्य, निरञ्जन और परमात्मा
हैं—, इन सभी पाँच प्रधान महाशक्तियों के सहित चेतन का नाम ही अनाद्य पिण्ड
है । यही सच्चिदानन्दघनस्वरूप परमेश्वर ही उपर्युक्त गुण और नाम से पाँच
रूपों में स्वाकारित—अभिव्यक्त होता है । यह स्वरूपाभिव्यक्त समष्टिदेव ही
परमेश्वर शिव हैं, आदिनाथ हैं ॥ २४ ॥
महासाकार आद्यपिण्ड पुरुष की उत्पत्ति, उसके पाँच तत्व
और पचीस गुण
अनाद्यात् परमानन्दः परमानन्दात् प्रबोधः प्रबोधाच्चिदु-
दयश्चिदुदयाच्चित्प्रकाशः चित्प्रकाशात् सोऽहं भावः ॥ २५ ॥
( अनाद्यपिण्ड परमेश्वर से आद्यपिण्ड पुरुष की अभिव्यक्ति का वर्णन है । )
अनाद्य पिण्ड से परमानन्द, परमानन्द से प्रबोध, प्रबोधसेचिदुदय, चिदुदय से
चित्प्रकाश और चित्प्रकाश से अहं भाव उत्पन्न—रूपाभिव्यक्त हैं ॥ २५ ॥
विशेष--इस आद्य पुरुष परमेश्वर के भी पाँच-पाँच गुणों से विशिष्ट युक्त
पाँच देवों के निरूपण-क्रम में महातत्वगत पंचभूतबीजोत्पत्ति का प्रतिपादन है ।
स्पन्दो हर्ष उत्साहो निष्पन्दो नित्यसुखत्वमिति पंचगुणाः
परमानन्दः ॥ २६ ॥
परमानन्द के पाँच गुण हैं। पहला गुण स्पन्द ( चलन-शक्ति ) है, दूसरा
गुण हर्ष ( आनन्द ) है, तीसरा गुण उत्साह ( कृतिशक्ति ) है, चौथा गुण निष्पन्द
१० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
( परिणामशक्ति ) है और पाँचवां गुण नित्यसुखत्व ( स्वरूप में सुखानुभव की
शक्ति ) है ॥ २६ ॥
उदय उल्लासोऽवभासो विकासः प्रभा इति पंचगुणः
प्रबोधः ॥ २७ ॥
प्रबोध के पाँच गुण हैं। पहला गुण उदय ( उत्पत्ति ) है, दूसरा गुण
उल्लास ( चित्त की प्रफुल्लता ) है, तीसरा गुण अवभास ( ज्ञान ) है, चौथा गुण
विकास ( विकसित-अभिव्यक्त होना ) है और पाँचवां गुण प्रभा ( तेज अथवा
स्वरूप-प्रकाश ) है ॥ २७ ॥
सद्भावो विचारः कर्तृत्वं ज्ञातृत्वं स्वतन्त्रत्वमिति
पंचगुणाश्चिदुदयः ॥ २८ ॥
चिदुदय के पाँच गुण हैं। पहला गुण सद्भाव (सनातनता, नित्यता) है। दूसरा
गुण विचार ( नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक ) है। तीसरा गुण कर्तृत्व ( कर्तापन
का स्वभाव ) है। चौथा गुण ज्ञातृत्व ( जानने का स्वभाव ) है। पाँचवां गुण
स्वतन्त्रत्व ( अद्वय, अनुपम, स्वाश्रयी अथवा स्वाभिव्यक्त रहना ) है ॥ २८ ॥
निर्विकारत्वं निष्कलत्वं निर्विकल्पत्वं समता विश्रान्ति-
रिति पञ्चगुणाः चित्प्रकाशः ॥ २६ ॥
चित्प्रकाश ( देव ) के पाँच गुण हैं। पहला गुण निर्विकारत्व ( उत्पत्ति,
वृद्धि आदि विकारों का अभाव ) है। दूसरा गुण निष्कलत्व ( अवयव आदि
न होना ) है। तीसरा गुण निर्विकल्पत्व ( संशयरहितता ) है । चौथा गुण
समता ( सर्वत्र एकरूपता अथवा एकरस व्याप्त रहना ) है। पाँचवां गुण
विश्रान्ति ( निर्विषयता अथवा विषयों से उपरामता ) है ॥ २६ ॥
अहन्ताऽखण्डैश्वर्यं स्वात्मता विश्वानुभवसामर्थ्यं सर्वज्ञ-
त्वमिति पञ्चगुणाः सोऽहंभावः । इत्याद्यपिण्डस्य पञ्चतत्त्वं
पञ्चविंशति गुणाः । परमानन्दः प्रबोधश्चिदुदयश्चित्प्रकाशः
सोऽहंभाव इत्यन्त आद्यपिण्डो महातत्त्वयुक्तः समुत्थितः ॥ ३० ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११
सोऽहं भाव के पाँच गुण हैं। पहला गुण अहंता है—मैं ही सर्वत्र व्यापक
हूँ। दूसरा गुण अखण्ड ऐश्वर्य है। तीसरा गुण स्वात्मता (सर्वत्र आत्मबुद्धि—
सब में अपने आपको व्याप्त देखना) है। चौथा गुण विश्वानुभवसामर्थ्य—स्थूल
और सूक्ष्म समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष करने की शक्ति है और पाँचवां गुण सर्वज्ञत्व
अतीत और अनागत विषयक ज्ञान की शक्ति है। इस तरह आद्यपिण्ड के
परमानन्दादि पाँच देवता ही पाँच अंग हैं तथा प्रत्येक के अंग में पाँच-पाँच गुण
ही पचीस गुण हैं। इन्हीं परमानन्द आदि पाँच देवों का समवाय महत्तत्व रूप
आद्यपिण्ड है। यही आद्यपिण्ड पुरुष हिरण्यगर्भ के नाम से प्रसिद्ध है ॥ ३० ॥
आद्यान्महाकाशो महाकाशान्महावायुर्महावायोर्महातेजो
महातेजसो महासलिलं महासलिलान्महापृथ्वी ॥ ३१ ॥
पाँच भूतों का कारण आद्यपिण्ड सूत्रात्मा है। उससे महाकाश उत्पन्न है;
महाकाश से महावायु उत्पन्न है, महावायु से महातेज उत्पन्न है, महातेज से
महासलिल उत्पन्न है, महासलिल से महापृथ्वी उत्पन्न है ॥ ३१ ॥
अवकाशोऽच्छिद्रमस्पृशत्वं नीलवर्णत्वं शब्दत्वमिति पञ्च-
गुण अवकाशः ॥ ३२ ॥
आकाश के पाँच गुण हैं। पहला गुण अवकाश है, पोल होने से यह समस्त
पदार्थों का आश्रय है। दूसरा गुण अच्छिद्रत्व—छेद न होना है। आकाश में छिद्र
नहीं है। तीसरा गुण अस्पृशत्व है, इसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है, यह
असंग है। चौथा गुण नीलवर्णत्व है, यह आकाश नीले वर्ण (रंग) का है।
पाँचवां गुण शब्दत्व है, यह आकाश शब्द (ध्वनि) से परिपूर्ण है ॥ ३२ ॥
सञ्चारः सञ्चालनं स्पर्शनं शोषणं धूम्रवर्णत्वमिति पञ्च-
गुणो महावायुः ॥ ३३ ॥
महावायु के पाँच गुण हैं। पहला गुण सञ्चार है, वायु चलने की क्रिया
युक्त रहती है। दूसरा गुण सञ्चालन है। स्वयं चलती रहने से यह अन्य पदार्थों
को भी चलाती रहती है। तीसरा गुण स्पर्श है। यह समस्त पदार्थों का स्पर्श
करती रहती है। चौथा गुण शोषण है, यह जलादि से युक्त पदार्थों को सुखाती
है। पाँचवां गुण धूम्रवर्णत्व है, वायु धूम के रंग की होती है ॥ ३३ ॥
१२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
दाहकत्वं पाचकत्वमुष्णत्वं प्रकाशत्वं रक्तवर्णत्वमिति
पञ्चगुणं महातेजः ॥ ३४ ॥
महातेज के पाँच गुण हैं। पहला गुण दाहकत्व है, यह पृथ्वी और जल में
दाहकत्व पहुँचा कर उन्हें जलाता है। इसका दूसरा गुण पाचकत्व है, यह जठरादि
में भोजन आदि सामग्री को पचाता है। तीसरा गुण उष्णत्व है। यह पदार्थों में
उष्णता पैदा करता है। चौथा गुण प्रकाश है। यह सभी पदार्थों को प्रकाशित
प्रत्यक्ष करता है। पाँचवां गुण रक्तवर्णत्व है। यह लाल रंग का होता है ॥ ३४ ॥
महाप्रवाह श्राप्यायनं द्रवो रसः श्वेतवर्णत्वमिति पञ्चगुणं
सलिलम् ॥ ३५ ॥
सलिल ( जल ) के पाँच गुण होते हैं। पहला गुण प्रवाह है, यह बहता
रहता है। दूसरा गुण आप्यायन है, यह उमड़ता रहता है। तीसरा गुण द्रव है,
यह द्रवित ( पिघलता ) रहता है। चौथा गुण रस है, यह स्वाभाविक मधुर और
आस्वाद्य होता है। इसका पाँचवां गुण श्वेतवर्णत्व है, यह श्वेत रंग का होता
है, निर्मल रहना इसका स्वभाव है ॥ ३५ ॥
स्थूलता नानाकारता काठिन्यं गन्धः पीतवर्णत्वमिति
पञ्चगुणामहापृथ्वी । इति महासाकारपिण्डस्य पञ्चतत्त्वं पञ्च-
विंशति गणाः ॥ ३६ ॥
महापृथ्वी के पाँच गुण हैं। पहला गुण स्थूलता है, यह स्थूल है। दूसरा
गुण नानाकरता है, पर्वत, तरु, लता, सम, विषम रूप धारण करना इसका स्वभाव
है। तीसरा गुण काठिन्य है, यह कड़ी होती है। चौथा गुण गन्ध है। पाँचवां
गुण पीतवर्णत्व है, इसका रंग पीला होता है। चित्-अचित् विशिष्ट महासाकार
पिण्ड, पञ्चभूतात्मक समष्टिरूप पिण्ड के आकाशादि पाँच रूप अथवा अंग हैं।
एक-एक अंग के पाँच-पाँच गुण हैं। इस तरह महासाकार पिण्ड के पाँच तत्त्वात्मक
पचीस गुण हैं। यह महासाकार पिण्ड पञ्चतत्त्वात्मक और पचीस गुणों से विशिष्ट
( शिवात्मक ) है ॥ ३६ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३
महासाकार पिण्ड की आठ मूर्ति
स एव शिवः शिवाद् भैरवो भैरवात् श्रीकण्ठः श्रीकण्ठात्
सदाशिवः सदाशिवादीश्वर ईश्वराद्रुद्रो रुद्राद्विष्णु विष्णो-
र्ब्रह्मेति महासाकारपिण्डस्य मूर्त्यष्टकम् ॥ ३७ ॥
महासाकार पिण्ड पञ्चानन शिव की आठ मूर्ति—आकृति ( रूप ) है ।
वह शिव है । शिव से भैरव, भैरव से श्रीकण्ठ, श्रीकण्ठ से सदाशिव, सदाशिव से
ईश्वर, ईश्वर से रुद्र, रुद्र से विष्णु और विष्णु से ब्रह्मा अभिव्यक्त हैं ।) इन्हीं
आठों के द्वारा सृजन, नियमन ( रक्षण ) और संहार के कार्य सम्पादित होते हैं ।
ये ही संसारग्रस्त जीवों को बन्धनमुक्त कर भवसागर से तार देते हैं, अतएव सभी
मुमुक्षुओं के लिये अभीष्ट पूर्तिहेतु ये ही उपास्य अथवा पूज्य हैं ।) इस तरह
एक महासाकार पिण्ड शिव से आठ रूपों की अभिव्यक्ति है ॥ ३७ ॥
नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की उत्पत्ति और पंचभूतों के
पचीस गुण
तद् ब्रह्मणः सकाशादवलोकनेन नरनारीरूपप्रकृतिपिण्डः
समुत्पन्नस्तच्च पञ्चपञ्चात्मकं शरीरम् ॥ ३८ ॥
( नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की सृष्टि का वर्णन किया जाता है । ( सबसे
पहले ब्रह्मा के अवलोकन—ईक्षणरूप संकल्प से स्त्रीसम्पुटित पुरुषप्रकृतिपिण्ड
( शतरूपासहित मनुप्रजापति ) की समुत्पत्ति होती है । ( इसके उपरान्त
जरायुजादि भौतिक ( पञ्चभूतात्मक ) शरीरों की उत्पत्ति है ।) यही प्रकृतिपिण्ड
भूमि आदि पंचभूतों के पांच गुणों से युक्त होने से पाञ्चभौतिक शरीर कहा
जाता है ॥ ३८ ॥
अस्थिमांसत्वङ् नाड़ीरोमाणीति पञ्चगुणा भूमिः ॥ ३६ ॥
( इस पाञ्चभौतिक शरीर में पृथ्वी का अंश अधिक है, इसलिये यह शरीर
पार्थिव कहा जाता है ।) इस भौतिक शरीर में पृथ्वीतत्व के पांच गुण हैं, इसका
पहला गुण अस्थि है, दूसरा गुण मांस है, तीसरा गुण त्वचा है, चौथा गुण नाड़ी है
१४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
और पाँचवां गुण रोम ( बाल ) है। शरीर के रचनाक्रम में पृथ्वीतत्व के गुण के
रूप में अस्थि, मांस, त्वचा, नाड़ी और रोम ही मुख्य हेतु हैं ॥ ३६ ॥
लाला मूत्रं शुक्रं शोणितं स्वेद इतिपञ्चगुणा
आपः ॥ ४० ॥
भौतिक शरीर में स्थित जल तत्व के पाँच गुण लार, मूत्र, शुक्र, ( वीर्य )
शोणित ( रक्त ) और स्वेद पसीना हैं । जलीय द्रव्य के रूप में भौतिक शरीर की
संरचना में ये पाँचों अंश मुख्य हेतु हैं ॥ ४० ॥
क्षुधा तृषा निद्रा कान्तिरालस्यमिति पञ्चगुणं
तेजः ॥ ४१ ॥
भौतिक शरोर में तेज ( पावक—अग्नि ) तत्व के पाँच गुण क्षुधा, तृषा
( प्यास ) निद्रा, कान्ति और आलस्य हैं। तेज तत्व के रूप में भौतिक शरीर
की संरचना में ये पाँचों अंश मुख्य हेतु हैं ॥ ४१ ।
विशेष—निद्रा को अग्नि तत्व का गुण इसलिये कहा गया है कि पेट
भर भोजन करने के बाद पेट में गर्मी की अधिकता से पित्त नाड़ियों में व्याप्त
होता है, मन का नाड़ियों में सञ्चार ( भ्रमण ) बन्द हो जाने से निद्रा आती
है। इसी तरह नाड़ियों में पित्त के व्याप्त हो जाने पर आलस्य आता है।
धावनं भ्रमणं प्रसारणमाकुञ्चनं निरोधनमिति पञ्च-
गुणो वायुः ॥ ४२ ॥
भौतिक शरीर में वायु की स्थिति ही उसकी सजीवता अथवा प्राणमयता
है। शरीर में स्थित वायु के पाँच गुण धावन (वेगपूर्वक संचरण), भ्रमण ( प्रत्येक
नाड़ी में प्रवहन ), प्रसारण ( फैलना ), आकुञ्चन ( समेटना—स्वाभिमुख-
संयोगानुकूल व्यापार और निरोध ( नियतदेशसंयोगानुकूल व्यापार ) हैं।
शरीरस्थ वायु के ये पाँच गुण शरीर के जीवित रहने में मुख्य हेतु हैं ॥ ४२ ॥
रागो द्वेषो भयं लज्जा मोह इति पञ्चगुण आकाशः
इति पञ्चविंशति गुणानां भूतानां पिण्डः ॥ ४३ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५
भौतिक शरीर में व्याप्त आकाश तत्व के पाँच गुण राग, द्वेष, भय, लज्जा
और मोह शरीरगत व्यवहार में मुख्य हेतु हैं। इन्हीं के आश्रय में शरीर में द्वन्द्व
भावों की उत्पत्ति होती है। यद्यपि ये रागद्वेषादि अन्तःकरण के धर्म हैं तथापि
इनके निवास-स्थान हृदयाकाश का भूताकाश से भेद नहीं है।) इस तरह प्रत्येक
भूत के पाँच-पाँच गुण अथवा धर्म से (पचीस गुणों से) पिण्ड--शरीर उत्पन्न
होता है॥ ४३॥
अन्तःकरणपंचक
मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं चैतन्यमित्यन्तःकरण-
पञ्चकम् ॥ ४४ ॥
(स्थूल पिण्ड-शरीर के संचालक सूक्ष्मशरीरादिपर्यन्त लिङ्गात्मा का
वर्णन किया जाता है।) यद्यपि अवयवी अन्तःकरण है तथापि उसके अवयव के
रूप में मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और चैतन्य के रूप में अन्तःकरण की पाँच
वृत्तियाँ हैं। यही अन्तःकरणपञ्चक कहा गया है॥ ४४॥
संकल्पो, विकल्पो, मूर्च्छा, जड़ता, मननमिति पञ्चगुणं
मनः ॥ ४५ ॥
मन के पाँच गुण अथवा धर्म हैं। पहला गुण संकल्प है। यह पदार्थ मुझे
मिल जाय अथवा मेरे द्वारा यह कार्य सम्पन्न हो जाय, इस आशा को संकल्प कहा
जाता है। संशयात्मक विचार—यह पदार्थ ऐसा है या नहीं है, इसको विकल्प
कहा जाता है। मन की यह दूसरी अवस्था है। मन का तीसरा गुण मूर्च्छा है,
मन की मुग्धता, विमूढ़ता अथवा अचेत वृत्ति को मूर्च्छा कहा जाता है। मन का
चौथा गुण जड़ता है। विवेक का अभाव ही जड़ता है। मन का पाँचवां गुण
मनन है। मनन का आशय है तर्कसंगत विचार ॥ ४५ ॥
विवेको, वैराग्यं, शान्तिः, सन्तोषः, क्षमेति पंचगुणा
बुद्धिः ॥ ४६ ॥
बुद्धि के पाँच गुण हैं। पहला गुण विवेक है। वस्तु के स्वरूप का यथार्थ
निश्चय ही विवेक है। (विवेक हो जाने पर वैराग्य का उदय होता है।)
१६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सद्वस्तु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर लोक-परलोक के विषयभोग और पुण्यफलभोग
में मन की आसक्ति का समाप्त हो जाना ही वैराग्य है। यह बुद्धि का दूसरा गुण
है। बुद्धि का तीसरा गुण शान्ति है । ( विवेक और वैराग्य हो जाने पर मन में
शान्ति-वृत्ति का उदय होता है । ) चित्त में चञ्चलता अथवा विषयभोग की
कामना में उपरामता की वृत्ति ही शान्ति है। मन शान्त हो जाता है। बुद्धि
का चौथा गुण संतोष है । जब विवेक, वैराग्य और भोग में अनासक्ति का बुद्धि में
उदय होता है, तब मन सहज संतुष्ट होकर आत्मस्वरूप में ही तृप्त रहने का
स्वभाव ग्रहण करता है ।। बुद्धि की यही वृत्ति संतोष है । पांचवां गुण क्षमा है ।
विवेक, वैराग्य, शान्ति और संतोष से मन राग-द्वेष से प्रभावित नहीं होता है ।
वह सहनशील होकर दूसरे जीव में दोष-दर्शन नहीं करता और दोष बन जाने पर
भी उसे दण्डित करने की भावना का त्याग कर देता है । यह आत्मोदय की वृत्ति
है। यह आत्मोदय की वृत्ति ही स्थितप्रज्ञता की भूमिका है ।
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
( गीता २ । ५५-५७ )
जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को अच्छी तरह
त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह
स्थितप्रज्ञ कहा जाता है । दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं
होता, सुखों की प्राप्ति में जो निःस्पृह है तथा जिसमें राग, भय, क्रोध नहीं रह
जाते, वह स्थिरबुद्धि है। जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित होकर शुभाशुभ की
प्राप्ति में प्रसन्न और द्वेषयुक्त नहीं होता, उसी की बुद्धि स्थिर है ।
अभिमानं, मदीयं, मम सुखं, मम दुःखं, ममेदमिति
पञ्चगुणोऽहंकारः ॥ ४७ ॥
अहंकार की पाँच वृत्तियाँ हैं। पहली अवस्था अभिमान है। मैं ही इस
तरह का कार्य करने में समर्थ हूँ, ऐसा विचार ही अभिमान है। दूसरी अवस्था
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७
मदीय ( यह वस्तु मेरी ) है, शरीर, इन्द्रियादि मेरे हैं । तीसरी वृत्ति मम सुख—
इस सुख से मेरा ही एकमात्र सम्बन्ध है--इस भावना की प्रतिपादिका है ।
चौथी वृत्ति मम दुख— मैं इससे दुःखी हूँ, इस दुःखपरक अवस्था से सम्बन्ध
स्थापित करती है । पाँचवीं वृत्ति ममेदम् — यह पदार्थ मेरा है, ये मेरे सम्बन्धी
हैं, आदि की परिचायिका है ॥ ४७ ॥
मतिर्धृतिस्मृतिस्त्यागः स्वीकार इति पञ्चगुणं
चित्तम् ॥ ४८ ॥
चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं । पहली वृत्ति मति है, मति का आशय है
इच्छा । दूसरी वृत्ति धैर्य—उत्साह है । तीसरी वृत्ति स्मृति है, संस्कार-मात्र
से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को स्मृति कहा गया है । चौथी वृत्ति त्याग है ।
उत्तम पात्र को अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु का उसकी सुखेच्छा की तृप्ति के लिये
दान कर देना ही त्याग है । पाँचवीं वृत्ति स्वीकार है, इसका आशय है दाना-
नुकूल और ग्रहणानुकूल के व्यापार-अनुक्रम से किसी पदार्थ या भाव को स्वीकार
करना ॥ ४८ ॥
विमर्शः शोलनं धैर्यं चिन्तनं निःस्पृहत्वमिति पञ्चगुणं
चैतन्यमेवमन्तःकरणगुणाः ॥ ४६ ॥
चैतन्य के पाँच गुण अथवा धर्म हैं। पहला गुण विमर्श है । प्रमाण के
माध्यम से वस्तु का विचार ही विमर्श है । शीलन दूसरा धर्म है, इसका
आशय है तत्परतापूर्वक बार-बार पदार्थ अथवा भाव के गुण-
दोष की यथार्थज्ञानप्राप्ति में लगे रहना । तीसरा धर्म धैर्य है । बड़ी-से-बड़ी
विपत्ति के आ जाने पर भी कार्य से विमुख न होना तथा शरीर-मन और
इन्द्रियों को निरन्तर उत्साहित करते रहना ही धैर्य है । चौथा गुण चिन्तन है ।
इसका आशय है बार-बार अपने द्वारा सम्पादित होने वाले कार्य के प्रति सावधान
रहना । पाँचवां गुण निःस्पृहत्व हैं । संसार के विषय-भोगों में मन को आसक्त न
होने देना तथा उसको विवेक-वैराग्यपूर्वक आत्माभिमुख रखना ही निःस्पृहता
है । ये ही अन्तःकरण के पचीस गुण हैं । इस तरह सूक्ष्म-शरीर का वर्णन
किया गया ॥ ४६ ॥
१८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
कुलपंचक
सत्त्वं रजस्तमः कालो जीव, इति कुलपञ्चकम् ॥ ५० ॥
सत्व, रज और तम ( तीनों गुण ) काल और जीव ( इन पाँचों ) की
भाव, मन और बुद्धि और इन्द्रिय आदि के संचालन में प्रधानता रहती है । इस
कारण ये पाँच कुल अर्थात् प्रधान कहे गये हैं ( योगतन्त्र में इन्हें कुलपंचक
कहा गया है । ) ॥ ५० ॥
दया, धर्मः, क्रियाभक्तिः श्रद्धेति पञ्चगुणं सत्त्वम् ॥ ५१ ॥
सत्व गुण के पाँच कार्यरूप गुणों का वर्णन किया जाता है । पहला गुण
दया—प्राणियों पर अनुग्रह करना है । दूसरा गुण धर्म है, जिससे सुख की प्राप्ति
और श्रेय का अभ्युदय हो, वह धर्म है । तीसरा गुण क्रिया है, पूजा आदि
सत्कर्म और पुण्याचरण तथा भगवत्प्रीत्यर्थ व्रतोपवास-अनुष्ठान आदि क्रिया है ।
चौथा गुण भक्ति है । परमेश्वर में भक्ति—प्रीति ही भक्ति है । भक्ति से परमेश्वर
की शरणागति प्राप्त होती है । इससे योगी को समाधिसिद्धि होती है । महर्षि
पतञ्जलि का अभिमत है :
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥
( योगदर्शन २ । ४५ )
पाँचवां गुण श्रद्धा है । श्रद्धा से इस लोक के अतिरिक्त परलोक के अस्तित्व
तथा स्वरूपावस्थानपरक आत्मज्ञान ( परमात्मा के प्रति विश्वास ) में निष्ठा
होती है ।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥
( गीता १४ । ५–६ )
सत्वगुण निर्मलता के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित होता
है । यह जीवात्मा को सुख और ज्ञान के सम्बन्ध से प्रभावित करता है । गीता
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६
(१४।६) में कहा गया है--'सत्वं सुखे संजयति ।' (सत्व सुख में लगाता है ।)
इन्द्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है । 'सत्वात् संजायते ज्ञानम्'
( गीता १४।१७ ) – सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ५१ ॥
दानं भोगः शृङ्गारो वस्तुग्रहणं स्वार्थसंग्रहणमिति
पञ्चगुणं रजः ॥ ५२ ॥
रजोगुण से दान, भोग, शृङ्गार, वस्तुग्रहण और संग्रह में प्रवृत्ति होतो है ।
यह जीव को कर्म से वन्धनयुक्त करता है । रजोगुण रागरूप है । यह कामना
और आसक्ति ( तृष्णा ) से उत्पन्न होता है । जीवात्मा इसके द्वारा कर्मफल की
प्राप्ति की स्पृहा करता है । रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से
कर्मों का सकाम भाव से आरम्भ, अशान्ति, विषयभोग की लालसा—ये सब उत्पन्न
होते हैं । राजस कर्म का फल दुःख है । 'रजसस्तु फलं दुःखम् ।' (गीता १४।१६)
रजोगुण से लोभ बढ़ता है । रजोगुण का पहला गुण दान है, भविष्य में
अथवा जन्मान्तर में फल-प्राप्ति की कामना से देश-काल के अनुसार सत्पात्र
का विचार कर यथाशक्ति धन अथवा पदार्थ प्रदान करना दान है । दूसरा गुण
भोग है । सुन्दर रूप, रस, गन्ध शब्द, स्पर्शादि की कामना में प्रवृत्त होना भोग है ।
तीसरा गुण शृङ्गार है, मोक्ष-प्राप्ति के लिये नहीं, विषयभोग की इच्छा की पूर्ति
के लिये शरीरादि को समलंकृत करना शृङ्गार है । चौथा गुण वस्तुग्रहण है ।
अपने भोग-सुख के लिये वस्तु के ग्रहण और संचय में आसक्त रहना वस्तुग्रहण
है । पाँचवां गुण स्वार्थ-संग्रहण है । दूसरे की हानि होगी, दुःख होगा—इन
बातों का विचार किये बिना अपने स्वार्थ की तृप्ति के लिये वस्तु और विषय-
भोग में सहायक उपकरणों के संग्रह में अभिरुचिपूर्वक उन्हें सुरक्षित रखना ही
स्वार्थ-संग्रहण है ॥ ५२ ॥
विवादः कलहः शोको वधो वञ्चनमिति पञ्चगुणं
तमः । ५३ ॥
तमोगुण की पाँच वृत्तियाँ हैं । तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है ।
देहाभिमानियों को मोहग्रस्त कर प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बन्धनमुक्त
करता है । तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश (अन्धकार)
कर्तव्य में अप्रवृत्ति, मोहिनी प्रमादमयी वृत्तियों का जन्म होता है । तमोगुण से
प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं ।
२० ] [ सिद्धसिद्धान्तप
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ।
( गीता ५ । १७ )
तम का पहला गुण विवाद है । इससे व्यर्थ प्रलाप में समय निष्प्रयोजन
बीत जाता है । तम का दूसरा गुण कलह है । तमोगुणी व्यक्ति अविवेकी होने
से दूसरों से कलह करने में सुख मानता है । तम का तीसरा गुण शोक है । तम
का चौथा गुण वध है । तमोगुणी व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये दूसरे प्राणी
को मार डालने में संकोच नहीं करता है । तम का पाँचवां गुण वञ्चन है ।
तमोगुणी व्यक्ति दूसरों को ठगने में प्रवृत्त रहता है ॥ ५३ ॥
कलना, कल्पना, भ्रान्तिः प्रमादः अनर्थ इति पञ्चगुणाः
कालः ॥ ५४ ॥
काल की पाँच अवस्थायें अथवा गुण हैं । पहली अवस्था कलना-एक, दो,
तीन आदि की संख्या गिनना, आयु आदि की गणना करना है । दूसरी अवस्था
कल्पना-अनेक वस्तु-रचना की सामर्थ्य है-वसन्त है, हेमन्त है-इत्यादि ।
तीसरी अवस्था भ्रान्ति है । बुढ़ापा, यौवन, वचपन आदि में परिवर्तन-निमित्तता
भ्रान्ति है । चौथी अवस्था प्रमाद है । असावधानी में उत्पन्न कार्य में प्रवृत्ति—
व्यर्थ आलस्य आदि में समय बिताना प्रमाद है । पाँचवीं अवस्था अनर्थ है ।
अनिष्ट कार्य में लगना अनर्थ का द्योतक है ॥ ५४ ॥
जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तिस्तुरीयातुर्यातीतमिति पञ्चगुणो
जीवः ॥ ५५ ॥
जीव की पाँच अवस्थायें हैं । पहली जाग्रत् अवस्था है । स्थूल-शरीर में
इन्द्रियों द्वारा कर्म होते रहने का भान अथवा ज्ञान जाग्रत् अवस्था है । दूसरी
स्वप्न-अवस्था है । बाह्य इन्द्रियों के कार्यकलाप शान्त होने पर मन में
( अचेतावस्था में ) अनेक वस्तु आदि का व्यवहार होते रहना स्वप्नावस्था है ।
तीसरी सुषुप्ति-अवस्था है । इसमें बाह्य इन्द्रियों और मन के व्यापार-कार्य के
निरोध से निद्रा की स्थिति ही सुषुप्ति है । चौथी तुर्यावस्था है । इसमें
आत्मस्वरूपविषयक एकाग्रचित्तता बनी रहती है । आत्मस्वरूपविषयक मनोवृत्ति
और द्वैतप्रपंच की अप्रतीति ही तुर्यावस्था का लक्षण है । पाँचवीं तुर्यातीत अवस्था
में निर्विकल्प समाधि में जीव प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ५५ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २१
व्यक्तिपंचक और उसके पचीस गुण
इच्छा, क्रिया, माया, प्रकृतिर्वागिति व्यक्तिपञ्चकम् ॥५६॥
सूक्ष्म-शरीर में जिन-जिन गुणों से व्यवहार का सम्पादन होता है, वे इच्छा
क्रिया, माया, प्रकृति और वाक्-पाँच गुण हैं । जीव के उपभोगसाधन में ये
व्यवहार में तत्पर रहते हैं, इन्हें व्यक्तिपंचक कहा जाता है ॥ ५६ ॥
उन्मादो, वासना, वाञ्छा, चिन्ता चेष्टेति पञ्च-
गुणेच्छा ॥ ५७ ॥
इच्छा के कार्यभूत पाँच व्यापार-गुण हैं । पहला उन्माद है, इच्छा भंग
होने पर उन्माद होता है । स्वकर्त्तव्य-निर्वाह में पहले किये गये कर्मों के संस्कार के
अनुरूप शरीर, इन्द्रिय मन आदि को प्रवृत्त करना वासना है धन आदि पदार्थों
की प्राप्ति की कामना वाञ्छा है । वासना और वाञ्छा यथाक्रम दूसरे और
तीसरे गुण हैं। चौथा गुण चिन्ता है । इष्ट विषय के अन्वेषण की इच्छा
चिन्ता है । पाँचवां गुण चेष्टा है, शरीर का व्यापार ही चेष्टा है, कार्य की पूर्ति
में शरीर का प्रयासरत होना ही चेष्टा है ॥ ५७ ॥
स्मरणं उद्योगः कार्यं निश्चयः स्वकुलाचार इति पञ्चगुणा
क्रिया ॥ ५८ ॥
क्रिया के पाँच गुण अथवा अवस्थायें हैं । संसार के व्यवहार में स्मृति-ज्ञान
के उत्पादक व्यापार को स्मरण कहा जाता है । साधनजनक व्यापार को उद्योग
कहा जाता है । घट-पटादि उत्पन्न करने वाला व्यापार ( मन की वृत्ति को
क्रियात्मक रूप देना ) ही कार्य है । निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने वाली
इन्द्रियादि तथा मन की क्रिया ही निश्चय है और अपनी कुलपरम्परागत मर्यादा
के पालन में मन की प्रवृत्ति ही स्वकुलाचार है । ये ही पाँचों क्रिया के गुण
हैं ॥ ५८ ॥
मदो, मात्सर्यं, दम्भः कृत्रिमत्त्वमसत्यमिति पञ्चगुणा
माया ॥ ५६ ॥
२२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
माया के पाँच रूप हैं। पहला मद है। मद से युक्त प्राणी कहता है कि
मैं ही बलवान हूँ, धनी हूँ, मेरे समान कोई दूसरा नहीं है। अपने सत्स्वरूप को
इस तरह अज्ञान से आच्छादित करना मद है। दूसरा रूप मात्सर्य है, दूसरों की
उन्नति देख कर उनके प्रति मन में द्वेष-भाव रख कर उनकी उन्नति से जलते
रहना और उन्हें गिराने की चेष्टा में लगे रहना मत्सर है। सत् को छिपाकर
असत् अथवा मिथ्या भाव दिखाकर दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाने का भाव
दम्भ है। यह माया का तीसरा गुण है। चौथा रूप कृत्रिमता—बनावट है और
पाँचवां गुण माया का है असद् व्यवहार और मिथ्या भाषण, वचन आदि के
द्वारा दूसरे को विमुग्ध कर असत्य-से अपना काम बनाना; असत्य ही मिथ्या
आचरण है ॥ ५६ ॥
आशा तृष्णा स्पृहा काङ्क्षामित्येति पञ्चगुणा
प्रकृतिः ॥ ६० ॥
(अन्तःकरण के स्वभाव को प्रकृति कहा जाता है।) प्रकृति के पाँच गुण
हैं। पहला गुण आशा है। आगे प्राप्त होने वाली वस्तु के विषय में प्राप्ति की
भावना आशा है। दूसरा गुण तृष्णा है। अपने पास भोग के समस्त साधन रहते
हुए भी अधिक-से-अधिक साधनपदार्थ की प्राप्ति की कामना में प्रवृत्त रहना
तृष्णा है। यह कभी जीर्ण नहीं होती। 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः' वचन
पर भर्तृहरि ने वैराग्यशतक में पक्की छाप (मुहर) लगा दी है। तीसरा
गुण स्पृहा है, अमुक वस्तु की प्राप्ति हो जाय, इस तरह की मनोवृत्ति स्पृहा है।
चौथा गुण काङ्क्षा है, यह वस्तु सदा बनी रहे, कोई छीन न ले, ऐसी वृत्ति
काङ्क्षा है। पाँचवां गुण मिथ्या है, न मिलने वाली वस्तु की प्राप्ति की
इच्छा करना मिथ्या है ॥ ६० ॥
परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, मातृकेति पञ्चगुणा वाक्
इति व्यक्तिपञ्चकः पञ्चविंशति गुणा ॥ ६१ ॥
अन्तः करण के व्यापारसञ्चालन में वाक्—वाणी का बड़ा महत्व है।
वाक् के पाँच रूप हैं। पहला रूप परा है। यह वाणी मूलाधार-चक्र में रहती है
और निर्विकल्प समाधि के द्वारा जानी जातीं है। इस वाणी में मन की गति
नहीं है। वाक् का दूसरा रूप पश्यन्ती है। जब परावाक्—परावाणी नाभि-देश में
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २३
आकर स्थूल रूप धारण करती है, तब यह पश्यन्ती वाणी हो जाती है। इसके
साथ मनका सम्बन्ध भी रहता है। योगी सविकल्प समाधि में इसे जानते हैं।
वाक् का तीसरा रूप मध्यमा है। पश्यन्ती वाणी ऊपर गति करती हुई जब हृदय
में प्रवेश करती है और अकारादि वर्ण-समुदाय पदरूप धारण करती है, तब इसी
का नाम मध्यमा हो जाता है। यही वाणी जब मस्तक से लौट कर कण्ठ और तालु
आदि स्थानों में टकराती है, तब उससे प्रकट होने वाले शब्द की वाणी वैखरी
कहलाती है। यह वाक् का चौथा रूप है। वाक् का पाँचवां रूप मातृका है।
अकारादि वर्णों में शिवरूप मकारके अनुस्वार होने से 'अ आ इ ई' इत्यादि
बीज-मन्त्ररूप वर्णमाला ही मातृका वाक् है। इस तरह व्यक्तिपञ्चक के पचीस
गुणों—प्रकार आदि का वर्णन किया गया ॥ ६१ ॥
प्रत्यक्षकरणपंचक
कर्म कामश्चन्द्रः सूर्योऽग्निरिति प्रत्यक्षकरणपञ्च-
कम् ॥६२ ॥
कर्म, काम, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि सुख-दुःख भोगने वाले शरीर की प्राप्ति
के पाँच प्रधान कारण हैं। शुभ-अशुभ कर्म की अनुकूल वासना के द्वारा शरीर
प्राप्त होता है। बिन्दुरूप शरीर का निमित्तकारण, कर्म और वासना है। यह
संसार में अग्नि और चन्द्रमा के मेल से ही स्थित रहता है। सोमरस भोग्य है
और अग्नि शोषक और भोक्ता है। एक के न रहने पर केवल मात्र दूसरे की
प्रबलता या अधिकता से संसार और शरीर की स्थिति नहीं रह सकती, इसलिये
दोनों का सामरस्य ही शरीर-प्राप्ति और उसकी स्थिति की दृष्टि से आवश्यक
है। सोम से कुछ अग्नि-अंश अधिक रहने से अग्नि की विशिष्टता स्वीकृत
है। यद्यपि सूर्य और अग्नि अन्यत्र एक ही तत्व के रूप में वर्णित हैं, पर
सूर्य बारह कलात्मक, अग्नि दस कलात्मक है और सोम अथवा चन्द्रमा को
सोलह कलात्मक परिलक्षित किया गया है। यह शरीर माता के रज और
पिता के वीर्य से उत्पन्न होता है। रज सोमात्मक है, चन्द्रमारूप है और वीर्य
सूर्य और अग्नि-तत्व रूप है। इस शरीर का उपादान कारण सूर्य, अग्नि और
चन्द्रमा है तथा कर्म और काम निमित्त कारण हैं। कला का अर्थ है चित् से
मिली हुई सत्त्वरूप शक्ति। यही प्रत्यक्षकरणपंचक है ॥ ६२ ॥
२४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
शुभमशुभं यशोऽपिकीर्तिरदृष्टफलसाधनमिति पञ्चगुणं
कर्म ॥ ६३ ॥
शरीर की उत्पत्ति के निमित्तकारणरूप कर्म पाँच प्रकार के होते हैं।
पहला शुभ कर्म है। यज्ञादि कर्म तथा स्वर्गादि प्राप्त कराने वाले सत्कर्म ही शुभ
कर्म हैं। अशुभ कर्म वे हैं, जो निन्दित और असत्य तथा पापप्रेरित हैं। इनसे नरक
आदि की प्राप्ति होती है। पुण्यादि कर्म से यश बढ़ता है और अकर्म अपकीर्ति
प्रदान करने वाले कर्म हैं। जिन कर्मों के फल चर्मचक्षु--इन्द्रियजन्य ज्ञान के
अप्रत्यक्ष हैं, वे अदृष्टफलसाधन कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥
रतिः, प्रीतिः, क्रीड़ा, कामनाऽऽतुरतेति पञ्चगुणाः
कामः ॥ ६४ ॥
विषय-भोग-सेवन-जन्य कर्म ही काम कहा जाता है। काम पाँच प्रकार का
होता है। काम का पहला रूप रति है, स्त्री के प्रति रमणीयता की वृत्ति ही
रति है। सुख-साधनों में अनुरक्ति ही प्रीति है। इन्द्रियों और मन को आनन्दित
करने वाली रमणीय वस्तुओं को साधन बनाकर सुख-सम्पादन की क्रिया ही
क्रीड़ा है, इस सम्बन्ध में नौका-विहार, कन्दुक उछालना आदि खेलों को दृष्टान्त
रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। काम-सुख की प्राप्ति में निरन्तर स्पृहा रखना
ही कामना है तथा भोग-सुख अथवा रमणीयता का आस्वादन शीघ्रातिशीघ्र
हो, इस तरह की मनोवृत्ति ही आतुरता है ॥ ६४ ॥
उल्लोला, कल्लोलिनी,, उच्चलन्ती, उन्मादिनी, तरङ्गिणी
शोषिणी, लम्पटा, प्रवृत्तिः, लहरी, लोला, लेलिहाना, प्रसरन्ती,
प्रवाहा, सौम्या, प्रसन्नता, प्लवन्ती एवं चन्द्रस्य षोडशकला
सप्तदशीकला निवृत्ति, साऽमृतकला ॥ ६५ ॥
चन्द्रमा की सोलह कलायें हैं। भोगप्रवृत्ति को बढ़ानेवाली, द्रवित करने
वाली कला उल्लोला है। बड़े आकार की तरंगमयी कला कल्लोलिनी है, ऊपर
को चलनेवाली, प्रवृत्त होनेवाली उच्चलन्ती है। विषयसुख के प्रति मन को
उन्मादित करने वाली कला उन्मादिनी है, तरंगायित होने वाली कला तरंगिणी
है, जल और रस को सुखाने वाली कला शोषिणी है, लम्पटा चारों ओर फैलती
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २५